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सर्वकोश
भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 690 में से

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पृष्ठ 127

६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० कपाल भांति अरु धौंकनी, बाघी शंख पखाल ।
चारि कर्म ये औरहैं, इनहिं छहों के नाल ॥
इति त्राटककर्म ॥
अथ खेचरीमुद्रा ॥
शिष्यवचन
दो० एक बार फिरभी कहौ, मुद्रा पांच दयाल ।
मोसे रंक अधीनपर, होकर बहुत कृपाल ॥
गुरुवचन ॥
अष्टपदी ॥
आगे मुद्रा तोहिं कही समुझाइया ।
फिरभि कहूँ अब खोलि सुनौ वितलाइया ॥
पहिले मुद्राखेचरी को साधन भनूं ।
जैसे आगे करी सबी ऋषि मुनिजनूं ॥
ताते जलके कुरले करि जुबगाइये ।
तापाछे चौबस्त को चूर्ण लाइये ॥
जिह्वा हाथमें पकरि मर्दन छीलनकरै ।
दोहनताननकरै बहुरि दशनन धरै ॥
फिरि करि छीलन ताहि छेदनहिं कीजिये ।
तोतू ज्यों कटिजाय यत्न सोइ लीजिये ॥
ब्रह्मरंध्र को धोयकै मैल निवारिये ।
बायें अँगूठे ऊपर कागको धारिये ॥
सहज सहज सरकायकै आगे लाइये ।