भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
अविभाज्य हैं, सामान्य हित के लिए समान रूप से सांघातिक हैं : एक वर्ग से
निरंकुश पैदा होते हैं, तो दूसरे वर्ग से, निरंकुशता के समर्थक : हमेशा इन्हीं दोनों
के बीच सार्वजनिक स्वतन्त्रता का व्यापार चलता रहता है : एक ख़रीदता है, दूसरा
बेचता है।¹
पृष्ठ 182 (117)
“ओलावृष्टि कुछेक क्षेत्रों को बरबाद कर डालती है, पर इससे अकाल बिरले
ही पड़ता है। दंगे-फसाद और गृहयुद्ध सदारत करने वाले लोगों को काफ़ी चौंका
देते हैं; फिर भी वे राष्ट्रों के लिए कोई वास्तविक संकट नहीं पैदा करते, जब तक
इस बात को लेकर विवाद चलता है कि कौन उन पर निरंकुश शासन करे। उनकी
वास्तविक समृद्धि या विपदाएँ तो उनकी स्थायी स्थितियों से पैदा होती हैं। जब
सब कुछ जुवे तले कुचल कर रख दिया जाता है, तभी सब कुछ नष्ट हो जाता
है; तभी ये शासक, इत्मीनान से सब कुछ नष्ट करने के बाद, एक मुर्दा ख़ामोशी
पैदा कर देते हैं, जिसे वे शान्ति कहते हैं।”
पृष्ठ 176²
पृष्ठ 183 (118)
फ्रांसीसी क्रान्ति³ :
अमेरिका : अमेरिकी स्वतन्त्रता-संग्राम का फ्रांस की स्थिति पर भारी प्रभाव
पड़ा। (1776)
टैक्स :
‘राजा’ के नाम पर काम करने वाले कोर्ट या मन्त्रिमण्डल ने मनमाने ढंग से
टैक्सों के फ़रमान तैयार किये और उसे पार्लियामेण्ट⁴ में इन्दराज किये जाने के लिए
भेज दिया, क्योंकि जब तक पार्लियामेण्ट उनका इन्दराज नहीं कर लेती, तब तक
वे लागू नहीं हो सकते थे।
कोर्ट का दावा था कि पार्लियामेण्ट की सत्ता को एतराज़ का कारण बताने
के अलावा और कोई अधिकार न था, जबकि वह (यानी कोर्ट या मन्त्रिमण्डल)
अपने पास यह फ़ैसला करने का अधिकार सुरक्षित रखे हुए था कि कारण
वाजिब हैं या ग़ैर-वाजिब, और कि तदनुसार ही वह अपनी मर्ज़ी से चाहे तो
- वही 2. वही
- फ्रांसीसी क्रान्ति के बारे में भगतसिंह के इन नोट्स के स्रोत का पता नहीं चलता।
- पार्लियामेण्ट : वास्तव में यह कोई निर्वाचित प्रतिनिधियों का निकाय नहीं, बल्कि राजा
के सलाहकारों का एक निकाय या इजलास हुआ करती थी।
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फ़रमान वापस ले ले या बाक़ायदा उसे आधिकारिक तौर पर इन्दराज किये जाने
का आदेश जारी कर दे।
दूसरी तरफ़, पार्लियामेण्ट का दावा था कि उसके पास इन्कार कर देने का
अधिकार था।
मन्त्री एम. कैलोन¹ को मुद्रा चाहिए थी। वह टैक्सों के मामले में पार्लियामेण्ट
के कड़े रुख से परिचित था। उसने **“असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स”**² आहूत की
(1787)।
यह स्टेट्स-जनरल नहीं थी, जोकि चुनी जाती थी, बल्कि इसके सभी सदस्य
राजा द्वारा मनोनीत किये गये थे और इसमें कुल 141 सदस्य थे। तब भी वह
बहुमत का समर्थन हासिल न कर सका। तब उसने इसे 7 कमेटियों में विभक्त
कर दिया। प्रत्येक कमेटी में 20 सदस्य थे। हरेक सवाल कमेटियों में बहुमत से
और असेम्बली में कमेटियों के बहुमत से तय किया जाता था। उसने किन्हीं चार
या प्रत्येक कमेटी में 11 ऐसे सदस्य रखने की कोशिश की, जिन पर वह विश्वास
कर सकता था। लेकिन उसकी ये युक्तियाँ भी असफल रहीं।
पृष्ठ 184 (119)
एम. द लफ़ायत⁴ एक दूसरी कमेटी का उपाध्यक्ष था। उसने एम. कैलोन पर
- चार्ल्स अलेक्सान्द्र द कैलोन (1734-1802), फ़्रांसीसी राजनीतिज्ञ, जो नवम्बर 1783 में
वित्तमन्त्री बना। - असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स : राज्य का ख़ज़ाना खाली होने के कारण, वित्तमन्त्री कैलोन
शाही ख़ज़ाने के लिए क़र्ज़ लेना चाहता था, परन्तु पार्लियामेण्ट ने इसे मंजूर नहीं किया। तब
उसने राजा को सलाह दी कि आन्तरिक सीमाशुल्कों को ख़त्म कर दिया जाये और नोटेबल्स
यानी कुलीनों और पादरियों पर टैक्स लगा दिया जाये। इसके लिए कुलीनों की एक सभा
(असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स) जनवरी 1787 में बुलायी गयी। परन्तु कुलीनों ने अपने
विशेषाधिकारों में कटौती किये जाने का विरोध कर दिया। - स्टेट्स जनरलः यह कुलीन वर्ग, पादरी वर्ग और बुर्जुआ वर्ग से चुने गये प्रतिनिधियों की
एक सभा थी। - मार्क्विस द लफ़ायत (1757-1834) : अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम और फ्रांस की क्रान्ति
में भाग लिया। वह फ़्रांसीसी सेना का कर्नल (1779) और बाद में मेजर जनरल (1781)
भी रहा; 1790 में उसकी तरक़्क़ी नेशनल गार्ड ऑफ़ पेरिस के कर्नल-जनरल पद पर हो गयी,
और उसने क्रान्ति के आरम्भिक दौरों में बहुत सक्रिय भूमिका निभायी। लेकिन 1792 में
संवैधानिक राजतन्त्र का समर्थन करने के कारण असेम्बली ने उसे गद्दार क़रार कर निर्वासित
कर दिया। अपने निर्वासन काल में भी वह अपनी क्रान्तिकारी भूमिका के कारण 5 वर्षों तक
प्रशा, जर्मनी, और आस्ट्रिया की जेलों में क़ैद रहा, और नेपोलियन बोनापार्ट के हस्तक्षेप से
ही जेल से रिहा होकर 1799 में फ़्रांस लौटा।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 659
दो मिलियन लाइवर में शाही ज़मीन बेच डालने का आरोप लगाया। इसे उसने
लिखित रूप में भी पेश किया। उसके कुछ ही समय बाद, एम. कैलोन को
बरख़ास्त कर दिया गया।
तोलूस का आर्कबिशप प्रधानमन्त्री और वित्तमन्त्री नियुक्त हुआ। उसने
पार्लियामेण्ट के समक्ष दो प्रकार के टैक्सों का प्रस्ताव रखा - स्टाम्प टैक्स और
एक क़िस्म का भूमि टैक्स। इस पर पार्लियामेण्ट ने जवाब दिया,
कि राष्ट्र अब तक जिस तरह के राजस्व की हिमायत करता आ
रहा है, उसके साथ टैक्सों की चर्चा उनमें कटौती करने के अलावा
और किसी भी उद्देश्य से नहीं करनी चाहिए,
और उन दोनों ही प्रस्तावों को उठाकर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। तब उन्हें
वर्साई बुलाया गया, जहाँ राजा ने 'ए बेड ऑफ़ जस्टिस' नाम से एक विशेष बैठक
की और उन प्रस्तावों का इन्दराज कर लिया। पार्लियामेण्ट पेरिस लौट गयी। वहाँ
एक अधिवेशन किया। वर्साई में की गयी प्रत्येक कार्यवाही को गैर-क़ानूनी क़रार
देते हुए, इन्दराज को रद्द कर देने का आदेश दिया। तब सबको 'लेटर डि कैशेत्स'
नामक शाही फ़रमान जारी हुआ और सभी को निर्वासित कर दिया गया। फिर बाद
में उन्हें वापस बुला लिया गया। और फिर वे ही फ़रमान उनके सामने रखे गये।
[पृष्ठ 185 (120) पर जारी]
फिर स्टेट्स जनरल की बैठक बुलाने का सवाल उठा। राजा ने इसके लिए
पार्लियामेण्ट से वादा किया। लेकिन मन्त्रिमण्डल ने विरोध किया, और एक 'फुल
कोर्ट' गठित करने का नया प्रस्ताव रखा। लेकिन इसका दो आधारों पर विरोध हुआ
: पहला यह कि सैद्धान्तिक आधार पर सरकार को स्वयं को बदलने का कोई
अधिकार नहीं था। इस तरह की नज़ीर नुक़सानदेह होगी। दूसरा विरोध स्वरूप को
लेकर था, इसके विरोध में यह दलील दी गयी कि यह एक विस्तारित मन्त्रिमण्डल
के अलावा और कुछ न होता।
अतः पार्लियामेण्ट ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब उसे सशस्त्र सेनाओं से
घेर लिया गया। कई दिनों तक यह घेरेबन्दी चलती रही। फिर भी पार्लियामेण्ट
अपनी बात पर अड़ी रही। तब उसके कई सदस्यों को गिरफ़्तार करके अलग-अलग
जेलों में भेज दिया गया।
इसका विरोध-प्रदर्शन करने के लिए ब्रिटैनी से एक प्रतिनिधिमण्डल आया।
उसके सदस्यों को बास्तीय (जेल) भेज दिया गया।
'असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स' फिर बुलायी गयी, और स्टेट्स जनरल की बैठक
बुलाने के लिए फिर वही तरीक़ा अपनाने का फ़ैसला किया गया, जो 1614 में
अपनाया गया था।
पार्लियामेण्ट ने तय किया कि इसके लिए कुल 1200 सदस्यों में से 600
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साधारण जनता से, 300 पादरी वर्ग से, और 300 कुलीन वर्ग से चुने जाने चाहिए।
स्टेट्स जनरल¹ की बैठक मई 1789 में हुई। कुलीन वर्ग और पादरी वर्ग
के प्रतिनिधि दो अलग-अलग कक्षों में बैठे।
<u>पृष्ठ 186 (121)</u>
तीसरी श्रेणी, या साधारण जनता के प्रतिनिधियों ने पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग
के इस अधिकार को मानने से इन्कार कर दिया और स्वयं को 'राष्ट्र के प्रतिनिधि'
घोषित करते हुए, अपने कक्ष में साथ बैठे राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के अलावा, अन्य
किसी भी हैसियत के किसी भी सदस्य का कोई भी अधिकार मानने से इन्कार
कर दिया। इस प्रकार, स्टेट्स जनरल ही 'राष्ट्रीय असेम्बली' हो गयी। उसने दूसरे
कक्षों में आमन्त्रण भेजे। पादरी वर्ग के प्रतिनिधियों की अधिकतर संख्या उनके साथ
आ गयी। कुलीन वर्ग के 45 सदस्य उनके साथ आ गये, फिर उनकी संख्या
बढ़कर 80 और बाद में उससे भी अधिक हो गयी।
<u>पृष्ठ 187 (122)</u>
टेनिस कोर्ट की शपथ
कुलीन वर्ग और पादरी वर्ग के दुष्ट तत्त्व राष्ट्रीय असेम्बली को उखाड़ फेंकना
चाहते थे। उन्होंने मन्त्रिमण्डल के साथ मिलकर षड्यन्त्र रचा। राष्ट्र के प्रतिनिधियों
की मौजूदगी में ही कक्ष का दरवाज़ा बन्द कर दिया गया और उस पर अंगरक्षक
सेना का पहरा बैठा दिया गया। तब वे एक टेनिस कोर्ट की ओर बढ़ गये, और
वहाँ सबने मिलकर शपथ खायी कि जब तक वे एक संविधान की स्थापना नहीं
कर लेते, तब तक अलग नहीं होंगे।
बास्तीय²
दूसरे दिन कक्ष का दरवाज़ा उनके लिए फिर खोल दिया गया। लेकिन
चुपके-चुपके 30 हज़ार की फ़ौज पेरिस को घेरने के लिए रवाना की जा चुकी थी।
- स्टेट्स जनरल : 175 वर्ष के लम्बे अन्तराल के बाद मई 1789 में इसकी बैठक हुई।
ख़ज़ाना ख़ाली हो जाने के कारण मजबूर होकर सम्राट लुई चौदहवें को सामन्तों, चर्च और
बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधियों की यह बैठक बुलानी पड़ी। पहली दोनों श्रेणियों के क़रीब
300-300 और तीसरी श्रेणी के इससे दोगुने प्रतिनिधि आये। जल्द ही यह एक नये राजनीतिक
संघर्ष का केन्द्र बन गयी। जनता के प्रतिनिधियों ने बढ़कर पहल अपने हाथ में ले ली। फ़्रांसीसी
क्रान्ति के तूफ़ानी घटनाक्रम की शुरुआत इसी से हुई। - बास्तीय : पेरिस से कुछ दूर स्थित बास्तीय का क़िला, जहाँ राजतन्त्र विरोधी बन्दियों
को रखा और यातनाएँ दी जाती थीं, निरंकुशता और दमन का एक घृणित प्रतीक था। 14
जुलाई 1789 को निहत्थी जनता की भीड़ ने इस पर धावा बोलकर क़ब्ज़ा कर लिया।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 661
पेरिस की निहत्थी भीड़ ने बास्तीय पर धावा बोल दिया, बास्तीय का पतन हो गया।
14 जुलाई 1789
वर्साई¹ :
5 अक्टूबर 1789 — हज़ारों स्त्री-पुरुष राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति अंगरक्षक सेना
द्वारा किये गये गुस्ताख़ी भरे व्यवहार का बदला लेने के लिए वर्साई की ओर कूच
कर गये। इसे वर्साई अभियान के नाम से जाना जाता है। उसके बाद घटी घटनाओं
के फलस्वरूप राजा को पेरिस लाया गया।
पृष्ठ 188 (123)
प्रत्येक राष्ट्र का विवेक जब जाग जाता है, तो वह अपने सभी उद्देश्यों के लिए
पर्याप्त सिद्ध होता है। (पृष्ठ 112, राइट्स ऑफ़ मैन)²
चूँकि हर काल में सरकार का स्वरूप पूरी तरह से राष्ट्र की इच्छा का ही
मामला रहा है, यानी कि अगर उसने राजतन्त्रात्मक स्वरूप चुना, तो ऐसा करने का
उसे अधिकार था; और उसके बाद अगर उसने गणतान्त्रिक होना पसन्द किया, तो
उसका अधिकार था कि वह गणतान्त्रिक हो, और राजा से यह कहे कि "अब
तुम्हारे लिए हमारे पास कोई गुंजाइश नहीं है।"
हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में, मन्त्री अर्ल ऑफ़ सेलबोर्न³
पृष्ठ 189 (124)
राजा :
यदि कहीं कोई ऐसा आदमी हो जो अन्य सबसे लोकोत्तर रूप में इतना अधिक
बुद्धिमान हो कि राष्ट्र के संचालन के लिए उसकी बुद्धि ज़रूरी हो, तब तो राजशाही
का कुछ औचित्य माना जा सकता है, लेकिन जब हम किसी देश पर नज़र दौड़ाते
हैं और देखते हैं कि कैसे उसका हरेक हिस्सा अपने मामलों की सूझबूझ रखता
- वर्साई : पेरिस से कुछ दूर स्थित वर्साई के महलों में राजा और उसके मन्त्रियों का
ठिकाना था जहाँ से वे सेना के सहारे क्रान्ति को दबाने की कोशिश कर रहे थे। 5 अक्टूबर
1789 को हज़ारों लोगों ने वर्साई पर धावा बोला और राजा लुई चौदहवें, रानी मैरी
अन्तोयनेत तथा उनके अमले को बन्दी बनाकर पेरिस ले आये। - टॉमस पेन की रचना राइट्स ऑफ़ मैन से (देखें पृष्ठ 14 (11) का सन्दर्भ 3)
- प्रथम अर्ल ऑफ़ सेल्बोर्न राउन्डेल पामर (1812-1895) या उसका पुत्र द्वितीय अर्ल
ऑफ़ सेल्बोर्न विलियम वाल्डग्रेव पामर (1859-1942)। दोनों ही ब्रिटिश संसद के सदस्य
थे।
पेन और सेल्बोर्न के उद्धरण मोटे अक्षरों में पेज पर तिरछे लिखे हुए हैं।
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है; और जब हम पूरी दुनिया पर नज़र दौड़ाते हैं और देखते हैं कि इसमें रहने वाले
सभी मनुष्यों में से राजाओं का ही वंश ऐसा है जो अपनी क्षमता में सबसे नगण्य
है, तब हमारी बुद्धि इस सवाल पर चकराने लगती है कि – आख़िर इन लोगों को
क्यों बरक़रार रखा गया है? 112¹
अपमानकर्ता :
“यदि टैक्सों के जुल्मो-सितम को ख़त्म करने की गरज से राजशाही और हरेक
क़िस्म की वंशानुगत सरकार की धोखाधड़ी और छल-कपट से भरी टैक्स-नीति
का भण्डाफोड़ करना – असहाय बच्चों की शिक्षा तथा बूढ़ों एवं मुसीबत के मारे
लोगों की सहायता की योजनाएँ प्रस्तावित करना – युद्ध के घृणित चलन को ख़त्म
करना – सार्वभौमिक शान्ति, सभ्यता और वाणिज्य को प्रोत्साहित करना – और
राजनीतिक अन्धविश्वास की बेड़ियों को तोड़ डालना, तथा अधोगति के शिकार
मनुष्य को उसकी वाजिब गरिमा तक उठाना – यदि ये सब चीजें अपमानजनक
हैं, तो मुझे एक अपमानकर्ता का जीवन जीने दो, और मेरी क़ब्र पर “अपमानकर्ता”
का नाम खुदवा देना।” xi²
पृष्ठ 140 (125)
लेकिन जब स्थान नहीं बल्कि सिद्धान्त कर्म को ऊर्जस्वित करने वाला कारण
बन जाता है, तो मैं देखता हूँ कि आदमी हर जगह एक ही जैसा हो जाता है।³
मृत्यु :
यदि हम अमर होते तो बहुत दुखी होते, इसमें कोई शक नहीं कि मरना कठिन
है, पर यह सोचना मधुर लगता है कि हम हमेशा जीते ही नहीं रहेंगे।⁴
( पृष्ठ 45, एमिली)
समाजवादी व्यवस्था :
“प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के
अनुसार।”⁵
- टॉमस पेन, राइट्स ऑफ़ मैन
- ब्रिटिश सरकार द्वारा राजद्रोह का मुक़दमा चलाये जाने पर टॉमस पेन द्वारा दिया गया
प्रसिद्ध जवाब - और 4. ये दोनों उद्धरण मोटे अक्षरों में पेज पर तिरछे लिखे हुए हैं।
- शोषण-विहीन, वर्ग-विहीन, राज्य-विहीन साम्यवादी समाज को अभिलक्षित करने वाला
मार्क्स-एंगेल्स का प्रसिद्ध सूत्र वाक्य
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 663
साहसिकता क्रान्ति में सफलता की जान है।
दान्तों¹ का कहना था, “कार्रवाई, कार्रवाई। सत्ता पहले, बहस बाद में”²
पृष्ठ 141 (126)
रूसी प्रयोग³
1917–27
- फ़ेस एण्ड माइण्ड
ऑफ़ बोल्शेविज़्म
ले. रेने फुलप-मिलर - रशिया
ले. माकीव-ओ'हारा - रशियन रिवोल्यूशन
ले. लैंसलॉट लोटन (मैकमिलन) - बोल्शेविस्ट रशिया
ले. एण्टन कार्लग्रीन - लिटरेचर एण्ड रिवोल्यूशन
– त्रात्स्की - मार्क्स-लेनिन एण्ड साइंस
ऑफ़ रिवोल्यूशन
ले. एण्टन कार्लग्रीन
“बोल्शेविकों का दर्शन एकदम,
आक्रामक रूप से भौतिकवादी है,
जिसकी एक मुक्तिदायी विशेषता को
उनके कट्टर से कट्टर दुश्मनों तक को
स्वीकार करना पड़ेगा, और वह यह कि
उनमें किसी भी प्रकार के विभ्रम का पूरी
तरह अभाव है।
वे अपने संस्थापक के इस विश्वास
पर पूरी दृढ़ता से क़ायम हैं कि “प्रत्येक
चीज़ को प्राकृतिक नियमों द्वारा या, एक
संकीर्णतर अर्थ में कहें तो, भौतिक
क्रिया विज्ञान (फ़िजियॉलॉजी) द्वारा
व्याख्यायित किया जा सकता है।”
– पृष्ठ 30 - जॉर्ज जाक दान्तों (1769-1794) : फ़्रांसीसी क्रान्तिकारी। प्रखर वक्ता और फ़्रांसीसी
क्रान्ति के सबसे रैडिकल नेताओं में से एक। राजशाही को उखाड़ फेंकने (1792) में उसकी
प्रमुख भूमिका थी। वह अस्थायी सरकार का प्रमुख बना और ‘नागरिक सुरक्षा की कमेटी’
की स्थापना की जो बाद में क्रान्तिकारी आतंक क़ायम करने का साधन बन गयी। - ये दोनों वाक्य मोटे अक्षरों में पेज पर तिरछे लिखे हुए हैं।
- भगतसिंह ने एक ओर कुछ पुस्तकों और उनके लेखकों के नाम दर्ज किये हैं और उनके
सामने एक उद्धरण लिखा है जिसका स्रोत स्पष्ट नहीं है।
664 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
मार्क्स ने कहा है, “दार्शनिकों ने, इस दुनिया की महज तरह-तरह से व्याख्या
की है, दरअसल महत्त्वपूर्ण बात तो इसे बदलने की है।”¹
पृष्ठ 192 (127)
धर्म और समाजवाद
“धर्म मानवता के लिए अफ़ीम है”, मार्क्स का कहना था।²
“सारे के सारे भाववादी चिन्तन अन्ततः एक न एक प्रकार की दैवीयता की
अवधारणा पर ही जा पहुँचते हैं, और इसीलिए, मार्क्सवादियों की नज़र में, वे शुद्ध
बकवास हैं। यहाँ तक कि हेगेल³ को भी इस दुनिया पर शासन करने वाली प्रत्येक
अच्छी और तर्कसंगत चीज़ का ठोस रूप ईश्वर में ही दिखायी देता था। भाववादी
सिद्धान्त प्रत्येक चीज़ को बरबस इसी अभागे पकी दाढ़ी वाले (अर्थात ईश्वर -
स.) के कन्धों पर डाल देता है, जो उसके भक्तों की शिक्षाओं के अनुसार, पूर्ण
है, और जिसने, आदम के अलावा, पिस्सुओं और वेश्याओं, क़ातिलों और कोढ़ियों,
भूख और दुख, प्लेग और वोदका की सृष्टि की है, ताकि उन पापियों को सज़ा
दे सके, जिनको उसने खुद ही पैदा किया, और जो खुद उसी की मर्जी से पाप
करते हैं...। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह सिद्धान्त वाहियात ही सिद्ध होता है। इस
दुनिया की सभी परिघटनाओं की एकमात्र वैज्ञानिक व्याख्या तो पूर्ण भौतिकवाद ही
देता है।
(पृष्ठ 32, बुख़ारिन)⁴
उनके (यानी भौतिकवादियों के - स.) अनुसार,
आरम्भ में थी प्रकृति; उससे जीवन; और जीवन से चिन्तन और वे सारी
- मार्क्स की थीसिस ऑन फ़ायरबाख़ से
- देखें नोटबुक पृष्ठ 40 (37) का सन्दर्भ 1
- गेओर्ग विल्हेल्म फ़्रेडरिक हेगेल (1770-183) : जर्मन दार्शनिक जिसने चिन्तन और
व्याख्या की द्वन्द्वात्मक पद्धति दी, जिसे मार्क्स ने भौतिकवादी दर्शन के लिए अपनाया - परन्तु
उलटकर, क्योंकि इस पद्धति से हेगेल ने चेतना या परम तत्त्व या ईश्वर को प्राथमिक कहा
था जबकि इसी का इस्तेमाल कर मार्क्स ने पदार्थ को प्राथमिक और चेतना को उससे व्युत्पन्न
सिद्ध किया। - देखें नोटबुक पृष्ठ 50 (47) का सन्दर्भ 2
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 665
अभिव्यक्तियाँ, जिन्हें हम मानसिक या नैतिक परिघटनाएँ कहते हैं। आत्मा जैसी
कोई चीज़ है ही नहीं, और मनःचेतना पदार्थ की, एक ख़ास ढंग से संगठित, एक
क्रिया के अलावा और कुछ नहीं है।¹
(पृष्ठ) 33
<u>पृष्ठ 193 (128)</u>
आम बग़ावत के बारे में मार्क्स का दृष्टिकोण
पहली बात :
“अगर आम बग़ावत को उसके कड़वे अंजाम तक ले जाने (अर्थात – उसके
सारे परिणामों को झेलने) का दृढ़संकल्प न हो, तो उसके साथ खेलो मत। आम
बग़ावत एक ऐसा समीकरण है जिसके मान बहुत अनिश्चित होते हैं, जो हर दिन
बदल सकते हैं। इसमें जिन शक्तियों का विरोध किया जाना होता है उनके पास
संगठन, अनुशासन और परम्परागत सत्ता की सारी अनुकूल स्थितियाँ होती हैं।
“अगर आम बग़ावत करने वाले अपने शत्रुओं के ख़िलाफ़ भारी ताक़त नहीं
जुटा पायें, तो वे कुचल डाले और नष्ट कर दिये जायेंगे।
दूसरी बात :
“यदि आम बग़ावत एक बार शुरू हो गयी, तो यह आवश्यक है कि पूरे
संकल्प के साथ कार्रवाई की जाये और आक्रामक रुख़ अख़्तियार किया जाये।
रक्षात्मक रुख़ हरेक सशस्त्र आम बग़ावत की मौत साबित होता है; यह दुश्मन से
ज़ोर-आज़माइश करने से पहले ही तबाह हो जाता है। दुश्मन को उसी वक़्त
हक्का-बक्का कर डालना आवश्यक है जब उसके सैनिक अभी बिखरे हुए हों,
और हर रोज़ नयी-नयी सफलताएँ हासिल करना ज़रूरी है, चाहे वे कितनी भी
छोटी क्यों न हों। पहली सफलता से बढ़े मनोबल को बनाये रखना ज़रूरी है।
डाँवाँडोल तत्त्वों को आम बग़ावत के पक्ष में लामबन्द करना ज़रूरी है, जो
हमेशा ही ताक़तवर के पीछे हो लेते हैं, और हमेशा अधिक सुरक्षित पक्ष तलाशते
रहते हैं... एक शब्द में दान्तों – अब तक की जानकारी में क्रान्तिकारी नीति के
सबसे बड़े विशारद – के इन शब्दों के अनुसार कार्रवाई करो : साहसिकता...
साहसिकता...और एक बार फिर साहसिकता!”²
- वही
- एंगेल्स, जर्मनी में क्रान्ति तथा प्रतिक्रान्ति से। भगतसिंह ने यह उद्धरण मूल रचना से नहीं,
बल्कि एक अन्य पुस्तक से लिया था और इसीलिए वह इस भ्रम में रहे कि वह मार्क्स को
उद्धृत कर रहे हैं।
666 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
नोटबुक में अगली लिखावट पृष्ठ 273 (130) पर है। पृष्ठ
194 से पृष्ठ 272 तक सादे हैं। पीछे भी ऐसे ही सादे पृष्ठ या
अन्तराल आये हैं।
हो सकता है कि भगतसिंह ने अपनी 404 पृष्ठों की नोटबुक
में अपने अध्ययन के विभिन्न विषयों के अनुसार अलग-अलग
हिस्से निर्धारित किये हों। यहाँ ख़त्म हुए हिस्से में पृष्ठ 165 (100)
से 193 (128) तक उनके नोट्स राज्य के विज्ञान पर — स्वतन्त्रता
और सम्प्रभुता की अवधारणाओं और उनके विकास पर, तथा
उनकी निरन्तरता में फ्रांसीसी क्रान्ति और सोवियत प्रयोग पर
केन्द्रित रहे। अगले हिस्से में विभिन्न विविध विषयों पर उनकी
टिप्पणियाँ और पुस्तकों के अवतरण दर्ज हैं। लेकिन इन सबमें एक
सामान्य सूत्र यह है कि ज्यादातर तत्कालीन भारतीय स्थितियों और
अन्य सम्बन्धित मुद्दों के बारे में हैं। — स.
पृष्ठ 273 (130)
"...क्या तुम चाहते हो कि विधान परिषदों का और विस्तार हो? क्या तुम चाहते
हो कि कुछेक भारतीय तुम्हारे प्रतिनिधियों के रूप में हाउस ऑफ़ कामंस में जाकर
बैठें? क्या तुम चाहते हो कि भारतीयों की एक बड़ी संख्या सिविल सर्विस में भरती
हो जाये? तो आओ देखें कि क्या 50, 100, 200, या 300 (भारतीय — स.)
सिविलियन भरती हो जाने से सरकार हमारी हो जायेगी...। भले ही पूरी की पूरी
सिविल सर्विस भारतीय हो जाये, लेकिन सिविल सर्वेन्ट्स को तो सिर्फ़ हुक्म की
ही तामील करनी होगी — वे कोई निर्देश नहीं दे सकते, कोई नीति नहीं निर्धारित
कर सकते। एक मुर्गा विहान नहीं लाता। ब्रिटिश सरकार की सेवा में एक
सिविलियन, 100 सिविलियन या 1000 सिविलियन भरती होकर सरकार को
भारतीय नहीं बना सकते। जो परम्पराएँ हैं, क़ानून हैं, नीतियाँ हैं, उनकी ताबेदारी
तो हर सिविलियन को करनी होगी, चाहे वह काला हो, भूरा हो, गोरा हो, और जब
तक ये परम्पराएँ नहीं बदली जातीं, जब तक इनके सिद्धान्तों में रद्दोबदल नहीं किया
जाता, और जब तक इनकी नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया जाता, तब
तक यूरोपियनों के स्थान पर भारतीयों को भरती कर देने मात्र से ही इस देश में
अपनी सरकार नहीं क़ायम हो सकती...।
अगर आज सरकार आकर मुझसे कहे कि, “स्वराज लो”, तो मैं इस उपहार
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 667
के लिए धन्यवाद तो दे दूँगा, पर उस चीज़ को स्वीकार नहीं करूँगा जिसे मैंने स्वयं
अपने हाथों से अर्जित नहीं किया है...।
“कोई भी सत्ता जो हमारे विरुद्ध जाती है, उसे हम बरबस अपनी मर्ज़ी के आगे
झुकने के लिए मजबूर करेंगे।
“...बुनियादी चीज़ सरकार की गरिमा है। [पृष्ठ 274 (131) पर जारी]
“क्या साम्राज्य के भीतर स्व-शासन का होना वास्तव में एक व्यावहारिक
आदर्श हो सकता है? इसका मतलब क्या होगा? इसका मतलब या तो हमारा
कोई स्व-शासन नहीं होगा, या इंग्लैण्ड का हमारे ऊपर कोई वास्तविक आधिपत्य
नहीं होगा। क्या हम स्व-शासन के मात्र छायाभास से ही सन्तुष्ट हो लेंगे? अगर
नहीं तो क्या इंग्लैण्ड हमारे ऊपर अपने मात्र छायाभासी आधिपत्य से ही सन्तुष्ट
हो लेगा? दोनों ही दशाओं में, इंग्लैण्ड एक छायाभासी आधिपत्यभर से ही सन्तुष्ट
नहीं हो सकता, और हम भी मात्र छायाभासी स्व-शासन से सन्तुष्ट होने से इन्कार
करते हैं। और इसीलिए भारत में स्व-शासन और इंग्लैण्ड के उस पर आधिपत्य
के बीच ऐसी परिस्थितियों में कोई समझौता सम्भव नहीं है...। यदि स्व-शासन –
वास्तविक – हो, तो सिर्फ़ भारत में ही नहीं, बल्कि स्वयं ब्रिटिश साम्राज्य के
भीतर इंग्लैण्ड की स्थिति क्या होगी? स्व-शासन का मतलब है स्वयं टैक्स
लगाने का अधिकार, इसका मतलब है अपना नियन्त्रण, इसका मतलब है अपनी
जनता को विदेशी निर्यातों पर संरक्षणात्मक और निषेधात्मक चुंगी लगाने का
अधिकार। जिस क्षण हमको खुद टैक्स लगाने का अधिकार मिल जायेगा, उस
क्षण हम क्या करेंगे? तब हम औद्योगिक बायकाट के इस कठिन काम में लगने
की कोशिश नहीं करेंगे। बल्कि वही करेंगे जो हरेक राष्ट्र करता आया है। आज
हम जिन परिस्थितियों में जी रहे हैं, उनके मद्देनज़र हम मैनचेस्टर से आने वाले
कपड़े के एक-एक इंच पर, और लीड्स से आने वाली एक-एक ब्लेड या छुरी
पर, भारी निषेधात्मक और संरक्षणात्मक चुंगी लगा देंगे। हम अपने देश में एक भी
अंग्रेज़ को घुसने की अनुमति नहीं देंगे। आज जिस तरह ब्रिटिश पूँजी भारतीय
संसाधनों के विकास के नाम पर यहाँ लगी हुई है, उसकी हम कतई अनुमति
नहीं देंगे। हम ब्रिटिश पूँजीपतियों को देश की खनिज सम्पदा की खुदाई करने
और उसे अपने देश उठा ले जाने का कोई अधिकार नहीं देंगे। [पृष्ठ 275 (132)
पर जारी] हमें विदेशी पूँजी की ज़रूरत होगी। पर इसके लिए हम पूरी दुनिया के
खुले बाज़ारों से विदेशी कर्ज़ लेने की दरख्वास्त करेंगे, और कर्ज़ की वापसी के
लिए भारतीय सरकार, भारतीय राष्ट्र की साख की गारण्टी देंगे...। और आज जिस
तरह से इंग्लैण्ड के वाणिज्यिक हित सिद्ध हो रहे हैं, तब, जनता के स्व-शासन
की दशा में, नहीं सिद्ध होंगे, भले ही यह सरकार साम्राज्य के अधीन ही क्यों न
668 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
रहे। लेकिन तब साम्राज्य के भीतर इसका क्या मतलब होगा? इसका मतलब यह
होगा कि इंग्लैण्ड को चुंगी सम्बन्धी कुछ तरजीह पाने के लिए हमारे साथ कुछ
क़रार करने को बाध्य होना पड़ेगा। अगर इंग्लैण्ड भारत के हमारे बाज़ारों में प्रवेश
की खुली छूट चाहेगा, तो उसे हमारे द्वारा रखी गयी शर्तों के तहत ही आना होगा,
और एक समय के बाद जब हम अपने संसाधनों का विकास कर लेंगे और अपने
औद्योगिक जीवन को सुव्यवस्थित कर लेंगे, तब हम सिर्फ़ इंग्लैण्ड के लिए ही
नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के हरेक हिस्से के लिए अपना दरवाज़ा खोल देंगे।
और क्या तुम समझते हो कि इंग्लैण्ड जैसा मुट्ठीभर आबादी वाला एक
छोटा-सा देश, जो चाहे कितना भी अधिक सम्पन्न क्यों न हो, निष्पक्षता और
बराबरी की शर्तों पर, भारत जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर देश के साथ
प्रतियोगिता कर सकेगा, जिसके पास इतनी भारी आबादी है, जो दुनिया के किसी
भी भाग में सबसे शालीन और संयमी समझी जाती है?
“अगर साम्राज्य के भीतर सचमुच हमारी अपनी सरकार हो जाये, अगर 30
करोड़ लोगों को वही स्वतन्त्रता मिल जाये जो साम्राज्य को हासिल है, तब तो
ब्रिटिश साम्राज्य रह ही नहीं जायेगा। भारतीय साम्राज्य हो जायेगा...।”
बि.च. पाल ¹
न्यू स्पिरिट, 1907 में
पृष्ठ 276 (133)
हिन्दू सभ्यता :
हमें ऐसा लग सकता है कि अपने कई पक्षों की दृष्टि से यह एक ऐसा लगभग
अकल्पनीय-सा समुच्चय है जिसमें एक तरफ़ आध्यात्मिक भाववाद है तो दूसरी
तरफ़ स्थूल भौतिकवाद भी है, एक तरफ़ इन्द्रियनिग्रह है तो दूसरी तरफ़
इन्द्रियलिप्सा भी है, एक तरफ़ यह मानवीय आत्मा को वैश्विक आत्मा के साथ
एकाकार करने का दर्पभरा दावा करती है तथा मनुष्य को दैवीयता में और दैवीयता
को मनुष्य में समाहित करती है, तो दूसरी तरफ़ वह हताश कर देने वाला निराशावाद
भी है जिसके तहत यह उपदेश देती है कि जीवन अपनेआप में दुखदायी प्रतीति
- बिपिनचन्द्र पाल (1858-1932) : स्वाधीनता संग्राम के दौरान बंगाल में एवं अन्यत्र
स्वदेशी एवं विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आन्दोलनों के प्रमुख नेता; बाल गंगाधर तिलक, लाला
लाजपत राय और बिपिनचन्द्र पाल यानी 'लाल-बाल-पाल' की तिकड़ी ने कांग्रेस में 'गरम
दल' का नेतृत्व किया। पाल ने कई अख़बारों जैसे न्यू इण्डिया, वन्देमातरम, स्वराज, द
इण्डिपेण्डेण्ट एवं न्यू स्पिरिट का सम्पादन किया।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 669
के अलावा और कुछ नहीं है और कि इससे मुक्ति का एवं सभी बुराइयों के अन्त
का, एकमात्र उपाय अस्तित्वहीन हो जाने में ही है।
शिरोल पृष्ठ 26
इण्डियन अनरेस्ट ¹
शिक्षा नीति :
भारत में पश्चिमी शिक्षा को चालू करने का मूल मन्तव्य नौजवान भारतीयों की
एक अच्छी-खासी संख्या को प्रशिक्षित करना था, ताकि सरकारी दफ़्तरों में मातहती
पदों को अंग्रेज़ी बोलने वाले देशज लोगों से भरा जा सके।
पृष्ठ 34²
पृष्ठ 277 (134)
ब्रिटिश नौकरशाही के अत्याचार के ख़िलाफ़ अपनेआप को राजनीतिक
आन्दोलन में झोंक देने वाले कितने पश्चिमी शिक्षाप्राप्त भारतीयों ने अपने
देशवासियों को उनकी सामाजिक बुराइयों की नृशंसता से मुक्त करने के लिए
कभी अँगुली उठायी है? उनमें से कितने ऐसे हैं जो स्वयं इससे मुक्त हैं, या,
यदि मुक्त भी हैं, तो क्या उनमें अपने विचार के अनुसार आचरण करने का
साहस भी है?
इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू, पृष्ठ 107³
पृष्ठ 278 (135 )
किसी भारतीय संसद की कल्पना करना कठिन है!
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लगभग शुरू से ही एक संसद की कार्यशैली अख़्तियार
कर चुकी थी। परन्तु भारत में संसद की न तो कोई गुंजाइश थी, और न है कारण
- सर वैलेन्टाइन शिरोल (1858-1929) : एक मशहूर ब्रिटिश पत्रकार, जिन्होंने भारत
का 17 बार दौरा किया; उन्होंने भारत सम्बन्धी दो प्रमुख किताबें लिखीं : इण्डियन अनरेस्ट
और इण्डिया : ओल्ड एण्ड न्यू। वह 1890 से 1912 तक लन्दन के ‘टाइम्स’ अख़बार के
विदेश विभाग के प्रभारी थे तथा 1912 से 1914 तक भारतीय लोक सेवा आयोग के सदस्य
भी रहे। - इण्डियन अनरेस्ट से
- शिरोल की पुस्तक
670 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कि जब तक ब्रिटिश शासन एक वास्तविकता बना रहेगा, तब तक भारतीय सरकार,
जैसाकि लॉर्ड मोसली ने साफ़तौर पर कहा है, एक निरंकुश तन्त्र ही हो सकता है
– जो भले ही कल्याणकारी हो और भारतीय विचारों के साथ पूरी सहानुभूति रखे,
फिर भी एक निरंकुशतन्त्र ही होगा।
154, अनरेस्ट¹
कांग्रेस का उद्देश्य या लक्ष्य :
“भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उद्देश्य भारतीय जनता को सरकार की एक ऐसी
प्रणाली उपलब्ध कराना है जो ठीक वैसी ही हो जैसीकि ब्रिटिश साम्राज्य के
अन्तर्गत स्व-शासित देश चला रहे हैं, जिसमें वे साम्राज्य के अधिकारों और दायित्वों
में बराबर के भागीदार हों।”
मालवीय जी का अध्यक्षीय भाषण 1909²
(कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन)
पृष्ठ 276 (136)
स्वतन्त्र भारत का संविधान¹
और कोई नहीं, बल्कि स्वयं (भारत) माँ ही यह तय करेगी और कर
सकती है कि एक बार जब वह अपनी अस्मिता पा लेती है और आज़ाद हो
जाती है तो इस क्रान्ति के सम्पन्न हो जाने के बाद वह अपने जीवन के
मार्ग-दर्शन के लिए कौन-सा संविधान अपनायेगी...। बिना विस्तार में गये, हम
इतना कह सकते हैं कि भारतीय राष्ट्र की इम्पीरियल सरकार का मुखिया
राष्ट्रपति बनेगा या राजा, यह इस पर निर्भर करता है कि यह क्रान्ति स्वयं को
कैसे आगे बढ़ाती है...। माँ का आज़ाद होना, उसका अखण्ड और एक होना,
तथा उसकी इच्छा का सर्वोपरि रहना ज़रूरी है। उसके बाद ही वह अपनी
इच्छा ज़ाहिर कर सकती है कि वह अपने सिर पर राजसी मुकुट धारण करे
या अपनी पवित्र काया को गणतान्त्रिक परिधान से आवेष्ठित करे।
- शिरोल की इण्डियन अनरेस्ट; भगतसिंह ने शिरोल की पुस्तक से विस्तृत नोट्स लिये हैं।
ख़ासकर इसमें उद्धृत नेताओं के भाषणों और परचों से। पीछे आया बिपिनचन्द्र पाल का लम्बा
उद्धरण और आगे आया मदनमोहन मालवीय का उद्धरण इसी पुस्तक से लिया गया है। - पण्डित मदन मोहन मालवीय (1861-1946)
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 671
पर मत भूलो हे राजाओ! कि तुम्हारे कृत्यों और अकृत्यों का कड़ा हिसाब
लिया जायेगा, और नया जन्म पायी हुई जनता तुम्हारे साथ तुम्हारे ही ढंग से हिसाब
चुकता करने में नहीं चूकेगी। हर कोई जो जनता के साथ सक्रिय रूप से
विश्वासघात करेगा, अपने पुरखों का तिरस्कार करेगा, और माँ के ख़िलाफ़
जाकर अपने खून को गन्दा करेगा...उसे कुचल कर धूल और गर्द में मिला दिया
जायेगा...। क्या तुम्हें हमारे इस कठोर संकल्प पर शुबहा है? अगर है, तो सुन लो
नाम धींगरा¹ का और चुप कर जाओ। उस शहीद का नाम लेकर कहते हैं कि अरे
भारतीय राजाओ, इन शब्दों पर गम्भीरता से और गहराई से सोचो। जैसी मर्ज़ी हो
करो, लेकिन तुम वही पाओगे जो बोओगे। चुन लो कि तुम राष्ट्र के संस्थापकों में
पहला बनोगे या राष्ट्र के अत्याचारियों में आख़िरी।
पृष्ठ 196, इण्डियन अनरेस्ट
“तय करो, ओ भारतीय शासको”²
अछूत :
राजनीतिक दृष्टिकोण से भारतीय आबादी के लाखों-लाख लोगों का अपने
शासकों की आस्था के अनुरूप धर्मान्तरण ऐसी सम्भावनाओं के द्वार खोल देगा कि
मैं उनका विस्तारपूर्वक वर्णन करने की ज़रूरत नहीं महसूस करता।
पृष्ठ 184³
- मदनलाल धींगरा : लन्दन में ‘इण्डियन होमरूल सोसायटी’ तथा ‘इण्डिया हाउस ग्रुप’
से जुड़े युवा क्रान्तिकारी। इसकी स्थापना क्रान्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने लाला हरदयाल,
सावरकर और धींगरा जैसे देशभक्त युवाओं को साथ लेकर की थी। मदनलाल धींगरा ने
बंग-भंग और उसके बाद देश में चले आन्दोलन पर बर्बर दमन के विरोध में सर विलियम
कर्जन वायली की लन्दन में 1 जुलाई 1909 को गोली मार कर हत्या कर दी। उन्हें बाद में
फाँसी दे दी गयी। - “तय करो, ओ भारतीय शासको” शीर्षक यह परचा राष्ट्रवादी क्रान्तिकारियों ने भारत
के रजवाड़ों/रियासतों के शासकों के नाम भेजा था। एक शासक ने इसे शिरोल को दिया था
जिसने इसके दो हिस्से अपनी पुस्तक इण्डियन अनरेस्ट में शामिल किये। - शिरोल, इण्डियन अनरेस्ट, अध्याय ‘दलित जातियाँ’ से
672 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
पृष्ठ 280 (137)
हत्या नॉय यज्ञ¹
सोने की मुद्रा पाने के लालच में मानव वेषधारी कुछ देशी नरपिशाचों, भारत
के कलंक - पुलिस - ने वारीन्द्र घोष² आदि उन महान सपूतों को गिरफ़्तार कर
लिया, जो अपने निजी हितों का बलिदान करके और बम बनाने जैसे 'यज्ञ' के
पवित्र अनुष्ठान को पूरा करने में अपने जीवन को समर्पित करके, अपने देश की
आज़ादी के लिए काम कर रहे थे। इन नरपिशाचों में सबसे बड़ा नरपिशाच, आशुतोष
विश्वास³ इन बहादुर सपूतों को फाँसी के तख्ते पर पहुँचाने का रास्ता साफ़ करने
लगा। लेकिन शाबास चारू⁴! (आशुतोष विश्वास को ख़त्म करने वाले) तुम्हारे
माँ-बाप सर्वपूज्य हैं। तुमने उनका गौरव बढ़ाया, सर्वोच्च साहस का परिचय दिया,
जो इस क्षणभंगुर जीवन की परवाह न करते हुए, उस नरपिशाच की इस दुनिया
से छुट्टी कर दी। अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए जब गोरों ने, छल-बल से भारत को
भारतीयों (मूल पाठ में मुहम्मदनों – स.) से, उचक्कों की तरह झपट लिया था।
और वह कमीना शम्स-उल-आलम⁵, जिसने उस आलमगीर पादशा⁶ का रास्ता
- हत्या नहीं यज्ञ : यह पूरा अवतरण शिरोल की पुस्तक इण्डियन अनरेस्ट (मैकमिलन एण्ड
कम्पनी, लन्दन से 1910 में प्रकाशित) के टिप्पणियों वाले हिस्से से लिया गया है। इसमें “द
रिमूवल ऑफ़ इनफार्मर्स” (भेदियों का सफाया) शीर्षक के अन्तर्गत लिखा गया है कि
“शम्स-उल-आलम की हत्या के तुरन्त बाद निम्नलिखित अपील” क्रान्तिकारियों द्वारा कलकत्ते
में जारी की गयी :
‘हत्या नॉय यज्ञ’ (हत्या नहीं यज्ञ)
नक़द इनाम : एक यूरोपीय या दो भेदियों का सिर काटने पर
50वाँ अंक, कलकत्ता, रविवार चैत्र अष्टमी 1316) - वारीन्द्र घोष : अरविन्दो घोष के छोटे भाई और क्रान्तिकारियों के मानिकतला ग्रुप के
एक नेता, जो अलीपुर षड्यन्त्र केस (मई 1909) के अभियुक्त थे; वे ‘युगान्तर’ नामक
क्रान्तिकारी पत्र भी प्रकाशित करते थे। - आशुतोष विश्वास : क्रान्तिकारियों को सज़ा दिलाने के लिए तमाम गलत तरीक़े अपनाने
वाला अंग्रेज़परस्त एक सरकारी वकील जिसे अलीपुर पुलिस कोर्ट से बाहर क्रान्तिकारी चारु
चन्द्र गुहा ने गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। - चारुचन्द्र गुहा : एक वीर तरुण जिसने दायें हाथ की हथेली जन्म से ही नहीं होने के
बावजूद देशद्रोही सरकारी वकील आशुतोष विश्वास को गोली मार दी। उसे 10 मार्च 1909
को अलीपुर सेन्ट्रल जेल में फाँसी दे दी गयी। - शम्स-उल-आलम : ब्रिटिश पुलिस का सी.आई.डी. इंस्पेक्टर जो क्रान्तिकारियों की
सुराग़रशी करता था। उसे वीरेन्द्रनाथ दत्त ने 24 जनवरी, 1910 को गोली से उड़ा दिया; इस
नौजवान क्रान्तिकारी को 21 फ़रवरी 1910 को फाँसी दे दी गयी। - आलमगीर पादशा : मुगल बादशाह औरंगजेब
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 673
अपनाया, जिसने सोने की मुद्रा पाने की लालच में पूर्वजों के नाम को कलंकित
किया – आज उस दुराचारी को तुमने भारत की इस पवित्र धरती से मिटा दिया
है। नरेन गोसाईं¹ से लेकर तलित चक्रवर्ती तक सभी उस कमीने जालसाज़
शम्स-उल-आलम की जालसाज़ियों और यातना के फलस्वरूप सरकारी गवाह बन
गये थे। अगर तुमने नरपिशाचों के इस मददगार की छुट्टी नहीं कर दी होती, तो
क्या भारत के लिए कोई उम्मीद बची रह जाती?
कई लोग यह चीख़-पुकार मचा रहे हैं कि विद्रोह करना महापाप है। लेकिन
विद्रोह है क्या? क्या भारत में कोई ऐसी चीज़ है, जिसके ख़िलाफ़ विद्रोह किया
जाए? क्या एक फिरंगी को भारत का राजा माना जा सकता है, जिसके स्पर्शमात्र
से, जिसकी महज परछाईं पड़ जाने से ही हिन्दू अपना शुद्धिकरण करने के लिए
बाध्य हो जाते हैं?
ये महज पश्चिमी लुटेरे हैं जो भारत को लूट रहे हैं...। उन्हें निकाल बाहर करो,
हे भारत के सपूतों! वे तुम्हें जहाँ कहीं भी मिलें, उन पर और उनके साथी जासूसों
और खुफ़िया एजेण्टों पर कोई रहम मत करो। पिछले वर्ष, अकेले बंगाल में ही 19
लाख लोग बुखार, चेचक, हैजा, प्लेग और दूसरी बीमारियों से मर गये। तुम
अपनेआप को भाग्यशाली समझो कि तुम बच गये, लेकिन याद रखो कि कल तुम
भी प्लेग और हैजा की चपेट में आ सकते हो। क्या तुम्हारे लिए बेहतर नहीं होगा
कि तुम बहादुरों की मौत मरो?
जब ईश्वर का यही विधान है, तो ज़रा सोचो, कि क्या इस शुभ बेला में भारत
के हरेक सपूत का कर्तव्य नहीं है कि वह इन गोरे दुश्मनों का संहार करे? [पृष्ठ
282 (138) पर जारी]² अपनेआप को प्लेग और हैजा से मत मरने दो, ऐसा करके
भारत माँ की पवित्र धरती को दूषित मत करो। पुण्य और पाप में फ़र्क़ करने के
लिए हमारे शास्त्र हमारे मार्गदर्शक हैं। हमारे शास्त्र बार-बार हमें बताते हैं कि इन
गोरे कमीनों और उनके सहयोगियों एवं सहअपराधियों को क़त्ल करना अश्वमेध
यज्ञ के बराबर है। आओ, सब के सब आओ। आओ हम सब मिलकर इस बलिवेदी
पर अपनी यज्ञाहुति अर्पित करें, और प्रार्थना करें कि इस यज्ञ में सारे गोरे साँप
इसकी ज्वाला में वैसे ही भस्म हो जायें जैसे जनमेजय यज्ञ में साँप नष्ट हो गये
थे। याद रखो, यह हत्या नहीं, यज्ञ है।
(पृष्ठ 342, नोट्स) आइ.यू.³
- पूरा नाम नरेन्द्रनाथ गोसाई : मुज़फ़्फ़रपुर बम काण्ड में (जिसके लिए खुदीराम बोस को
फाँसी दे दी गयी) ब्रिटिश सरकार का मुख़बिर, जिसे 31 अगस्त 1908 को कनाई लाल दत्त
और सत्येन्द्र नाथ दत्त ने मार डाला। - नोटबुक पृष्ठ संख्या 281 नहीं है, पर पृष्ठ (137) के बाद पृष्ठ (138) का क्रम ठीक
है। - शिरोल की पुस्तक इण्डियन अनरेस्ट
674 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
“भारत में कुल मतदाता 62,00,000 अर्थात भारत की कुल आबादी का 2¾
प्रतिशत हैं जिसमें वे क्षेत्र शामिल नहीं, जिन पर 1919 का क़ानून नहीं लागू होता
था।”
194
आइ.ओ.एन.¹
पृष्ठ 283 (140)²
इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू : शिरोल वी.
“ब्रिटिश लोग यह जान लें कि यदि वे न्याय नहीं करना चाहते, तो यह प्रत्येक
भारतीय का परम कर्त्तव्य बन जायेगा कि इस साम्राज्य को नष्ट कर दे।”
महात्माजी³ (नागपुर कांग्रेस)
देहात और शहर का सवाल
कुछ सरकारी बुद्धिमत्ता इस रूप में दिखायी गयी थी कि भौगोलिक स्थिति
पर बिना ध्यान दिये, दूर-दराज के शहरों को एक निर्वाचन क्षेत्र में रख दिया गया
था, ताकि ऐसे शहरी व्यक्तियों को, जोकि (सरकार के) न चाहते हुए भी अधिक
विकसित राजनीतिक दृष्टिकोण पा चुके थे, उन देहाती निर्वाचन क्षेत्रों से उम्मीदवार
बनने से रोका जा सके, जिनमें यदि उपर्युक्त व्यवस्था न की गयी होती तो कई
एक छोटे शहर भी स्वाभाविक तौर पर शामिल हो जाते। यह एक आख़िरी कोशिश
थी जो इस विश्वास पर आधारित थी कि पंजाब की आबादी को बकरियों और
भेड़ों के रूप में विभाजित किया जा सकता था, जिसमें बकरियाँ ‘विश्वासघाती’
शहरी लोग तथा भेड़ें ‘विश्वासपात्र’ किसान समुदाय के लोग माने गये थे।⁴
खालसा कालेज 1892 में स्थापित हुआ⁵
- शिरोल की पुस्तक इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू
- नोटबुक पृष्ठ 282 के बाद पृष्ठ 283 का क्रम तो ठीक है पर (138) के बाद (139) नहीं,
बल्कि (140) दिया गया है। - महात्मा गाँधी; शिरोल की पुस्तक इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू से उद्धृत
- इण्डिया ओल्ड एण्ड न्यू से ही उद्धृत
- मूल में, पेज के नीचे की ओर हाशिये पर तिरछा लिखा हुआ
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 675
पृष्ठ 284 (141)
भारत जैसा मैंने इसे जाना$^1$
एक ‘महात्मा’ का रास्ता सचमुच कठिन है, और यह आश्चर्यजनक नहीं है
कि गाँधी ने हाल ही में इस उपाधि को – और इसकी ज़िम्मेदारियों को त्याग देने
की कोशिश की है। भारत में उनका प्रभाव निरन्तर घटता जा रहा है, फिर भी उनका
संन्यासी का बाना और महान नैतिक सच्चाइयों के रूप में उनके द्वारा अत्यन्त
कुशलता से निरूपित किये जाने वाले अस्पष्ट और अव्यावहारिक तोलस्तोय मार्का
सिद्धान्त बहुतेरे लोगों को सार्थक लगने का भ्रम देते हैं तथा भावुक इंग्लैण्ड के
दुर्बल मन वाले तथा फ़्रांस के कुछ तर्कशील लोग भी इसी भ्रम में हैं, जो पूर्व से
एक नयी रोशनी की उम्मीद लगाये हुए हैं। पृष्ठ 65
भेदिया$^2$ :
आयरिश षड्यन्त्रों में जो घृणित लेकिन उपयोगी वर्ग आमतौर पर (भेदियों
की – स.) आपूर्ति किया करता था, वह जड़मूल से क्यों सूख गया, इसके मुख्य
कारणों में से मैं समझता हूँ एक तो यही रहा है कि सत्ताधारी अपने भेदिये को
छिपाने और बचाने में असफल रहे (जैसे जेम्स कैरी के मामले में, जबकि उसी
ने क्रान्तिकारियों के अभेद्य गिरोह का रहस्योद्घाटन किया था और उसी के साक्ष्य
पर ब्रैडी, फिट्ज़हरबर्ट और मुलेन को फीनिक्स पार्क की दो हत्याओं, अर्थात चीफ़
सेक्रेटरी और अण्डरसेक्रेटरी की हत्याओं के बदले फाँसी पर चढ़ा दिया गया। उस
भेदिये की एक नौजवान क्रान्तिकारी ओ'डॉनैल ने, डरबन में, दिन-दहाड़े गोली
मारकर हत्या कर दी।$^3$) गो कि हत्या करने वाला पकड़ा गया। महायुद्ध से पहले
- सर माइकेल ओ'ड्वायर (1885-1823) की पुस्तक इण्डिया ऐज़ आई निउ इट से
उद्धृत, जो 1925/28 में लन्दन से प्रकाशित हुई। 1988 में मित्तल पब्लिकेशंस, दिल्ली से
पुनर्मुद्रित। ओ'ड्वायर प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान पंजाब का लेफ्टिनेण्ट गवर्नर था, उसने पंजाब
से बड़े पैमाने पर नौजवानों की ज़बरन सेना में भरती करायी, लोगों को युद्ध के लिए सरकार
को ऋण देने पर बाध्य किया और राजनीतिक नेताओं को क्रूरतापूर्वक प्रताड़ित किया।
जलियाँवाला बाग़ काण्ड का उसने समर्थन किया। बाद में, ऊधमसिंह ने लन्दन में उसकी हत्या
कर दी। - इस हिस्से में ओ'ड्वायर ने आयरलैण्ड के क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश सरकार के भेदियों
के सफाये का उदाहरण देते हुए पंजाब में खुद उसके द्वारा क्रान्तिकारियों के विरुद्ध अपनाये
तरीक़ों की चर्चा की है। - जब आयरिश क्रान्तिकारियों ने फीनिक्स पार्क में चीफ़ और अण्डरसेक्रेटरियों की हत्या
कर दी, तब उन्हें पकड़वाने और फाँसी चढ़वाने में जेम्स कैरी ने मुखबिर की भूमिका निभायी,
हालाँकि उसकी भी पैट्रिक ओ'डोनेल नामक क्रान्तिकारी ने गोली मारकर हत्या कर दी, जिससे
भारत के क्रान्तिकारियों को भारी मनोबल प्राप्त हुआ।
676 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
और उसके दौरान, पंजाब के लेफ़्टीनेण्ट गवर्नर के रूप में, मेरा कई क्रान्तिकारी
षड्यन्त्रों से पाला पड़ा, जिनका पर्दाफ़ाश करने में भेदियों की जाति ने एक बड़ी
भूमिका अदा की, और हमारी सतर्कता इतनी मुकम्मल रही कि एक भी मामले
में किसी भी भेदिये पर कोई आँच नहीं आयी।¹
पृष्ठ 285 (142)
मैं समझ सकता हूँ कि अपनी नीचताभरी चालबाज़ी, असामान्य अहम्मन्यता,
दुरभिसन्धि रचने की अपनी जन्मजात रुझान, और अरुचिकर तथ्यों पर पर्दा डालने
की क्षमता से पूरी तरह लैस भारतीय षड्यन्त्रकारी कैसे इस माहौल में आराम से
काम करते थे।
पृष्ठ 187
इण्डिया ऐज़ आइ निउ इट²
आर्यसमाज :
वास्तव में आर्यसमाज पश्चिमी प्रभाव के विरुद्ध एक राष्ट्रवादी पुनर्जागरण है।
यह इस सम्प्रदाय के संस्थापक दयानन्द के आधिकारिक ग्रन्थ, सत्यार्थ प्रकाश में
अपने अनुयायियों का आह्वान करता है कि वे वेदों की ओर लौटें और आर्यों के
काल्पनिक स्वर्णिम अतीत में स्वर्णिम भविष्य की तलाश करें। सत्यार्थ प्रकाश
गैर-हिन्दू शासन के विरुद्ध दलीलें भी देता है, और कुछ वर्ष पहले, इस सम्प्रदाय
के एक अग्रणी मुखपत्र ने तो दयानन्द को ही स्वराज के सिद्धान्त का असली
प्रवर्त्तक होने का दावा भी किया।
लेकिन 1907 में जब कुछ शरारती लोगों ने आर्य समाज के विरुद्ध अफ़वाहें
फैलाना शुरू किया, तब इस सम्प्रदाय ने अपने पुराने धर्म सिद्धान्त को दोहराते हुए
इस आशय का एक प्रस्ताव प्रकाशित करने की बुद्धिमत्ता दिखायी कि इस संगठन
का किसी भी क़िस्म के राजनीतिक निकाय या किसी भी क़िस्म के राजनीतिक
आन्दोलन से कोई सम्बन्ध नहीं है। अब यदि एक निकाय के रूप में समाज द्वारा
चरमपन्थी राजनीति से सम्बन्ध-विच्छेद के इस दावे को मान भी लिया जाये, तब
भी कट्टर हिन्दुओं के लिए यह बात ग़ौरतलब होनी ही चाहिए कि भले ही, आर्य
समाज में पंजाब की हिन्दू आबादी के 5 प्रतिशत से अधिक लोग शामिल नहीं हैं,
फिर भी 1907 से लेकर आज तक हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी जो राजद्रोह
- ओ'ड्वायर की पुस्तक इण्डिया ऐज़ आई निउ इट से
- ओ'ड्वायर की पुस्तक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 677