भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 671, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स ने कहा है, “दार्शनिकों ने, इस दुनिया की महज तरह-तरह से व्याख्या
की है, दरअसल महत्त्वपूर्ण बात तो इसे बदलने की है।”¹
पृष्ठ 192 (127)
धर्म और समाजवाद
“धर्म मानवता के लिए अफ़ीम है”, मार्क्स का कहना था।²
“सारे के सारे भाववादी चिन्तन अन्ततः एक न एक प्रकार की दैवीयता की
अवधारणा पर ही जा पहुँचते हैं, और इसीलिए, मार्क्सवादियों की नज़र में, वे शुद्ध
बकवास हैं। यहाँ तक कि हेगेल³ को भी इस दुनिया पर शासन करने वाली प्रत्येक
अच्छी और तर्कसंगत चीज़ का ठोस रूप ईश्वर में ही दिखायी देता था। भाववादी
सिद्धान्त प्रत्येक चीज़ को बरबस इसी अभागे पकी दाढ़ी वाले (अर्थात ईश्वर -
स.) के कन्धों पर डाल देता है, जो उसके भक्तों की शिक्षाओं के अनुसार, पूर्ण
है, और जिसने, आदम के अलावा, पिस्सुओं और वेश्याओं, क़ातिलों और कोढ़ियों,
भूख और दुख, प्लेग और वोदका की सृष्टि की है, ताकि उन पापियों को सज़ा
दे सके, जिनको उसने खुद ही पैदा किया, और जो खुद उसी की मर्जी से पाप
करते हैं...। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह सिद्धान्त वाहियात ही सिद्ध होता है। इस
दुनिया की सभी परिघटनाओं की एकमात्र वैज्ञानिक व्याख्या तो पूर्ण भौतिकवाद ही
देता है।
(पृष्ठ 32, बुख़ारिन)⁴
उनके (यानी भौतिकवादियों के - स.) अनुसार,
आरम्भ में थी प्रकृति; उससे जीवन; और जीवन से चिन्तन और वे सारी
- मार्क्स की थीसिस ऑन फ़ायरबाख़ से
- देखें नोटबुक पृष्ठ 40 (37) का सन्दर्भ 1
- गेओर्ग विल्हेल्म फ़्रेडरिक हेगेल (1770-183) : जर्मन दार्शनिक जिसने चिन्तन और
व्याख्या की द्वन्द्वात्मक पद्धति दी, जिसे मार्क्स ने भौतिकवादी दर्शन के लिए अपनाया - परन्तु
उलटकर, क्योंकि इस पद्धति से हेगेल ने चेतना या परम तत्त्व या ईश्वर को प्राथमिक कहा
था जबकि इसी का इस्तेमाल कर मार्क्स ने पदार्थ को प्राथमिक और चेतना को उससे व्युत्पन्न
सिद्ध किया। - देखें नोटबुक पृष्ठ 50 (47) का सन्दर्भ 2
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 665