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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग / 235
क्रान्तिकारी दल के प्रति है। और कभी-कभी तो क्रान्तिकारियों को फांसी होने
के अवसर पर खुले आन्दोलन के ये नेता इस प्रकार से समवेदना के साथ वीरत्व
की मर्यादा को अक्षुण्ण रखते हुए ऐसी ही आलोचना करते थे जिसके परिणामतः
क्रान्तिकारी भावना को प्रोत्साहन ही मिलता था।
भारत के दूसरे प्रान्तों में अभी तक खुला राजनीतिक आन्दोलन कहने लायक
कुछ भी नहीं हुआ था। सम्भवतः स्वर्गीय लाजपतराय के कारण पंजाब प्रान्त
बंगाल को छोड़कर भारत के अन्य प्रान्तों से अधिक जागृत था। इसलिए हम
देखते हैं कि पंजाब और बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन जैसा पनपा ऐसा और
किसी प्रान्त में नहीं पनपा। बम्बई प्रान्त में राजनीतिक जागरण यथेष्ठ था।
लेकिन लोकमान्य तिलक के बाद बम्बई प्रान्त में किसी उपयुक्त नेता का आविर्भाव
नहीं हुआ। लोकमान्य तिलक छः साल तक मण्डला में कैद रहे। इस बीच महा-
राष्ट्र और गुजरात ने भारत के राजनीतिक आन्दोलन में विशेष महत्त्वपूर्ण भाग
नहीं लिया। उद्योग-धन्धों की उन्नति बम्बई प्रान्त में जैसी थी ऐसी और किसी
प्रान्त में नहीं थी। लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में महाराष्ट्र भारत के दूसरे प्रान्तों
से पीछे नहीं था। लेकिन तिलक के बाद उपयुक्त नेता न रहने के कारण महाराष्ट्र
एवं गुजरात की अग्रगति रुक-सी गई। युक्त प्रान्त में अभी पं० जवाहरलालजी
का अभ्युदय नहीं हुआ था। बिहार में अभी तक न कोई राजनीतिक आन्दोलन ही
हुआ था और न किसी प्रभावशाली नेता का ही आविर्भाव हुआ था। सम्भवतः
बिहार प्रान्त भारत में सबसे पिछड़ा हुआ प्रान्त था। मद्रास प्रान्त की हालत भी
बिहार से कुछ अधिक अच्छी न थी।
लेकिन जब से महात्माजी राजनीतिक क्षेत्र में अवतीर्ण हुए, भारत की
हालत एकदम पलट गई। अभी तक राजनीतिक और क्रान्तिकारी आन्दोलन के
कारण भारत में थोड़ी-बहुत जागृति हो चुकी थी। अण्डमन जाने के पहले युक्त
प्रान्त के शहर के आस-पास के देहातों में भी श्री अरविन्द का नाम मैंने सुना था।
बम पार्टी के नाम से भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन का परिचय जन साधारण
को प्राप्त हो चुका था।
इसके अतिरिक्त यूरोपियन महायुद्ध के कारण भी संसार-भर की हवा पलट
गई थी। भारत में भी आम जनता में इसका असर पहुँचा। इस अभूतपूर्व परि-
वर्तन का परिचय तब मिला जब महात्मा गांधी अपने कार्यक्रम को लेकर भारत
के राजनीतिक क्षेत्र में कूद पड़े।
महात्मा गांधी भारत के क्रान्तिकारियों के प्रति विशेष रूप से आकृष्ट हुए
थे। इनके त्याग और इनके साहस से महात्मा जी समझ गए थे कि ऐसे ही त्याग
और साहस के साथ यदि भारत के राजनीतिक नेतागण कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण न
हुए तो उनके काम का असर प्रजा या सरकार पर कुछ भी नहीं पड़ेगा। क्रान्ति-
कारी आन्दोलन को दबाने के लिए रोलट कमेटी की एक भीषण योजना प्रकाशित
हो चुकी थी। महात्मा गांधी ने इस आयोजना के विरुद्ध तीव्र रूप से आन्दोलन

236 / बन्दी जीवन
शुरू किया। इस आन्दोलन को शुरू करने के पहले चम्पारन में महात्माजी ने
अपनी शक्ति की परीक्षा कर ली थी। देखने में और कार्य में भी बिहार प्रान्त
भारत में सबसे पिछड़ा हुआ प्रान्त था। चम्पारन बिहार प्रान्त में ही था। इस
चम्पारन के जिले में महात्माजी ने सर्वप्रथम सक्रिय किन्तु शान्त विप्लव प्रारम्भ
किया था और यही देखा गया कि जिस प्रान्त को पिछड़ा हुआ समझा गया था
वह भी महात्माजी के नेतृत्व में सुप्रतिष्ठित ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह
करने को तैयार हो गया। महात्माजी ने अपने आत्म-चरित्र में इस बात को स्वी-
कार किया है कि सन् 1919 में पहली दफा व्यापक रूप से सत्याग्रह आरम्भ करने
के पहले महात्माजी पंजाब नहीं गए थे एवं उस प्रदेश में उन्होने अपने आन्दोलन
का कोई प्रचार भी नहीं किया था, इसलिए महात्माजी ने यह आशा नहीं की थी
कि पंजाब देश में भी उनका सत्याग्रह आन्दोलन जरा भी जोर पकड़ेगा। ये बातें
महात्माजी की आपबीती में मिलेंगी। युक्त प्रान्त में भी महात्माजी ने अपने
सिद्धान्त का कुछ भी प्रचार नहीं किया था। मुझे याद है, मेरे अण्डमन जाने के
पहले मोतीलालजी ने इलाहाबाद में महात्माजी के South Africa (दक्षिण
अफ्रीका) आन्दोलन के सिलसिले में सभा की थी। उस सभा में न अधिक आदमी
आये थे और न कोई जोश दिखलाई दे रहा था। लेकिन महायुद्ध के बाद महात्मा
जी जब अपने नवीन कार्यक्रम को लेकर मैदान में कूद पड़े तो समग्र भारत में
उनके आह्वान की सजीव प्रतिध्वनि सुनाई पड़ी। महात्माजी ने स्वीकार किया है
कि समग्र भारत ने जिस प्रकार से महात्माजी के आह्वान का उत्सुकता के साथ
प्रत्युत्तर दिया उसकी आशा उन्हें न थी। समग्र देश मानो उपयुक्त नेता की
अपेक्षा कर रहा था। महात्माजी जैसे महान् नेता यदि कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण न
होते तो शायद ही भारत में आज की जैसी जागृति होती। उपयुक्त नेतृत्व के
कारण भारत की जन-शक्ति का परिचय मिला।
महात्माजी के आन्दोलन के प्रारम्भ होने के पहले ही भारत की जनता में
जागृति पैदा हुई थी। और यह जागृति उत्तरोत्तर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उग्र
से उग्र रूप धारण कर रही थी। यदि महात्माजी की तरह महाप्रतिभावान नेता
भी जनता के इस रुख के विरुद्ध जाते तो उन्हें भी पराजय स्वीकार करनी पड़ती।
इस बात का भी प्रमाण महात्माजी की आपबीती में ही है। जिस चम्पारन जिले
में महात्माजी अपना विद्रोह आन्दोलन सफल रूप से चला पाए उसी चम्पारन
जिले में जब महात्माजी ने अंग्रेज सरकार को मदद देने की गरज से अपने
आदमी भेजे तो जनता ने महात्माजी का साथ नहीं दिया। यहाँ तक कि महात्माजी
के आदमियों को गाँव-गाँव जाने के लिए कोई सवारी तक नहीं मिली। अर्थात्
जनता मे जागृति हो चुकी थी। महात्माजी ने उस जागृति से लाभ उठाया और
भारत का प्रभूत कल्याण किया। भारत के अन्य नेतागण ऐसा नहीं कर पाए। यही
महात्माजी की एक महान् विशेषता है।
1919 के व्यापक सत्याग्रह आन्दोलन के परिणामतः अमृतसर में जलियां-

चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग / 237
वाला बाग का नृशंस गोलीकांड हो गया। समस्त सभ्य संसार स्तब्ध रह गया।
अंग्रेजों के साथ अमेरिकनों की सन्धि थी। ऐसी परिस्थिति में ही भारत के हम
बहुत-से राजबन्दी मुक्त किये गए। इसी परिस्थिति में अण्डमन से मुक्त होकर मैं
भी भारत में वापस आया।
मुक्त राजबन्दियों में से बहुत-से राजनीति से अलग होकर गृहकार्य में लग
गए। लेकिन ऐसे भी बहुत-से रहे जिनका यह विश्वास बना रहा कि सशस्त्र
क्रान्ति को छोड़कर और किसी रास्ते से भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं हो
सकती। बेनियापुकुर के मकान में रहते समय बंगाल के विभिन्न क्रान्तिकारी
दलों के सदस्यों से मैं मिला। लेकिन अभी तक बहुत-से क्रान्तिकारी नेतागण
मुक्त नहीं हुए थे। जैसे किसी विशाल नगर में आग लग जाय अथवा भीषण
बवंडर से यदि कोई शहर विध्वस्त हो जाय या यदि कोई प्रदेश भीषण बाढ़ के
कारण अस्त-व्यस्त हो जाय और कोई इन सब दुर्घटनाओं के बाद उन सब प्रान्तों
की जो दशा होती है उसे देखे, बस भारत के क्रान्तिकारी दलों की भी इन दिनों
वही अवस्था हो रही थी। जैसे भीषण भूकम्प के बाद पुनः निर्माण कार्य प्रारम्भ
होता है वैसे ही भारत में फिर से क्रान्तिकारी आन्दोलन का पुनर्गठन प्रारम्भ
हुआ।

7
जमशेदपुर में मजदूर संगठन
सन् 1920 में महात्माजी का सत्याग्रह आन्दोलन समाप्त हो जाने के बाद
ही मैंने 'पूर्ण रीति से विप्लव दल का संगठन प्रारम्भ किया था। लेकिन इसमें
कितनी उलझनों का सामना करना पड़ा उसका कुछ हाल यहाँ दे देना आवश्यक
है। जैसाकि मैंने पहले ही उल्लेख कर दिया है। मेरी तरह से दूसरे अनेक मुक्त
राजबन्दियों के सामने भी सबसे कठिन प्रश्न यही था कि कैसे अपनी आर्थिक
स्वतन्त्रता प्राप्त करें। कभी सोचा किताब की दुकान खोलें जिससे पढ़ने-लिखने की
फुरसत रहे। विप्लव के कार्य को चलाने के लिए किताबों की दुकान उपयोगी
होगी। लेकिन इसके लिए बहुत रुपयों की आवश्यकता थी। इसलिए इस ख्याल
को छोड़ना पड़ा। कभी सोचा छापाखाना खोलें। छापेखाने की सहायता से
प्रचार कार्य का भी काम खूब चलेगा। पुस्तकें भी प्रकाशित की जाएँगी। लेकिन
इसके लिए भी कम-से-कम दस हजार रुपयों की आवश्यकता थी। आखिरकार
इस ख्याल को भी छोड़ना पड़ा। फिर सोचा एक बिसातखाने की दुकान खोल
दें। सोचा कि शायद एक-दो हजार रुपये की लागत में ऐसी दुकान खोल सकते
हैं। पिता की कमाई के कुछ रुपये माँ के पास थे। मेरी माँ और मेरे सब भाई
मेरे ऊपर अत्यधिक जोर डाल रहे थे कि मैं किसी काम में लग जाऊँ। सी०
आई० डी० के डिप्टी इन्स्पेक्टर जनरल ने हमारे मामू को लिखा था कि मुझे ऐसे
काम में लगाया जाय कि जिससे दूसरे किसी उलझन मे पड़ने का अवकाश ही
न मिले। इसलिए सी० आई० डी० जी० यह चाहते थे कि मेरे लिए जमीन ले
ली जाय और मैं खेती के काम में लगा दिया जाऊँ। मैंने इस काम को स्वीकार
नहीं किया। आखिर बिसातखाने की दुकान खोलने की ठहरी। वह कहाँ खोली
जाए ? यदि मौके का स्थान न मिले तो दुकान का खोलना ही व्यर्थ है।
बिसातखाने की दुकान के लिए मौका ढूंढते-ढूंढ़ते कलकत्ता शहर को छान
डाला। सुबह से शाम तक जगह की तलाश में घूमते थे। घूमते-घूमते थक जाते
थे। एक दिन क्लान्त होकर दिल में ऐसा ख्याल पैदा हुआ कि यदि मैं औरत
होती तो मेरे लिए जीविका उपार्जन करने का कम-से-कम एक रास्ता तो खुला
रहता ही जैसाकि मैने कलकत्ता की बीसों सड़कों के जंगले पर बैठी हुई औरतों
को देखा था। मेरी आँखों में आँसू आ जाते थे। मैं सोचा करता था आखिर

जमशेदपुर में मजदूर संगठन / 239
दूसरे देशों के क्रान्तिकारीगण कैसे निर्वाह करते होंगे। इस बात की खोज में मैंने
बहुत-सी किताबें पढ़ीं, लेकिन मुझे कुछ पता न चला। टालस्टाय ने एक स्थान
पर ऐसा लिखा है कि जिस पुस्तक में जिस बात की आशा करते हैं उस पुस्तक में
उस बात को छोड़कर और बहुत-सी बातें मिलती हैं, लेकिन जिस बात के लिए
पुस्तक लिखी गई है वह बात उस पुस्तक में बहुत कम मिलती है। विप्लववादियों
के बहुत-से ग्रन्थ पढ़े लेकिन वे लोग अपना निर्वाह कैसे करते थे, इसका पता मुझे
नहीं चला। सिर्फ एक पुस्तक में क्राप्टकिन साहब ने जो कुछ लिखा है उससे
ऐसा मालूम होता है कि रूस में भी क्रान्तिकारियों की वैसी ही दुर्दशा होती थी
जैसी कि हमारे देश में होती है।
कलकत्ता में रहकर मैं काम-काज की खोज कर रहा था। उधर मेरी माँ मेरी
शादी के लिए लड़की ढूँढने बंगाल आई थी। कुछ स्थानों पर माँ के साथ मुझे
भी जाना पड़ा। इसी सिलसिले में अपने कुछ दूर के रिश्तेदारों से बातचीत करने
के बाद यह तय हुआ कि उन रिश्तेदारो के साथ मिलकर कलकत्ता के पास वर्द्ध-
मान जिले के कालना नामक सब-डिवीज़न में ईंट बनाने का कारबार खोलें। कुछ
महीने तक इस काम मे मुझे लगना पड़ा। ऊपर से तो काम करते थे, जी में रोते थे।
कालना में काम करते समय मैंने बन्दी जीवन लिखना प्रारम्भ किया। दिन-
भर काम करता था। आधी रात को लिखा करता था। पढ़ने का समय थोड़ा ही
मिलता था। वहाँ के नौजवानो से भी मिलने का प्रयत्न किया करता था। काम
के सिलसिले में कभी-कभी कलकत्ता जाना पड़ता था। ऐसे अवसरों पर कभी-कभी
देखता था कि बाढ़-पीड़ितों की सहायता के लिए नौजवान लोग टोली बनाकर
सड़क की दुकानों पर से चन्दा संग्रह कर रहे हैं। इस प्रकार से नौजवानो की
देश-सेवा की लगन को देखकर मेरा हृदय पिघल जाया करता था। उनके साथ
अपनी तुलना करते हुए अपने प्रति नितान्त दुःख होता था। सोचता था मैं क्या
चाहता था और क्या कर रहा हूँ। अपने को कर्त्तव्य-च्युत होते देखकर मैं रो
पड़ता था। ट्राम में बैठे हुए रोना भी तो मुश्किल था। दूसरे आदमी आँख में
आँसू देखकर क्या कहेंगे। इसलिए दूसरो की आँख बचाकर अपनी आँखें पोंछा
करता था।
मेरे ईंट के कारोबार में लगने के पहले कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हो
चुका था। इसका उल्लेख पहले ही कर चुका हूँ। जिन दिनों मैं ईंटों के कारोबार
में लगा हुआ था उन दिनों मे कांग्रेस का विशेष कोई काम नहीं हो रहा था।
ईंट का कारबार बरसात के दिनों में बन्द होता है। इस कारबार में रुपये
लगा दिए थे जब तक मैं इस लागत को वसूल नहीं कर लेता तब तक मैं इस कार-
बार को कैसे छोड़ सकता था। निश्चय तो मैंने कर लिया था कि इस कारबार
को छोड़ दूँगा। इस कारबार को छोड़ने के पहले मेरी शादी हो गई। अन्त में
मैंने अपने कारबार को अपने रिश्तेदारों के हाथ बेच दिया। मुझे एक हजार
रुपये का घाटा हुआ। खाने-पीने का खर्च और मेहनत तो अलग ही रही।

240 / बन्दी जीवन
ईंट के कारबार के बाद बी० एन० रेलवे में मैंने पचास रुपये की एक नौकरी
कर ली। इस नौकरी का अनुभव कैसा रहा इस स्थान पर इसकी कोई चर्चा नहीं
करना चाहता। इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि एक दिन आत्म-हत्या भी करने
की इच्छा हुई थी। इतने में एक दिन मेरे पास जमशेदपुर से एक आदमी आया।
जमशेदपुर की मजदूर सभा के सभापति श्री एस० एन० हलदारजी ने इन्हें मेरे
पास भेजा था। जमशेदपुर का मजदूर संगठन टूटता जा रहा था। वहाँ के मजदूर
संगठन को सँभालने के लिए हलदारजी मुझे उसमें लगाना चाहते थे।
देशबन्धु सी० आर० दास की धर्मपत्नी हलदार साहब की बहन लगती थीं। डेढ़
सौ रुपये मासिक वेतन पर मैं जमशेदपुर में लेबर यूनियन के काम पर चला
गया। बी० एन० रेलवे के दफ्तर के हेड क्लर्क ने मुझे थोड़ा-सा समझाना चाहा
कि रेलवे की नौकरी में स्थिरता है। लेबर यूनियन की नौकरी में कोई स्थिरता
नहीं है। ऐसी दशा में मेरे लिए रेलवे की नौकरी को छोड़ देना उचित होगा या
नहीं, यह बात अच्छी तरह से सोच लेनी चाहिए। लेकिन मैं तो नौकरी करना
चाहता ही न था। इसलिए जमशेदपुर के मजदूर संगठन के काम को मैंने सहर्ष
स्वीकार कर लिया। मानो मेरे लिए यह एक भारी आशीर्वाद था। रेलवे की
नौकरी को छोड़कर जमशेदपुर चला गया। नौ महीने तक मजदूर सगठन का.
काम किया। जमशेदपुर में पचहत्तर हजार मजदूर काम करते थे। नौ महीने
रात-दिन काम करते हुए मैंने मजदूर संगठन के बारे में यथेष्ठ अभिज्ञता अर्जन
कर ली। जमशेदपुर में काम करते समय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में सम्मिलित
हुआ। इस अवसर पर भारत के समस्त प्रान्तों के क्रान्तिकारी व्यक्तियों से
जान-पहचान, मेल-मुलाकात हुई। इस अधिवेशन में राजनीतिक बन्दियों के लिए
जो कुछ किया था उसका उल्लेख पहले ही कर चुका हूँ।
महात्माजी का सत्याग्रह आन्दोलन जोरों से चला था। उसका इतिहास
यहाँ पर लिखने की आवश्यकता नही है। जितने दिन यह आन्दोलन चलता रहा,
मैं जमशेदपुर में मजदूर संगठन का काम करता रहा। महात्माजी का सत्याग्रह
आन्दोलन जब निर्जीव होने लगा तब मैंने सोचा कि अब अपने क्रान्तिकारी दल
का काम प्रारम्भ करना चाहिए। जमशेदपुर के काम से दो बार इस्तीफा दिया
लेकिन दोनों बार लेबर यूनियन की कार्यकारिणी समिति ने मेरे इस्तीफे को स्वी-
कार नहीं किया। लेबर यूनियन से डेढ़ सौ रुपया लेना मैं ठीक नहीं समझता था।
इसके अतिरिक्त क्रान्तिकारी दल का संगठन करना मजदूर संगठन की जिम्मे-
दारी को लिये हुए सम्भव नहीं था। मजदूर संगठन के काम में यदि कोई सोलह
आना मन और चौबीस घण्टे का समय नहीं लगाता है तो इस काम को ठीक
प्रकार से कोई भी नहीं कर सकता। और यदि कोई मासिक वेतन लेता है तो
मजदूर संगठन के काम में उसे अपना पूरा समय लगाना उचित है।
जब से मैंने जमशेदपुर की लेबर यूनियन का काम हाथ में लिया था तब से
यूनियन की काफ़ी उन्नति हुई थी। मेरे आने के पहले यूनियन का चन्दा कुछ भी

जमशेदपुर में मजदूर संगठन / 241

वसूल नहीं हो रहा था। मेरे आने के बाद एक तो मुझे इसी चन्दे में से डेढ़ सौ
रुपया माहवार मिला करता था। इसके अलावा मैंने एकाउण्टेण्ट और ऑफिस
क्लर्क भी पचास रुपया माहवार पर नियुक्त किया था। इन सब खर्चों को चलाकर
भी यूनियन की तहवील मे एक हजार से ऊपर रुपया मैंने जमा कर लिया था।
इस हालत में मेरे लिए डेढ़ सौ रुपया माहवार लेना ज्यादा बे-मुनासिब न था।
लेकिन फिर भी मैंने यूनियन के काम को छोड़ देना ठीक समझा। यदि मुझे कोई
दूसरा व्यक्ति मिल जाता जो कि क्रान्तिकारी संगठन के काम को संभाल सकता
तो मैं यूनियन के काम को न छोड़ता। बंगाल मे क्रान्तिकारी व्यक्तियों की कुछ
कमी तो थी नहीं। तो फिर मुझे यूनियन का काम क्यों छोड़ना पड़ा ?
जैसाकि मैंने पहले ही बतला दिया है, भारत मे एक ही संस्था विप्लव के
मार्ग से भारत को स्वाधीन करने के काम मे नही लगी हुई थी। मेरे अण्डमन से
लौटने के बाद ढाका अनुशीलन समिति के नेताओं ने मेरे साथ खुले दिल से
सहयोग नहीं किया। रासबिहारी के रहते समय ढाका समिति का जो रुख था अब
वह नहीं रहा। ढाका समिति इस नई परिस्थिति मे क्या करना चाहती थी, इस
विषय को लेकर उसके नेताओ ने मेरे साथ किसी प्रकार का भी विचार-विमर्श
नहीं किया। श्री पुलिनबिहारीदास ढाका समिति के सर्वमान्य एव सबसे पुराने
नेता थे। राजबन्दियो के छूटने के बाद ढाका समिति का नेतृत्व श्री पुलिनबिहारी
के हाथ मे था। इन पुलिनबिहारी के साथ मैं अण्डमन मे रह चुका था। पुलिन-
बिहारी कैसे ढाका समिति के नेता बन गए थे, यह बात मेरी समझ में नहीं आती
थी। न बुद्धि मे, न अध्ययन में, न विचारशीलता में और न समझदारी मे ही
पुलिनबिहारी की कोई विशेषता थी। ऐसे तो वे बी० ए० तक पढ़े थे, लेकिन
उनकी मानसिक प्रकृति नितांत ठस थी। सामाजिक प्रश्नों को लेकर न कभी
उन्होंने किसी से कोई विचार-विमर्श या विचार-विनिमय ही किया और न
सामाजिक या राजनीतिक समस्याओं पर लिखी हुई किताबों को पढ़ने में कोई रुचि
ही दिखलाई। अण्डमन मे रहते समय अधिकारियों के साथ उनका कभी कोई
सघर्ष नही हुआ। जिस समय अन्य राजबन्दीगण अनशन करते थे अथवा अन्य
प्रकार से जेल अधिकारियो के साथ आत्म-मर्यादा की रक्षा के लिए अपमानो का
प्रतिवाद करने के लिए लडा करते थे तो उस समय पुलिनबिहारीजी छिपकर इन
झंझटो से अलग रहते थे। एक बात तो समझ मे आती है कि हरएक प्रकार का
दुःख और कष्ट उठाने के लिए हरएक आदमी तैयार नही हो सकता और ऐसी
आशा करना भी उचित नहीं है, लेकिन जो व्यक्ति ऐसा कर सकता है हृदयवान
सच्चे मनुष्य के लिए यह स्वाभाविक है कि वह उस व्यक्ति के प्रति सहानुभूति
सम्पन्न अवश्य होगा। यदि ऐसा व्यक्ति वीरो का साथ नहीं भी देता है तो भी
उसके आचरण से सहज ही मे सरलता के कारण समवेदना का और सहकारी होने
का भाव टपकता है। पुलिनबिहारी मे मैंने इस प्रकार की कोई भावना नहीं
पायी। अपनी मनुष्य चरित्र जानने की अभिज्ञता से मैंने यह समझ लिया था कि

242 / बन्दी जीवन
पुलिनबिहारी में नेतृत्व की कुछ भी योग्यता न थी। इसलिए अण्डमन में रहते हुए
ही मैंने यह निश्चय कर लिया था कि छूटने के बाद उनके साथ मैं किसी प्रकार
से भी काम नहीं कर सकता। पुलिनबिहारीजी में मात्र योग्यता की ही कमी हो,
केवल यही बात नहीं थी, नेतृत्व के लिए वे सर्वथा अयोग्य थे । वे शिक्षित समाज
में बैठकर साधारण प्रश्नों पर भी युक्तिपूर्ण रूप मे बातचीत नहीं कर सकते थे ।
एक दफा उन्होंने जिस बात को जिस प्रकार से ग्रहण कर लिया, फिर उस बात
को दूसरे प्रकार से समझने की शक्ति उनमें नहीं थी । अधिक क्या कहूँ उनके प्रति
मेरे दिल में रत्ती-भर भी श्रद्धा न थी ।
पुलिनबिहारी के छूट जाने के बाद ढाका अनुशीलन समिति उन्हीं के नेतृत्व
में काम करने लग गई । ढाका समिति के अन्य नेतागण भी पुलिनबिहारी के प्रति
अधिक श्रद्धावान नहीं थे । फिर भी उन्हें प्रारम्भ में पुलिनबिहारी को नेता
मानना ही पड़ा ।
महात्माजी का सत्याग्रह आन्दोलन जोरों पर चलने लगा। देशबन्धुदास ने
भी इस बढ़ती हुई लहर का साथ देने का निश्चय कर लिया । दासजी ने चाहा
कि पुलिनबिहारी, मैं एवं एक-दो और क्रान्तिकारी नेता उनका साथ दें। मैं उस
समय ईंट के कारबार में बुरी तरह फँसा हुआ था। इस कारण मन में प्रबल इच्छा
रहने पर भी मैं दासजी का साथ नही दे पाया। पुलिनबिहारी में कुछ योग्यता तो
थी ही नहीं, फिर सत्याग्रह में भी उनका विश्वास नही था । जो हो, पुलिनबिहारी
ने भी दासजी का साथ नही दिया। बंगाल के क्रान्तिकारी दल के दूसरे नेताओं
ने दासजी का साथ दिया। मैंने भी बहुत मर्तबा चाहा कि घर का सब काम छोड़-
कर खुले राजनीतिक आन्दोलन में जी-जान से लग जाऊँ । कभी-कभी ऐसा
ख़याल आता है कि ऐसा न करके मैंने भारी भूल की। नागपुर कांग्रेस मे मैंने
हिन्दी भाषा में वक्तृता दी थी। उस वक्तृता को सुनकर दासजी ने ऐसी इच्छा
प्रकट की थी कि मैं दासजी के साथ मिलकर मज़दूर आन्दोलन को काग्रेस आन्दो-
लन की एक शाखा बना दूँ। लेकिन दासजी के एक मित्र बैरिस्टर श्री निशितसेनजी
ने स्पष्ट शब्दों में एक बात मुझे समझा दी कि आर्थिक दृष्टि से यदि मैं स्वाव-
लम्बी नही होता हूँ तो राजनीति के क्षेत्र में मैं अपना आसन जमा नही पाऊँगा ।
मैंने दासजी की इच्छा का उल्लेख किया । तिस पर भी सेनसाहब ने अपनी राय
बदली नहीं। मैंने भी सेनसाहब की युक्ति को अस्वीकार नही किया। परिणामतः
मैं जमशेदपुर में लेबर यूनियन के वेतन भोगी आर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी का काम
करता रहा ।
इधर बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी दलों के नेता श्री सुरेन्द्रनाथ घोष,
श्री विपिनबिहारी गंगोली इत्यादि ने देशबन्धुदास के साथ सत्याग्रह आन्दोलन में
अपने दलों को अच्छी तरह से लगा दिया ।
जैसा मैंने पहले बताया है, अनुशीलन समिति के दो केन्द्र थे । एक केन्द्र ढाका
में था और दूसरा कलकत्ता में । कलकत्ता अनुशीलन समिति के सदस्यगण

जमशेदपुर में मजदूर संगठन / 243
कलकत्ता के अन्य क्रान्तिकारी दलों में शामिल हो गए। कलकत्ता अनुशीलन समिति
का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रहा। श्री यदुगोपालजी मुखर्जी कलकत्ता अनुशीलन-
समिति के अनुभवी सदस्य थे। मैं भी कलकत्ता अनुशीलन समिति का सदस्य रह
चुका था। अण्डमन जाने के पहले यदुगोपालजी से मेरा परिचय हो चुका था।
अण्डमन जाने के पहले मैंने चाहा था कि यदुगोपाल और मैं मिलकर कलकत्ता
अनुशीलन समिति का पुनर्गठन करें। लेकिन यदुगोपालजी ने इसका विशेष
आग्रह नही किया। मैं बनारस मे अपना संगठन करता रहा। अब अण्डमन
से लौटने के बाद जब मैं जमशेदपुर मे लेबर यूनियन के काम मे था तो
यदुगोपालजी ने मुझे अपनी पार्टी मे शामिल होने के लिए कहा। अण्डमन जाने के
पहले तक मै ढाका-समिति के साथ मिलकर काम कर रहा था। इस कारण मेरे
लिए यह उचित था कि पहले मैं ढाका वालों से मिलकर इस बात को जान लूं कि
मेरे साथ वे लोग खुले दिल से काम करने के लिए तैयार हैं या नही। ढाका
समिति के जितने नेतागण छूटकर बाहर आए थे, उनसे मेरी पटती नही थी।
लेकिन अभी और कुछ नेता छूटने को बाकी थे। इसलिए उनके छूटने की प्रतीक्षा
कर रहा था। लेकिन अब मैं समझता हूँ कि यदुगोपाल से न मिलना मेरे लिए
एक और गलती हो गई।
एक बात और हो रही थी जिसका पता पहले मुझे न था। पुलिनबिहारीदास
ने सी० आर० दास का साथ तो दिया ही नही, उलटे सी० आर० दास के
विरोधी दल के आदमियों से मिलकर वे सत्याग्रह आन्दोलन के खिलाफ प्रचार-
कार्य करने लग गए थे। बैरिस्टर एस० आर० दास, मी० आर० दास के आत्मीय
थे और उस समय गवर्नमेट एडवोकेट थे। एस० आर० दास और उनके अन्य
राजभक्त बन्धु-बान्धव मिलकर सत्याग्रह आन्दोलन के विरुद्ध प्रचार-कार्य चलाना
चाहते थे, जैसा युक्त प्रान्त में अमन सभाएँ किया करती थी। एस० आर० दास
आदि से काफ़ी रुपया ढाका समिति को मिलता था। इन रुपयों से 'शंख' नामक
एक साप्ताहिक पत्र एव 'हक कथा' नामक पर्चे निकलते थे। मुझे यह पता न था
कि राष्ट्रीय आन्दोलन के विरुद्धवादियों से रुपया लेकर यह साप्ताहिक पत्र
निकाला जाता था। मैं इस पत्र मे लेख दिया करता था। लेनिन की एक जीवनी
लिखनी प्रारम्भ की थी। करीब चार अध्याय लिख भी चुका था। इतने में एक
दिन कलकत्ता में यदुगोपाल से मेरी बातचीत हुई। पता चला कि 'हक़ कथा'
किस ढंग से निकलता था। 'शंख' की भी जन्म-कथा मालूम हो गई। ढाका
समिति के साथ मेरा सम्बन्ध पहले से ही कुछ अच्छा नही रहा। इन सब बातों को
सुनकर ढाका समिति के प्रति मेरी अश्रद्धा और बढ़ गई। ढाका समिति के किसी
नेता को भी मैने ऐसा नही पाया था जिनकी योग्यता की तुलना वारीन्द्र, उपेन्द्र
या हेमचन्द्र इत्यादि से कुछ भी हो सके। ढाका समिति की सबसे बड़ी बात यह
थी कि वह संगठित थी। बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी दल अलग-अलग टोलियों
में बँटे हुए थे। संगठन की दृष्टि से एक तो छोटी-छोटी टोली होने के कारण,

244 / बन्दी जीवन
एवं ये छोटी-छोटी टोलियाँ अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को क़ायम रखना चाहती
थीं, इस कारण से भी ढाका-समिति को छोड़कर बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी
दल, संगठन की दृष्टि से दुर्बल थे। लेकिन बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी दलों के
नेतागण व्यक्तित्व एवं एकता की दृष्टि से ढाका समिति के नेतागणों से कहीं
उच्च श्रेणी के थे। मेरी हार्दिक सहानुभूति बंगाल के दूसरे दलों के नेताओं के
प्रति थी। लेकिन अभी मैं 'त्रैलोक्य चक्रवर्ती' नामक ढाका समिति के एक
प्रतिष्ठित नेता के छूटने की प्रतीक्षा कर रहा था। ऐसी परिस्थिति में मेरे लिए
बंगाल के किसी भी क्रान्तिकारी दल में शामिल होना सम्भव नहीं था। मैंने एक
प्रकार से तो निश्चय कर लिया था कि युक्त प्रान्त एवं पंजाब में स्वतन्त्र रूप से
क्रान्तिकारी दल का संगठन प्रारम्भ कर दूँ, फिर बाद को निश्चय करूँगा कि
बंगाल के किस दल के साथ हम सहयोग कर सकते हैं।
यह बात सच है कि कुछ सरकारी प्रतिष्ठा-प्राप्त लोगों से रुपया लेकर ढाका
समिति कुछ हद तक अपना संगठन कर पाई थी। लेकिन राष्ट्रीय आन्दोलन का
विरोध करने के कारण बंगाल में इसकी बहुत बदनामी फैल रही थी। इस कारण
इस समिति के सदस्यों में असन्तोष फैल रहा था। ऐसे अवसर पर एक बात और
फैली। पुलिनबिहारी दास ने एस० आर० दास को बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों
के नाम की एक तालिका दे दी और यह सूचना भी उनके साथ दे दी कि ये लोग
फिर क्रान्तिकारी आन्दोलन की तैयारी कर रहे हैं। इस बात के फैलने के बाद
पुलिनबिहारी को ढाका समिति से अलग हो जाना पड़ा। पुलिनबिहारी की
राजनीतिक मृत्यु तो पहले ही हो चुकी थी। अब इस बार उनकी अर्थी निकली।
बंगाल के मुक्त राजबन्दीगणों ने बंगाल के मासिक और साप्ताहिक पत्र
और पत्रिकाओं में क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में खूब लिखना प्रारम्भ कर
दिया था। बंगाल की जनता की सहानुभूति भी इन राजबन्दियों के प्रति अधिक-
से-अधिक थी। वहाँ के शिक्षित एवं अशिक्षित जन भी दिल से यह चाहते थे कि
विप्लववादियों की उन्नति हो। बंगाल के कुछ जजों ने भी इस सहानुभूति को
राजनीतिक मामलों का फैसला देते समय भी कार्य रूप में दिखलाया। मेरे
अण्डमन जाने के पहले सर आशुतोष मुखर्जी के सामने एक मामला पेश हुआ था
जिसमें चार नवयुवक बम बनाने के अपराध में अभियुक्त थे। आशुतोषजी ने इन
चार में से तीन को छोड़ दिया और एक को सजा दे दी। बाद में आपस में बात
करते हुए आशुतोषजी ने कहा था कि यदि मैं चारों को छोड़ देता तो सरकार
अपील करती और फिर चारों को सजा हो जाती। इसलिए मैंने एक को तो पूरी
सजा दे दी और तीन को छोड़ दिया। ऐसी हालत में सरकार के लिए अपील
करना कुछ कठिन बात हो जाती है। बंगाल में ऐसे और भी जज हुए हैं जिन्होंने
राजनीतिक मामलों में फैसला देते समय अपनी सहानुभूति को कार्य रूप में परि-
णत करके दिखलाया है। सरकारी नौकरी में भी जो बंगाली थे वे भी क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के प्रति सहानुभूति सम्पन्न थे।

जमशेदपुर में मजदूर संगठन / 245

अंग्रेजी मासिक पत्र 'हिन्दू रिव्यू' ने खुल्लम-खुल्ला लिखा था कि 'क्रान्ति-
कारियों के एक-एक आतंकवादी काम पर सरकारी मुलाजिम भी उल्लसित हो
उठता है।'
ऐसी परिस्थिति में भी महात्माजी ने जब अपना अहिंसात्मक आन्दोलन
ज़ोरों से प्रारम्भ कर दिया तो विप्लववादी आन्दोलन को गहरी चोट पहुँची।
महात्माजी के सत्याग्रह आन्दोलन के कार्यक्रम के अनुसार जेल जाना ही
सबसे बड़ी बात थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि महात्माजी के नेतृत्व में भारत
का जन-आन्दोलन चरम शिखर पर पहुँचा। जनता में ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध
विद्रोह करने का माद्दा कुछ सीमा तक पैदा हुआ। जिस दिन से महात्माजी ने
भारतीय जन-आन्दोलन में भाग लेना प्रारम्भ किया, उस दिन से यह निश्चय हो
गया कि राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने का अर्थ है जेल जाना, मुसीबत सहना
और कम-से-कम अपना पूरा समय राष्ट्रीय कार्य में लगा देना। इसके पहले भारत
के राष्ट्रीय आन्दोलन में क्रान्तिकारी संस्था ही एकमात्र ऐसी संस्था थी जिसकी
कार्य-प्रणाली में अत्यन्त साहस, दुर्दमनीय वीरता, चरम स्वार्थ-त्याग, आन्तरिकता
एवं परम लगन की नितान्त आवश्यकता थी। महात्माजी के राष्ट्रीय क्षेत्र में
आने से पहले भारतीय जन-आन्दोलन के नेतागणों में दो प्रकार की मनोवृत्ति के
कारण उनमें आत्म-विश्वास की मर्यादा का अभाव दीख पड़ता था। इसलिए ये
नेतागण अंग्रेज सरकार से आवेदन-निवेदन करना ही जानते थे। इनकी धारणा
यह थी कि धमकी दिखलाकर अथवा दूसरो का अनुग्रह-प्रार्थी न होकर, अपने
राष्ट्र के बल पर ही निर्भर रहते हुए हम कुछ नहीं कर सकते। हमारे देश मे इन
नेताओं को लिबरल कहते थे। दूसरी मनोवृत्तिवाले नेताओं में ये बाते नही पाई
जाती थी। इन दूसरे नेताओं में यह स्पष्ट भावना पैदा हो रही थी कि भीख माँग-
कर दुनिया मे कभी भी कोई राष्ट्र दुश्मनों के पंजे से अपने को मुक्त नही कर
पाया है। इसलिए ये नेता यह चाहते थे कि राष्ट्रीय आन्दोलन को ऐसे मार्ग पर
चलाया जाय जिससे जनता मे साहस, त्याग और विद्रोह की भावना पैदा हो।
हमारे देश मे इन नेताओं को एक्सट्रीमिस्ट कहते थे। इन एक्सट्रीमिस्टों ने भारत
के सामने पूर्ण स्वतन्त्रता के ध्येय को नितान्त स्पष्ट शब्दों में, निर्मल रूप मे,
ऐसी आन्तरिकता के साथ, ऐसी अविचल श्रद्धा के साथ, ऐसे मर्मस्पर्शी शब्दों में,
ऐसी उमंगभरी ललकार के साथ रखा था कि भारत के शत-शत नवयुवक
प्राणों की बाजी लगाकर राष्ट्रीय बलिवेदी पर अपने को न्योछावर करने के लिए
बेचैन हो उठे थे। इस अन्तिम ध्येय के प्रचार के परिणामतः जिस विप्लव-
आन्दोलन की सृष्टि हुई थी आज चालीस साल के अकथनीय पीड़न के होते हुए
भी वह आन्दोलन दब नहीं पाया, लेकिन फिर भी विप्लव-आन्दोलन जन-
आन्दोलन नही बन पाया। तिलक, अरविन्द, लाजपत और विपिनचन्द्र के
नेतृत्व में भारत का जन-आन्दोलन विप्लव के मार्ग में क्रमशः आगे बढ़ रहा
था कि इतने में अरविन्द राजनीतिक क्षेत्र से अलग हो गए। तिलक छः साल के

246 / बन्दी जीवन

लिए जेल में बन्द पड़े रहे, लाजपत भारत के बाहर चले गए, विपिनचन्द्र दुर्बल
पड़ गए। ऐसी अवस्था में महात्माजी राजनीति के क्षेत्र में अवतीर्ण हुए।
महात्माजी के साथ-साथ भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में अन्य और भी शक्ति-
शाली नेताओं का आविर्भाव हुआ। अभी तक इन नेताओं का कोई पता ही न
था। महात्माजी का साथ देने के पहले बाबू राजेन्द्रप्रसाद का क्या अस्तित्व था ?
पंडित जवाहरलालजी को सन् 1919 में कौन जानता था ? सुभाषचन्द्र बोस
सन् 1919 में विलायत में एक छात्र मात्र थे। मोतीलालजी की गिनती लिबरलों
में भी नरम आदमियों में थी। इलाहाबाद में तिलक के आगमन के समय लोग
ऐसी तरकीबें सोचते थे कि जनता की तरफ से उनका शानदार स्वागत न हो।
महात्माजी के राष्ट्रीय क्षेत्र में अवतीर्ण होने के कारण एक ओर जैसे जनता में
विद्रोह की भावना फैलने लगी, उसी प्रकार से दूसरी ओर एक नवीन नेताओं
के दल का आविर्भाव हुआ। महात्माजी की विशेष देन में ऐसे नेताओं का आवि-
र्भाव होना भी एक विशेष महत्वपूर्ण बात है।
विप्लव-आन्दोलन में भाग लेने का अर्थ होता है फाँसी जाना या जन्म-भर
के लिए कालेपानी के टापू में ज़िन्दा दफनाये जाने की तरह अदृश्य हो जाना।
इतना त्याग और इतनी कठिनाई को सहने के लिए अधिक आदमी नहीं मिल
सकते। लेकिन महात्माजी के आन्दोलन में भाग लेने से थोड़ा त्याग और थोड़ी
मुसीबत सहने से ही काम चल जा सकता है। इसलिए महात्माजी के आन्दोलन
में सहस्रों की संख्या में भारतवासियों ने भाग लिया; लेकिन महात्माजी के
कार्यक्रम के अनुसार भारतवर्ष को किस प्रकार से पूर्ण स्वतन्त्रता मिल सकती है,
यह बात मेरे जैसे नवयुवकों की समझ में नहीं आती थी। सहस्रों की संख्या में
जेल जाने ही से किस प्रकार से राजशक्ति प्रजा के हाथ में आ जायेगी, यह बात
हम लोगों की समझ में नहीं आती थी। इसलिए मेरे-जैसे नवयुवकों ने यह मान
लिया था कि सशस्त्र क्रान्ति की तैयारी तो करनी ही पड़ेगी। तथापि महात्माजी
का सत्याग्रह-आन्दोलन जिस समय प्रबल रूप से चल रहा था, उस समय क्रान्तिकारी
आन्दोलन के लिए वातावरण ऐसा बन गया था कि अधिक-से-अधिक संख्या में
युवक वृन्द सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने लग गए। महात्माजी ने यह कह दिया
था कि हम एक साल के अन्दर स्वराज्य ले लेंगे। लेकिन क्रान्तिकारी आन्दोलन
के लिए उपयुक्त तैयारी की आवश्यकता होती है और इसके लिए दो बातों की
सख्त जरूरत है—एक तो प्रजा में राजनीतिक जागृति पर्याप्त परिमाण में होनी
चाहिए, दूसरे सशस्त्र क्रान्तिकारी आयोजन के लिए ऐसे वातावरण की
आवश्यकता होती है जिसमें हम लोग अन्तराल में रहकर, शासनकर्ताओं के सन्देह
को जागृत न करते हुए बहुत दिनों तक कठिन परिश्रम करने का अवसर प्राप्त
कर सकते हों। यदि हम अधिक-से-अधिक संख्या में जेल में गए और वह भी
ऐसा काम करके नहीं गए जिससे कि ब्रिटिश सरकार की पलटनों में बगावत की
भावना फैले, तो ऐसे जेल जाने से क्या लाभ है ! और न खाली विद्रोह की भावना

जमशेदपुर में मजदूर संगठन / 247
फैलाने से ही काम बनता है। इसके लिए तो बहुत ही श्रृंखलाबद्ध संगठन की
आवश्यकता है। यह संगठन कौन करेगा और कब करेगा ? इन सब कारणों से
जिस समय महात्माजी का सत्याग्रह आन्दोलन जोरों पर चल रहा था, उस समय
जमशेदपुर में मजदूर संगठन का काम करना ही मैंने उचित समझा ।
जब महात्माजी का बारदोली कार्यक्रम स्थगित हो गया और महात्माजी
गिरफ्तार हो गए तो सत्याग्रह आन्दोलन का प्रथम अध्याय समाप्त हो गया और
देश के सामने दूसरा कोई कार्यक्रम नही रहा।
महात्माजी के गिरफ्तार होने के पहले ही मैंने चाहा कि जमशेदपुर के मजदूर
संगठन के काम से छुट्टी ले लूं और विप्लव का कार्य आरम्भ कर दूं। इसके लिए
मैने दो बार जमशेदपुर के मजदूर-सगठन के कार्यकर्त्ताओं के पास त्यागपत्र भेज
दिया, लेकिन उन कार्यकर्त्ताओं ने मेरा त्यागपत्र स्वीकार नही किया। वे लोग नहीं
चाहते थे कि मैं मजदूर-सगठन के कार्य से अलग हो जाऊँ । जब तक महात्माजी
गिरफ्तार नही हुए, तब तक मैंने भी मजदूर-सगठन के कार्य को छोड़ने की ज़िद
नही की। महात्माजी की गिरफ्तारी के बाद मैंने ठान लिया कि अब समय नष्ट
नही करना चाहिए और विप्लव के कार्य को हाथ मे उठा लेना चाहिए।
मजदूर संगठन का कार्य भी नितान्त आवश्यक काम है, यह मैं समझ रहा था ।
लेकिन सशस्त्र विप्लव के लिए भी संगठन का कार्य करना मजदूर संगठन के
कार्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है, ऐसा भी मैं समझ रहा था। मैंने यह समझ लिया
कि मजदूर-आन्दोलन तो देशव्यापी विराट् सशस्त्र विप्लव आन्दोलन की एक
शाखा मात्र बन सकता है नही तो केवल मजदूर संगठन के कार्य से हम देश को
स्वाधीन नही कर सकते ।
बंगाल की राजनीतिक परिस्थिति को देखते हुए मैंने यह विश्वास कर लिया
था कि मुझे अकेला ही उत्तर भारत मे अर्थात् पंजाब और युक्त प्रान्त में काम
करना पड़ेगा। ऐसी परिस्थिति में मैंने तृतीय बार जमशेदपुर की मजदूर सभा
की कार्यकारिणी समिति के पास अपना त्यागपत्र भेजा और अबकी बार मैने
ज़िद की कि मेरा त्यागपत्र स्वीकार कर लिया जाय, क्योकि मुझे अब युक्त प्रान्त
मे जाना ही पड़ेगा । मेरी ज़िद के कारण अबकी बार मजदूर सभा की कार्य-
कारिणी समिति ने मेरा त्यागपत्र स्वीकार कर लिया। मैं जमशेदपुर छोड़कर
इलाहाबाद चला आया । उस दिन से यथार्थ रूप में मैंने उत्तर भारत मे विप्लव
कार्य प्रारम्भ कर दिया और जीवन का एक नया अध्याय पुनः प्रारम्भ हो गया ।

8
क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन
(1)
सन् 1921 मे जमशेदपुर के काम को छोडकर मैं इलाहाबाद चला गया ।
इसके पहले ही मेरी शादी हो चुकी थी । जिस दिन मै बनारस से शादी के लिए
रवाना हुआ था उस दिन मेरे कुछ पुराने साथी मुझे ऐसा कुछ कहने लगे थे कि
मानो मैं शादी करके कर्त्तव्य से च्युत हो रहा हूँ । उनके ठेसदार शब्द उस दिन
मेरे हृदय को खूब चुभे थे । जमशेदपुर से लौटकर मैने उन दोस्तो की तलाश की ।
बनारस षड्यन्त्र मामले के बाद जितने व्यक्तियो ने युक्त प्रान्त मे विप्लव कार्य
को सँभाला था उनमे से वे भी थे जिन्होंने मेरे विवाह पर आपत्ति की थी। जिस
दिन इन्होने मुझे ठेसदार शब्द कहे थे उस दिन एक तरफ तो मुझे आघात लगा
था, दूसरी तरफ वैसा ही मुझे आनन्द भी प्राप्त हुआ था । कारण कि मेरे दिल
मे यह आशा जागृत हुई थी कि अपने काम के लिए मुझे आदमी मिलने मे दिक्कत
नही होगी । जमशेदपुर से लौटने के बाद जब मैने इन्हे अपने काम के लिए
आह्वान किया तो ये मेरे साथ हो लिए । अभी तक ढाका अनुशीलन समिति का
कोई प्रतिनिधि युक्त प्रान्त मे नही आया था ।
अण्डमन से लौटने के बाद एक महीने के अन्दर ही मै गोरखपुर मे बनारस
आया और अपने पुराने साथियो की तलाश करने लग गया । उम समय अपने
पुराने साथी श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य से मिला। अपने एक और साथी प्रियनाथ
भट्टाचार्य के सामने सुरेशबाबू के साथ संगठनकार्य के बारे मे बातचीत हुई। मुझे उस
समय यह पता न था कि प्रियनाथ ने बहुत पहले ही पुलिस के पास एक लम्बा
बयान दे दिया है। इस बात को मैं पहले ही बता चुका हूँ कि अण्डमन से लौटने
के बाद पहले महीने के अन्दर ही सुरेशबाबू से मेरी जो बातचीत हुई थी, उसकी
रिपोर्ट पुलिस के पास पहुँच गई। यू० पी० के खुफिया विभाग के जो प्रधान थे,
उन्होने मेरे भाई के पास एक डेमी ऑफीशियल चिट्ठी भेजी जिसमे लिखा था कि
तुम्हारे भाई फिर संगठन करने के बारे मे बातचीत चला रहे है। उन्हें होशियार
कर दो । इनकी स्त्री और मेरे भाई इलाहाबाद में ऑक्सफोर्ड होस्टल में रहते थे ।
मेरे भाई एम० ए० में पढ़ते थे । और बिग्रेन साहब की स्त्री शायद बी० ए० या

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 249
एम० ए० में पड़ती थी। मुझे ठीक पता नहीं। पी० बिग्रेन सन् 21 और 22 में
सम्भव है ए० टू० डी० आई० जी०, सी० आई० डी० थे। ए० टू० डी० आई०
जी०, सी० आई० डी०, खुफिया डिपार्टमेण्ट में राजनीतिक विभाग में प्रधान
होते हैं। जिस दिन खुफिया विभाग के तमाम कागजात विद्रोहियों के हाथ आएँगे
उस समय ही यह पता लगेगा कि युक्त प्रान्त में महायुद्ध के बाद विप्लव कार्य का
पुनः संगठन मैंने ही सर्वप्रथम प्रारम्भ किया था या नहीं। जहाँ तक मुझे ज्ञात है,
अण्डमन से लौटने के बाद मैंने ही सर्वप्रथम युक्त प्रान्त में विप्लव का संगठन
पुनः प्रारम्भ किया था।
सन् 1920 में नागपुर मे कांग्रेस का अधिवेशन हो जाने के पश्चात् ढाका
अनुशीलन समिति के प्रमुख नेता श्री अतुलचन्द्र गांगुली को साथ लेते हुए आगरा,
इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ इत्यादि शहरों मे घूमा था। उस समय तक भी
ढाका अनुशीलन समिति की तरफ से कोई व्यक्ति यू० पी० मे नहीं भेजा गया
था। लेकिन उस समय मैं यू० पी० मे एक-दो करके अपने आदमियों का संग्रह
कर रहा था। जैसे प्रतुल गांगुली अपनी बात मुझे नहीं बतलाते थे, वैसे ही मैं
भी अपनी बातें उन्हें नहीं बतलाता था। इसीलिए सम्भव है उनके दिल में यह
ख्याल पैदा हो गया हो कि शायद मैंने अभी अपने प्रान्त मे विप्लव कार्य प्रारम्भ
नहीं किया है।
जिस समय मैं जमशेदपुर में मजदूर संगठन का कार्य कर रहा था उसी समय
भविष्य मे विप्लव कार्य चलाने के लिए अर्थ-संग्रह का काम भी कर रहा था।
ढाका अनुशीलन समिति से असन्तुष्ट होकर दो-एक व्यक्ति मेरे पास आए थे,
लेकिन ये व्यक्ति अपने संकल्प मे दृढ़ नही रहे। जिस समय मैं जमशेदपुर से इलाह'-
बाद के लिए रवाना हो रहा था उस समय विप्लव कार्य करने के लिए मेरे पास
कुछ धन आ गया था। मेरे लिए यह एक परम सौभाग्य की बात थी कि उत्तर
भारत में विप्लव कार्य करने के लिए धनी व्यक्ति मुझे नियमिन रूप से सहायता
देते रहे।
इलाहाबाद पहुँचकर मैंने कांग्रेस के प्रमुख नेताओं से मुलाकात की। कांग्रेस
के विभिन्न कार्यकर्ताओं से भी परिचय प्राप्त करने लगा। इलाहाबाद के विभिन्न
होस्टलों में जाकर मैं नौजवानों से परिचित होने की चेष्टा भी करने लगा।
कांग्रेस के नेताओं में से एक-आध ने मेरे साथ सहानुभूति तो अवश्य दिखलाई
लेकिन कार्य-क्षेत्र में वे लोग एक क़दम भी आगे नहीं बढ़े। बनारस षड्यन्त्र केस
के बाद मैनपुरी में एक षड्यन्त्र केस चला था। इसके साथ हमारे पुराने दल का
कोई सम्बन्ध न था। अवश्य यह बात निःसन्देह सत्य है कि बनारस केस के चलने
के कारण ही यू० पी० के दूसरे नौजवानों में भी क्रान्तिकारी कार्य करने की प्रबल
इच्छा पैदा हुई थी। इलाहाबाद में आकर मैंने चाहा कि मैनपुरी केस के बचे
हुए व्यक्तियों से मेरा परिचय हो जाए। इस प्रकार से खोज करते-करते मैनपुरी
दल के एक नेता श्री देवनारायणजी का पता चला। इलाहाबाद में ही उनसे

250 / बन्दी जीवन
मुलाकात हो गई। मेरे मकान में आपने एक दिन खाना भी खाया। बाद को
इनसे आगरा में जाकर मिला। श्री देवनारायणजी ने मैनपुरी केस के बारे में
तमाम बातें मुझे बताईं। शाहजहाँपुर निवासी श्री रामप्रसादजी बिस्मिल भी
मैनपुरी दल में एक प्रमुख व्यक्ति थे। श्री देवनारायणजी से पता चला कि राम-
प्रसादजी और देवनारायणजी में एक भीषण विरोध है। मेरे लिए अब यह एक
समस्या हो गई कि इन दोनों व्यक्तियों में से किसको अपने दल में लूँ। मेरे दिल
में एक सन्देह पैदा हुआ कि यदि देवनारायणजी को साथ लेता हूँ तो सम्भव है
कि रामप्रसादजी मेरे साथ न आएँ और यदि रामप्रसादजी मेरे साथ आते हैं तो
सम्भव है देवनारायणजी मेरा साथ न दें।
देवनारायणजी से मैंने कहा कि आप देहात को छोड़कर आगरा में आकर डट
जाएँ। देवनारायणजी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। श्री देवनारायणजी
ने मुझे आगरा में कुछ बातें बताईं थीं जिनका इस स्थान पर उल्लेख कर देना
नितान्त प्रासंगिक होगा। एक तो देवनारायणजी ने मुझे यह अच्छी प्रकार सम-
झाना चाहा कि अब मुझे प्रकाश्य आन्दोलन में कदम रखना चाहिए। दूसरे,
उन्होंने रामप्रसादजी के बारे में कुछ ऐसी बातें बताईं जिसे इस स्थान पर वर्णन
करने में मन संकुचित हो जाता है। देवनारायणजी की बात पर यकीन कर लेने
पर रामप्रसादजी को दल में ले लेना निहायत अनुचित जान पड़ता था। लेकिन
मैंने दिल में सोचा कि देवनारायणजी और रामप्रसाद के बीच परस्पर घोर विद्वेष
है, इसलिए देवनारायणजी की बातों पर पूर्ण रूप से विश्वास करना उचित नहीं
है। प्रकाश्य आन्दोलन में मैं भी लगना चाहता था, इसलिए देवनारायणजी की
इस बात को मैंने सर्वान्तःकरण से स्वीकार कर लिया। देवनारायणजी से बातचीत
करके मुझे बहुत-कुछ प्रसन्नता हुई। वे बहुत गम्भीर प्रकृति के समझदार आदमी
थे। लेकिन हमारे देश का यह परम दुर्भाग्य है कि गम्भीर प्रकृति के समझदार
व्यक्तियों ने निहायत ही कम संख्या में भारतीय विद्रोह आन्दोलन में भाग लिया
है। पता नहीं यह परम दुर्भाग्य या सौभाग्य की बात हुई कि श्री देवनारायणजी
ने अपने वादे को पूरा नहीं किया। उनसे बातचीत करके यह तय हुआ था कि
देवनारायणजी अपने गाँव को छोड़कर आगरा में जाकर अपना केन्द्र स्थापित
करेंगे। यदि देवनारायणजी ऐसा करते तो उत्तर भारत का विप्लव आन्दोलन
और भी गौरवमय रूप धारण करता।
इतिहास के पृष्ठों में 'सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यं अप्रियम्' इस
वाक्य का स्थान नहीं है। लेकिन मैं ऐसा कुछ लिखना नहीं चाहता जिससे क्रान्ति-
कारी आन्दोलन को धक्का पहुँचे। तथापि एक बात यहाँ यह कह देना नितान्त
आवश्यक है कि क्रान्तिकारी आन्दोलन गुप्त और षड्यन्त्र रूप से होने के कारण
अवांछनीय एवं अनुपयुक्त व्यक्तियों का इस आन्दोलन में शामिल हो जाना एक
विषम संकट का कारण हो जाता है। आज भी मुझे अत्यन्त भय है कि यदि योग्य
व्यक्ति क्रान्तिकारी आन्दोलन करना आरम्भ कर देता है तो शुद्ध हृदयवाले

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 251
त्यागी साहसी युवक तो उसे मिल जाएँगे लेकिन विचारशील एवं योग्य नेतृत्व के
अभाव से इन सब नवयुवकों का अमूल्य जीवन सार्थक होने नहीं पाएगा। बंगाल
में ऐसे बहुत-से तुच्छ अयोग्य छोटे-छोटे विप्लवी दलों से मैं खूब परिचित रहा।
मुझे इस बात की आशंका रही कि यू० पी० मे भी वैसे ही अयोग्य व्यक्तियों के
नेतृत्व में बंगाल की तरह भिन्न-भिन्न छोटी-छोटी पार्टियां न खड़ी हो जाएँ।
जिस दिन मैंने अण्डमन से लौटकर सर्वप्रथम यू० पी० विप्लव दल का संगठन
पुनः क़ायम किया था उस समय यहाँ पर और कोई दल काम नहीं कर रहा
था।
सन् 1920 मे अगस्त-सितम्बर महीने में कलकत्ता मे कांग्रेस का एक विशेष
अधिवेशन हुआ था। उस अवसर पर कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री बी० सी०
चटर्जी साहब ने मैनपुरी केस के एक मुक्त राजबन्दी के साथ मेरा परिचय करा
दिया था। उनका नाम है श्री चन्द्रधर जौहरी। उनकी आंखों मे मैंने उस दिन
जो जोश और आन्तरिकता देखी थी उससे यह अनुमान किया था कि यह व्यक्ति
जिस काम को हाथ मे लेगा उस काम के पीछे सर्वस्व दे देगा। सच तो यह है
कि जौहरीजी को देखकर तत्काल ही मेरे मन मे जो भावना पैदा हुई थी उसका
अग्रेजी नाम है Fanatical zeal, लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि इनसे बाद को
फिर मिलने का अवसर मुझे नही मिला। मुझे इस वक्त ठीक याद नही है कि
जौहरीजी सन् '21 के आन्दोलन मे गिरफ्तार हो गए थे या नही। सम्भव है, हो
गए हो और इसीलिए संभव है फिर बाद को उनसे मेरी मुलाकात नही हुई। ये
बिचारे शर्त पर छोड़े गए थे। जिन शर्तों पर छूटे थे उनमे से एक शर्त यह भी
थी कि यदि सरकार के खिलाफ किसी आन्दोलन मे जौहरीजी भाग लेगे तो उन्हें
फिर पुरानी कैद पूरी काटनी पडेगी। इस कारण जब जौहरीजी ने सत्याग्रह
आन्दोलन मे भाग लिया तो जिला-कलक्टर ने उन्हें दफ्तर मे बुलाकर यह हुक्म
सुनाया कि तुमने सरकार के विरुद्ध आन्दोलन मे भाग लिया है इसलिए तुम्हे
अपनी पुरानी कैद फिर काटनी पडेगी और तुम यहां से सीधे जेल चले जाओगे।
संभव है, यह सन् 1921 की बात है। इनसे जो मुझे आशा थी वह यो ही विलीन
हो गई।
मैं स्वयं छात्र न था। एव पहले कभी इलाहाबाद मे रहा नही था इसलिए
भी इलाहाबाद के युवकगणो से मेरा कुछ भी परिचय न था। क्रान्तिकारी
आन्दोलन की सफलता युवक-मडली पर ही निर्भर रहती है ऐसी मेरी समझ थी।
क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में मेरी धारणा यह थी कि मध्यम श्रेणी के युवक
वृन्द ही क्रान्तिकारी आन्दोलन का नेतृत्व कर सकते हैं। यह बात सत्य है कि
संघर्ष के समय किसान-मजदूरों की श्रेणी से ही आदमी निकलेंगे, जो यथार्थ में
सिपाही का काम करेंगे। लेकिन सिपाही अपना नेतृत्व स्वयं नही कर सकता।
इतिहास में बहुत दफे ऐसा देखा गया है कि राष्ट्रीय उथल-पुथल के अवसर पर
सेनापति गण सर्वेसर्वा बन जाते हैं। तब स्वाधीनता के स्थान पर प्रजातन्त्र की

252 / बन्दी जीवन
जगह सामरिक तन्त्र स्थापित हो जाता है। इसका प्रतिकार तभी हो सकता है
जब प्रजा में अपनी नेतृत्व करने की शक्ति पैदा हो। क्रान्तिकारी उथल-पुथल के
इतिहास आदि पढ़कर अभी तक मेरी यही धारणा बनी रही कि मध्यम श्रेणी के
शिक्षित सम्प्रदाय से ही भारत के भावी समाज-संगठनकारी गण निकलेंगे।
महात्मा गांधी के अतुलनीय आन्दोलन के बाद भी मेरा यह दृढ़ विश्वास बना
रहा कि भारत की आम जनता उथल-पुथल के लिए जितनी तैयार है उनका
नेतृत्व करनेवाले उपयुक्त व्यक्तियों का उतना ही अभाव है। एक बात तो यह
थी। दूसरी बात यह थी कि महात्माजी और उनके अनुयायीगण अथवा जन-
आन्दोलन के दूसरे प्रतिष्ठित नेतागण भारतवर्ष को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र बनाने के
लिए सचेष्ट तो थे ही नही बल्कि वे नेतागण भारत की स्वाधीनता के प्रश्न को
अलीक स्वप्नवत् समझा करते थे। वे कभी भी यह विश्वास नही करते थे कि
भारतवर्ष को स्वाधीन करने का प्रश्न वास्तविक जगत् का प्रश्न है। ये सब लब्ध-
प्रतिष्ठ नेतागण यह समझते थे कि कुछ बहके हुए भारत के नौजवान भारत को
स्वाधीन करने का स्वप्न देखा करते हैं। यह प्रश्न आये दिन का प्रश्न ही नही है।
भारत के सर्वमान्य नेतागण स्वाधीनता के प्रश्न को व्यवहार में लाने योग्य सम-
झते ही न थे। सम्भव है आज भी वे ऐसा ही समझते हों। महात्माजी और उनके
साथियों का कहना है कि "स्वाधीनता, स्वाधीनता करके चिल्लाने से क्या होता
है। जो लोग ऐसा चिल्लाया करते हैं वे लोग आज तक कुछ करके दिखला भी
सके हैं ? जो कुछ कर सकते है वह तो करते नहीं ? व्यर्थ का शोर मचाते है।
लेकिन भारत को पूर्ण रूप से स्वतन्त्र करने के प्रश्न को जो युवकवृन्द व्यावहारिक
रूप में लाना चाहते थे ? वे ऐसा समझते थे कि भारत को स्वाधीन करने के
लिए जो कुछ करना चाहिए, उसके लिए भारत के प्रकाश्य आन्दोलन के नेतागण
प्रस्तुत नही थे। और इसीलिए वे भारत की स्वाधीनता के प्रश्न को व्यावहारिक
प्रश्न नही समझते थे। क्रान्तिकारियों और कांग्रेस के नेतागणों के दृष्टिकोण में
यही सबसे बड़ा अन्तर है। इस दृष्टिकोण में ऐसा अन्तर रहने के कारण क्रान्ति-
कारी और कांग्रेस-आन्दोलन के मार्ग में भी बहुत अन्तर है। अस्तु, इस स्थान
पर क्रान्तिकारी मार्ग के बारे में मैं कोई विशेष विचार-विमर्श नही करना
चाहता। यहाँ पर इतना कहना पर्याप्त है कि मैं जमशेदपुर से लौटकर युवक
वृन्दों में ही काम करना चाहता था।
मेरे लिए इलाहाबाद के युवकवृन्दों से परिचित होने के लिए कोई सहज और
सरल उपाय नही था। इसलिए मैने प्रतिदिन इलाहाबाद के विभिन्न होस्टलों में
जाना प्रारम्भ कर दिया। जान-पहचान तो किसी से थी ही नहीं। जहाँ देखता
था कि दो-तीन नौजवान बरामदे में खड़े होकर बातचीत कर रहे हैं उनके पास
थोड़ी दूर पर मैं भी जाकर खड़ा हो जाता था। उनकी बातें सुना करता था।
ख़याल यह रहता था कि यदि ये युवकगण राजनीति के बारे में कुछ बातचीत
करने लगें तो मैं भी अवसर देखकर उसमें शामिल हो जाऊँ। लेकिन दुर्भाग्य की

क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 253
बात है कि इलाहाबाद में जितने दिन ऐसी टोलियों के पास खड़े होकर इन लोगों
का वार्तालाप सुना। उनमें से एक दिन भी इन लोगों को किसी भी राजनीतिक,
सामाजिक या साहित्यिक प्रश्नों पर बातचीत करते हुए नहीं पाया। इन लोगों
की बातचीत इतनी दुर्नीतिपूर्ण एवं मलीन होती थी कि उनके पास खड़ा रहना
भी अपमानजनक एवं अधोगतिकारी मालूम होता था। इलाहाबाद के बड़े-बड़े
होस्टलों में मैंने शायद ही किसी के कमरे में कोई मासिक पत्र देखा हो। जो दो-
चार अच्छे लड़के होते थे, वे अपने पढ़ने-लिखने में ही मग्न रहते थे और कुछ
छात्र खेल-कूद में लगे रहते थे। सन् 1920-21 में कितना बड़ा आन्दोलन हमारे
देश में होता रहा लेकिन हमारे युवकवृन्द के मन को इस आन्दोलन ने कितना
थोड़ा स्पर्श किया। मैं एक प्रकार से हताश हो गया। मैं बीच-बीच में बनारस भी
जाता रहा और कानपुर भी। सुरेशबाबू कुछ दिन कानपुर के 'प्रताप प्रेस' में
काम करते रहे और कुछ दिन 'वर्तमान' के दफ्तर में। बनारस में श्री सुरेन्द्रनाथ
मुखर्जी नामक एक बड़े पुराने साथी थे। इनकी सहायता से श्री राजेन्द्रनाथ
लाहिड़ी नामक एक युवक से मेरा परिचय हुआ। इनके अलावा एक और पुराने
साथी भी थे, जिन्होंने मेरी शादी के समय कुछ चुभती हुई बातें मुझे कही थीं। वे
भी मेरे साथ काम करने लगे थे। इनका नाम अपने समझने के लिए यहाँ पर
तारकनाथ रख देता हूँ। उधर कानपुर में जहाँ तक मेरा ख्याल है, सुरेशबाबू की
सहायता से श्री रामदुलारे त्रिवेदी से जान-पहचान हुई। सुरेशबाबू की सहायता
से और भी दो सज्जनों से जान-पहचान हुई। उनके नाम हैं : श्री वीरभद्र तिवारी
एवं श्री मन्नीलालजी अवस्थी। उस समय मन्नीलालजी एक राष्ट्रीय स्कूल के
हेडमास्टर थे। अवस्थीजी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट भी थे। श्री राजेन्द्र
लाहिड़ी बी० ए० में पढ़ते थे। इलाहाबाद में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ मैं
मिलने-जुलने लग गया। इस प्रकार से दो नौजवान मुझे मिले—एक श्री बनवारी-
लालजी, दूसरे श्री नरेन्द्रनाथ बनर्जी। इन्हें कांग्रेसवाले नोडू भी कहा करते थे।
इनकी सहायता से अलीगढ़ के ठाकुर खानदान के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के साथ
मेरा परिचय हुआ। ये भी हमारे साथ काम करने लगे। इलाहाबाद के श्री
बनवारीलाल की सहायता से रायबरेली में भी कुछ हमारे आदमी बन गए, जिनका
नाम आज भी बतलाना उचित नहीं होगा। अलीगढ़ के ठाकुर साहब की सहायता
से फतेहगढ़ पहुँचा एवं अलीगढ़ तहसीलों में भी पहुँचा। जहाँ तक मुझे स्मरण है
इन्ही ठाकुर साहब की सहायता से मेरठ में श्री विष्णुशरणजी दुबलिश के पास
पहुँचा। इस वक्त मुझे ठीक स्मरण नहीं है कि दुबलिशजी की सहायता से
श्री रामदुलारेजी के पास पहुँचा था या नहीं। श्री विष्णुशरणजी की सहायता से
श्री महावीर त्यागीजी से जान-पहचान हुई। श्री महावीर त्यागी की सहायता से
शाहजहाँपुर में श्री रामप्रसाद बिस्मिल और श्री अशफाकउल्लाजी के पास पहुँचा।
कानपुर के श्री मन्नीलाल अवस्थी की सहायता से फतेहपुर पहुँचा। सन् 1922
के अन्दर इन आठ जिलों में मेरा काम फैल गया। लेकिन यह काम एक दिन में

254 / बन्दी जीवन
नहीं हुआ। सम्भव है सन् 1922 के अन्त तक ढाका अनुशीलन समिति की तरफ
से कोई प्रतिनिधि बनारस पहुंचे हों। सन् 1921 में नागपुर कांग्रेस से लौटने के
पश्चात् जब ढाका अनुशीलन समिति के श्री प्रतुल गांगुली के साथ मैं बनारस
आया था उस समय अर्थात् सन् 1922 के प्रारम्भ में बनारस में ढाका समिति के
कोई प्रतिनिधि उपस्थित नहीं थे। यद्यपि श्री प्रतुल गांगुली के कुछ परिचित व्यक्ति
उस समय बनारस में हिन्दू कॉलेज में पढ़ते थे परन्तु इन छात्रों से प्रतुलजी ने
मेरा परिचय नहीं कराया। अर्थात् उस समय फिर मैंने यह अनुभव किया कि
प्रतुल गांगुली अपने दल की सब बातें मुझे बताना नहीं चाहते थे। सन् 1922 के
अन्त तक मेरा कार्य बहुत-कुछ अग्रसर हो चुका था। इसे संगठन न कहकर
संगठन का एक ढांचा कहना ही उचित होगा। मुझे इस वक़्त ठीक याद नहीं है,
लेकिन जहां तक मुझे याद है, सम्भव है, सन् 1922 में ही मैं भगतसिंह के पास
लाहौर पहुँच गया। जिस प्रकार से मैं इलाहाबाद के होस्टल में नवयुवकों को
ढूंढ़ता फिरता था, उसी प्रकार से एक दिन फतेहगढ़ में अपने अजीब तरीके के
कारण एक प्रतिभावान नवयुवक के पास जा पहुँचा जिनकी सहायता से अन्त में
मैं भगतसिंह के पास भी पहुँच गया। इसका एक पूरा इतिहास है। वह जैसा रोचक
है, वैसा ही कौतूहलपूर्ण भी है।
जमशेदपुर से इलाहाबाद लौट आने के पहले मैं दो-तीन बार कलकत्ता गया
था। कलकत्ता में विभिन्न क्रान्तिकारी दल के आदमियो से समय-समय पर बात-
चीत करता रहा। इलाहाबाद लौट आने के बाद भी मैं कई बार कलकत्ता गया।
जिस प्रकार युक्त प्रान्त में मैं अपना संगठन कार्य करने की चेष्टा कर रहा था ?
उसी प्रकार कलकत्ता मे भी मैं अपना एक दल बनाना चाहता था। जमशेदपुर मे
रहते समय भी मैं नितान्त असावधान नहीं रहा। समय पाकर मैं कभी नहीं
चूका।
एक दिन कलकत्ता के मिसी पार्क में मैंने देखा कि कुछ भद्र नौजवान एकत्र
होकर बातचीत कर रहे हैं। मैं भी उनके पास जाकर बैठ गया। थोड़ी ही देर मे
मालूम पड़ा कि ये सब नौजवान आधुनिक राजनीतिक प्रश्न पर बातचीत कर
रहे हैं। मैंने भी इन लोगों के वार्तालाप में धीरे-धीरे योग देना प्रारम्भ कर दिया।
इस प्रकार इस टोली के साथ मेरा खूब परिचय हो गया। इनमें से एक युवक
महाशय अच्छे घर के थे। लड़ाई के समय ब्रिटिश सेना में सिपाही के रूप में इराक
और मैसोपोटामिया तक पहुँच गए थे और अपनी कार्य-कुशलता के कारण पलटन
में ओहदा भी पा चुके थे। जिस समय का मैं उल्लेल कर रहा हूँ, उस समय
आप यूनिवर्सिटी कोर में एक अच्छे पदाधिकारी थे। इधर आप इंजीनियरिंग
कॉलेज में भी पढ़ते थे। इनकी सहायता से बंगाल में कुछ और नवयुवकों से मेरा
परिचय हुआ। लेकिन अनुशीलन समिति के किसी भी सदस्य को मैंने कभी कुछ
बताया नहीं कि मैं क्या कर रहा हूँ और क्या नहीं कर रहा हूँ। एक दफा ढाका
अनुशीलन समिति के प्रमुख नेता श्री प्रतुलचन्द्र गांगुली से मैंने यह कहा था,