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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 654, कुल 788 में से

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पृष्ठ 654

पहुँचाने से बच सकें तथा एक साथ मिलकर उस किसी भी चीज़ से अपना बचाव
कर सकें जो गड़बड़ी पैदा करने वाली हो या इस तरह की सहमति के ख़िलाफ़
पड़ती हो। इसी की बदौलत क़स्बे, नगर और राज्य अस्तित्व में आये। तब आत्मरक्षा
और संरक्षण की यह आधिकारिक सत्ता जो बुनियादी तौर पर उनमें से प्रत्येक के
भीतर तथा संयुक्त रूप से सबमें निहित थी, डिप्टियों और कमिश्नरों के रूप में
राजाओं और मजिस्ट्रेटों को सौंप दी गयी।”
“राजाओं और मजिस्ट्रेटों की सत्ता और कुछ भी नहीं है, सिवाय इसके कि
यह सिर्फ़ उन्हें जनता द्वारा सबकी भलाई के विश्वास के साथ प्रदानित, हस्तान्तरित
और सौंपी गयी सत्ता है, जो अभी भी बुनियादी तौर पर उसी में (यानी जनता
में – स.) निहित होती है और जो उसके प्राकृतिक जन्मसिद्ध अधिकार का
उल्लंघन किये बग़ैर छीनी नहीं जा सकती। अतः राष्ट्र राजाओं को चुन या हटा
सकते हैं, स्वतन्त्र-जन्मा मनुष्यों के महज इस अधिकार और स्वतन्त्रता के आधार
पर कि वे किनसे शासित होना सर्वोत्तम समझते हैं।”
पृष्ठ 173 (108)
राजाओं के दैवी अधिकारों का सिद्धान्त
पितृसत्तात्मक सिद्धान्त
इसी युग में जहाँ बहुतेरे विचारक ‘जनता की सम्प्रभुता’ के इन सिद्धान्तों का
इस प्रकार प्रतिपादन करने में लगे हुए थे, वहीं दूसरे सिद्धान्तकार भी थे, जो यह
साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि राज्य वृहदाकार परिवार ही हैं, जिनमें एक
कुटुम्ब के मुखिया की पैतृक सत्ता, ज्येष्ठता क्रम की वंशपरम्परा में पूर्ववर्ती सम्प्रभु
शासक के उस प्रतिनिधि को हस्तान्तरित कर दी जाती है जो किसी राष्ट्र पर शासन
करने में सक्षम सिद्ध हो सके। इसीलिए राजशाही को एक अजेय अधिकार पर
आधारित माना गया, और राजा को केवल ईश्वर के प्रति ही उत्तरदायी
ठहराया गया। इसे ही “राजाओं का दैवी अधिकार” कहा गया। इसे ही
“पितृसत्तात्मक सिद्धान्त” कहा गया।¹
टॉमस हॉब्स :
1642-1650-1651 में लिखी गयी अपनी विविध रचनाओं में उसने सम्प्रभु
शासक की असीमित सत्ता के सिद्धान्त को जनता के आरम्भिक क़रार के विरोधी
सिद्धान्त के साथ संयुक्त कर दिया। परन्तु निरंकुशतावाद – मूक आज्ञाकारिता – के

  1. यह स्पष्ट नही है कि भगतसिंह किसी पुस्तक से उद्धरण नोट कर रहे थे या ये उनकी
    अपनी टिप्पणियाँ हैं।
    648 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़