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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 408 में से

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पृष्ठ 247

जमशेदपुर में मजदूर संगठन / 245

अंग्रेजी मासिक पत्र 'हिन्दू रिव्यू' ने खुल्लम-खुल्ला लिखा था कि 'क्रान्ति-
कारियों के एक-एक आतंकवादी काम पर सरकारी मुलाजिम भी उल्लसित हो
उठता है।'
ऐसी परिस्थिति में भी महात्माजी ने जब अपना अहिंसात्मक आन्दोलन
ज़ोरों से प्रारम्भ कर दिया तो विप्लववादी आन्दोलन को गहरी चोट पहुँची।
महात्माजी के सत्याग्रह आन्दोलन के कार्यक्रम के अनुसार जेल जाना ही
सबसे बड़ी बात थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि महात्माजी के नेतृत्व में भारत
का जन-आन्दोलन चरम शिखर पर पहुँचा। जनता में ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध
विद्रोह करने का माद्दा कुछ सीमा तक पैदा हुआ। जिस दिन से महात्माजी ने
भारतीय जन-आन्दोलन में भाग लेना प्रारम्भ किया, उस दिन से यह निश्चय हो
गया कि राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने का अर्थ है जेल जाना, मुसीबत सहना
और कम-से-कम अपना पूरा समय राष्ट्रीय कार्य में लगा देना। इसके पहले भारत
के राष्ट्रीय आन्दोलन में क्रान्तिकारी संस्था ही एकमात्र ऐसी संस्था थी जिसकी
कार्य-प्रणाली में अत्यन्त साहस, दुर्दमनीय वीरता, चरम स्वार्थ-त्याग, आन्तरिकता
एवं परम लगन की नितान्त आवश्यकता थी। महात्माजी के राष्ट्रीय क्षेत्र में
आने से पहले भारतीय जन-आन्दोलन के नेतागणों में दो प्रकार की मनोवृत्ति के
कारण उनमें आत्म-विश्वास की मर्यादा का अभाव दीख पड़ता था। इसलिए ये
नेतागण अंग्रेज सरकार से आवेदन-निवेदन करना ही जानते थे। इनकी धारणा
यह थी कि धमकी दिखलाकर अथवा दूसरो का अनुग्रह-प्रार्थी न होकर, अपने
राष्ट्र के बल पर ही निर्भर रहते हुए हम कुछ नहीं कर सकते। हमारे देश मे इन
नेताओं को लिबरल कहते थे। दूसरी मनोवृत्तिवाले नेताओं में ये बाते नही पाई
जाती थी। इन दूसरे नेताओं में यह स्पष्ट भावना पैदा हो रही थी कि भीख माँग-
कर दुनिया मे कभी भी कोई राष्ट्र दुश्मनों के पंजे से अपने को मुक्त नही कर
पाया है। इसलिए ये नेता यह चाहते थे कि राष्ट्रीय आन्दोलन को ऐसे मार्ग पर
चलाया जाय जिससे जनता मे साहस, त्याग और विद्रोह की भावना पैदा हो।
हमारे देश मे इन नेताओं को एक्सट्रीमिस्ट कहते थे। इन एक्सट्रीमिस्टों ने भारत
के सामने पूर्ण स्वतन्त्रता के ध्येय को नितान्त स्पष्ट शब्दों में, निर्मल रूप मे,
ऐसी आन्तरिकता के साथ, ऐसी अविचल श्रद्धा के साथ, ऐसे मर्मस्पर्शी शब्दों में,
ऐसी उमंगभरी ललकार के साथ रखा था कि भारत के शत-शत नवयुवक
प्राणों की बाजी लगाकर राष्ट्रीय बलिवेदी पर अपने को न्योछावर करने के लिए
बेचैन हो उठे थे। इस अन्तिम ध्येय के प्रचार के परिणामतः जिस विप्लव-
आन्दोलन की सृष्टि हुई थी आज चालीस साल के अकथनीय पीड़न के होते हुए
भी वह आन्दोलन दब नहीं पाया, लेकिन फिर भी विप्लव-आन्दोलन जन-
आन्दोलन नही बन पाया। तिलक, अरविन्द, लाजपत और विपिनचन्द्र के
नेतृत्व में भारत का जन-आन्दोलन विप्लव के मार्ग में क्रमशः आगे बढ़ रहा
था कि इतने में अरविन्द राजनीतिक क्षेत्र से अलग हो गए। तिलक छः साल के