भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 665, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंफ़रमान वापस ले ले या बाक़ायदा उसे आधिकारिक तौर पर इन्दराज किये जाने
का आदेश जारी कर दे।
दूसरी तरफ़, पार्लियामेण्ट का दावा था कि उसके पास इन्कार कर देने का
अधिकार था।
मन्त्री एम. कैलोन¹ को मुद्रा चाहिए थी। वह टैक्सों के मामले में पार्लियामेण्ट
के कड़े रुख से परिचित था। उसने **“असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स”**² आहूत की
(1787)।
यह स्टेट्स-जनरल नहीं थी, जोकि चुनी जाती थी, बल्कि इसके सभी सदस्य
राजा द्वारा मनोनीत किये गये थे और इसमें कुल 141 सदस्य थे। तब भी वह
बहुमत का समर्थन हासिल न कर सका। तब उसने इसे 7 कमेटियों में विभक्त
कर दिया। प्रत्येक कमेटी में 20 सदस्य थे। हरेक सवाल कमेटियों में बहुमत से
और असेम्बली में कमेटियों के बहुमत से तय किया जाता था। उसने किन्हीं चार
या प्रत्येक कमेटी में 11 ऐसे सदस्य रखने की कोशिश की, जिन पर वह विश्वास
कर सकता था। लेकिन उसकी ये युक्तियाँ भी असफल रहीं।
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एम. द लफ़ायत⁴ एक दूसरी कमेटी का उपाध्यक्ष था। उसने एम. कैलोन पर
- चार्ल्स अलेक्सान्द्र द कैलोन (1734-1802), फ़्रांसीसी राजनीतिज्ञ, जो नवम्बर 1783 में
वित्तमन्त्री बना। - असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स : राज्य का ख़ज़ाना खाली होने के कारण, वित्तमन्त्री कैलोन
शाही ख़ज़ाने के लिए क़र्ज़ लेना चाहता था, परन्तु पार्लियामेण्ट ने इसे मंजूर नहीं किया। तब
उसने राजा को सलाह दी कि आन्तरिक सीमाशुल्कों को ख़त्म कर दिया जाये और नोटेबल्स
यानी कुलीनों और पादरियों पर टैक्स लगा दिया जाये। इसके लिए कुलीनों की एक सभा
(असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स) जनवरी 1787 में बुलायी गयी। परन्तु कुलीनों ने अपने
विशेषाधिकारों में कटौती किये जाने का विरोध कर दिया। - स्टेट्स जनरलः यह कुलीन वर्ग, पादरी वर्ग और बुर्जुआ वर्ग से चुने गये प्रतिनिधियों की
एक सभा थी। - मार्क्विस द लफ़ायत (1757-1834) : अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम और फ्रांस की क्रान्ति
में भाग लिया। वह फ़्रांसीसी सेना का कर्नल (1779) और बाद में मेजर जनरल (1781)
भी रहा; 1790 में उसकी तरक़्क़ी नेशनल गार्ड ऑफ़ पेरिस के कर्नल-जनरल पद पर हो गयी,
और उसने क्रान्ति के आरम्भिक दौरों में बहुत सक्रिय भूमिका निभायी। लेकिन 1792 में
संवैधानिक राजतन्त्र का समर्थन करने के कारण असेम्बली ने उसे गद्दार क़रार कर निर्वासित
कर दिया। अपने निर्वासन काल में भी वह अपनी क्रान्तिकारी भूमिका के कारण 5 वर्षों तक
प्रशा, जर्मनी, और आस्ट्रिया की जेलों में क़ैद रहा, और नेपोलियन बोनापार्ट के हस्तक्षेप से
ही जेल से रिहा होकर 1799 में फ़्रांस लौटा।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 659