बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजमशेदपुर में मजदूर संगठन / 241
वसूल नहीं हो रहा था। मेरे आने के बाद एक तो मुझे इसी चन्दे में से डेढ़ सौ
रुपया माहवार मिला करता था। इसके अलावा मैंने एकाउण्टेण्ट और ऑफिस
क्लर्क भी पचास रुपया माहवार पर नियुक्त किया था। इन सब खर्चों को चलाकर
भी यूनियन की तहवील मे एक हजार से ऊपर रुपया मैंने जमा कर लिया था।
इस हालत में मेरे लिए डेढ़ सौ रुपया माहवार लेना ज्यादा बे-मुनासिब न था।
लेकिन फिर भी मैंने यूनियन के काम को छोड़ देना ठीक समझा। यदि मुझे कोई
दूसरा व्यक्ति मिल जाता जो कि क्रान्तिकारी संगठन के काम को संभाल सकता
तो मैं यूनियन के काम को न छोड़ता। बंगाल मे क्रान्तिकारी व्यक्तियों की कुछ
कमी तो थी नहीं। तो फिर मुझे यूनियन का काम क्यों छोड़ना पड़ा ?
जैसाकि मैंने पहले ही बतला दिया है, भारत मे एक ही संस्था विप्लव के
मार्ग से भारत को स्वाधीन करने के काम मे नही लगी हुई थी। मेरे अण्डमन से
लौटने के बाद ढाका अनुशीलन समिति के नेताओं ने मेरे साथ खुले दिल से
सहयोग नहीं किया। रासबिहारी के रहते समय ढाका समिति का जो रुख था अब
वह नहीं रहा। ढाका समिति इस नई परिस्थिति मे क्या करना चाहती थी, इस
विषय को लेकर उसके नेताओ ने मेरे साथ किसी प्रकार का भी विचार-विमर्श
नहीं किया। श्री पुलिनबिहारीदास ढाका समिति के सर्वमान्य एव सबसे पुराने
नेता थे। राजबन्दियो के छूटने के बाद ढाका समिति का नेतृत्व श्री पुलिनबिहारी
के हाथ मे था। इन पुलिनबिहारी के साथ मैं अण्डमन मे रह चुका था। पुलिन-
बिहारी कैसे ढाका समिति के नेता बन गए थे, यह बात मेरी समझ में नहीं आती
थी। न बुद्धि मे, न अध्ययन में, न विचारशीलता में और न समझदारी मे ही
पुलिनबिहारी की कोई विशेषता थी। ऐसे तो वे बी० ए० तक पढ़े थे, लेकिन
उनकी मानसिक प्रकृति नितांत ठस थी। सामाजिक प्रश्नों को लेकर न कभी
उन्होंने किसी से कोई विचार-विमर्श या विचार-विनिमय ही किया और न
सामाजिक या राजनीतिक समस्याओं पर लिखी हुई किताबों को पढ़ने में कोई रुचि
ही दिखलाई। अण्डमन मे रहते समय अधिकारियों के साथ उनका कभी कोई
सघर्ष नही हुआ। जिस समय अन्य राजबन्दीगण अनशन करते थे अथवा अन्य
प्रकार से जेल अधिकारियो के साथ आत्म-मर्यादा की रक्षा के लिए अपमानो का
प्रतिवाद करने के लिए लडा करते थे तो उस समय पुलिनबिहारीजी छिपकर इन
झंझटो से अलग रहते थे। एक बात तो समझ मे आती है कि हरएक प्रकार का
दुःख और कष्ट उठाने के लिए हरएक आदमी तैयार नही हो सकता और ऐसी
आशा करना भी उचित नहीं है, लेकिन जो व्यक्ति ऐसा कर सकता है हृदयवान
सच्चे मनुष्य के लिए यह स्वाभाविक है कि वह उस व्यक्ति के प्रति सहानुभूति
सम्पन्न अवश्य होगा। यदि ऐसा व्यक्ति वीरो का साथ नहीं भी देता है तो भी
उसके आचरण से सहज ही मे सरलता के कारण समवेदना का और सहकारी होने
का भाव टपकता है। पुलिनबिहारी मे मैंने इस प्रकार की कोई भावना नहीं
पायी। अपनी मनुष्य चरित्र जानने की अभिज्ञता से मैंने यह समझ लिया था कि