भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 672, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभिव्यक्तियाँ, जिन्हें हम मानसिक या नैतिक परिघटनाएँ कहते हैं। आत्मा जैसी
कोई चीज़ है ही नहीं, और मनःचेतना पदार्थ की, एक ख़ास ढंग से संगठित, एक
क्रिया के अलावा और कुछ नहीं है।¹
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आम बग़ावत के बारे में मार्क्स का दृष्टिकोण
पहली बात :
“अगर आम बग़ावत को उसके कड़वे अंजाम तक ले जाने (अर्थात – उसके
सारे परिणामों को झेलने) का दृढ़संकल्प न हो, तो उसके साथ खेलो मत। आम
बग़ावत एक ऐसा समीकरण है जिसके मान बहुत अनिश्चित होते हैं, जो हर दिन
बदल सकते हैं। इसमें जिन शक्तियों का विरोध किया जाना होता है उनके पास
संगठन, अनुशासन और परम्परागत सत्ता की सारी अनुकूल स्थितियाँ होती हैं।
“अगर आम बग़ावत करने वाले अपने शत्रुओं के ख़िलाफ़ भारी ताक़त नहीं
जुटा पायें, तो वे कुचल डाले और नष्ट कर दिये जायेंगे।
दूसरी बात :
“यदि आम बग़ावत एक बार शुरू हो गयी, तो यह आवश्यक है कि पूरे
संकल्प के साथ कार्रवाई की जाये और आक्रामक रुख़ अख़्तियार किया जाये।
रक्षात्मक रुख़ हरेक सशस्त्र आम बग़ावत की मौत साबित होता है; यह दुश्मन से
ज़ोर-आज़माइश करने से पहले ही तबाह हो जाता है। दुश्मन को उसी वक़्त
हक्का-बक्का कर डालना आवश्यक है जब उसके सैनिक अभी बिखरे हुए हों,
और हर रोज़ नयी-नयी सफलताएँ हासिल करना ज़रूरी है, चाहे वे कितनी भी
छोटी क्यों न हों। पहली सफलता से बढ़े मनोबल को बनाये रखना ज़रूरी है।
डाँवाँडोल तत्त्वों को आम बग़ावत के पक्ष में लामबन्द करना ज़रूरी है, जो
हमेशा ही ताक़तवर के पीछे हो लेते हैं, और हमेशा अधिक सुरक्षित पक्ष तलाशते
रहते हैं... एक शब्द में दान्तों – अब तक की जानकारी में क्रान्तिकारी नीति के
सबसे बड़े विशारद – के इन शब्दों के अनुसार कार्रवाई करो : साहसिकता...
साहसिकता...और एक बार फिर साहसिकता!”²
- वही
- एंगेल्स, जर्मनी में क्रान्ति तथा प्रतिक्रान्ति से। भगतसिंह ने यह उद्धरण मूल रचना से नहीं,
बल्कि एक अन्य पुस्तक से लिया था और इसीलिए वह इस भ्रम में रहे कि वह मार्क्स को
उद्धृत कर रहे हैं।
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