भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 658, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंनागरिक समाज की उत्पत्ति!
लेकिन ऐसा लगता है कि लोगों को किसी प्रकार का ख़तरा और भय रहता
था, और इसीलिए, उन्होंने नागरिक स्वतन्त्रता के पक्ष में, अपनी प्राकृतिक
स्वतन्त्रता को तिलांजलि दे दी। संक्षेप में, आवश्यकता, सहूलियत और रुझान
ने लोगों को समाज में बाँधने के लिए विवश किया।
नागरिक समाज की परिभाषा!
जो लोग एक निकाय में गठित हो चुके होते हैं, और जिनके पास एक ऐसा
सर्वमान्य स्थापित क़ानून और न्यायाधिकरण होता है जिसमें अपील की जा सके
तथा जिसे आपसी विवादों को निपटाने एवं दोषी को दण्डित करने का अधिकार
हो, वे एक नागरिक समाज में होते हैं।
सहमति :
दूसरों पर विजय सरकार का ‘स्रोत’ नहीं है। सहमति ही किसी भी वैध
सरकार का स्रोत थी, और हो सकती है।
क़ानून-निर्मात्री सभा लोगों के जीवन, स्वतन्त्रता और सम्पत्ति के ऊपर पूर्णतः
मनमाना अधिकार नहीं रखती, क्योंकि इसके पास सिर्फ़ वही संयुक्त अधिकार होता
है जो समाज के गठन से पहले अलग-अलग सदस्यों के पास हुआ करता था, और
जिसे उन्होंने अपने विशेष और सीमित उद्देश्यों के लिए सौंप दिया है।
क़ानून :
“क़ानून का उद्देश्य स्वतन्त्रता को ख़त्म करना या रोकना नहीं, बल्कि
उसे सुरक्षित करना और विस्तृत करना है।”
विधायिका :
विधायिका कुछ निश्चित उद्देश्यों के लिए सिर्फ़ एक न्यासधारी सत्ताभर है, जो
यदि इसमें न्यस्त किये गये विश्वास को खण्डित करे, तो जनता द्वारा भंग या
परिवर्तित की जा सकती है।
जनता की सर्वोपरि सम्प्रभुता!
इस प्रकार सर्वोच्च सत्ता या सर्वोपरि सम्प्रभुता हमेशा जन-समुदाय के पास ही
रहती है, परन्तु वह इसका इस्तेमाल तब तक नहीं करता, जब तक कि सरकार भंग
नहीं हो जाती।
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