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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 408 में से

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पृष्ठ 250

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क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन
(1)
सन् 1921 मे जमशेदपुर के काम को छोडकर मैं इलाहाबाद चला गया ।
इसके पहले ही मेरी शादी हो चुकी थी । जिस दिन मै बनारस से शादी के लिए
रवाना हुआ था उस दिन मेरे कुछ पुराने साथी मुझे ऐसा कुछ कहने लगे थे कि
मानो मैं शादी करके कर्त्तव्य से च्युत हो रहा हूँ । उनके ठेसदार शब्द उस दिन
मेरे हृदय को खूब चुभे थे । जमशेदपुर से लौटकर मैने उन दोस्तो की तलाश की ।
बनारस षड्यन्त्र मामले के बाद जितने व्यक्तियो ने युक्त प्रान्त मे विप्लव कार्य
को सँभाला था उनमे से वे भी थे जिन्होंने मेरे विवाह पर आपत्ति की थी। जिस
दिन इन्होने मुझे ठेसदार शब्द कहे थे उस दिन एक तरफ तो मुझे आघात लगा
था, दूसरी तरफ वैसा ही मुझे आनन्द भी प्राप्त हुआ था । कारण कि मेरे दिल
मे यह आशा जागृत हुई थी कि अपने काम के लिए मुझे आदमी मिलने मे दिक्कत
नही होगी । जमशेदपुर से लौटने के बाद जब मैने इन्हे अपने काम के लिए
आह्वान किया तो ये मेरे साथ हो लिए । अभी तक ढाका अनुशीलन समिति का
कोई प्रतिनिधि युक्त प्रान्त मे नही आया था ।
अण्डमन से लौटने के बाद एक महीने के अन्दर ही मै गोरखपुर मे बनारस
आया और अपने पुराने साथियो की तलाश करने लग गया । उम समय अपने
पुराने साथी श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य से मिला। अपने एक और साथी प्रियनाथ
भट्टाचार्य के सामने सुरेशबाबू के साथ संगठनकार्य के बारे मे बातचीत हुई। मुझे उस
समय यह पता न था कि प्रियनाथ ने बहुत पहले ही पुलिस के पास एक लम्बा
बयान दे दिया है। इस बात को मैं पहले ही बता चुका हूँ कि अण्डमन से लौटने
के बाद पहले महीने के अन्दर ही सुरेशबाबू से मेरी जो बातचीत हुई थी, उसकी
रिपोर्ट पुलिस के पास पहुँच गई। यू० पी० के खुफिया विभाग के जो प्रधान थे,
उन्होने मेरे भाई के पास एक डेमी ऑफीशियल चिट्ठी भेजी जिसमे लिखा था कि
तुम्हारे भाई फिर संगठन करने के बारे मे बातचीत चला रहे है। उन्हें होशियार
कर दो । इनकी स्त्री और मेरे भाई इलाहाबाद में ऑक्सफोर्ड होस्टल में रहते थे ।
मेरे भाई एम० ए० में पढ़ते थे । और बिग्रेन साहब की स्त्री शायद बी० ए० या