बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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पुलिनबिहारी में नेतृत्व की कुछ भी योग्यता न थी। इसलिए अण्डमन में रहते हुए
ही मैंने यह निश्चय कर लिया था कि छूटने के बाद उनके साथ मैं किसी प्रकार
से भी काम नहीं कर सकता। पुलिनबिहारीजी में मात्र योग्यता की ही कमी हो,
केवल यही बात नहीं थी, नेतृत्व के लिए वे सर्वथा अयोग्य थे । वे शिक्षित समाज
में बैठकर साधारण प्रश्नों पर भी युक्तिपूर्ण रूप मे बातचीत नहीं कर सकते थे ।
एक दफा उन्होंने जिस बात को जिस प्रकार से ग्रहण कर लिया, फिर उस बात
को दूसरे प्रकार से समझने की शक्ति उनमें नहीं थी । अधिक क्या कहूँ उनके प्रति
मेरे दिल में रत्ती-भर भी श्रद्धा न थी ।
पुलिनबिहारी के छूट जाने के बाद ढाका अनुशीलन समिति उन्हीं के नेतृत्व
में काम करने लग गई । ढाका समिति के अन्य नेतागण भी पुलिनबिहारी के प्रति
अधिक श्रद्धावान नहीं थे । फिर भी उन्हें प्रारम्भ में पुलिनबिहारी को नेता
मानना ही पड़ा ।
महात्माजी का सत्याग्रह आन्दोलन जोरों पर चलने लगा। देशबन्धुदास ने
भी इस बढ़ती हुई लहर का साथ देने का निश्चय कर लिया । दासजी ने चाहा
कि पुलिनबिहारी, मैं एवं एक-दो और क्रान्तिकारी नेता उनका साथ दें। मैं उस
समय ईंट के कारबार में बुरी तरह फँसा हुआ था। इस कारण मन में प्रबल इच्छा
रहने पर भी मैं दासजी का साथ नही दे पाया। पुलिनबिहारी में कुछ योग्यता तो
थी ही नहीं, फिर सत्याग्रह में भी उनका विश्वास नही था । जो हो, पुलिनबिहारी
ने भी दासजी का साथ नही दिया। बंगाल के क्रान्तिकारी दल के दूसरे नेताओं
ने दासजी का साथ दिया। मैंने भी बहुत मर्तबा चाहा कि घर का सब काम छोड़-
कर खुले राजनीतिक आन्दोलन में जी-जान से लग जाऊँ । कभी-कभी ऐसा
ख़याल आता है कि ऐसा न करके मैंने भारी भूल की। नागपुर कांग्रेस मे मैंने
हिन्दी भाषा में वक्तृता दी थी। उस वक्तृता को सुनकर दासजी ने ऐसी इच्छा
प्रकट की थी कि मैं दासजी के साथ मिलकर मज़दूर आन्दोलन को काग्रेस आन्दो-
लन की एक शाखा बना दूँ। लेकिन दासजी के एक मित्र बैरिस्टर श्री निशितसेनजी
ने स्पष्ट शब्दों में एक बात मुझे समझा दी कि आर्थिक दृष्टि से यदि मैं स्वाव-
लम्बी नही होता हूँ तो राजनीति के क्षेत्र में मैं अपना आसन जमा नही पाऊँगा ।
मैंने दासजी की इच्छा का उल्लेख किया । तिस पर भी सेनसाहब ने अपनी राय
बदली नहीं। मैंने भी सेनसाहब की युक्ति को अस्वीकार नही किया। परिणामतः
मैं जमशेदपुर में लेबर यूनियन के वेतन भोगी आर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी का काम
करता रहा ।
इधर बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी दलों के नेता श्री सुरेन्द्रनाथ घोष,
श्री विपिनबिहारी गंगोली इत्यादि ने देशबन्धुदास के साथ सत्याग्रह आन्दोलन में
अपने दलों को अच्छी तरह से लगा दिया ।
जैसा मैंने पहले बताया है, अनुशीलन समिति के दो केन्द्र थे । एक केन्द्र ढाका
में था और दूसरा कलकत्ता में । कलकत्ता अनुशीलन समिति के सदस्यगण