भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)
Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas
सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
इड़ा पिंगला मारग थाकै । उलटि सुषमना चालनलागैं ॥
बायें खैंचना पूरक जानौ । ठहरावन को कुम्भक मानौ ॥
फेरि उतारै रेचक वोई । प्राणायाम कहावै सोई ॥
दो० इड़ा पवन पूरक करै, कुम्भक राखै रोक ।
रेचक पिंगल सों करै, मिटैं पापके थोक ॥
पिंगल रोकै पवन न जावै । इड़ा और सो वायु चढ़ावै ॥
कुम्भककरि हिय चिबुक लगावै । जितकातित मनको ठहरावै ॥
सोलह मात्रा पूरक लीजै । चौंसठि कुम्भकमें जपकीजै ॥
रेचक फिरि बत्तीस उतारै । धीरे धीरे ताहि निवारै ॥
पहिल पहिलही कीजै आधे । तीनि महीने ऐसे साधे ॥
यासे आगे फेरि बढ़ावै । दोय आठ अरु चारि चढ़ावै ॥
बढ़त बढ़त ऐसेही बढ़ै । योंहीं चौंसठि ताहीं चढ़ै ॥
इड़ा वायुसों पूरक कीजै । पिंगल सों रेचक तजिदीजै ॥
फिरि पिंगलसों पूरक धारै । बहुरि इड़ाहीसों निरवारै ॥
ऐसे बारीबारी करिये । जीते प्राण वायु अघ हरिये ॥
होयसकै कुम्भक सरकावै । चौंसठि से भी परै बढ़ावै ॥
शिष्यवचन ॥
दो० चरणदास करजोरिकह, सुनौ गुरू शुकदेव ।
कौन समै याको करै, राति दिना कहिदेव ॥
मात्रा कासों कहत हैं, जो बतलायो जाप ।
केतौ करै अहारही, जाको कहिये नाप ॥
गुरुवचन ॥
ॐ बिन्दी के सहितही, ताहि मात्रा जान ।
बीजमन्त्र तासों कहत, प्रणव को पहिंचान ॥
७० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
कोमल भोजन कीजिये, आधी रखिये भूख ।
पवन बसै सुखसों जहां, तन नहिं पावै दूख ॥
साठिघरी दिनराति की, आठ तासुके याम ।
लीजै चौथा भागही, कीजै प्राणायाम ॥
चारभाग ताके करै, चार समै ठहराय ।
चार चार घटिका करै, दृढ़ब्रत चित्तलगाय ॥
और दूसरी भांति सुनीजै । हो नसकै तौ याको कीजै ॥
बारह ॐ पवन चढ़ावै । कुम्भक माहिं बीस ठहरावै ॥
बारह पिंगल पवन उतारै । राति दिनामें चारहिबारै ॥
फेरि बढ़ावै कुम्भक दुगुनी । केते द्यौसन में फिर तिगुनी ॥
फिर पिंगल सों पूरक लीजे । इड़ा बायु रेचकही कीजे ॥
बिरिया एक इड़ा सों खेंचे । पिंगल दूजीबार जु एंचे ॥
कबहुँ यासू कबहुँ वासों । रेचक करै जो पूरक जासों ॥
कुंभक तिगुनी सो अधिकावे । होयसके जितनी सरकावे ॥
दो० भांति दूसरी और सुनि, साधन अधिक अनूप ।
गुरु बिन भेद न पाइये, महा गुप्त सों गूप ॥
अष्टपदी ॥
प्राण वायुकी युक्ति कहौं जेहि बातहै ।
द्वादश अंगुल नासिका आगे जातहै ॥
संयमही सों सहज जु उलट घटाइये ।
शनैशनैही साध जु ताहि समाइये ॥
अपान वायुको खेंचि प्राण घर लाइये ।
फिरि बाहर सों रोंकि जु तिन्हें मिलाइये ॥
तीनि कर्म पूरकके कुम्भकके कहे ।
१ धीरेधीरे ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७१
रेचकही के कर्म दोय निश्चय भये ॥
दो रेचक के कर्म पूरक के तीनहीं ।
ये सबही रहिजायँ होय जब छीनहीं ॥
पूरक रेचक छुटै केवल कुम्भकयही ।
ठौर समैका बंध न राखै नाशही ॥
या किरियाको अन्त जानौ तुम हां तहीं ।
प्राणवायु को रोकै कायाके महीं ॥
दो० साठहजार इक्कीसलख, सबके श्वास परमान ।
यह तौ रोकै देहमें, जबलग एकहि प्रान ॥
याकेहू ये सौ दिना, साधन भवै जु सिद्धि ।
केवल कुम्भक जानिये, पूरी हवै जु विद्धि ॥
अष्टपदी ॥
इतनी होवै शक्ति रुकन जब श्वासकीं ।
रहै नहीं परमाण जु गिनती मासकी ॥
द्वादशकै सौ बर्ष सहस कै लाखही ।
चाहै जब लग रखै सांच यह साखही ॥
गुप्त महा यह जान कठिन है साधना ।
कोटिनमें कोइ एक करै आराधना ॥
देखा देखी बहुत मनुष याकू लगैं ।
कोई चढ़ै परमान घने मगमेंथकैं ॥
चरणदास यह समझि कहें शुकदेवहीं ।
शनैशनै सों करै पांय या भेवही ॥
दो० मूल बंध अरु खेचरी, मुद्राही को जान ।
दोनोंके साधे बिना, होय अपान न प्रान ॥
खेचरि मुद्राकहूँ बखानै । जाको कोटिन में कोइ जानै ॥
७
७२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
सकल शिरोमणि योग मंझारी। ज्यों मनुषों में छत्तर धारी ॥
शीश फूल ज्यों गहनो माहीं । या बिन ताड़ी लागै नाहीं ॥
साधन कर कर जीभ बढ़ावै । सो ब्रह्मरंधरताईं लावै ॥
उरैताल वा ठौर कहावै । रसना सूं द्वां बंध लगावै ॥
जासूं पवन न सरकन पावै । श्रवण नैनजू बाट रुकावै ॥
प्राणवायु बाहर नहिं आवै । मुखनासा हो निकस न जावै ॥
शुकदेव कहैं चरणदास बताऊं । आगे मूलबंध समुझाऊं ॥
दो० मूल बन्ध जानौ यही, एंडी गुदा लगाव ।
थक दहनी वावीं कभी, सिध आसन ठहराव ॥
मूलबन्ध जा कारण दीजै । सो मैं कहूँ सबै सुनि लीजै ॥
अधार चक्रसूं पवन उठावै । स्वाधिष्ठानहिं के ढिग लावै ॥
दहिनी ओर कूं ताहि फिरावै । ऐसी तीन लपेट लगावै ॥
सीधा ह्वै ऊपर कूं धावै । मणिपूरक चकर में आवै ॥
शनई शनई ताहि चढ़ावै । चकर चकर में पहुंचावै ॥
भूचकर के ऊपर ताईं । ब्रह्मरंध्र के लावै ठाईं ॥
ऐसे षट चकर कूं शोधै । प्राण वायु को यों परबोधै ॥
अपान वायु जो ह्यांतक आव । प्राण वायु ह्वै सहज समावै ॥
शुकदेव कहै सुन चरणहिं दासा । सहज शून्यमें करै निवासा ॥
अथ अष्ट प्रकार के कुम्भक वर्णन ॥
शिष्यवचन ॥
दो० प्राणायाम की विधि सबै, गुरु तुम दई सुनाय ।
सो लेकरि हिरदै धरी, ताहि न देउं भुलाय ॥
चरणदासके शीश पर, तुम्हीं गुरु शुकदेव ।
कुम्भक अष्ट प्रकार के, तिनको कहिये भेव ॥
लक्षण नाम स्वभाव गुण, जुदे जुदे समुझाय ।
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७३
चरणदास के मन विषे, सुनबेको अति चाय ॥
गुरुवचन
अब आठौ कुम्भक कहूँ, नावँ भेद गुण रूप ।
शुकदेव कहैं परसिद्ध हैं, योगहि माहिं अनूप ॥
प्रथम कुम्भकही कहूँ, नावँ जु सूरज भेद ।
दूजे ऊजाई सुनो, साधे छूटै खेद ॥
शीतकार अरु शीतली, पाँचवीं भस्त्रक जान ।
छठीं जु अमरी नाम है, नीके समझि पिछान ॥
नावँ मूर्छा सातवीं, अठवीं केवल होय ।
रणजीता सबसे बड़ी, आयु बढ़ावै सोय ॥
पवन पूर पूरकही कीजै । पाछे बन्ध जलन्धर दीजै ॥
कुंभक रेचकके मधि जानौ । ह्याईं बन्ध उड्यान पिछानौ ॥
पवन जोरही सूं गहि लीजै । अध ऊर्ध्व संकोच न कीजै ॥
मध्यम कीजै पश्चिम तानै । ब्रह्म नारिके माहिं समानै ॥
नाड़ीं पवन खैंचिये ऐसे । भरिये सब संध्यान जु जैसे ॥
अपान वायु कुं ऊपर लावै । प्राण वायु नीचे लै जावै ॥
जोपै यह साधन बनि आवै । योगी बूढ़ा होन न पावै ॥
तरुण अवस्था देखै ऐसी । नितहीरहै जानिये जैसी ॥
अथ सूर्यभेदन ॥
कुं० कुम्भक सूरज भेदही, पहिले देहुं सुनाय ।
सुख आसन कै कीजिये, अथवा वज्र लगाय ॥
अथवा वज्र लगाय, पूरक दहिने स्वर कीजै ।
नख शिख सेती रोंकि, वायू कुं बन्ध करीजै ॥
७४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बायें सेती रेचिये, हौरै हौरै जान ।
कपाल धौंकनीजानिये, चरणदास पहिचान ॥
दो० वायु किरम पीड़ा हरै, कीजै वारंबार ।
कुम्भक सूरज भेदनी, शुकदेव कहै हियधार ।
अथ ऊजाई ॥
अब ऊजाई कुम्भक सुनिये । समझ सीखमन माहीं गुनिये ॥
दोउ सुर समकर पवन चढ़ावै । पेट कण्ठ लौं ताहि भरावै ॥
ताको रोकै दृढ़ करि राखै । सहजइड़ा सों रेचक नाखै ॥
ऐसे जो कोई साधन करै । रोग सलेषम के सब हरै ॥
हिरदय कण्ठ माहिं जो होई । कफका रोग रहै नहिं कोई ॥
रोग जलन्धरही का भागै । भजै वायु दुख पावक जागै ॥
बैठत चलत पवनको भरै । यही उजाई कुम्भक करै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । तीजी शीतकार समुझावै ॥
अथ शीतकार
दो० ओड़ जँभाई नासिका, लीजै खिंचै जु पौन ।
ताहि कछू ठहरायकै, छोड़ै मुख सों जौन ॥
धीरे धीरे खैंचिये, सीसी शब्द उचार ॥
सुन्दर होवै तेजवन्त, अधिक रूप को धार ॥
भूख प्यास व्यापै नहीं, आलस नींद न होय ।
तनचेतनही होत है, रहै उपाधि न कोय ॥
यहि विधि साधतही रहै, होय योगिन मैं भूप ।
चरणदास शुकदेव कहि, कुम्भक यही अनूप ॥
अथ शीतली
कहूँ शीतली कुम्भक आगे । जो कोइ करै भागतिहि जागे ।
तालु मूल जिह्वा बल सेती । प्राण वायु पीवै कर हेती ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७५
कुम्भक राखै सबतन माहीं । ढीला गात रमावै ह्वाहीँ ॥
नासा सेती रेचक कीजै । एकमास सिधिहो सुखलीजै ॥
पीजै पवन जीभको मोड़े । सहजै छोड़ै नासा ओड़े ॥
दोनों रंध्रसे तजि दीजै । यों अभ्यास पूर करलीजै ॥
ताप तिली गोला ज्वर होई । वाके तनमें रहै न कोई ॥
देह पुरानी नूतन होय । तीनि वरष साधै जो कोय ॥
जैसे सांप केंचुली भौंहिं । श्वेत बाल तजि काले होहिं ॥
काहू भांतिका दुख नहिं व्यापै । भूख प्यास तिसभाजै आपै ॥
अथ भस्त्रिका ॥
दो० अबकहूँकुम्भकभस्त्रिका, पित कफ वायु नशाय ॥
अगिनि बढ़ै अभ्याससों, तीनि गांठि खुलिजाय ॥
आसनपद्म सुयाविधि करै । बामजंघ दहिनो पग धरै ॥
बावों पग दहिनी पर लावै । जांघनसों दोउहाथ मिलावै ॥
ग्रीवा पेट बराबर राखै । आगे सुनु शुकदेवा भाखै ॥
मुख मूदै रेचै नासासूं । पूरक चपल करै श्वासासूं ॥
रेचक पूरक ऐसे कीजै । वारंवार तजै अरु लीजै ॥
जैसे खाल लोहारा भरै । रेचक पूरक आतुर करै ॥
करत करत जबहिं थकिजावै । नेक ठहरि दूजी विधि लावै ॥
फिरि पूरक सूरजसों करै । पवन उदरके माहीं भरै ॥
तर्जनि अँगुली सों दृढ़ रोकै । नासामध्य धारकरि जोखै ॥
दो० कुम्भक पिछली भांतिकरि, रेच इड़ासों वाय ।
कफ पित वायु नशायकै, लेवै अग्नि बढ़ाय ॥
कुण्डलिनी देवैजगा, यह कुम्भक सुखदाय ।
करै जुहित व्रत धारिकै, चरणदास चितलाय ॥
कुण्डलिनी सरकायकै, बेधै तीनों गांठ ।
७६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
ऐसी पँचवीं भस्त्रिका, रहै न कोई आंठ ॥
ब्रह्मनाड़िका के छिद्र माहीं। रोंकिरही मुखदेरहि ह्नाहीं ॥
लाय लपेटै नाभी ठाहीं। दृढ़है बैठी सरकै नाहीं ॥
सवा बिलस्त कि जाकीदेही। तामें अस्थित जीव सनेही ॥
शक्ति नांगिनी यही जु कहिये। याके भेद गुरूंसों लहिये ॥
महा अपरबल जागै नाहीं। ताते नर सब मरिमरि जाहीं ॥
कोइ इक योगी ताहि डुलावै। सुपमन बाट गगन लैजावै ॥
ब्रह्मरंध्र में जाय समावै। लगै समाधि बहुत सुखपावै ॥
जो कछु होय सो कहा न जावै। चरणदास शुकदेव सुनावै ॥
दो० शिव शक्ति भेलाभ वय, रहै न द्वितिया भाव ।
कुण्डलिनी परबोधका, जो कोइ करै उपाव ॥
शिष्यवचन ॥
व्यास पुत्र शुकदेवजी, किरिपाकरी दयाल ।
चरणदास आधीनही, समझो भयो निहाल ॥
एकबार फिरि खोलिकै, कुण्डलिनी समुझाव ।
याके सबही भेद को, सुनबेको अतिचाव ॥
गुरुवचन ॥
फिरभी तोसों कहतहौं, कुण्डलिनी विस्तार ।
ताके सगरे भेदही, सुनिकै हियमें धार ॥
नाभिस्थान नागिनि रहै, कुण्डल शशी अकार ।
प्राण पियारा वही है, आगे सुनो विचार ॥
कुंभक कर्म कोई करै, देवै शक्ति जगाय ।
जैसे लागी लष्टिका, नागन शीश उठाय ॥
सीखी गुरूंसों कुंभक साधै। नीकी विधि ताको अवराधै
पवन ठवकलग ताहि जगावै । तब ऊरध¹ को शीश उठावै ॥
नाभि ठौर ताका है वासा । पद्मराग मणि ज्यों परकासा ॥
सात लपेटे बाई जानौ । ताते शक्र कुण्डली मानौ ॥
नाड़ी सहस लगी हैं वाको । सोपर छुटी जानिको ताको ॥
जिनमें तीन नारि अधिकाई । इड़ा पिंगला सुषमन गाई ॥
तिनके माहिं शिरोमणिसुषमन । नालकमल जानतयोगी जन ॥
जायपहुंचि ब्रह्मरंधर ताहीं । ऊरध कमल सातवें माहीं ॥
आवन जोन पवन की बाटा । सकत चढ़न ऊरधका घाटा ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा । आगे कहूं जुहो परकासा ॥
दो० नागिनि सूक्ष्म जानिये, बाल सहस वा भाग ।
शुकदेव कहैं अँकारही, रक्त बरण ज्यों नाग ॥
कुंभक हो अत्यन्त जब, तब ऊरधको जाय ।
ब्रह्मरंध्र में आयकर, घड़ी दोय ठहराय ।
अमृत का करि पानही, पूरण हो अभ्यास ।
उड़ते देखै सिद्धि तब, वाको माहिं अकास ॥
पै देखत है नैन विनाहीं । चहै करै लीला उन माहीं ॥
खेचर मिलि खेचर है जावै । यह भी शक्ति उड़नकी पावै ॥
अधिकी ठहरै लगै समाधा । यह तौ कहिये खेल अगाधा ॥
शिवशक्ती जहाँ मेला होई । होय लीन मन उनमन सोई ॥
योग युक्ति करि याको पावै । परासक्त अपने बल लावै ॥
चाहै अर्द्ध ठौर लैआवै । जब चाहै ऊरध लैजावै ॥
कबहूं हिरदयके मधि आनै । याही को आपनपौ जानै ॥
इच्छा करै सिद्धि की जैसी । होय प्राप्त सो वेगिहि तैसी ॥
चहै अस्थूल सूक्ष्म तन धारूं । वैसाही होय जाय सबारूं ॥
१ ऊपर ॥
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति सटीक लिप्यंतरण (transcription) प्रस्तुत है:
कहि शुकदेव सुन चरणहिंदासै। जो कुंडलिनी हृदयप्रकासै ॥
दो० कुण्डलिनी परकाशही, भौंरा एक अनूप ।
सोउ प्रकाशत है तहां, सुवरण कोसो रूप ॥
हिरदयमें उजियारही, होत चपल यहि भांति।
जैसे धूमर मेघमें, बिजलीही दमकाति ॥
कहि शुकदेव चरणदास बताऊं। और अनूठी सिद्धि सुनाऊं ॥
चाहै परदेही में बरूं। अपनी कायाको परिहरूूं ॥
रेकच प्राणायाम प्रतापै। कुण्डलिनी जो अपनी आपै ॥
रेचक किये बाहरे आवै। परकायामें जाय समावै ॥
अस्थिर होय जाय ज्यों जानो। सदा विराजत ऐसे मानो ॥
ऐसे पहिली देह गिरावै। ज्यों मणिको डोरा ,तजिजावै ॥
जब चाहै अपने घट माहीं। परासक्तही आवै छाही ॥
काया पलट कहत है याको। कोइक योगी जानत ताको ॥
दो० चाहै तनको छोड़ करि, देह कलप धरि और ।
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ७६
अथ मूर्च्छा ॥
सतवीं कुम्भक मूरछा, पूरक ऐसे होय ।
खैंचत होवै सोरसा, मेघधार ज्यों जोय ॥
बन्ध जलन्धर दीजिये, सहज कण्ठ तल ताज ।
रेचित वाई मूरछित, होय यही पहिंचान ॥
सुखदायी सुखवृधि करन, कही सोइ शुकदेव ।
केवल कुम्भक आठवीं, गुरुसों पावै भेव ॥
पूरक रेचकही सहित, ये कुम्भक करि लेहि ।
केवल कुम्भकनामधै, जबलग ह्यां चित देहि ॥
केवल कुम्भक आशधरि, येहू साधत लोग ।
बलपावै वशपौन हो, और भजैं तन रोग ॥
अथ केवल कुम्भक ॥
आयु बढ़ावै सिद्धिदे, लागै और समाधि ।
केवल कुम्भक गुण भरी, बिन परमाण अगाधि ॥
केवल कुम्भक जब सधै, तब ये सब रहि जाहिं ।
जैसे सूरज उद्यते, तारे सब लुकि जाहिं ॥
केवल कुम्भक योग में, ज्यों नगरी में भूप ।
रेचक पूरक के विना, जैसे बँधा जु कूप ॥
सो तुम सों पहिले कही, विधिगति सब समुझाय ।
सो सुनि तुम हिरदयधरी, देहौना बिसराय ॥
प्राणायाम बड़ातप सोई । प्राणायाम सों बल नहिं कोई ॥
प्राण वायुको यह वश लावै । मनको निश्चल करि ठहरावै ॥
आयुर्दायको यही बढ़ावै । तनमें रोग रहन नहिं पावै ॥
पाप जलावै निर्मल करै । उपजै ज्ञान तिमिर सब हरै ॥
योग युक्ति की जड़ यह जानो । याहि टेकगहि करना ठानो ॥
८० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ।
अड़ि आसनसों याको कीजै। नवो द्वार पटनीके दीजै॥
पांचौ इन्द्रीके रस पेलौ। इड़ा पिंगला सुपमन खेलौ॥
कहि शुकदेव चरणहीं दासा। प्रत्याहार सुनि विषै निरासा॥
इति चौथाप्राणायामअंग सम्पूर्णम् ॥
अथ पांचवां प्रत्याहारअंग वर्णन॥
दो०-प्रत्याहार जो पांचवां, समझाऊं चर्णदास।
शुकदेव कहकहूँ खोलकरि, नीके समझौ तास॥
प्रत्याहार पांचवां कहिये। सो योगीको निश्चय चहिये॥
विषय ओर इन्द्री जो जावै। अपने स्वादन को ललचावै॥
तिनकी ओर न जाने देई। प्रत्याहार कहावै एई॥
रोंकिरोंकि इन्द्रिनको लावै। ध्यान आतमा माहिं लगावै॥
जैसे कछुआ अंग समेटै। रंक शीतकाला में लेटै॥
जैसे माता पूत खिलावै। बालक वस्तू कों ललचावै॥
सरप आग अरु शस्तर कोई। कछू और दुखदायी होई॥
तिनको बालक नाहीं जानै। पकड़नको दौड़ै मन आनै॥
दो०-बालक जानत है नहीं, दुखदायी सब एह।
जो पकरूंगा हाथ से, दुख पावैगी देह॥
माता जानत है सबै, खोंटी खरी विकार।
राखै सुतको खैंचिकरि, वारंवार निहार॥
ऐसेही बुधि ज्ञान सों, पांचौ इन्द्री रोक।
विषय ओरसों फेरिये, लहै न अपना भोग॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८१
ज्यों ज्यों इनको भोगदै, परबल हाती जाहिं ।
विना भोग होहीं नहीं, वह बल रहै जुनाहिं ॥
नैन जु भोगैं रूप को, और गन्ध को घ्रान ।
षटरस भोगै जीभही, शब्दहि भोगै कान ॥
त्वचा भोगि अस्पर्शको, बाढ़ै अधिक विकार ।
पांचौ इन्द्री जानिले, इनका यही अहार ॥
इनसेमिलिमिलि मनबिगड़ि, होयगया कछुऔर ।
इन्द्री रोकै मन रुकै, रहै जु अपनी ठौर ॥
ज्यों ज्यो होवै प्राणवश, त्यों त्यों मनवश होय ।
ज्यों ज्यों इन्द्री थिररहें, विषयजाय सब खोय ॥
ताते प्राणायाम करि, प्राणायामहिं सार ।
पहिले प्राणायामकर, पीछे प्रत्याहार ॥
इति प्रत्याहारअंगसम्पूर्णम् ॥
अथ षष्ठधारणाअंग वर्णन ॥
दो० तत्त्वनकी कहुँ धारणा, तिनमें करै प्रवेश ।
शनैःशनैः साधिकरि, पहुँचे निर्भयदेश ॥
पहिले भूमि धारणा कीजै । ठौर कालजेमें चितदीजै ॥
पीतवरण चौकोर अकारो । विधि दैवत है तहां विचारो ॥
प्राण लीनकरि पांचघड़ीहीं । चित अस्थिर होवैगा जबहीं ॥
यासों पृथिवीको वश करिये । यही धारणा जो चित धरिये ॥
हिरदै से ऊपर जल जानो । कण्ठतईं ताको पहिंचानो ॥
८२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
चन्दफांक अरु श्वेत अकारो । हृषीकेश तहँ देव निहारो ॥
ह्यां हूं पांच घरी अस्थापै । प्राणलीन करि चितदै आपै ॥
व्यापैना विष काहू विधिको । शुकदेवकहैंफलजलकेसिधिको ॥
दो० कण्ठसे ऊपर तालुका, लो पावक अस्थान ।
लालरंग तिरकोन है, रुद्र देवता मान ॥
तहां लीन करि प्राणको, पांच घड़ी परमान ।
भय व्यापै नहिं ज्वालको, अग्निधारणा जान ॥
जाके आगे वायु है, भृकुटीलौं मर्य्याद ।
मेघ बरण षटकोन है, ईश्वर देवत साध ॥
प्राणलीन तहँ कीजिये, पांच घड़ी रे तात ।
पैहै खेचर सिद्धिही, तत पदही ह्वै जात ॥
ब्रह्मरंध्र आकाश है, बड़ा जु तत्त्व न माहिं ।
श्याम बरण ब्रह्म देवता, योगी जहां सिराहिं ॥
प्राण लीन घटि पांचकरि, पावै मुक्ति अनूप ।
व्योमतत्त्व की धारणा, जहां छाँह नहिं धूप ॥
पृथ्वी संग लकारही, जल के संग बकार ।
पावक संग रकार है, मारुत संग मकार ॥
पंचम तत्त्व आकाश ही, सब के ऊपर जान ।
अक्षर जहां हकारही, शुकदेव कहै बखान ॥
पहिलिं धारणा थंभनी, दूजी द्रावण होय ।
तीजी दहनी जानिये, चौथी आमनी सोय ॥
पँचवीं नाम जु शंखिनी, इनको लेवो जान ।
शुकदेवा अब कहत है, आगे और विधान ॥
गुरु की प्रथम धारणा लीजै । अपना रूप उन्हीं सा कीजै ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८३
ऐसे ध्यान सभी सुधि पावै । जैसी धारै सो होयजावै ॥
वेगिहि सब साधन सधि आवै । आलस कायरता भजिजावै ॥
लोक परलोक सभी सुख लेवै । जो गुरु को ऐसो व्रत सेवै ॥
दूजे परमातम की धारण । मुक्तिदेन अरु बंध निवारण ॥
धारनसों चित घना लगावै । सिमिटि सभी ओरनसों आवै ॥
जो कछु होय सो आगेहि आगै । टेक पकरि मारग में लागै ॥
चरणदास शुकदेव बतावै । सती शूरमा ज्यों मन लावै ॥
दो० प्राण वायुकी धारणा, परमेश्वर पहिंचान ।
परमातम ह्वै जात है, जोपै रोके प्रान ॥
बारह मात्रा सों चढ़ै, ह्वां तक पहुँचै जाय ।
बारह सै अरु छानवे, कुम्भक में ठहराय ॥
यही धारणा अंग है, शनै शनै कर ध्याव ।
याते दुगुनी ध्यान में, प्राण वायु परचाव ॥
दूजा जानि समाधि लो, ध्यानहिं सेती एहु ।
पांच सहस अरु एकसौ, चौरासी गिनिलेहु ॥
इति धारणांगसम्पूर्णम् ॥
अथ सातवांअंग वर्णन ॥
शिष्यवचन ॥
दो० अंग धारणा का कहा, सो धारा चितमाहिं ।
ध्यान अंग बरणन करौं, मैं रहुँ चरणन छाहिं ॥
८४
श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
चरणदास अब ध्यान सुन, कहूं तोहिं समुझाय ।
कहिशुकदेवसोसुनिसमुझि, करौ ताहि चितलाय ॥
ध्यान जु चारि प्रकार के, कहूं जु उनकी रीत ।
पदस्थ पिंड रूपस्थ है, चौथा रूपातीत ॥
अथ पदस्थध्यान ॥
हिय पदपंकज ध्यानकरि, फिरि करि सारी देह ।
नखशिखलौं छविनिरखिकै, चरणन में चितदेह ॥
कै कुंभकही कीजिये, ह्वां प्रणव का जाप ।
मन निश्चल हो सहजमें, भाजैं त्रैविधि ताप ॥
पदस्थ ध्यान याको कहैं, करै सो जानै भेव ।
पिंडस्थ ध्यान वर्णन करें, खोलि खोलि शुकदेव ॥
अथ पिंडस्थध्यान ॥
ब्रह्म सोई यह पिंड है, यामें करि करि वास ।
कमलन के लखि देवता, लहो परापत तास ॥
सोधे सिगरे पिंडको, षट चक्रहु को ध्यान ।
शोधत शोधत आचढ़ै, भवँर गुफा अस्थान ॥
तिरवेणी संगम बहै, ज्योति जहां दरशाय ।
सातजन्म सुधि होय जब, ध्यान करै मनलाय ॥
आगे कमल हजार दल, सतगुरु ध्यान प्रधान ।
अमृत द्रवे बहिचलै, हंस करै जहँ न्हान ॥
ऊपर तेजहि पुंज है, कोटि भानु परकास ।
शून्य शिखर ताऊपरै, योगी करै विलांस ॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८५
अथ रूपस्थध्यान ॥
रूपस्थ ध्यानको भेद सुनि, कीजै मन ठहराय ।
देखै त्रिकुटी मध्य है, निश्चल दृष्टि लगाय ॥
ध्यान किये पहिले जहाँ, अगन फूल दृष्टाय ।
केते द्योसन माहिंहीं, दीप ज्योति प्रकटाय ॥
शनै शनै आगे जहां, दीपमाल दरशाय ।
फिरि तारों की मालसो, दामिनि बहु दमकाय ॥
बहुत चन्द सूरज घने, देखे कोटि अनन्त ।
अणुज्यों करि सूभर भरे, ध्यान माहिं दरशन्त ॥
झिलमिल झिलमिल तेजमय, भासै सब संसार ।
तन मन उपजै सुखघना, आनन्द अधिक अपार ॥
जल अथाह में डूबज्यों, देखै दृष्टि उघार ।
जो दीखै तौ नीरही, दश दिशि अपरम्पार ॥
यही ध्यान प्रत्यक्ष है, गुरू कृपासों होय ।
कहि शुकदेव वर्णदासकरि, तन मन आलस खोय ॥
अथ रूपातीतध्यान ॥
रूपातित शून्यध्यानहिंजानो । शून्यहि को परब्रह्म पिछानो ॥
त्रिकुटी परै शून्य अस्थान । सो वह कहिये पद निर्वान ॥
चिदानन्द ताकी हिय आनो । वाही में मनहीं को सानो ॥
आठपहर जहं चित्त लगावो । याके कीन्हे सों लयपावो ॥
ज्यों अकाश में पक्षी धावै । धावत धावत दृष्टि न आवै ॥
बहुरि अचानक दीखै आई । वह ध्यानी ऐसा ह्वै जाई ॥
इसपरमशून्यकाअधिकीध्याना । सब ध्यानन में है परधाना ॥
सो योगी यह लहै ठिकाना । सायुज्यमुक्तिहोइ जायनिदाना ॥
योगसार एवं अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि)
८६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
दो० यासों लगै समाधिही, निद्रा कहिये योग।
ध्याता होवै लीनही, रहै न त्रिपुटी रोग॥
सतवाँ कहाजु ध्यानहीं, अठवीं कहूँ समाधि।
ज्ञान ध्यान जहँ वीसरै, तहां न विद्यावाद॥
इति ध्यानाङ्गसम्पूर्णम्॥
अथ आठवां समाधि अङ्गवर्णन ॥
अष्टपदी छन्द ॥
अठवीं कहूँ समाधि लक्षण वर्णन करूं।
तोको सब समुझाय तेरी दुविधा हरूं॥
जबहीं लगै समाधि योगी आनन्द लहै।
योग भया सिध जानि क्रिया कोइ ना रहै॥
मिलि ध्याता अरु ध्यान एक होव जहां।
दूजारहै न भाव मुक्ति वर्तै जहां॥
निरउपाधि निर्खेद ऐसा वह देश है।
करम भरम अरु धरम नहीं कोइ लेश है॥
आपार है न कोय सकल आशागरै।
चिन्ताका दुख नाहिं वासना सब जरै॥
पंच विषय जहं नाहिं नहीं गुणतीनहीं।
होवै ब्रह्म स्वरूप जीवता क्षीनहीं॥
जाग्रत स्वप्न सुषोप्ति जहां होवै नहीं।
चौथे पद को पाय होय जहँ लीनहीं॥
अष्टाङ्गयोगवर्णन ८७
ऐसे कहै शुकदेव सुनौ चर्णदासही।
यह निर्द्वन्द्व समाधि करौ जहां वासही॥
दो० जहां कछू गम ना रहे, विद्या वेद न वाद।
ऋधिसिधि मिटि आनंदलहै, ऐसी शून्य समाधि॥
अष्टपदी छन्द॥
तहां किये परवेश रहै न अकारही।
रूप नाम गुण क्रिया यही साकारही॥
पाप पुण्य सुख दुःख जहां नहिं पाइये।
सतमारग कुल धर्म न देत दिखाइये॥
भूख प्यास अरु उष्ण जहां नहिं शीत है।
हर्ष शोक नहिं नेक वैर नहिं प्रीत है॥
इन्द्री मन नहिं रहत गलत है जात है।
सिध साधक गुरु शिष्य न भाव रहात है॥
उडुगन चन्द्र न सूर न दिवस न रात है।
त्वंपद ईश्वर ब्रह्म न जान्यो जात है॥
जैसे जल में नीर क्षीर में क्षीरही।
असि पद में यों जीव नीर में नीरही॥
अहं मिटै मिटि जाय जु आपा थोकही।
ना परमातम आतम बंध न मोषही॥
ऐसे कह शुकदेव यों होय समाधि में।
वैसोही है जाय सोई था आदि में॥
दो० हुता आदि परमात्मा, बिचउठि लगा विकार।
मिलि समाधि निर्मल भवै, लहै रूप ततसार॥
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८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी छन्द
जहँ आतमदेव अभेव सेव्य नहिं सेवैहै ।
स्वामीजी ह्वां नाहिं पूजा नहिं देव है ॥
नौधा¹ नेम न प्रेम ज्ञान नहिं ध्यान है ॥
जड़ चेतन कछु नाहिं सुरति नहिं ज्ञान है ॥
विधि निषेध नहिं भेद अन्वैवितरेकना ।
निश्चय अरु व्यवहार कछू तामें न ह्वा ॥
उत्तम मध्यम भाव न शुभ ना अशुभहै ।
सिंह सर्प डरनाहिं औ शस्तर कोन मै ॥
पावक दग्ध न करै बहावै जल नहीं ।
ह्वां नहिं पहुँचे काल न ज्वालाहै तहीं ॥
ऐसा भवन समाधि भाग्य सों पाइये ।
तजि कै जक्त उपाधि तहां मठ छाइये ॥
यतन करै लख माहिं और सब भेषही ।
कोटिनमें कोइ होय समाधी एकही ॥
ह्वांतक पहुंचै जाय सोई सिध साध है ।
कहै शुकदेव पुकारि जु 'कठिन समाधि है ॥
दो० भक्ति योग अरु ज्ञान की, त्रैविधि कहूँ समाधि ।
गुरू मिलै तौ सुगमहै, नाहीं कठिन अगाधि ॥
अथ भक्तिसमाधि ॥
सब इंद्रिन को रोंकिकै, करि हरि चरणन ध्यान ।
बुद्धि रहै सुरत रहै, तौ समाधि मत मान ॥
ध्याता बिसरै ध्यान में, ध्यान होय लय ध्येह ।
बुद्धि लीन सुरत न रहै, पद समाधि लखिलेह ॥
१ श्रवण कीर्तन स्मरण पादसेवन अर्चन वंदन दास्य सख्य आत्मनिवेदन ॥