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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

दूसरा या आधुनिक प्रकार का सम्प्रदाय व्यक्तियों के बीच एक क़रार के जरिये
राजनीतिक समाज की संस्थाबद्धता से सम्बन्धित है। चिन्तन की इस शाखा के
प्रमुख विचारक हूकर¹, हॉब्स², लॉक³ और रूसो⁴ हुए हैं।
लोक-स्वतन्त्रता के हिमायती
ह्यूजिनॉट⁵

  1. विण्डिसिए कोण्ट्रा टाइरैनॉस⁶ (1576) ह्यूजिनॉट लैंगु़एत की रचना।
    इसमें दलील दी गयी थी कि राजा अपनी सत्ता जनता की इच्छा से प्राप्त करे, और
    कि यदि राजा क़ानूनों के परिपालन में उस क़रार को भंग करे जो उसके और जनता
    के बीच संयुक्त रूप से राजशाही की स्थापना के समय किया गया होता है, तब
    जनता भी राज्यनिष्ठा से मुक्त हो जायेगी।
    बुका़नन⁷ :
  2. बुका़नन का भी यही कहना था कि राजा और जनता एक पैक्ट के तहत
    वचनबद्ध होते हैं, और कि यदि राजा इसे भंग कर दे, तो वह अपने अधिकार भी
    खो बैठता है।
  3. रिचर्ड हूकर : देखें नोटबुक पृष्ठ 107 (80) का सन्दर्भ 1
  4. टॉमस हॉब्स : देखें नोटबुक पृष्ठ 108 (81) का सन्दर्भ 2
  5. जॉन लॉक (1632-1707) : अंग्रेज़ दार्शनिक और एक अग्रणी व्यवहारवादी। उसने
    सामाजिक संविदा के हॉब्स के सिद्धान्त की आलोचना की जो राजतन्त्र के समर्थन तक जाते
    थे; 1689 में अपनी प्रसिद्ध कृति टू ट्रीटाइजेज़ ऑन गवर्नमेण्ट लिखी, जिसने आगे चलकर
    अमेरिकी संविधान निर्माताओं को प्रभावित किया; उसकी दूसरी प्रसिद्ध पुस्तक एस्से कंसर्निंग
    ह्यूमन अण्डरस्टैण्डिंग है जो ऐन्द्रिक अनुभव पर आधारित ज्ञान की अवधारणा के समर्थन में
    है।
  6. ज्याँ जाक रूसो : देखें नोटबुक पृष्ठ 119 (92) का सन्दर्भ 1
  7. ह्यूजिनात : यह नाम सोलहवीं सदी के मध्य से फ्रांस के प्रोटेस्टेण्टों को दिया जाने लगा
    था, कारण कि तूर्श शहर में स्थानीय प्रोटेस्टेण्ट ईसाई रात में राजा ह्यूगो के फाटक पर मुलाक़ात
    किया करते थे। राजा ह्यूगो को जनता एक दैवीय शक्ति मानती थी।
  8. विण्डीसिए कोण्ट्रा टाइरैनस : ह्यूबर्ट लैंगु़एत (1518-1581) की रचना जिसमें निरंकुश
    शासन के विरुद्ध प्रतिरोध करने का सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया था; परन्तु इसके लिए यह
    भी ज़रूरी बताया गया था कि ऐसा प्रतिरोध एक समुचित रूप से गठित आधिकारिक निकाय
    द्वारा ही किया जाना चाहिए।
  9. जॉर्ज बुका़नन (1506-1582) : स्कॉट विचारक, जिन्होंने अपनी रचना डि ज्यूर रेग्नी
    एपुड स्कोतोस (1579) में लिखा कि राजा उन परिस्थितियों से बँधा होता है जिनके तहत
    उसे सर्वोच्च सत्ता प्रदान की गयी; और निरंकुश शासकों का प्रतिरोध करना तथा यहाँ तक
    कि उन्हें दण्डित करना भी न्यायपूर्ण है।
    644 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 171 (106)
जेसुइट¹ :
3. यहाँ तक कि जेसुइट बेलार्मिन² और मारिएना³ की भी यही दलील थी कि
राजा अपनी सत्ता जनता से प्राप्त करे; परन्तु पोप के अधीन रहे।
राजा जेम्स प्रथम⁴ (1609) : जेम्स प्रथम ने इस सिद्धान्त को, 1609 में,
संसद में एक वक्तव्य देते हुए यह कहकर स्वीकार किया कि “एक स्थापित राज्य
का हरेक न्यायप्रिय राजा यह देखने के लिए बाध्य है कि उसकी सरकार के गठन
में, जनता के साथ उसके क़ानूनों के तहत जो पैक्ट किया जाता है वह जनता को
स्वीकार्य भी हो।”
कनवेंशन पार्लियामेण्ट (1688) : कनवेंशन पार्लियामेण्ट ने 1688 में
घोषित किया कि जेम्स द्वितीय⁵ को “राजा और जनता के बीच मूल समझौते को
तोड़कर संविधान को उलटने की कोशिश करने के कारण सिंहासन ख़ाली कर देना
पड़ा।”
बोदें⁶ (1586)8 : आधुनिक काल के पहले सम्पूर्ण राजनीतिक दार्शनिक
और 'रिपब्लिक' (1577 और 1586) के लेखक, बोदिन का कहना है कि
“समझौता नहीं, बल्कि ताक़त से गणराज्य की उत्पत्ति हुई है।” आदिकालीन
पितृसत्तात्मक सरकारों को जीत करके उखाड़ फेंका गया, और इस प्रकार,
प्राकृतिक स्वतन्त्रता का अन्त हो गया।
उसके विचार से, “सम्प्रभुता नागरिकों के ऊपर सर्वोच्च सत्ता है।” वह
मानता था कि “सम्प्रभुता स्वतन्त्र, अविभाज्य, स्थायी, अहस्तान्तरणीय और

  1. जेसुइट : सोसायटी ऑफ़ जीसस नामक सम्प्रदाय का सदस्य; इस कैथोलिक धार्मिक
    सम्प्रदाय की स्थापना 1540 में, सेण्ट इग्नेशियस लोयोला ने की थी।
  2. बेलार्मिन (इतालवी में बेलार्मिनो) – राबर्टो फ्रांसिस्को रोमोलो (1542-162) इतालवी
    धर्मशास्त्री, वह मानता था कि पोप के पास एक अयोग्य शासक को हटा देने का अप्रत्यक्ष
    अधिकार होता है।
  3. जुआन डि मारिएना (1536-1624) : स्पेन का इतिहासकार और जेसुइट; वह एक
    निरंकुश शासक को उखाड़ फेंकने को वैध मानता था।
  4. जेम्स प्रथम (1602-1625): ब्रिटेन का राजा। उसने राजा के दैवीय अधिकार की
    घोषणा की, जिसको लेकर संसद से उसका टकराव हुआ।
  5. जेम्स द्वितीय (1633-1701) : ब्रिटेन का राजा। अपनी कैथोलिक पक्षधरता और
    स्वेच्छाचारी शासन के कारण उसे 1688 की “गौरवशाली क्रान्ति” के बाद, सिंहासन छोड़कर
    फ्रांस भागना पड़ा।
  6. ज्याँ बोदें (1530-1596) : फ्रांसीसी दार्शनिक। उसका मानना था कि सम्प्रभु शासक
    की सत्ता को जनतान्त्रिक संसद संशोधित कर सकती है।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 645

निरपेक्ष सत्ता” है। उसने सम्प्रभुता की अपनी धारणा और उस समय की
मौजूद राजशाही के बीच घालमेल कर दिया।
अल्थूसियस (1557-1638)¹: वह स्पष्ट रूप से यह कहने के लिए जाना
जाता है कि सम्प्रभुता एकमात्र जनता में ही निहित होती है। राजा सिर्फ़ उसका
मजिस्ट्रेट या प्रशासकभर होता है, और कि समुदाय का सम्प्रभुता का अधिकार
अहस्तान्तरणीय होता है।
ग्रोटियस (1625)²: अपनी कृति “डि ज्यूरे बेली एट पेरिस” (1628) में
ग्रोटियस कहता है कि मनुष्य में एक शान्तिप्रिय और व्यवस्थित समाज की
प्रबल इच्छा होती है। लेकिन वह अ-प्रतिरोध का सिद्धान्त विकसित करता है,
और इस बात से इन्कार करता है कि लोग हमेशा और हर जगह सम्प्रभुता
सम्पन्न होते हैं अथवा यह कि सारी सरकारें शासितों के लिए गठित होती
हैं। सम्प्रभुता या तो विजय से आती है या सहमति से, लेकिन वह इस धारणा पर
ज़ोर देता है कि सम्प्रभुता अविभाज्य सत्ता है।
हूकर : वह अपनी कृति ‘एक्लेसियस्टिकल पालिटी’ – खण्ड 1
(1592-3) में प्रकृति की एक ऐसी मौलिक दशा को स्वीकार करता है जिसमें
सभी मनुष्य बराबर थे और किसी भी क़ानून के मातहत नहीं थे। मानवोचित गरिमा
के अनुकूल जीवन की इच्छा और एकाकीपन के प्रति अरुचि ने उन्हें ‘राजनीतिक
समाजों’ में एकबद्ध होने के लिए प्रेरित किया। ‘प्राकृतिक रुझान’ और एक साथ
जीवन जीने की उनकी एकबद्धता के तौर-तरीक़े पर प्रत्यक्ष या गुप्त सहमति से
चलने वाली व्यवस्था ही वर्तमान ‘राजनीतिक समाजों’ के दो बुनियादी आधार बने।
इनमें से दूसरे आधार को ही हम “सामान्य हित के क़ानून” कहते हैं।
पृष्ठ 172 (107) राज्य की उत्पत्ति
सम्प्रभुता : विधायी सत्ता का
कार्यपालिका पर भी नियन्त्रण
‘सभी आपसी शिकायतों, क्षतियों और ग़लतियों को दूर करने के लिए एकमात्र
तरीक़ा किसी क़िस्म की सरकार, या सर्वमान्य न्यायकर्ता की व्यवस्था करना ही
था।’

  1. जोहान्स अल्थूसियस (1557-1638) : एक जर्मन विधिवेत्ता और डच गणराज्य की
    सीमा पर स्थित एक इम्पीरियल शहर एमडैन का चीफ़ मजिस्ट्रेट
  2. ह्यूगो ग्रोटियस (1583-1645) : डच विधिवेत्ता और राजनीतिज्ञ। उसकी पुस्तक
    अन्तरराष्ट्रीय क़ानून का सबसे पहले निरूपण करने वाली कृति मानी जाती है।
    646 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

वह इस बात पर अरस्तू से सहमत था कि सरकार की उत्पत्ति राजतन्त्र से
हुई। लेकिन वह यह भी कहता है कि 'क़ानून सिर्फ़ भलाई की शिक्षा ही नहीं
देते, बल्कि एक बाध्यकारी शक्ति भी रखते हैं, जो शासितों की सहमति से प्राप्त
होती है, और जो या तो व्यक्तिगत तौर पर या प्रतिनिधियों के मार्फ़त प्रदर्शित होती
है।'
“क़ानून, चाहे जिस किसी भी क़िस्म के मनुष्यों के लिए हों, वे उनकी
सहमति से ही उपलब्ध (अर्थात वैध) होते हैं।”
“वे क़ानून क़ानून नहीं हैं जो जनता के अनुमोदन से नहीं बनाये गये होते हैं।”
“जनता की सम्प्रभुता”
इस प्रकार उसने स्पष्ट तौर पर कहा कि सम्प्रभुता या क़ानून-निर्मात्री सत्ता
अन्ततः जनता में ही निहित होती है।
1620 :
मेफ़्लावर (1620) पर सवार “पिलग्रिम फादर्स”¹ की मशहूर घोषणा :
“ईश्वर को साक्षी मानकर हम सब मिलकर एक दूसरे क़रार की घोषणा करते हैं
और अपनेआप को एक नागरिक राजनीतिक निकाय के रूप में संयुक्त करते हैं।”
1647 :
इंग्लैण्ड की जनता का क़रार : एक और मशहूर प्यूरिटन² दस्तावेज़, जो आर्मी
ऑफ़ द पार्लियामेण्ट ( 1647 ) से निःसृत हुआ, सोच की इसी प्रवृत्ति का संकेत
देता है।
मिल्टन³
1649 (जनता की सम्प्रभुता)⁴
अपनी कृति “टेन्योर ऑफ़ किंग्स एण्ड मैजिस्ट्रेट्स” (1649) में वह भी ऐसे
ही सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है। वह दावे के साथ कहता है कि “सभी मनुष्य
प्राकृतिक रूप से स्वतन्त्र ही पैदा हुए थे।” वे एक “सामान्य संघ के रूप में
एक-दूसरे के साथ बँधने के लिए इसलिए सहमत हुए कि वे एक-दूसरे को क्षति

  1. पिलग्रिम फ़ादर्स : इंग्लैण्ड के चर्च के प्यूरिटन विद्रोहियों का एक जत्था जो परेशान किये
    जाने से बचने तथा उत्तरी अमेरिका में जा बसने के लिए, मेफ़्लावर नामक जहाज़ से भाग
    निकला।
  2. प्यूरिटन : प्रोटेस्टेण्ट ईसाई सम्प्रदाय का सदस्य
  3. जॉन मिल्टन (1608-1674) : अंग्रेज़ कवि। पैराडाइज लॉस्ट और पैराडाइज रिगेन्ड के
    रचयिता
  4. मोटे अक्षरों में हाशिये पर दर्ज
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 647

पहुँचाने से बच सकें तथा एक साथ मिलकर उस किसी भी चीज़ से अपना बचाव
कर सकें जो गड़बड़ी पैदा करने वाली हो या इस तरह की सहमति के ख़िलाफ़
पड़ती हो। इसी की बदौलत क़स्बे, नगर और राज्य अस्तित्व में आये। तब आत्मरक्षा
और संरक्षण की यह आधिकारिक सत्ता जो बुनियादी तौर पर उनमें से प्रत्येक के
भीतर तथा संयुक्त रूप से सबमें निहित थी, डिप्टियों और कमिश्नरों के रूप में
राजाओं और मजिस्ट्रेटों को सौंप दी गयी।”
“राजाओं और मजिस्ट्रेटों की सत्ता और कुछ भी नहीं है, सिवाय इसके कि
यह सिर्फ़ उन्हें जनता द्वारा सबकी भलाई के विश्वास के साथ प्रदानित, हस्तान्तरित
और सौंपी गयी सत्ता है, जो अभी भी बुनियादी तौर पर उसी में (यानी जनता
में – स.) निहित होती है और जो उसके प्राकृतिक जन्मसिद्ध अधिकार का
उल्लंघन किये बग़ैर छीनी नहीं जा सकती। अतः राष्ट्र राजाओं को चुन या हटा
सकते हैं, स्वतन्त्र-जन्मा मनुष्यों के महज इस अधिकार और स्वतन्त्रता के आधार
पर कि वे किनसे शासित होना सर्वोत्तम समझते हैं।”
पृष्ठ 173 (108)
राजाओं के दैवी अधिकारों का सिद्धान्त
पितृसत्तात्मक सिद्धान्त
इसी युग में जहाँ बहुतेरे विचारक ‘जनता की सम्प्रभुता’ के इन सिद्धान्तों का
इस प्रकार प्रतिपादन करने में लगे हुए थे, वहीं दूसरे सिद्धान्तकार भी थे, जो यह
साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि राज्य वृहदाकार परिवार ही हैं, जिनमें एक
कुटुम्ब के मुखिया की पैतृक सत्ता, ज्येष्ठता क्रम की वंशपरम्परा में पूर्ववर्ती सम्प्रभु
शासक के उस प्रतिनिधि को हस्तान्तरित कर दी जाती है जो किसी राष्ट्र पर शासन
करने में सक्षम सिद्ध हो सके। इसीलिए राजशाही को एक अजेय अधिकार पर
आधारित माना गया, और राजा को केवल ईश्वर के प्रति ही उत्तरदायी
ठहराया गया। इसे ही “राजाओं का दैवी अधिकार” कहा गया। इसे ही
“पितृसत्तात्मक सिद्धान्त” कहा गया।¹
टॉमस हॉब्स :
1642-1650-1651 में लिखी गयी अपनी विविध रचनाओं में उसने सम्प्रभु
शासक की असीमित सत्ता के सिद्धान्त को जनता के आरम्भिक क़रार के विरोधी
सिद्धान्त के साथ संयुक्त कर दिया। परन्तु निरंकुशतावाद – मूक आज्ञाकारिता – के

  1. यह स्पष्ट नही है कि भगतसिंह किसी पुस्तक से उद्धरण नोट कर रहे थे या ये उनकी
    अपनी टिप्पणियाँ हैं।
    648 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

प्रति हॉब्स की पक्षधरता धर्मशास्त्रीय न होकर, धर्मनिरपेक्ष और तर्कसंगत थी। वह
समुदाय (पूरी समष्टि) के सुख को सरकार का महान लक्ष्य मानता था।
( मनुष्य एक असामाजिक प्राणी )
हॉब्स का दर्शन सिनिकवादी है। उसके अनुसार, मनुष्य के मनोवेग स्वाभाविक
रूप से उसके निजी संरक्षण और सुख की दिशा में ही निर्दिष्ट होते हैं, और वह
उनकी प्राप्ति के अलावा और कोई उद्देश्य नहीं रखता। अतः मनुष्य स्वभाव से
असामाजिक है। वह कहता है, “प्राकृतिक अवस्था में, हरेक आदमी अपने
जैसों से युद्धरत रहता है, और हरेक का जीवन ख़तरे में, अकेला, असहाय,
असुरक्षित, पशुवत और अल्पकालिक होता है।” इस प्रकार के जीवन का भय
ही उसे राजनीतिक एकता में बँधने के लिए विवश करता है।
( लगातार ख़तरा उन्हें राज्य गठित करने पर विवश करता है! )
चूँकि महज पैक्ट काम नहीं देता, इसलिए ‘एक सर्वोच्च सर्वमान्य सत्ता’ –
“सरकार” की स्थापना
( “जीत” या “अधिग्रहण” और “संस्थाबद्धता” सभी राज्यों के एकमात्र
आधार )
समाज की स्थापना “अधिग्रहण” अर्थात जीत द्वारा या “संस्थाबद्धता”
द्वारा, मसलन, पारस्परिक समझौते या क़रार द्वारा, होती है। इस प्रकार, एक बार
जब सम्प्रभु सत्ता क़ायम हो जाती है, तब सभी को इसका आज्ञाकारी होना
आवश्यक हो जाता है। इससे विद्रोह करने वाले किसी भी व्यक्ति को ख़त्म कर
दिया जाना चाहिए। उसे तबाह कर दिया जाना चाहिए।
( सम्प्रभु शासक की असीमित सत्ता! )
वह¹ विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के सारे के सारे अधिकार
सम्प्रभु शासक के हवाले कर देता है। वह लिखता है, “प्रभावी होने के लिए सम्प्रभु
सत्ता को निश्चय ही असीमित, अहस्तान्तरणीय और अविभाज्य होना चाहिए। बेशक
असीमित सत्ता गड़बड़ियों को जन्म दे सकती है, लेकिन सबसे इसका बुरा से बुरा
रूप भी उतना बुरा नहीं है जितना कि गृहयुद्ध या अराजकता।
पृष्ठ 174 (109)
उसके विचार से राजशाही, कुलीनतन्त्र, या जनतन्त्र में सत्ता को लेकर कोई

  1. हॉब्स
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 649

अन्तर नहीं है। सामान्य शान्ति और सुरक्षा की दिशा में इनकी उपलब्धियाँ इनके
द्वारा शासित जनता या लोगों की आज्ञाकारिता पर निर्भर करती हैं। फिर भी वह
‘राजशाही’ को ही अधिक पसन्द करता है। उसके विचार से ‘सीमित राजशाही’
ही सर्वोत्तम है। लेकिन वह इस बात पर भी ज़ोर देता है कि सम्प्रभु शासक को
निश्चय ही धार्मिक के साथ-साथ नागरिक मामलों का भी नियमन करना चाहिए,
और यह तजबीज भी करनी चाहिए कि कौन से सिद्धान्त शान्ति-व्यवस्था बनाये
रखने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
इस प्रकार, वह सम्प्रभुता के एक स्पष्ट और वैध सिद्धान्त की हिमायत तो
करता है, लेकिन इसके साथ ही वह राजा या सम्प्रभु शासक पैदा करने के लिए
सामाजिक समझौते की कल्पना को भी बरक़रार रखता है।
स्पिनोज़ा¹ : ( 1677 )
( मनुष्य की असमाजिकता )
अपनी कृति ट्रैक्टेटस पॉलिटिकस (1677), में वह मानता है कि शुरू-शुरू
में मनुष्यों का सभी चीज़ों पर समान अधिकार था, इसलिए प्राकृतिक अवस्था युद्ध
की अवस्था था। मनुष्यों ने अपने विवेक से प्रेरित होकर अपनी शक्तियों को
नागरिक सरकार की स्थापना के लिए संयुक्त किया। चूँकि मनुष्यों के पास निरंकुश
सत्ता थी, इसलिए इस प्रकार स्थापित सम्प्रभु सत्ता भी निरंकुश सत्ता ही थी। उसके
विचार से ‘अधिकार’ और ‘सत्ता’ एक समान है। अतः सत्ता से लैस होकर सम्प्रभु
शासक को सारे के सारे अधिकार स्वयमेव प्राप्त हो जाते हैं। इस प्रकार, वह
‘निरंकुशतावाद’ का समर्थन करता है।
पुफ़ेन्डोर² :
( लॉ ऑफ़ नेचर एण्ड नेशंस 1672)³
उसके विचार से, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, जो परिवार और शान्तिमय
जीवन की ओर स्वाभाविक रुझान रखता है।

  1. स्पिनोज़ा (1632-1677) : देकार्त से प्रभावित डच दार्शनिक। उसने अपनी पुस्तक
    एथिक्स (1677) में यह विचार प्रकट किया कि मानव-जीवन ईश्वर (या प्रकृति) से
    ओतप्रोत है। अपारम्परिक विचारों के कारण अपने मूल सम्प्रदाय से 1956 में निष्कासित।
  2. सैमुअल बैरन फान पुफ़ेन्डोर (1632-1684) : जर्मन विधिवेत्ता और इतिहासकार।
    उसका विचार था कि राज्य के क़ानून प्राकृतिक क़ानून में ही शामिल हैं।
  3. सम्भवतः पुफ़ेन्डोर की पुस्तक, दि ज्यूरे नेचुरी एट जेण्टियम का अंग्रेज़ी शीर्षक
    650 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

एक आदमी द्वारा दूसरे आदमी को पहुँचायी जा सकने वाली क्षतियों का
अनुभव ही नागरिक सरकार की प्रेरणा देता है, जो इस प्रकार गठित होती है :

  1. एक कामनवेल्थ गठित करने हेतु कुछ लोगों के बीच एक सर्वसम्मत आपसी
    क़रार द्वारा, 2. बहुमत के इस प्रस्ताव द्वारा कि अमुक शासक को सत्ता पर आसीन
    किया जाये, 3. सरकार और जनता के बीच इस क़रार द्वारा कि सरकार शासन करे
    और जनता विधिसम्मत आदेशों का पालन करे।
    <u>पृष्ठ 175 (110)</u>
    लॉक :
    (नागरिक सरकार के दो सिद्धान्त-1690)
    “किसी भी मनुष्य को शासन करने का प्राकृतिक अधिकार नहीं होता।”
    वह प्राकृतिक अवस्था का — यानी शासनाधिकार और प्रभुत्व के मामले में
    स्वतन्त्रता और समानता वाली एक ऐसी अवस्था का चित्रण करता है जो सिर्फ़
    प्राकृतिक क़ानून या विवेक के ही अधीन रहे, जो लोगों को एक-दूसरे के जीवन,
    स्वास्थ्य, आज़ादी और स्वामित्व अधिकारों के मामले में नुक़सान पहुँचाने से रोकते
    हैं। निषेध या क्षतिपूर्ति के रूप में सज़ा देने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के हाथ
    में होता है।
    प्राकृतिक अवस्था!
    “प्राकृतिक अवस्था वास्तव में वह है जिसमें लोग आपस में फ़ैसला करने के
    अधिकार के साथ, बिना किसी एक सर्वमान्य शासक के, विवेक के अनुसार एक
    साथ रहते हैं।”
    निजी सम्पत्ति!
    “प्रत्येक व्यक्ति का यह प्राकृतिक अधिकार है कि वह अपने पास सम्पत्ति
    रखे और प्राकृतिक सामग्री पर अपने निजी श्रम से प्राप्त उत्पाद पर भी अपना
    अधिकार रखे। एक आदमी जितनी अधिक भूमि को जोत, बो, सुधार सकता है
    और खेती-बाड़ी के काम में ला सकता है तथा उससे प्राप्त जितनी पैदावार
    इस्तेमाल में ला सकता है, वह सब उसी की सम्पत्ति हैं।
    सम्पत्ति और नागरिक समाज!
    उसके अनुसार “सम्पत्ति” “नागरिक समाज” की पूर्ववर्ती है।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 651

नागरिक समाज की उत्पत्ति!
लेकिन ऐसा लगता है कि लोगों को किसी प्रकार का ख़तरा और भय रहता
था, और इसीलिए, उन्होंने नागरिक स्वतन्त्रता के पक्ष में, अपनी प्राकृतिक
स्वतन्त्रता को तिलांजलि दे दी। संक्षेप में, आवश्यकता, सहूलियत और रुझान
ने लोगों को समाज में बाँधने के लिए विवश किया।
नागरिक समाज की परिभाषा!
जो लोग एक निकाय में गठित हो चुके होते हैं, और जिनके पास एक ऐसा
सर्वमान्य स्थापित क़ानून और न्यायाधिकरण होता है जिसमें अपील की जा सके
तथा जिसे आपसी विवादों को निपटाने एवं दोषी को दण्डित करने का अधिकार
हो, वे एक नागरिक समाज में होते हैं।
सहमति :
दूसरों पर विजय सरकार का ‘स्रोत’ नहीं है। सहमति ही किसी भी वैध
सरकार का स्रोत थी, और हो सकती है।
क़ानून-निर्मात्री सभा लोगों के जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति के ऊपर पूर्णतः
मनमाना अधिकार नहीं रखती, क्योंकि इसके पास सिर्फ़ वही संयुक्त अधिकार होता
है जो समाज के गठन से पहले अलग-अलग सदस्यों के पास हुआ करता था, और
जिसे उन्होंने अपने विशेष और सीमित उद्देश्यों के लिए सौंप दिया है।
क़ानून :
“क़ानून का उद्देश्य स्वतन्त्रता को ख़त्म करना या रोकना नहीं, बल्कि
उसे सुरक्षित करना और विस्तृत करना है।”
विधायिका :
विधायिका कुछ निश्चित उद्देश्यों के लिए सिर्फ़ एक न्यासधारी सत्ताभर है, जो
यदि इसमें न्यस्त किये गये विश्वास को खण्डित करे, तो जनता द्वारा भंग या
परिवर्तित की जा सकती है।
जनता की सर्वोपरि सम्प्रभुता!
इस प्रकार सर्वोच्च सत्ता या सर्वोपरि सम्प्रभुता हमेशा जन-समुदाय के पास ही
रहती है, परन्तु वह इसका इस्तेमाल तब तक नहीं करता, जब तक कि सरकार भंग
नहीं हो जाती।
652 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पृष्ठ 176 (111)
विधायिका और कार्यपालिका
निजी हितों पर सामान्य हित की बलि रोकने के लिए, यह ज़रूरी है कि
विधायिका और कार्यपालिका की सत्ताएँ अलग-अलग हाथों में रहें, और
कार्यपालिका विधायिका के मातहत रहे।
जहाँ ये दोनों सत्ताएँ एक ही निरंकुश राजा में निहित होती हैं, वहाँ कोई नागरिक
सरकार नहीं होती, क्योंकि राजा और उसकी जनता के बीच कोई सर्वमान्य न्यायिक
सत्ता नहीं होती।
स्वतन्त्र समाजों में राज्यों के भिन्न-भिन्न रूप हैं, जनतन्त्र¹, अल्पतन्त्र, या
निर्वाचित राजतन्त्र तथा मिश्रित रूपों वाली व्यवस्थाएँ।
‘क्रान्ति का अधिकार’!
“जब सरकार समझौते के प्रति अपना दायित्व पूरा करने – यानी व्यक्तिगत
अधिकारों का संरक्षण करने – में विफल हो जाती है तो क्रान्ति न्यायसंगत बन जाती
है।
रूसो ¹
रूसो² :
समानता
कोई भी आदमी इतना अधिक धनी नहीं होना चाहिए कि वह दूसरे को ख़रीद
सके, और न ही कोई आदमी इतना अधिक ग़रीब होना चाहिए कि वह अपनेआप
को बेचने के लिए मजबूर हो जाये। भारी असमानताएँ निरंकुशता के लिए रास्ता
तैयार करती हैं।
सम्पत्ति और नागरिक समाज :
जिस पहले आदमी ने ज़मीन के एक टुकड़े को घेरकर यह कहने को सोचा
होगा कि ‘यह मेरा है’, तथा जिसे अपनी बात पर विश्वास करने वाले सीधे-सादे
लोग मिल गये होंगे, वही नागरिक समाज का असली संस्थापक था।
अगर किसी ने इस धोखेबाज़ी का पर्दाफ़ाश कर दिया होता, और यह एलान
कर दिया होता कि यह धरती किसी की सम्पत्ति नहीं है और कि इसके फल
सबके हैं, तब मानवजाति को इतने युद्ध, अपराध और सन्त्रास नहीं झेलने पड़े होते।

  1. और 2. मूल में ऐसे ही नोट किये हुए; देखें नोटबुक पृष्ठ सं. 118 (91) का
    सन्दर्भ 1
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 653

पृष्ठ 177 (112)
“जो आदमी ध्यान करता है वह दुराचारी प्राणी है।”¹
नागरिक क़ानून :
कमज़ोरों के उत्पीड़न और सबकी असुरक्षा की ओर इशारा कर धनिकों ने बड़ी
चालाकी से न्याय और शान्ति के नियम निरूपित किये, ताकि उनके द्वारा सबके
स्वामित्वों की गारण्टी रहे, और क़ानूनों को लागू करने के लिए एक सर्वोच्च शासक
की स्थापना की।
निश्चय ही समाज और क़ानूनों की उत्पत्ति इसी भाँति हुई होगी, जिसने ग़रीबों
को नयी बेड़ियाँ पहना दीं और धनिकों को नयी ताक़त प्रदान कर दी, प्राकृतिक
स्वतन्त्रता को अन्तिम रूप से ख़त्म कर दिया, और थोड़े से महत्त्वाकांक्षी लोगों के
लाभ के लिए, हमेशा-हमेशा के लिए सम्पत्ति और असमानता का क़ानून निर्धारित
कर दिया, एक चालाकी भरी लूट को एक अटल अधिकार में तब्दील कर
दिया, और इस प्रकार आइन्दा के लिए सारी मानवजाति को श्रम, दासता, और
दुर्गति का शिकार बना दिया।²
पुनश्चः असमानताएँ
लेकिन यह बात पूरी तरह प्राकृतिक क़ानून के ख़िलाफ़ है कि मुट्ठीभर लोग
तो बेशुमार दौलत गटकते रहें, जबकि विशाल भूखी आबादी जीवन की ज़रूरी
चीज़ों के लिए भी तरसती रहे।³
पृष्ठ 178 (113)
उसकी रचनाओं का हश्र
एमिली और सोशल काण्ट्रैक्ट दोनों ही 1762 में प्रकाशित हुईं, पहली को
पेरिस में जलाया गया, रूसो बमुश्किल गिरफ़्तार होते-होते बचा, फिर दोनों किताबों
को सार्वजनिक तौर पर, जेनोआ में, उसकी जन्मस्थली में, जलाया गया, जहाँ उसे
कहीं अधिक शोहरत मिलने की उम्मीद थी।

  1. सम्भवतः रूसो का उद्धरण
  2. रूसो, सोशल कॉन्ट्रैक्ट
  3. वही
    654 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

राजा की सम्प्रभुता से जनता की सम्प्रभुता की ओर
रूसो एकता और केन्द्रीकरण की फ्रांसीसी धारणाओं को बनाये रखता है;
जबकि सत्रहवीं सदी में राज्य (या सम्प्रभुता) को राजशाही के साथ गड्डमड्ड
कर दिया गया था। 18वीं सदी में रूसो के प्रभाव से यह जनता में निहित समझी
जाने लगी।
अनुबन्ध
अनुबन्ध के जरिये लोग नागरिक स्वतन्त्रता और नैतिक स्वतन्त्रता के लिए
प्राकृतिक स्वतन्त्रता का प्रतिदान करते हैं।¹
प्रथम स्वामित्व का अधिकार
सम्पत्ति का अधिकार :
इसका औचित्य इन दशाओं पर निर्भर करता है :
(अ) कि ज़मीन गैर-आबाद है, (ब) कि एक आदमी सिर्फ़ उतने ही रकबे
पर क़ब्ज़ा करता है जितना कि उसके गुज़ारे के लिए ज़रूरी हो; (स) कि वह
इस पर महज खोखली औपचारिकता के जरिये नहीं, बल्कि मेहनत और
खेती-बाड़ी करने के नाते दख़ल रखता है।²
पृष्ठ 179 (114)
धर्म :
रूसो धर्म को भी सम्प्रभु शासक की निरंकुशता के अधीन रखता है।
भूमिका³ :
मैं इस बात की जाँच करना चाहता हूँ कि क्या, आज लोग जैसे हैं और
जैसे क़ानून बनाये जा सकते हैं, उनको मद्देनज़र रखते हुए, यह सम्भव है कि
नागरिक मामलों के प्रशासन हेतु कुछ न्यायसंगत और निश्चित नियम स्थापित
किये जायें...।

  1. और 2. सोशल कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर
  2. रूसो, सोशल काण्ट्रैक्ट की भूमिका से
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 655

...मुझसे पूछा जा सकता है कि क्या मैं कोई राजा या विधि निर्माता हूँ जो मैं
राजनीति पर लिखता हूँ। मेरा उत्तर है कि मैं नहीं हूँ। अगर मैं वैसा होता, तो यह
कहने में समय नष्ट नहीं करता कि क्या किया जाना चाहिए, बल्कि उसे कर
डालता या ख़ामोश रहता।
मनुष्य जन्म से स्वतन्त्र होता है लेकिन हर जगह बेड़ियों में जकड़ दिया जाता
है।¹
गुलामी के जुवे को बलपूर्वक उतार फेंकना!
मैं कहना चाहूँगा कि जब तक लोग आज्ञापालन के लिए मजबूर किये जाते
रहें और वे आज्ञापालन करते रहें, अच्छा है; लेकिन वे जितनी जल्दी इस जुवे को
उतार फेंक सकें और उतार फेंकते हैं, तो वह और भी अच्छा है; कारण कि, यदि
लोग अपनी आज़ादी फिर उसी अधिकार (अर्थात ताक़त) से वापस लेते हैं जिस
अधिकार से यह उनसे छीनी गयी होती है, तो या तो उनका ऐसा करना न्यायसंगत
है, या उनसे इसे छीन लिये जाने का कोई औचित्य नहीं था।²
पृष्ठ 180 (115 )
ताक़त :
“सत्ता, जो हिंसा के द्वारा हासिल की जाती है, महज एक हड़पी गयी सत्ता
होती है, और सिर्फ़ तब तक ही बनी रहती है जब तक उसकी कमान सँभालने
वाले की ताक़त उसको मानने वालों की ताक़त पर हावी रहती है, और जब इसको
मानने वालों की ताक़त सबसे अधिक हो जाती है और वे उसके जुवे को उतार
फेंकते हैं, तो ऐसा वे उतने ही अधिकार और न्याय के साथ करते हैं जिसके साथ
उन पर सत्ता थोप रखी गयी थी। वही (ताक़त का) क़ानून जो सत्ता का अधिकार
देता है, बाद में उसे छीन भी लेता है; यह सबसे ताक़तवर का क़ानून है।”
दिदेरो – इंसाइक्लोपीडिया ³
“सत्ता”

  1. रूसो की प्रसिद्ध उक्ति, सोशल कॉन्ट्रैक्ट से
  2. वही
  3. देनी दिदेरो (1713-1784) : प्रबोधन काल का फ्रांसीसी दार्शनिक। विश्वकोष
    (इन्साइक्लोपीडिया) का प्रमुख सम्पादक। फ्रांसीसी क्रान्ति की वैचारिक ज़मीन तैयार करने में
    रूसो और वाल्तेयर के साथ उसकी मुख्य भूमिका थी।
    656 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

दास अपनी बेड़ियों में सब कुछ खो देते हैं, यहाँ तक कि उनसे निजात पाने
की इच्छा भी!¹
सबसे ताक़तवर का अधिकार
“सत्ताधिकारियों का आज्ञापालन करो। यदि इसका मतलब ताक़त के आगे
झुकना है, तो यह आदेश अच्छा तो है लेकिन गैर-ज़रूरी है; मेरा कहना है कि
इसका कभी उल्लंघन नहीं होगा।”²
दासता का अधिकार
“क्या तब पराधीन जन अपनी अस्मिताओं का इस शर्त पर त्याग कर दें कि
उनकी सम्पत्ति भी ले ली जाये? मैं समझ नहीं पाता कि उनके लिए क्या शेष रह
जायेगा?
“कहा जा सकता है कि निरंकुश शासक अपने शासितों के लिए नागरिक शान्ति
सुनिश्चित करता है। हो सकता है, ऐसी ही बात हो; लेकिन इससे उनको मिलता क्या
है, जबकि युद्ध, जो उसकी महत्त्वाकांक्षाओं के चलते उन पर थोप दिये जाते हैं, तथा
उसकी अतोषणीय लोलुपता और उसके प्रशासन के सन्ताप, उनके अपने बैर-विरोध
से कहीं अधिक ही उन्हें तंग करते हैं? [पृष्ठ 181 (116) पर जारी]
“यह कहना, कि एक आदमी अपनेआप को बिना किसी एवज में यों ही सौंप
देता है, एकदम वाहियात और अकल्पनीय बात है।”
इस तरह की बात, चाहे एक आदमी दूसरे आदमी को सम्बोधित करके कहे
या राष्ट्र को सम्बोधित करके कहे, हमेशा मूर्खतापूर्ण ही कही जायेगी :
“मैं पूरी तरह से तुम्हारी क़ीमत पर और पूरी तरह से अपने लाभ के लिए
तुमसे एक समझौता करता हूँ, और मैं इसे तब तक लागू किये रखूँगा, जब
तक मैं चाहूँगा, और तुम भी इसे तब तक लागू किये रखोगे जब तक मैं
चाहूँगा।”³
समानता :
यदि तुम राज्य को स्थायित्व प्रदान करना चाहते हो, तो इन दो चरम अवस्थाओं
को, जहाँ तक सम्भव हो सके, क़रीब लाओ : न तो धनिकों को बरदाश्त करो,
न ही भिखारियों को। ये दोनों ही स्थितियाँ, जो स्वाभाविक तौर पर एक-दूसरे से

  1. रूसो, सोशल कॉन्ट्रैक्ट
  2. वही 3. वही
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 657

अविभाज्य हैं, सामान्य हित के लिए समान रूप से सांघातिक हैं : एक वर्ग से
निरंकुश पैदा होते हैं, तो दूसरे वर्ग से, निरंकुशता के समर्थक : हमेशा इन्हीं दोनों
के बीच सार्वजनिक स्वतन्त्रता का व्यापार चलता रहता है : एक ख़रीदता है, दूसरा
बेचता है।¹
पृष्ठ 182 (117)
“ओलावृष्टि कुछेक क्षेत्रों को बरबाद कर डालती है, पर इससे अकाल बिरले
ही पड़ता है। दंगे-फसाद और गृहयुद्ध सदारत करने वाले लोगों को काफ़ी चौंका
देते हैं; फिर भी वे राष्ट्रों के लिए कोई वास्तविक संकट नहीं पैदा करते, जब तक
इस बात को लेकर विवाद चलता है कि कौन उन पर निरंकुश शासन करे। उनकी
वास्तविक समृद्धि या विपदाएँ तो उनकी स्थायी स्थितियों से पैदा होती हैं। जब
सब कुछ जुवे तले कुचल कर रख दिया जाता है, तभी सब कुछ नष्ट हो जाता
है; तभी ये शासक, इत्मीनान से सब कुछ नष्ट करने के बाद, एक मुर्दा ख़ामोशी
पैदा कर देते हैं, जिसे वे शान्ति कहते हैं।”
पृष्ठ 176²
पृष्ठ 183 (118)
फ्रांसीसी क्रान्ति³ :
अमेरिका : अमेरिकी स्वतन्त्रता-संग्राम का फ्रांस की स्थिति पर भारी प्रभाव
पड़ा। (1776)
टैक्स :
‘राजा’ के नाम पर काम करने वाले कोर्ट या मन्त्रिमण्डल ने मनमाने ढंग से
टैक्सों के फ़रमान तैयार किये और उसे पार्लियामेण्ट⁴ में इन्दराज किये जाने के लिए
भेज दिया, क्योंकि जब तक पार्लियामेण्ट उनका इन्दराज नहीं कर लेती, तब तक
वे लागू नहीं हो सकते थे।
कोर्ट का दावा था कि पार्लियामेण्ट की सत्ता को एतराज़ का कारण बताने
के अलावा और कोई अधिकार न था, जबकि वह (यानी कोर्ट या मन्त्रिमण्डल)
अपने पास यह फ़ैसला करने का अधिकार सुरक्षित रखे हुए था कि कारण
वाजिब हैं या ग़ैर-वाजिब, और कि तदनुसार ही वह अपनी मर्ज़ी से चाहे तो

  1. वही 2. वही
  2. फ्रांसीसी क्रान्ति के बारे में भगतसिंह के इन नोट्स के स्रोत का पता नहीं चलता।
  3. पार्लियामेण्ट : वास्तव में यह कोई निर्वाचित प्रतिनिधियों का निकाय नहीं, बल्कि राजा
    के सलाहकारों का एक निकाय या इजलास हुआ करती थी।
    658 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

फ़रमान वापस ले ले या बाक़ायदा उसे आधिकारिक तौर पर इन्दराज किये जाने
का आदेश जारी कर दे।
दूसरी तरफ़, पार्लियामेण्ट का दावा था कि उसके पास इन्कार कर देने का
अधिकार था।
मन्त्री एम. कैलोन¹ को मुद्रा चाहिए थी। वह टैक्सों के मामले में पार्लियामेण्ट
के कड़े रुख से परिचित था। उसने **“असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स”**² आहूत की
(1787)।
यह स्टेट्स-जनरल नहीं थी, जोकि चुनी जाती थी, बल्कि इसके सभी सदस्य
राजा द्वारा मनोनीत किये गये थे और इसमें कुल 141 सदस्य थे। तब भी वह
बहुमत का समर्थन हासिल न कर सका। तब उसने इसे 7 कमेटियों में विभक्त
कर दिया। प्रत्येक कमेटी में 20 सदस्य थे। हरेक सवाल कमेटियों में बहुमत से
और असेम्बली में कमेटियों के बहुमत से तय किया जाता था। उसने किन्हीं चार
या प्रत्येक कमेटी में 11 ऐसे सदस्य रखने की कोशिश की, जिन पर वह विश्वास
कर सकता था। लेकिन उसकी ये युक्तियाँ भी असफल रहीं।
पृष्ठ 184 (119)
एम. द लफ़ायत⁴ एक दूसरी कमेटी का उपाध्यक्ष था। उसने एम. कैलोन पर

  1. चार्ल्स अलेक्सान्द्र द कैलोन (1734-1802), फ़्रांसीसी राजनीतिज्ञ, जो नवम्बर 1783 में
    वित्तमन्त्री बना।
  2. असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स : राज्य का ख़ज़ाना खाली होने के कारण, वित्तमन्त्री कैलोन
    शाही ख़ज़ाने के लिए क़र्ज़ लेना चाहता था, परन्तु पार्लियामेण्ट ने इसे मंजूर नहीं किया। तब
    उसने राजा को सलाह दी कि आन्तरिक सीमाशुल्कों को ख़त्म कर दिया जाये और नोटेबल्स
    यानी कुलीनों और पादरियों पर टैक्स लगा दिया जाये। इसके लिए कुलीनों की एक सभा
    (असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स) जनवरी 1787 में बुलायी गयी। परन्तु कुलीनों ने अपने
    विशेषाधिकारों में कटौती किये जाने का विरोध कर दिया।
  3. स्टेट्स जनरलः यह कुलीन वर्ग, पादरी वर्ग और बुर्जुआ वर्ग से चुने गये प्रतिनिधियों की
    एक सभा थी।
  4. मार्क्विस द लफ़ायत (1757-1834) : अमेरिकी स्वतन्त्रता संग्राम और फ्रांस की क्रान्ति
    में भाग लिया। वह फ़्रांसीसी सेना का कर्नल (1779) और बाद में मेजर जनरल (1781)
    भी रहा; 1790 में उसकी तरक़्क़ी नेशनल गार्ड ऑफ़ पेरिस के कर्नल-जनरल पद पर हो गयी,
    और उसने क्रान्ति के आरम्भिक दौरों में बहुत सक्रिय भूमिका निभायी। लेकिन 1792 में
    संवैधानिक राजतन्त्र का समर्थन करने के कारण असेम्बली ने उसे गद्दार क़रार कर निर्वासित
    कर दिया। अपने निर्वासन काल में भी वह अपनी क्रान्तिकारी भूमिका के कारण 5 वर्षों तक
    प्रशा, जर्मनी, और आस्ट्रिया की जेलों में क़ैद रहा, और नेपोलियन बोनापार्ट के हस्तक्षेप से
    ही जेल से रिहा होकर 1799 में फ़्रांस लौटा।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 659

दो मिलियन लाइवर में शाही ज़मीन बेच डालने का आरोप लगाया। इसे उसने
लिखित रूप में भी पेश किया। उसके कुछ ही समय बाद, एम. कैलोन को
बरख़ास्त कर दिया गया।
तोलूस का आर्कबिशप प्रधानमन्त्री और वित्तमन्त्री नियुक्त हुआ। उसने
पार्लियामेण्ट के समक्ष दो प्रकार के टैक्सों का प्रस्ताव रखा - स्टाम्प टैक्स और
एक क़िस्म का भूमि टैक्स। इस पर पार्लियामेण्ट ने जवाब दिया,
कि राष्ट्र अब तक जिस तरह के राजस्व की हिमायत करता आ
रहा है, उसके साथ टैक्सों की चर्चा उनमें कटौती करने के अलावा
और किसी भी उद्देश्य से नहीं करनी चाहिए,
और उन दोनों ही प्रस्तावों को उठाकर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। तब उन्हें
वर्साई बुलाया गया, जहाँ राजा ने 'ए बेड ऑफ़ जस्टिस' नाम से एक विशेष बैठक
की और उन प्रस्तावों का इन्दराज कर लिया। पार्लियामेण्ट पेरिस लौट गयी। वहाँ
एक अधिवेशन किया। वर्साई में की गयी प्रत्येक कार्यवाही को गैर-क़ानूनी क़रार
देते हुए, इन्दराज को रद्द कर देने का आदेश दिया। तब सबको 'लेटर डि कैशेत्स'
नामक शाही फ़रमान जारी हुआ और सभी को निर्वासित कर दिया गया। फिर बाद
में उन्हें वापस बुला लिया गया। और फिर वे ही फ़रमान उनके सामने रखे गये।
[पृष्ठ 185 (120) पर जारी]
फिर स्टेट्स जनरल की बैठक बुलाने का सवाल उठा। राजा ने इसके लिए
पार्लियामेण्ट से वादा किया। लेकिन मन्त्रिमण्डल ने विरोध किया, और एक 'फुल
कोर्ट' गठित करने का नया प्रस्ताव रखा। लेकिन इसका दो आधारों पर विरोध हुआ
: पहला यह कि सैद्धान्तिक आधार पर सरकार को स्वयं को बदलने का कोई
अधिकार नहीं था। इस तरह की नज़ीर नुक़सानदेह होगी। दूसरा विरोध स्वरूप को
लेकर था, इसके विरोध में यह दलील दी गयी कि यह एक विस्तारित मन्त्रिमण्डल
के अलावा और कुछ न होता।
अतः पार्लियामेण्ट ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब उसे सशस्त्र सेनाओं से
घेर लिया गया। कई दिनों तक यह घेरेबन्दी चलती रही। फिर भी पार्लियामेण्ट
अपनी बात पर अड़ी रही। तब उसके कई सदस्यों को गिरफ़्तार करके अलग-अलग
जेलों में भेज दिया गया।
इसका विरोध-प्रदर्शन करने के लिए ब्रिटैनी से एक प्रतिनिधिमण्डल आया।
उसके सदस्यों को बास्तीय (जेल) भेज दिया गया।
'असेम्बली ऑफ़ नोटेबल्स' फिर बुलायी गयी, और स्टेट्स जनरल की बैठक
बुलाने के लिए फिर वही तरीक़ा अपनाने का फ़ैसला किया गया, जो 1614 में
अपनाया गया था।
पार्लियामेण्ट ने तय किया कि इसके लिए कुल 1200 सदस्यों में से 600
660 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

साधारण जनता से, 300 पादरी वर्ग से, और 300 कुलीन वर्ग से चुने जाने चाहिए।
स्टेट्स जनरल¹ की बैठक मई 1789 में हुई। कुलीन वर्ग और पादरी वर्ग
के प्रतिनिधि दो अलग-अलग कक्षों में बैठे।
<u>पृष्ठ 186 (121)</u>
तीसरी श्रेणी, या साधारण जनता के प्रतिनिधियों ने पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग
के इस अधिकार को मानने से इन्कार कर दिया और स्वयं को 'राष्ट्र के प्रतिनिधि'
घोषित करते हुए, अपने कक्ष में साथ बैठे राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के अलावा, अन्य
किसी भी हैसियत के किसी भी सदस्य का कोई भी अधिकार मानने से इन्कार
कर दिया। इस प्रकार, स्टेट्स जनरल ही 'राष्ट्रीय असेम्बली' हो गयी। उसने दूसरे
कक्षों में आमन्त्रण भेजे। पादरी वर्ग के प्रतिनिधियों की अधिकतर संख्या उनके साथ
आ गयी। कुलीन वर्ग के 45 सदस्य उनके साथ आ गये, फिर उनकी संख्या
बढ़कर 80 और बाद में उससे भी अधिक हो गयी।
<u>पृष्ठ 187 (122)</u>
टेनिस कोर्ट की शपथ
कुलीन वर्ग और पादरी वर्ग के दुष्ट तत्त्व राष्ट्रीय असेम्बली को उखाड़ फेंकना
चाहते थे। उन्होंने मन्त्रिमण्डल के साथ मिलकर षड्यन्त्र रचा। राष्ट्र के प्रतिनिधियों
की मौजूदगी में ही कक्ष का दरवाज़ा बन्द कर दिया गया और उस पर अंगरक्षक
सेना का पहरा बैठा दिया गया। तब वे एक टेनिस कोर्ट की ओर बढ़ गये, और
वहाँ सबने मिलकर शपथ खायी कि जब तक वे एक संविधान की स्थापना नहीं
कर लेते, तब तक अलग नहीं होंगे।
बास्तीय²
दूसरे दिन कक्ष का दरवाज़ा उनके लिए फिर खोल दिया गया। लेकिन
चुपके-चुपके 30 हज़ार की फ़ौज पेरिस को घेरने के लिए रवाना की जा चुकी थी।

  1. स्टेट्स जनरल : 175 वर्ष के लम्बे अन्तराल के बाद मई 1789 में इसकी बैठक हुई।
    ख़ज़ाना ख़ाली हो जाने के कारण मजबूर होकर सम्राट लुई चौदहवें को सामन्तों, चर्च और
    बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधियों की यह बैठक बुलानी पड़ी। पहली दोनों श्रेणियों के क़रीब
    300-300 और तीसरी श्रेणी के इससे दोगुने प्रतिनिधि आये। जल्द ही यह एक नये राजनीतिक
    संघर्ष का केन्द्र बन गयी। जनता के प्रतिनिधियों ने बढ़कर पहल अपने हाथ में ले ली। फ़्रांसीसी
    क्रान्ति के तूफ़ानी घटनाक्रम की शुरुआत इसी से हुई।
  2. बास्तीय : पेरिस से कुछ दूर स्थित बास्तीय का क़िला, जहाँ राजतन्त्र विरोधी बन्दियों
    को रखा और यातनाएँ दी जाती थीं, निरंकुशता और दमन का एक घृणित प्रतीक था। 14
    जुलाई 1789 को निहत्थी जनता की भीड़ ने इस पर धावा बोलकर क़ब्ज़ा कर लिया।
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 661

पेरिस की निहत्थी भीड़ ने बास्तीय पर धावा बोल दिया, बास्तीय का पतन हो गया।
14 जुलाई 1789
वर्साई¹ :
5 अक्टूबर 1789 — हज़ारों स्त्री-पुरुष राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति अंगरक्षक सेना
द्वारा किये गये गुस्ताख़ी भरे व्यवहार का बदला लेने के लिए वर्साई की ओर कूच
कर गये। इसे वर्साई अभियान के नाम से जाना जाता है। उसके बाद घटी घटनाओं
के फलस्वरूप राजा को पेरिस लाया गया।
पृष्ठ 188 (123)
प्रत्येक राष्ट्र का विवेक जब जाग जाता है, तो वह अपने सभी उद्देश्यों के लिए
पर्याप्त सिद्ध होता है। (पृष्ठ 112, राइट्स ऑफ़ मैन)²
चूँकि हर काल में सरकार का स्वरूप पूरी तरह से राष्ट्र की इच्छा का ही
मामला रहा है, यानी कि अगर उसने राजतन्त्रात्मक स्वरूप चुना, तो ऐसा करने का
उसे अधिकार था; और उसके बाद अगर उसने गणतान्त्रिक होना पसन्द किया, तो
उसका अधिकार था कि वह गणतान्त्रिक हो, और राजा से यह कहे कि "अब
तुम्हारे लिए हमारे पास कोई गुंजाइश नहीं है।"
हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में, मन्त्री अर्ल ऑफ़ सेलबोर्न³
पृष्ठ 189 (124)
राजा :
यदि कहीं कोई ऐसा आदमी हो जो अन्य सबसे लोकोत्तर रूप में इतना अधिक
बुद्धिमान हो कि राष्ट्र के संचालन के लिए उसकी बुद्धि ज़रूरी हो, तब तो राजशाही
का कुछ औचित्य माना जा सकता है, लेकिन जब हम किसी देश पर नज़र दौड़ाते
हैं और देखते हैं कि कैसे उसका हरेक हिस्सा अपने मामलों की सूझबूझ रखता

  1. वर्साई : पेरिस से कुछ दूर स्थित वर्साई के महलों में राजा और उसके मन्त्रियों का
    ठिकाना था जहाँ से वे सेना के सहारे क्रान्ति को दबाने की कोशिश कर रहे थे। 5 अक्टूबर
    1789 को हज़ारों लोगों ने वर्साई पर धावा बोला और राजा लुई चौदहवें, रानी मैरी
    अन्तोयनेत तथा उनके अमले को बन्दी बनाकर पेरिस ले आये।
  2. टॉमस पेन की रचना राइट्स ऑफ़ मैन से (देखें पृष्ठ 14 (11) का सन्दर्भ 3)
  3. प्रथम अर्ल ऑफ़ सेल्बोर्न राउन्डेल पामर (1812-1895) या उसका पुत्र द्वितीय अर्ल
    ऑफ़ सेल्बोर्न विलियम वाल्डग्रेव पामर (1859-1942)। दोनों ही ब्रिटिश संसद के सदस्य
    थे।
    पेन और सेल्बोर्न के उद्धरण मोटे अक्षरों में पेज पर तिरछे लिखे हुए हैं।
    662 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

है; और जब हम पूरी दुनिया पर नज़र दौड़ाते हैं और देखते हैं कि इसमें रहने वाले
सभी मनुष्यों में से राजाओं का ही वंश ऐसा है जो अपनी क्षमता में सबसे नगण्य
है, तब हमारी बुद्धि इस सवाल पर चकराने लगती है कि – आख़िर इन लोगों को
क्यों बरक़रार रखा गया है? 112¹
अपमानकर्ता :
“यदि टैक्सों के जुल्मो-सितम को ख़त्म करने की गरज से राजशाही और हरेक
क़िस्म की वंशानुगत सरकार की धोखाधड़ी और छल-कपट से भरी टैक्स-नीति
का भण्डाफोड़ करना – असहाय बच्चों की शिक्षा तथा बूढ़ों एवं मुसीबत के मारे
लोगों की सहायता की योजनाएँ प्रस्तावित करना – युद्ध के घृणित चलन को ख़त्म
करना – सार्वभौमिक शान्ति, सभ्यता और वाणिज्य को प्रोत्साहित करना – और
राजनीतिक अन्धविश्वास की बेड़ियों को तोड़ डालना, तथा अधोगति के शिकार
मनुष्य को उसकी वाजिब गरिमा तक उठाना – यदि ये सब चीजें अपमानजनक
हैं, तो मुझे एक अपमानकर्ता का जीवन जीने दो, और मेरी क़ब्र पर “अपमानकर्ता”
का नाम खुदवा देना।” xi²
पृष्ठ 140 (125)
लेकिन जब स्थान नहीं बल्कि सिद्धान्त कर्म को ऊर्जस्वित करने वाला कारण
बन जाता है, तो मैं देखता हूँ कि आदमी हर जगह एक ही जैसा हो जाता है।³
मृत्यु :
यदि हम अमर होते तो बहुत दुखी होते, इसमें कोई शक नहीं कि मरना कठिन
है, पर यह सोचना मधुर लगता है कि हम हमेशा जीते ही नहीं रहेंगे।⁴
( पृष्ठ 45, एमिली)
समाजवादी व्यवस्था :
“प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के
अनुसार।”⁵

  1. टॉमस पेन, राइट्स ऑफ़ मैन
  2. ब्रिटिश सरकार द्वारा राजद्रोह का मुक़दमा चलाये जाने पर टॉमस पेन द्वारा दिया गया
    प्रसिद्ध जवाब
  3. और 4. ये दोनों उद्धरण मोटे अक्षरों में पेज पर तिरछे लिखे हुए हैं।
  4. शोषण-विहीन, वर्ग-विहीन, राज्य-विहीन साम्यवादी समाज को अभिलक्षित करने वाला
    मार्क्स-एंगेल्स का प्रसिद्ध सूत्र वाक्य
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 663