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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 408 में से

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पृष्ठ 241

जमशेदपुर में मजदूर संगठन / 239
दूसरे देशों के क्रान्तिकारीगण कैसे निर्वाह करते होंगे। इस बात की खोज में मैंने
बहुत-सी किताबें पढ़ीं, लेकिन मुझे कुछ पता न चला। टालस्टाय ने एक स्थान
पर ऐसा लिखा है कि जिस पुस्तक में जिस बात की आशा करते हैं उस पुस्तक में
उस बात को छोड़कर और बहुत-सी बातें मिलती हैं, लेकिन जिस बात के लिए
पुस्तक लिखी गई है वह बात उस पुस्तक में बहुत कम मिलती है। विप्लववादियों
के बहुत-से ग्रन्थ पढ़े लेकिन वे लोग अपना निर्वाह कैसे करते थे, इसका पता मुझे
नहीं चला। सिर्फ एक पुस्तक में क्राप्टकिन साहब ने जो कुछ लिखा है उससे
ऐसा मालूम होता है कि रूस में भी क्रान्तिकारियों की वैसी ही दुर्दशा होती थी
जैसी कि हमारे देश में होती है।
कलकत्ता में रहकर मैं काम-काज की खोज कर रहा था। उधर मेरी माँ मेरी
शादी के लिए लड़की ढूँढने बंगाल आई थी। कुछ स्थानों पर माँ के साथ मुझे
भी जाना पड़ा। इसी सिलसिले में अपने कुछ दूर के रिश्तेदारों से बातचीत करने
के बाद यह तय हुआ कि उन रिश्तेदारो के साथ मिलकर कलकत्ता के पास वर्द्ध-
मान जिले के कालना नामक सब-डिवीज़न में ईंट बनाने का कारबार खोलें। कुछ
महीने तक इस काम मे मुझे लगना पड़ा। ऊपर से तो काम करते थे, जी में रोते थे।
कालना में काम करते समय मैंने बन्दी जीवन लिखना प्रारम्भ किया। दिन-
भर काम करता था। आधी रात को लिखा करता था। पढ़ने का समय थोड़ा ही
मिलता था। वहाँ के नौजवानो से भी मिलने का प्रयत्न किया करता था। काम
के सिलसिले में कभी-कभी कलकत्ता जाना पड़ता था। ऐसे अवसरों पर कभी-कभी
देखता था कि बाढ़-पीड़ितों की सहायता के लिए नौजवान लोग टोली बनाकर
सड़क की दुकानों पर से चन्दा संग्रह कर रहे हैं। इस प्रकार से नौजवानो की
देश-सेवा की लगन को देखकर मेरा हृदय पिघल जाया करता था। उनके साथ
अपनी तुलना करते हुए अपने प्रति नितान्त दुःख होता था। सोचता था मैं क्या
चाहता था और क्या कर रहा हूँ। अपने को कर्त्तव्य-च्युत होते देखकर मैं रो
पड़ता था। ट्राम में बैठे हुए रोना भी तो मुश्किल था। दूसरे आदमी आँख में
आँसू देखकर क्या कहेंगे। इसलिए दूसरो की आँख बचाकर अपनी आँखें पोंछा
करता था।
मेरे ईंट के कारोबार में लगने के पहले कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हो
चुका था। इसका उल्लेख पहले ही कर चुका हूँ। जिन दिनों मैं ईंटों के कारोबार
में लगा हुआ था उन दिनों मे कांग्रेस का विशेष कोई काम नहीं हो रहा था।
ईंट का कारबार बरसात के दिनों में बन्द होता है। इस कारबार में रुपये
लगा दिए थे जब तक मैं इस लागत को वसूल नहीं कर लेता तब तक मैं इस कार-
बार को कैसे छोड़ सकता था। निश्चय तो मैंने कर लिया था कि इस कारबार
को छोड़ दूँगा। इस कारबार को छोड़ने के पहले मेरी शादी हो गई। अन्त में
मैंने अपने कारबार को अपने रिश्तेदारों के हाथ बेच दिया। मुझे एक हजार
रुपये का घाटा हुआ। खाने-पीने का खर्च और मेहनत तो अलग ही रही।