बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन / 249
एम० ए० में पड़ती थी। मुझे ठीक पता नहीं। पी० बिग्रेन सन् 21 और 22 में
सम्भव है ए० टू० डी० आई० जी०, सी० आई० डी० थे। ए० टू० डी० आई०
जी०, सी० आई० डी०, खुफिया डिपार्टमेण्ट में राजनीतिक विभाग में प्रधान
होते हैं। जिस दिन खुफिया विभाग के तमाम कागजात विद्रोहियों के हाथ आएँगे
उस समय ही यह पता लगेगा कि युक्त प्रान्त में महायुद्ध के बाद विप्लव कार्य का
पुनः संगठन मैंने ही सर्वप्रथम प्रारम्भ किया था या नहीं। जहाँ तक मुझे ज्ञात है,
अण्डमन से लौटने के बाद मैंने ही सर्वप्रथम युक्त प्रान्त में विप्लव का संगठन
पुनः प्रारम्भ किया था।
सन् 1920 में नागपुर मे कांग्रेस का अधिवेशन हो जाने के पश्चात् ढाका
अनुशीलन समिति के प्रमुख नेता श्री अतुलचन्द्र गांगुली को साथ लेते हुए आगरा,
इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ इत्यादि शहरों मे घूमा था। उस समय तक भी
ढाका अनुशीलन समिति की तरफ से कोई व्यक्ति यू० पी० मे नहीं भेजा गया
था। लेकिन उस समय मैं यू० पी० मे एक-दो करके अपने आदमियों का संग्रह
कर रहा था। जैसे प्रतुल गांगुली अपनी बात मुझे नहीं बतलाते थे, वैसे ही मैं
भी अपनी बातें उन्हें नहीं बतलाता था। इसीलिए सम्भव है उनके दिल में यह
ख्याल पैदा हो गया हो कि शायद मैंने अभी अपने प्रान्त मे विप्लव कार्य प्रारम्भ
नहीं किया है।
जिस समय मैं जमशेदपुर में मजदूर संगठन का कार्य कर रहा था उसी समय
भविष्य मे विप्लव कार्य चलाने के लिए अर्थ-संग्रह का काम भी कर रहा था।
ढाका अनुशीलन समिति से असन्तुष्ट होकर दो-एक व्यक्ति मेरे पास आए थे,
लेकिन ये व्यक्ति अपने संकल्प मे दृढ़ नही रहे। जिस समय मैं जमशेदपुर से इलाह'-
बाद के लिए रवाना हो रहा था उस समय विप्लव कार्य करने के लिए मेरे पास
कुछ धन आ गया था। मेरे लिए यह एक परम सौभाग्य की बात थी कि उत्तर
भारत में विप्लव कार्य करने के लिए धनी व्यक्ति मुझे नियमिन रूप से सहायता
देते रहे।
इलाहाबाद पहुँचकर मैंने कांग्रेस के प्रमुख नेताओं से मुलाकात की। कांग्रेस
के विभिन्न कार्यकर्ताओं से भी परिचय प्राप्त करने लगा। इलाहाबाद के विभिन्न
होस्टलों में जाकर मैं नौजवानों से परिचित होने की चेष्टा भी करने लगा।
कांग्रेस के नेताओं में से एक-आध ने मेरे साथ सहानुभूति तो अवश्य दिखलाई
लेकिन कार्य-क्षेत्र में वे लोग एक क़दम भी आगे नहीं बढ़े। बनारस षड्यन्त्र केस
के बाद मैनपुरी में एक षड्यन्त्र केस चला था। इसके साथ हमारे पुराने दल का
कोई सम्बन्ध न था। अवश्य यह बात निःसन्देह सत्य है कि बनारस केस के चलने
के कारण ही यू० पी० के दूसरे नौजवानों में भी क्रान्तिकारी कार्य करने की प्रबल
इच्छा पैदा हुई थी। इलाहाबाद में आकर मैंने चाहा कि मैनपुरी केस के बचे
हुए व्यक्तियों से मेरा परिचय हो जाए। इस प्रकार से खोज करते-करते मैनपुरी
दल के एक नेता श्री देवनारायणजी का पता चला। इलाहाबाद में ही उनसे