भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 673, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंनोटबुक में अगली लिखावट पृष्ठ 273 (130) पर है। पृष्ठ
194 से पृष्ठ 272 तक सादे हैं। पीछे भी ऐसे ही सादे पृष्ठ या
अन्तराल आये हैं।
हो सकता है कि भगतसिंह ने अपनी 404 पृष्ठों की नोटबुक
में अपने अध्ययन के विभिन्न विषयों के अनुसार अलग-अलग
हिस्से निर्धारित किये हों। यहाँ ख़त्म हुए हिस्से में पृष्ठ 165 (100)
से 193 (128) तक उनके नोट्स राज्य के विज्ञान पर — स्वतन्त्रता
और सम्प्रभुता की अवधारणाओं और उनके विकास पर, तथा
उनकी निरन्तरता में फ्रांसीसी क्रान्ति और सोवियत प्रयोग पर
केन्द्रित रहे। अगले हिस्से में विभिन्न विविध विषयों पर उनकी
टिप्पणियाँ और पुस्तकों के अवतरण दर्ज हैं। लेकिन इन सबमें एक
सामान्य सूत्र यह है कि ज्यादातर तत्कालीन भारतीय स्थितियों और
अन्य सम्बन्धित मुद्दों के बारे में हैं। — स.
पृष्ठ 273 (130)
"...क्या तुम चाहते हो कि विधान परिषदों का और विस्तार हो? क्या तुम चाहते
हो कि कुछेक भारतीय तुम्हारे प्रतिनिधियों के रूप में हाउस ऑफ़ कामंस में जाकर
बैठें? क्या तुम चाहते हो कि भारतीयों की एक बड़ी संख्या सिविल सर्विस में भरती
हो जाये? तो आओ देखें कि क्या 50, 100, 200, या 300 (भारतीय — स.)
सिविलियन भरती हो जाने से सरकार हमारी हो जायेगी...। भले ही पूरी की पूरी
सिविल सर्विस भारतीय हो जाये, लेकिन सिविल सर्वेन्ट्स को तो सिर्फ़ हुक्म की
ही तामील करनी होगी — वे कोई निर्देश नहीं दे सकते, कोई नीति नहीं निर्धारित
कर सकते। एक मुर्गा विहान नहीं लाता। ब्रिटिश सरकार की सेवा में एक
सिविलियन, 100 सिविलियन या 1000 सिविलियन भरती होकर सरकार को
भारतीय नहीं बना सकते। जो परम्पराएँ हैं, क़ानून हैं, नीतियाँ हैं, उनकी ताबेदारी
तो हर सिविलियन को करनी होगी, चाहे वह काला हो, भूरा हो, गोरा हो, और जब
तक ये परम्पराएँ नहीं बदली जातीं, जब तक इनके सिद्धान्तों में रद्दोबदल नहीं किया
जाता, और जब तक इनकी नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया जाता, तब
तक यूरोपियनों के स्थान पर भारतीयों को भरती कर देने मात्र से ही इस देश में
अपनी सरकार नहीं क़ायम हो सकती...।
अगर आज सरकार आकर मुझसे कहे कि, “स्वराज लो”, तो मैं इस उपहार
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 667