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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 408 में से

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पृष्ठ 240

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जमशेदपुर में मजदूर संगठन
सन् 1920 में महात्माजी का सत्याग्रह आन्दोलन समाप्त हो जाने के बाद
ही मैंने 'पूर्ण रीति से विप्लव दल का संगठन प्रारम्भ किया था। लेकिन इसमें
कितनी उलझनों का सामना करना पड़ा उसका कुछ हाल यहाँ दे देना आवश्यक
है। जैसाकि मैंने पहले ही उल्लेख कर दिया है। मेरी तरह से दूसरे अनेक मुक्त
राजबन्दियों के सामने भी सबसे कठिन प्रश्न यही था कि कैसे अपनी आर्थिक
स्वतन्त्रता प्राप्त करें। कभी सोचा किताब की दुकान खोलें जिससे पढ़ने-लिखने की
फुरसत रहे। विप्लव के कार्य को चलाने के लिए किताबों की दुकान उपयोगी
होगी। लेकिन इसके लिए बहुत रुपयों की आवश्यकता थी। इसलिए इस ख्याल
को छोड़ना पड़ा। कभी सोचा छापाखाना खोलें। छापेखाने की सहायता से
प्रचार कार्य का भी काम खूब चलेगा। पुस्तकें भी प्रकाशित की जाएँगी। लेकिन
इसके लिए भी कम-से-कम दस हजार रुपयों की आवश्यकता थी। आखिरकार
इस ख्याल को भी छोड़ना पड़ा। फिर सोचा एक बिसातखाने की दुकान खोल
दें। सोचा कि शायद एक-दो हजार रुपये की लागत में ऐसी दुकान खोल सकते
हैं। पिता की कमाई के कुछ रुपये माँ के पास थे। मेरी माँ और मेरे सब भाई
मेरे ऊपर अत्यधिक जोर डाल रहे थे कि मैं किसी काम में लग जाऊँ। सी०
आई० डी० के डिप्टी इन्स्पेक्टर जनरल ने हमारे मामू को लिखा था कि मुझे ऐसे
काम में लगाया जाय कि जिससे दूसरे किसी उलझन मे पड़ने का अवकाश ही
न मिले। इसलिए सी० आई० डी० जी० यह चाहते थे कि मेरे लिए जमीन ले
ली जाय और मैं खेती के काम में लगा दिया जाऊँ। मैंने इस काम को स्वीकार
नहीं किया। आखिर बिसातखाने की दुकान खोलने की ठहरी। वह कहाँ खोली
जाए ? यदि मौके का स्थान न मिले तो दुकान का खोलना ही व्यर्थ है।
बिसातखाने की दुकान के लिए मौका ढूंढते-ढूंढ़ते कलकत्ता शहर को छान
डाला। सुबह से शाम तक जगह की तलाश में घूमते थे। घूमते-घूमते थक जाते
थे। एक दिन क्लान्त होकर दिल में ऐसा ख्याल पैदा हुआ कि यदि मैं औरत
होती तो मेरे लिए जीविका उपार्जन करने का कम-से-कम एक रास्ता तो खुला
रहता ही जैसाकि मैने कलकत्ता की बीसों सड़कों के जंगले पर बैठी हुई औरतों
को देखा था। मेरी आँखों में आँसू आ जाते थे। मैं सोचा करता था आखिर