बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजमशेदपुर में मजदूर संगठन / 243
कलकत्ता के अन्य क्रान्तिकारी दलों में शामिल हो गए। कलकत्ता अनुशीलन समिति
का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रहा। श्री यदुगोपालजी मुखर्जी कलकत्ता अनुशीलन-
समिति के अनुभवी सदस्य थे। मैं भी कलकत्ता अनुशीलन समिति का सदस्य रह
चुका था। अण्डमन जाने के पहले यदुगोपालजी से मेरा परिचय हो चुका था।
अण्डमन जाने के पहले मैंने चाहा था कि यदुगोपाल और मैं मिलकर कलकत्ता
अनुशीलन समिति का पुनर्गठन करें। लेकिन यदुगोपालजी ने इसका विशेष
आग्रह नही किया। मैं बनारस मे अपना संगठन करता रहा। अब अण्डमन
से लौटने के बाद जब मैं जमशेदपुर मे लेबर यूनियन के काम मे था तो
यदुगोपालजी ने मुझे अपनी पार्टी मे शामिल होने के लिए कहा। अण्डमन जाने के
पहले तक मै ढाका-समिति के साथ मिलकर काम कर रहा था। इस कारण मेरे
लिए यह उचित था कि पहले मैं ढाका वालों से मिलकर इस बात को जान लूं कि
मेरे साथ वे लोग खुले दिल से काम करने के लिए तैयार हैं या नही। ढाका
समिति के जितने नेतागण छूटकर बाहर आए थे, उनसे मेरी पटती नही थी।
लेकिन अभी और कुछ नेता छूटने को बाकी थे। इसलिए उनके छूटने की प्रतीक्षा
कर रहा था। लेकिन अब मैं समझता हूँ कि यदुगोपाल से न मिलना मेरे लिए
एक और गलती हो गई।
एक बात और हो रही थी जिसका पता पहले मुझे न था। पुलिनबिहारीदास
ने सी० आर० दास का साथ तो दिया ही नही, उलटे सी० आर० दास के
विरोधी दल के आदमियों से मिलकर वे सत्याग्रह आन्दोलन के खिलाफ प्रचार-
कार्य करने लग गए थे। बैरिस्टर एस० आर० दास, मी० आर० दास के आत्मीय
थे और उस समय गवर्नमेट एडवोकेट थे। एस० आर० दास और उनके अन्य
राजभक्त बन्धु-बान्धव मिलकर सत्याग्रह आन्दोलन के विरुद्ध प्रचार-कार्य चलाना
चाहते थे, जैसा युक्त प्रान्त में अमन सभाएँ किया करती थी। एस० आर० दास
आदि से काफ़ी रुपया ढाका समिति को मिलता था। इन रुपयों से 'शंख' नामक
एक साप्ताहिक पत्र एव 'हक कथा' नामक पर्चे निकलते थे। मुझे यह पता न था
कि राष्ट्रीय आन्दोलन के विरुद्धवादियों से रुपया लेकर यह साप्ताहिक पत्र
निकाला जाता था। मैं इस पत्र मे लेख दिया करता था। लेनिन की एक जीवनी
लिखनी प्रारम्भ की थी। करीब चार अध्याय लिख भी चुका था। इतने में एक
दिन कलकत्ता में यदुगोपाल से मेरी बातचीत हुई। पता चला कि 'हक़ कथा'
किस ढंग से निकलता था। 'शंख' की भी जन्म-कथा मालूम हो गई। ढाका
समिति के साथ मेरा सम्बन्ध पहले से ही कुछ अच्छा नही रहा। इन सब बातों को
सुनकर ढाका समिति के प्रति मेरी अश्रद्धा और बढ़ गई। ढाका समिति के किसी
नेता को भी मैने ऐसा नही पाया था जिनकी योग्यता की तुलना वारीन्द्र, उपेन्द्र
या हेमचन्द्र इत्यादि से कुछ भी हो सके। ढाका समिति की सबसे बड़ी बात यह
थी कि वह संगठित थी। बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी दल अलग-अलग टोलियों
में बँटे हुए थे। संगठन की दृष्टि से एक तो छोटी-छोटी टोली होने के कारण,