भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 651, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 171 (106)
जेसुइट¹ :
3. यहाँ तक कि जेसुइट बेलार्मिन² और मारिएना³ की भी यही दलील थी कि
राजा अपनी सत्ता जनता से प्राप्त करे; परन्तु पोप के अधीन रहे।
राजा जेम्स प्रथम⁴ (1609) : जेम्स प्रथम ने इस सिद्धान्त को, 1609 में,
संसद में एक वक्तव्य देते हुए यह कहकर स्वीकार किया कि “एक स्थापित राज्य
का हरेक न्यायप्रिय राजा यह देखने के लिए बाध्य है कि उसकी सरकार के गठन
में, जनता के साथ उसके क़ानूनों के तहत जो पैक्ट किया जाता है वह जनता को
स्वीकार्य भी हो।”
कनवेंशन पार्लियामेण्ट (1688) : कनवेंशन पार्लियामेण्ट ने 1688 में
घोषित किया कि जेम्स द्वितीय⁵ को “राजा और जनता के बीच मूल समझौते को
तोड़कर संविधान को उलटने की कोशिश करने के कारण सिंहासन ख़ाली कर देना
पड़ा।”
बोदें⁶ (1586)8 : आधुनिक काल के पहले सम्पूर्ण राजनीतिक दार्शनिक
और 'रिपब्लिक' (1577 और 1586) के लेखक, बोदिन का कहना है कि
“समझौता नहीं, बल्कि ताक़त से गणराज्य की उत्पत्ति हुई है।” आदिकालीन
पितृसत्तात्मक सरकारों को जीत करके उखाड़ फेंका गया, और इस प्रकार,
प्राकृतिक स्वतन्त्रता का अन्त हो गया।
उसके विचार से, “सम्प्रभुता नागरिकों के ऊपर सर्वोच्च सत्ता है।” वह
मानता था कि “सम्प्रभुता स्वतन्त्र, अविभाज्य, स्थायी, अहस्तान्तरणीय और
- जेसुइट : सोसायटी ऑफ़ जीसस नामक सम्प्रदाय का सदस्य; इस कैथोलिक धार्मिक
सम्प्रदाय की स्थापना 1540 में, सेण्ट इग्नेशियस लोयोला ने की थी। - बेलार्मिन (इतालवी में बेलार्मिनो) – राबर्टो फ्रांसिस्को रोमोलो (1542-162) इतालवी
धर्मशास्त्री, वह मानता था कि पोप के पास एक अयोग्य शासक को हटा देने का अप्रत्यक्ष
अधिकार होता है। - जुआन डि मारिएना (1536-1624) : स्पेन का इतिहासकार और जेसुइट; वह एक
निरंकुश शासक को उखाड़ फेंकने को वैध मानता था। - जेम्स प्रथम (1602-1625): ब्रिटेन का राजा। उसने राजा के दैवीय अधिकार की
घोषणा की, जिसको लेकर संसद से उसका टकराव हुआ। - जेम्स द्वितीय (1633-1701) : ब्रिटेन का राजा। अपनी कैथोलिक पक्षधरता और
स्वेच्छाचारी शासन के कारण उसे 1688 की “गौरवशाली क्रान्ति” के बाद, सिंहासन छोड़कर
फ्रांस भागना पड़ा। - ज्याँ बोदें (1530-1596) : फ्रांसीसी दार्शनिक। उसका मानना था कि सम्प्रभु शासक
की सत्ता को जनतान्त्रिक संसद संशोधित कर सकती है।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 645