भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 667, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाधारण जनता से, 300 पादरी वर्ग से, और 300 कुलीन वर्ग से चुने जाने चाहिए।
स्टेट्स जनरल¹ की बैठक मई 1789 में हुई। कुलीन वर्ग और पादरी वर्ग
के प्रतिनिधि दो अलग-अलग कक्षों में बैठे।
<u>पृष्ठ 186 (121)</u>
तीसरी श्रेणी, या साधारण जनता के प्रतिनिधियों ने पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग
के इस अधिकार को मानने से इन्कार कर दिया और स्वयं को 'राष्ट्र के प्रतिनिधि'
घोषित करते हुए, अपने कक्ष में साथ बैठे राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के अलावा, अन्य
किसी भी हैसियत के किसी भी सदस्य का कोई भी अधिकार मानने से इन्कार
कर दिया। इस प्रकार, स्टेट्स जनरल ही 'राष्ट्रीय असेम्बली' हो गयी। उसने दूसरे
कक्षों में आमन्त्रण भेजे। पादरी वर्ग के प्रतिनिधियों की अधिकतर संख्या उनके साथ
आ गयी। कुलीन वर्ग के 45 सदस्य उनके साथ आ गये, फिर उनकी संख्या
बढ़कर 80 और बाद में उससे भी अधिक हो गयी।
<u>पृष्ठ 187 (122)</u>
टेनिस कोर्ट की शपथ
कुलीन वर्ग और पादरी वर्ग के दुष्ट तत्त्व राष्ट्रीय असेम्बली को उखाड़ फेंकना
चाहते थे। उन्होंने मन्त्रिमण्डल के साथ मिलकर षड्यन्त्र रचा। राष्ट्र के प्रतिनिधियों
की मौजूदगी में ही कक्ष का दरवाज़ा बन्द कर दिया गया और उस पर अंगरक्षक
सेना का पहरा बैठा दिया गया। तब वे एक टेनिस कोर्ट की ओर बढ़ गये, और
वहाँ सबने मिलकर शपथ खायी कि जब तक वे एक संविधान की स्थापना नहीं
कर लेते, तब तक अलग नहीं होंगे।
बास्तीय²
दूसरे दिन कक्ष का दरवाज़ा उनके लिए फिर खोल दिया गया। लेकिन
चुपके-चुपके 30 हज़ार की फ़ौज पेरिस को घेरने के लिए रवाना की जा चुकी थी।
- स्टेट्स जनरल : 175 वर्ष के लम्बे अन्तराल के बाद मई 1789 में इसकी बैठक हुई।
ख़ज़ाना ख़ाली हो जाने के कारण मजबूर होकर सम्राट लुई चौदहवें को सामन्तों, चर्च और
बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधियों की यह बैठक बुलानी पड़ी। पहली दोनों श्रेणियों के क़रीब
300-300 और तीसरी श्रेणी के इससे दोगुने प्रतिनिधि आये। जल्द ही यह एक नये राजनीतिक
संघर्ष का केन्द्र बन गयी। जनता के प्रतिनिधियों ने बढ़कर पहल अपने हाथ में ले ली। फ़्रांसीसी
क्रान्ति के तूफ़ानी घटनाक्रम की शुरुआत इसी से हुई। - बास्तीय : पेरिस से कुछ दूर स्थित बास्तीय का क़िला, जहाँ राजतन्त्र विरोधी बन्दियों
को रखा और यातनाएँ दी जाती थीं, निरंकुशता और दमन का एक घृणित प्रतीक था। 14
जुलाई 1789 को निहत्थी जनता की भीड़ ने इस पर धावा बोलकर क़ब्ज़ा कर लिया।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 661