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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 408 में से

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पृष्ठ 246

244 / बन्दी जीवन
एवं ये छोटी-छोटी टोलियाँ अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को क़ायम रखना चाहती
थीं, इस कारण से भी ढाका-समिति को छोड़कर बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी
दल, संगठन की दृष्टि से दुर्बल थे। लेकिन बंगाल के दूसरे क्रान्तिकारी दलों के
नेतागण व्यक्तित्व एवं एकता की दृष्टि से ढाका समिति के नेतागणों से कहीं
उच्च श्रेणी के थे। मेरी हार्दिक सहानुभूति बंगाल के दूसरे दलों के नेताओं के
प्रति थी। लेकिन अभी मैं 'त्रैलोक्य चक्रवर्ती' नामक ढाका समिति के एक
प्रतिष्ठित नेता के छूटने की प्रतीक्षा कर रहा था। ऐसी परिस्थिति में मेरे लिए
बंगाल के किसी भी क्रान्तिकारी दल में शामिल होना सम्भव नहीं था। मैंने एक
प्रकार से तो निश्चय कर लिया था कि युक्त प्रान्त एवं पंजाब में स्वतन्त्र रूप से
क्रान्तिकारी दल का संगठन प्रारम्भ कर दूँ, फिर बाद को निश्चय करूँगा कि
बंगाल के किस दल के साथ हम सहयोग कर सकते हैं।
यह बात सच है कि कुछ सरकारी प्रतिष्ठा-प्राप्त लोगों से रुपया लेकर ढाका
समिति कुछ हद तक अपना संगठन कर पाई थी। लेकिन राष्ट्रीय आन्दोलन का
विरोध करने के कारण बंगाल में इसकी बहुत बदनामी फैल रही थी। इस कारण
इस समिति के सदस्यों में असन्तोष फैल रहा था। ऐसे अवसर पर एक बात और
फैली। पुलिनबिहारी दास ने एस० आर० दास को बंगाल के कुछ क्रान्तिकारियों
के नाम की एक तालिका दे दी और यह सूचना भी उनके साथ दे दी कि ये लोग
फिर क्रान्तिकारी आन्दोलन की तैयारी कर रहे हैं। इस बात के फैलने के बाद
पुलिनबिहारी को ढाका समिति से अलग हो जाना पड़ा। पुलिनबिहारी की
राजनीतिक मृत्यु तो पहले ही हो चुकी थी। अब इस बार उनकी अर्थी निकली।
बंगाल के मुक्त राजबन्दीगणों ने बंगाल के मासिक और साप्ताहिक पत्र
और पत्रिकाओं में क्रान्तिकारी आन्दोलन के बारे में खूब लिखना प्रारम्भ कर
दिया था। बंगाल की जनता की सहानुभूति भी इन राजबन्दियों के प्रति अधिक-
से-अधिक थी। वहाँ के शिक्षित एवं अशिक्षित जन भी दिल से यह चाहते थे कि
विप्लववादियों की उन्नति हो। बंगाल के कुछ जजों ने भी इस सहानुभूति को
राजनीतिक मामलों का फैसला देते समय भी कार्य रूप में दिखलाया। मेरे
अण्डमन जाने के पहले सर आशुतोष मुखर्जी के सामने एक मामला पेश हुआ था
जिसमें चार नवयुवक बम बनाने के अपराध में अभियुक्त थे। आशुतोषजी ने इन
चार में से तीन को छोड़ दिया और एक को सजा दे दी। बाद में आपस में बात
करते हुए आशुतोषजी ने कहा था कि यदि मैं चारों को छोड़ देता तो सरकार
अपील करती और फिर चारों को सजा हो जाती। इसलिए मैंने एक को तो पूरी
सजा दे दी और तीन को छोड़ दिया। ऐसी हालत में सरकार के लिए अपील
करना कुछ कठिन बात हो जाती है। बंगाल में ऐसे और भी जज हुए हैं जिन्होंने
राजनीतिक मामलों में फैसला देते समय अपनी सहानुभूति को कार्य रूप में परि-
णत करके दिखलाया है। सरकारी नौकरी में भी जो बंगाली थे वे भी क्रान्ति-
कारी आन्दोलन के प्रति सहानुभूति सम्पन्न थे।

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