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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 408 में से

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पृष्ठ 242

240 / बन्दी जीवन
ईंट के कारबार के बाद बी० एन० रेलवे में मैंने पचास रुपये की एक नौकरी
कर ली। इस नौकरी का अनुभव कैसा रहा इस स्थान पर इसकी कोई चर्चा नहीं
करना चाहता। इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि एक दिन आत्म-हत्या भी करने
की इच्छा हुई थी। इतने में एक दिन मेरे पास जमशेदपुर से एक आदमी आया।
जमशेदपुर की मजदूर सभा के सभापति श्री एस० एन० हलदारजी ने इन्हें मेरे
पास भेजा था। जमशेदपुर का मजदूर संगठन टूटता जा रहा था। वहाँ के मजदूर
संगठन को सँभालने के लिए हलदारजी मुझे उसमें लगाना चाहते थे।
देशबन्धु सी० आर० दास की धर्मपत्नी हलदार साहब की बहन लगती थीं। डेढ़
सौ रुपये मासिक वेतन पर मैं जमशेदपुर में लेबर यूनियन के काम पर चला
गया। बी० एन० रेलवे के दफ्तर के हेड क्लर्क ने मुझे थोड़ा-सा समझाना चाहा
कि रेलवे की नौकरी में स्थिरता है। लेबर यूनियन की नौकरी में कोई स्थिरता
नहीं है। ऐसी दशा में मेरे लिए रेलवे की नौकरी को छोड़ देना उचित होगा या
नहीं, यह बात अच्छी तरह से सोच लेनी चाहिए। लेकिन मैं तो नौकरी करना
चाहता ही न था। इसलिए जमशेदपुर के मजदूर संगठन के काम को मैंने सहर्ष
स्वीकार कर लिया। मानो मेरे लिए यह एक भारी आशीर्वाद था। रेलवे की
नौकरी को छोड़कर जमशेदपुर चला गया। नौ महीने तक मजदूर सगठन का.
काम किया। जमशेदपुर में पचहत्तर हजार मजदूर काम करते थे। नौ महीने
रात-दिन काम करते हुए मैंने मजदूर संगठन के बारे में यथेष्ठ अभिज्ञता अर्जन
कर ली। जमशेदपुर में काम करते समय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में सम्मिलित
हुआ। इस अवसर पर भारत के समस्त प्रान्तों के क्रान्तिकारी व्यक्तियों से
जान-पहचान, मेल-मुलाकात हुई। इस अधिवेशन में राजनीतिक बन्दियों के लिए
जो कुछ किया था उसका उल्लेख पहले ही कर चुका हूँ।
महात्माजी का सत्याग्रह आन्दोलन जोरों से चला था। उसका इतिहास
यहाँ पर लिखने की आवश्यकता नही है। जितने दिन यह आन्दोलन चलता रहा,
मैं जमशेदपुर में मजदूर संगठन का काम करता रहा। महात्माजी का सत्याग्रह
आन्दोलन जब निर्जीव होने लगा तब मैंने सोचा कि अब अपने क्रान्तिकारी दल
का काम प्रारम्भ करना चाहिए। जमशेदपुर के काम से दो बार इस्तीफा दिया
लेकिन दोनों बार लेबर यूनियन की कार्यकारिणी समिति ने मेरे इस्तीफे को स्वी-
कार नहीं किया। लेबर यूनियन से डेढ़ सौ रुपया लेना मैं ठीक नहीं समझता था।
इसके अतिरिक्त क्रान्तिकारी दल का संगठन करना मजदूर संगठन की जिम्मे-
दारी को लिये हुए सम्भव नहीं था। मजदूर संगठन के काम में यदि कोई सोलह
आना मन और चौबीस घण्टे का समय नहीं लगाता है तो इस काम को ठीक
प्रकार से कोई भी नहीं कर सकता। और यदि कोई मासिक वेतन लेता है तो
मजदूर संगठन के काम में उसे अपना पूरा समय लगाना उचित है।
जब से मैंने जमशेदपुर की लेबर यूनियन का काम हाथ में लिया था तब से
यूनियन की काफ़ी उन्नति हुई थी। मेरे आने के पहले यूनियन का चन्दा कुछ भी