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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 408 में से

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पृष्ठ 238

236 / बन्दी जीवन
शुरू किया। इस आन्दोलन को शुरू करने के पहले चम्पारन में महात्माजी ने
अपनी शक्ति की परीक्षा कर ली थी। देखने में और कार्य में भी बिहार प्रान्त
भारत में सबसे पिछड़ा हुआ प्रान्त था। चम्पारन बिहार प्रान्त में ही था। इस
चम्पारन के जिले में महात्माजी ने सर्वप्रथम सक्रिय किन्तु शान्त विप्लव प्रारम्भ
किया था और यही देखा गया कि जिस प्रान्त को पिछड़ा हुआ समझा गया था
वह भी महात्माजी के नेतृत्व में सुप्रतिष्ठित ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह
करने को तैयार हो गया। महात्माजी ने अपने आत्म-चरित्र में इस बात को स्वी-
कार किया है कि सन् 1919 में पहली दफा व्यापक रूप से सत्याग्रह आरम्भ करने
के पहले महात्माजी पंजाब नहीं गए थे एवं उस प्रदेश में उन्होने अपने आन्दोलन
का कोई प्रचार भी नहीं किया था, इसलिए महात्माजी ने यह आशा नहीं की थी
कि पंजाब देश में भी उनका सत्याग्रह आन्दोलन जरा भी जोर पकड़ेगा। ये बातें
महात्माजी की आपबीती में मिलेंगी। युक्त प्रान्त में भी महात्माजी ने अपने
सिद्धान्त का कुछ भी प्रचार नहीं किया था। मुझे याद है, मेरे अण्डमन जाने के
पहले मोतीलालजी ने इलाहाबाद में महात्माजी के South Africa (दक्षिण
अफ्रीका) आन्दोलन के सिलसिले में सभा की थी। उस सभा में न अधिक आदमी
आये थे और न कोई जोश दिखलाई दे रहा था। लेकिन महायुद्ध के बाद महात्मा
जी जब अपने नवीन कार्यक्रम को लेकर मैदान में कूद पड़े तो समग्र भारत में
उनके आह्वान की सजीव प्रतिध्वनि सुनाई पड़ी। महात्माजी ने स्वीकार किया है
कि समग्र भारत ने जिस प्रकार से महात्माजी के आह्वान का उत्सुकता के साथ
प्रत्युत्तर दिया उसकी आशा उन्हें न थी। समग्र देश मानो उपयुक्त नेता की
अपेक्षा कर रहा था। महात्माजी जैसे महान् नेता यदि कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण न
होते तो शायद ही भारत में आज की जैसी जागृति होती। उपयुक्त नेतृत्व के
कारण भारत की जन-शक्ति का परिचय मिला।
महात्माजी के आन्दोलन के प्रारम्भ होने के पहले ही भारत की जनता में
जागृति पैदा हुई थी। और यह जागृति उत्तरोत्तर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उग्र
से उग्र रूप धारण कर रही थी। यदि महात्माजी की तरह महाप्रतिभावान नेता
भी जनता के इस रुख के विरुद्ध जाते तो उन्हें भी पराजय स्वीकार करनी पड़ती।
इस बात का भी प्रमाण महात्माजी की आपबीती में ही है। जिस चम्पारन जिले
में महात्माजी अपना विद्रोह आन्दोलन सफल रूप से चला पाए उसी चम्पारन
जिले में जब महात्माजी ने अंग्रेज सरकार को मदद देने की गरज से अपने
आदमी भेजे तो जनता ने महात्माजी का साथ नहीं दिया। यहाँ तक कि महात्माजी
के आदमियों को गाँव-गाँव जाने के लिए कोई सवारी तक नहीं मिली। अर्थात्
जनता मे जागृति हो चुकी थी। महात्माजी ने उस जागृति से लाभ उठाया और
भारत का प्रभूत कल्याण किया। भारत के अन्य नेतागण ऐसा नहीं कर पाए। यही
महात्माजी की एक महान् विशेषता है।
1919 के व्यापक सत्याग्रह आन्दोलन के परिणामतः अमृतसर में जलियां-