बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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लिए जेल में बन्द पड़े रहे, लाजपत भारत के बाहर चले गए, विपिनचन्द्र दुर्बल
पड़ गए। ऐसी अवस्था में महात्माजी राजनीति के क्षेत्र में अवतीर्ण हुए।
महात्माजी के साथ-साथ भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में अन्य और भी शक्ति-
शाली नेताओं का आविर्भाव हुआ। अभी तक इन नेताओं का कोई पता ही न
था। महात्माजी का साथ देने के पहले बाबू राजेन्द्रप्रसाद का क्या अस्तित्व था ?
पंडित जवाहरलालजी को सन् 1919 में कौन जानता था ? सुभाषचन्द्र बोस
सन् 1919 में विलायत में एक छात्र मात्र थे। मोतीलालजी की गिनती लिबरलों
में भी नरम आदमियों में थी। इलाहाबाद में तिलक के आगमन के समय लोग
ऐसी तरकीबें सोचते थे कि जनता की तरफ से उनका शानदार स्वागत न हो।
महात्माजी के राष्ट्रीय क्षेत्र में अवतीर्ण होने के कारण एक ओर जैसे जनता में
विद्रोह की भावना फैलने लगी, उसी प्रकार से दूसरी ओर एक नवीन नेताओं
के दल का आविर्भाव हुआ। महात्माजी की विशेष देन में ऐसे नेताओं का आवि-
र्भाव होना भी एक विशेष महत्वपूर्ण बात है।
विप्लव-आन्दोलन में भाग लेने का अर्थ होता है फाँसी जाना या जन्म-भर
के लिए कालेपानी के टापू में ज़िन्दा दफनाये जाने की तरह अदृश्य हो जाना।
इतना त्याग और इतनी कठिनाई को सहने के लिए अधिक आदमी नहीं मिल
सकते। लेकिन महात्माजी के आन्दोलन में भाग लेने से थोड़ा त्याग और थोड़ी
मुसीबत सहने से ही काम चल जा सकता है। इसलिए महात्माजी के आन्दोलन
में सहस्रों की संख्या में भारतवासियों ने भाग लिया; लेकिन महात्माजी के
कार्यक्रम के अनुसार भारतवर्ष को किस प्रकार से पूर्ण स्वतन्त्रता मिल सकती है,
यह बात मेरे जैसे नवयुवकों की समझ में नहीं आती थी। सहस्रों की संख्या में
जेल जाने ही से किस प्रकार से राजशक्ति प्रजा के हाथ में आ जायेगी, यह बात
हम लोगों की समझ में नहीं आती थी। इसलिए मेरे-जैसे नवयुवकों ने यह मान
लिया था कि सशस्त्र क्रान्ति की तैयारी तो करनी ही पड़ेगी। तथापि महात्माजी
का सत्याग्रह-आन्दोलन जिस समय प्रबल रूप से चल रहा था, उस समय क्रान्तिकारी
आन्दोलन के लिए वातावरण ऐसा बन गया था कि अधिक-से-अधिक संख्या में
युवक वृन्द सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने लग गए। महात्माजी ने यह कह दिया
था कि हम एक साल के अन्दर स्वराज्य ले लेंगे। लेकिन क्रान्तिकारी आन्दोलन
के लिए उपयुक्त तैयारी की आवश्यकता होती है और इसके लिए दो बातों की
सख्त जरूरत है—एक तो प्रजा में राजनीतिक जागृति पर्याप्त परिमाण में होनी
चाहिए, दूसरे सशस्त्र क्रान्तिकारी आयोजन के लिए ऐसे वातावरण की
आवश्यकता होती है जिसमें हम लोग अन्तराल में रहकर, शासनकर्ताओं के सन्देह
को जागृत न करते हुए बहुत दिनों तक कठिन परिश्रम करने का अवसर प्राप्त
कर सकते हों। यदि हम अधिक-से-अधिक संख्या में जेल में गए और वह भी
ऐसा काम करके नहीं गए जिससे कि ब्रिटिश सरकार की पलटनों में बगावत की
भावना फैले, तो ऐसे जेल जाने से क्या लाभ है ! और न खाली विद्रोह की भावना