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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८५
अथ रूपस्थध्यान ॥
रूपस्थ ध्यानको भेद सुनि, कीजै मन ठहराय ।
देखै त्रिकुटी मध्य है, निश्चल दृष्टि लगाय ॥
ध्यान किये पहिले जहाँ, अगन फूल दृष्टाय ।
केते द्योसन माहिंहीं, दीप ज्योति प्रकटाय ॥
शनै शनै आगे जहां, दीपमाल दरशाय ।
फिरि तारों की मालसो, दामिनि बहु दमकाय ॥
बहुत चन्द सूरज घने, देखे कोटि अनन्त ।
अणुज्यों करि सूभर भरे, ध्यान माहिं दरशन्त ॥
झिलमिल झिलमिल तेजमय, भासै सब संसार ।
तन मन उपजै सुखघना, आनन्द अधिक अपार ॥
जल अथाह में डूबज्यों, देखै दृष्टि उघार ।
जो दीखै तौ नीरही, दश दिशि अपरम्पार ॥
यही ध्यान प्रत्यक्ष है, गुरू कृपासों होय ।
कहि शुकदेव वर्णदासकरि, तन मन आलस खोय ॥
अथ रूपातीतध्यान ॥
रूपातित शून्यध्यानहिंजानो । शून्यहि को परब्रह्म पिछानो ॥
त्रिकुटी परै शून्य अस्थान । सो वह कहिये पद निर्वान ॥
चिदानन्द ताकी हिय आनो । वाही में मनहीं को सानो ॥
आठपहर जहं चित्त लगावो । याके कीन्हे सों लयपावो ॥
ज्यों अकाश में पक्षी धावै । धावत धावत दृष्टि न आवै ॥
बहुरि अचानक दीखै आई । वह ध्यानी ऐसा ह्वै जाई ॥
इसपरमशून्यकाअधिकीध्याना । सब ध्यानन में है परधाना ॥
सो योगी यह लहै ठिकाना । सायुज्यमुक्तिहोइ जायनिदाना ॥