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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

मातृभूमि की गोद में / 211

कम-से-कम दो-तीन घंटे की देरी है। यह जानकर कि यदि मैं फिलहाल मिटिया-
बुर्ज थाने से चला जाऊँ और सीधा लालदिग्गी थाने में जाकर वहाँ फिर मुक्त
क़ैदियों के दल में सम्मिलित हो जाऊँ तो पुलिस को आपत्ति न होगी, मैंने सीधा
ट्राम का रास्ता लिया। ट्राम में चढ़कर कालीघाट आ पहुँचा। कालीघाट में मेरे
चचेरे भाई रहते थे। लेकिन मैंने सबसे पहले बी० सी० चटर्जी बैरिस्टर के यहाँ
जाने का निश्चय किया।
बंगाल एवं यू० पी० में चटर्जी साहब ने बहुत-से राजनीतिक षड्यन्त्रों के
मामले में पैरवी की थी। आप प्रसिद्ध नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के दामाद थे।
क्रांतिकारियों के साथ आप विशेष सहानुभूति रखते थे। बनारस षड्यन्त्र केस में
भी आपने पैरवी की थी। इस सिलसिले में चटर्जी साहब को घनिष्ठ रूप में
जानने का मौका मिला था। राजनैतिक क्षेत्र में आप अरविन्द की नीति के पक्ष-
पाती थे। बंग-विच्छेद के बाद बंगाल में जो अग्निमय युग आया था उस ज़माने
में अरविन्द एवं विपिनचन्द्र पाल के संचालन में 'वन्देमातरम्' नाम का एक
प्रसिद्ध दैनिक पत्र निकला करता था। हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में
इस पत्र का विशेष स्थान है। इस पत्र में अरविन्द के सहयोगी के रूप में श्री बी०
सी० चटर्जी भी लिखा करते थे। कलकत्ता हाईकोर्ट में जितने वकील-बैरिस्टर थे
उनमें सी० आर० दास, बी० सी० चटर्जी एवं एस० एन० हलदार प्रमुख थे।
बी० सी० चटर्जी साहब ने हम लोगों से अनुरोध किया था कि हम लोग डकैती
करना छोड़ दें। हम लोगों के लिए जितने रुपयों की आवश्यकता होगी, सब वे
संग्रह करके देंगे। लेकिन थोड़े ही दिनों बाद आपने हमसे कह दिया था कि
'भाई, तुम लोग जो चाहो सो करो, रुपया कोई देता नहीं है। हमने आशा की
थी कि हम काफ़ी रुपयों की मदद तुम्हें दे सकेंगे, लेकिन हम निराश हो गए हैं।
अब तुम्हें अधिकार है जो ठीक समझो, सो करो।' क्रांतिकारियों के साथ ये इतनी
गहरी सहानुभूति रखते थे, अतः मुक्ति पाने पर कलकत्ते में क़दम रखते ही आज
सीधा मैं उन्हीं बी० सी० चटर्जी के मकान की तरफ रवाना हो गया। मुझे उनके
स्थान का ठीक पता नहीं था। कालीघाट में ट्राम से उतरकर मैंने एक युवक से
बी० सी० चटर्जी का पता पूछा। सौभाग्य से इस युवक ने मेरे साथ बहुत सहानु-
भूति दिखाई। लेकिन जितनी आशा थी उतनी सहानुभूति नहीं मिली। पहले
तो इस युवक ने मुझे यों ही समझा के टालना चाहा कि अमुक रास्ते पर जाने
पर गन्तव्य स्थान को पहुँच जाऊँगा। लेकिन जब मैंने बतलाया कि मैं अभी सीधा
कालेपानी से आ रहा हूँ, यदि आप कृपापूर्वक मेरे साथ हो लें और बी० सी०
चटर्जी साहब का मकान दिखला दें तो मैं बहुत अनुगृहीत हूँगा। इस पर पहले तो
वह युवक हिचकिचाया, लेकिन मेरे अनुरोध करने पर वह मेरे साथ हो लिया।
कालीघाट से बालीगंज तक एवं पुनः बालीघाट से कालीघाट तक इस बेचारे ने
मेरा साथ नहीं छोड़ा। कालीघाट से बालीगंज काफ़ी दूर था।
प्रथम साक्षात में चटर्जी साहब ने मुझे नहीं पहचाना, लेकिन एक-दो क्षणों के

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बाद ही वे कुर्सी से कूदकर खड़े हो गए और दौड़कर मेरे गले से लग गए । फिर
हमें प्रेम और आदर के साथ अपने पास बैठाया और टेबुल पर से मेरी ही लिखित
एक चिट्ठी उठाकर मुझे दिखलाई । यह चिट्ठी मैंने अण्डमन से अपने भाई को
लिखी थी । मैंने देखा कि इस चिट्ठी में कई स्थान पर स्याही से कुछ लाइनें इस
प्रकार लीप-पोत दी गई थीं कि पढ़ी नहीं जा सकती थीं। इस चिट्ठी में और
बातों के साथ मैंने यह भी लिखा था कि भारत में अब नया शासन-विधान
प्रचलित होनेवाला है । अधिकारीगण यह कह रहे हैं कि भारत को अपनी राज-
नीतिक उन्नति के लिए पर्याप्त अवसर दिया जाएगा। यदि यह बात सच है, यदि
इंग्लैंड एवं फ्रांस की तरह हमें भी अपनी उन्नति के लिए उचित मौका मिले तो
ऐसा कौन पागल होगा जो कि खामखा खून-खराबी के रास्ते को ही ग्रहण करेगा
और यों ही अपनी जान को जोखिम में डालकर बन्दूक और तलवार के रास्ते को
अख्तियार करेगा। क्रान्तिकारीगण सचमुच पागल तो हैं नहीं। यदि अधिकारी-
गणों का कहना दिली हक़ीक़त है तो उन्हें अवश्य राजबन्दियों को छोड़ देना
चाहिए । इस चिट्ठी को मेरे भाई साहब ने बी० सी० चटर्जी के पास भेज दिया
था। बी० सी० चटर्जी साहब ने यह चिट्ठी दिखलाकर मुझसे यह कहा कि
उन्होंने इस चिट्ठी को अपने ससुर श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को दे दिया था । उन्होंने
असेम्बली में इस चिट्ठी के आधार पर राजबन्दियों को छोड़ने के लिए जोरदार
अपील की थी एवं अनेक राज-पुरुषों को यह चिट्ठी दिखलाई भी थी। बी० सी०
चटर्जी ने यह भी कहा कि वे स्वयं मांटेग्यू साहब से इस सम्बन्ध में मिले भी थे ।
उनके मुंह से मैंने यह भी सुना कि जिस समय वे मैनपुरा केस की पैरवी कर रहे
थे, उसी समय सम्राट् की घोषणा का पत्र प्रकाशित हुआ, जिसमें राजबन्दियों को
छोड़ने की इच्छा प्रकट की गई थी । सी० आई० डी० के डिप्टी-इंस्पेक्टर जनरल
सैण्ड्स साहब भी उस समय चटर्जी साहब के पास ही थे । सैण्ड्स साहब ने चटर्जी
साहब से कहा कि शचीन्द्र की माता से माफी की दरखास्त दिलवा दें और इस
पर उन्होंने स्वयं सिफारिश कर देने को कहा । चटर्जी साहब ने तार से मेरे मामा
को इस बात की इत्तिला दी । मामा ने माताजी के मार्फत दरखास्त दिलवाई ।
सैण्ड्स साहब ने इस दरखास्त पर सिफारिश लिख दी । यह इसी सब का परिणाम
हुआ कि मैं कारावास से मुक्त हो गया और बी० सी० चटर्जी से यह सब सुनने
का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ ।
बी० सी० चटर्जी ने मुझे तेईस साल की अवस्था में देखा था । अब जब मैं
लौटकर आया तो मेरी अवस्था अट्ठाईस साल की थी । बाल बहुत बड़े-बड़े हो
रहे थे । बकरे की दाढ़ी की तरह मेरी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी । इसीलिए प्रथम
दर्शन में तो चटर्जी साहब मुझे पहचान नहीं पाए थे । चटर्जी साहब ने चाहा कि
मेरे भाई को तार द्वारा मेरी रिहाई का संवाद भेज दें। मैंने मना किया । मैंने
चाहा कि अचानक घर में जाकर खड़ा हो जाऊँ । बहुत हर्ष के साथ चटर्जी साहब
से विदाई ली । एक मुक्त डेटेन्यू भी चटर्जी साहब के पास बैठे थे, उनसे भी

मातृभूमि की गोद में / 213
विदाई ली। पुनः अपने उस अपरिचित युवक के साथ कालीघाट में वापस लौट
आए। रास्ते में मैंने इस युवक के साथ राजनैतिक मामलों पर बातचीत की।
कलकत्ता में क़दम रखने के बाद रंगरूट भरती करने की मेरी यह सर्वप्रथम चेष्टा
थी। कालीघाट में मेरे चचेरे भाई रहते थे। मुझे पता था कि वह कहाँ रहते थे।
चटर्जी साहब के यहाँ से लौटने के बाद मैं सीधा भाई के पास नहीं आया। मैं तो
सबसे पहले इस युवक का ही घर देखने चला गया, तब कहीं बाद को भाई के पास
आया। लेकिन दुःख के साथ बताना पड़ता है कि रंगरूट्टी का मेरा यह प्रथम प्रयत्न
विफल रहा। यह युवक मेरे काम में शामिल नहीं हुआ। इस वक़्त तो मैंने सिर्फ़ इस
युवक का केवल घर ही देख लिया एवं थोड़ी-बहुत राजनीतिक आलोचनाएँ कीं।
बाद को मैं जब कलकत्ता आया तो मैंने फिर इनका पीछा किया एवं कुछ दिनों
तक यह प्रयत्न करता रहा कि यह युवक मेरे प्रभाव के अंदर आ जाय। लेकिन
मैं जैसा पहले कह चुका हूँ, इस प्रयत्न में मैं असफल ही रहा।
इस युवक के घर होते हुए भाईसाहब के घर आया। दरवाजे पर खड़े होकर
मैं यह पूछ रहा था कि अब भी मेरे भाईसाहब उसी मकान में रहते हैं या नहीं।
जंगले से उचककर भाईसाहब ने मुझे देखा एवं देखकर बोल पड़े, “शचीन्द्र ! आ
गए हो ! आओ, भीतर आओ।” भाईसाहब बार-बार मेरे मुंह की तरफ ताकने
लग गए। हँसकर मैंने कहा, “हजामत बहुत दिनों से नहीं बनी है।” नाई आया,
हजामत बनी। भाईसाहब ने कहा कि बनारस से मेरे छोटे भाई मुझे ले जाने के
लिए कलकत्ता आए थे। उन्हें पता ही नहीं चला कि जहाज कहाँ पर आया था।
बेचारे नाउम्मेद होकर वापस चले गए। नहाया-धोया। अब कुछ मालूम पड़ा कि
मैं छूट गया हूँ। क़ैद होने के बाद आज सर्वप्रथम मैंने घर का भोजन किया। पाँच
साल लगातार क़ैद का भोजन करते हुए भी रुचि नहीं बदली। नित्य प्रतिदिन
खाते-खाते भी यह आदत नहीं पड़ी कि जेलखाने के भोजन के प्रति भी रुचि हो
जाय। इससे यह प्रमाणित होता है कि स्थूल रूप से किसी काम को बराबर
करने ही से कहीं आदत नहीं बना करती, अच्छे भोजन के लिए हर घड़ी जी में
चाह बनी रहती थी। इसलिए वासना की तृप्ति न होने के कारण स्थूल व्यवहार
का कोई असर स्वभाव पर नहीं पड़ा। यथार्थ में वासना-जगत् में कोई परिवर्तन
हुए बिना शारीरिक या स्थूल व्यवहार का कोई असर मनुष्य-जीवन पर नहीं
होता। इस प्रकार हम यह थोड़ा-बहुत अनुभव कर सकते हैं कि जगत् प्रधानतः
वासनात्मक है। पाँच साल के बाद आज महत् तृप्तिपूर्वक भोजन किया। भाई ने
कहा कि घर को तार द्वारा मेरे छूटने का संवाद दे दूँ। इस वक़्त ठीक याद नहीं
है कि तार किसने भेजा था—चटर्जी साहब ने या इन्हीं भाई साहब ने। सम्भव
है कि भाईसाहब ने ही भेजा हो, क्योंकि शायद ऐसा हुआ हो कि मेरे छोटे भाई
का कलकत्ता आना और अकेले वापस चले जाने का असर.मेरे ऊपर हुआ था।
भाई साहब ने मुझे समझाया कि जो कुछ होना था.सो हो गया, अब मैं दत्तचित्त
होकर गृहस्थी के काम में लग जाऊँ। उम्र काफ़ी हो चुकी है। इस वक़्त की

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अवहेलना से बाद में पछताना पड़ेगा।
खाने-पीने के बाद कुछ आराम करके लालदिग्घी पहुँच गए। इतने में एक
मोटरकार थाने के प्रांगण में आई। इसमें कलकत्ता के सुपरिचित बैरिस्टर आई०
वी० सेन एवं बी० के० लाहिड़ी थे। ये आए थे बारीन्द्र वगैरह की खोज में।
संवाद-पत्र में पढ़ा होगा कि बारीन्द्र वगैरह छूट गए हैं। मैंने इनको बतलाया कि
वे तो कल रात ही अपने-अपने ठिकाने पहुँच गए होंगे। मुझे इस वक़्त याद नहीं
है कि आई० वी० सेन आए थे कि जे० एम० सेन गुप्ता । बी० के० लाहिड़ी ने
मेरे परिवार के साथ अपना कुछ रिश्ता बतलाया। बारीन्द्र को न पाकर इन्होंने
मुझसे ही अनुरोध किया कि कलकत्ता में एक खिलाफ़त कान्फ्रेंस हो रही है और
मुझे वहाँ चलना होगा। मैं जी में जरा-सा घबराया, सोचा कि आज ही तो कल-
कत्ता में पहले दिन क़दम रखा है ! अभी भी पुलिस के पंजे से छुटकारा नही
पाया है और लालदिग्घी थाने के प्रांगण के अन्दर ही राजनीतिक कान्फ्रेंस मे जाने
का यह साग्रह अनुरोध ! यह सच है कि बिना किसी प्रकार की शर्तें लगाये हुए ही
मुझे छोड़ दिया गया था। मुक्ति पाने का जो सर्टिफिकेट मुझे मिला था उसमें
एक स्थान पर ऐसा लिखा था कि अपने स्थान पर पहुँचते ही ज़िला-कलेक्टर को
हम इत्तिला दे दें कि कालेपानी से लौट आए हैं। अतः मैंने बैरिस्टर साहबों से
कहा कि अभी हम थाने मे ही हैं, ऐसी हालत मे कान्फ्रेंस में जाने से कोई हर्ज तो
नही है ? कान्फ्रेंस में मेरे लिए जाना क्या कोई विशेष आवश्यक बात है ? परन्तु
गुप्ता साहब तथा लाहिड़ी साहब ने इस पर भी विशेष आग्रह किया कि मैं कान्फ्रेंस
में अवश्य चलूँ, तो मैं तैयार हो गया। मुझे उन्होंने मोटर में बैठा लिया और
कान्फ्रेंस के पंडाल मे हाज़िर कर दिया। कान्फ्रेंस के बाद मै मौलाना शौकतअली
से मिलने गया। गिरफ़्तार होने के पहले मेरे आदमी मौलाना शौकतअली एवं
मौलाना मोहम्मदअली के पास क्रान्तिकारी उद्योग के सम्बन्ध मे पहुँचे थे।
इसलिए मौलाना मोहम्मदअली तथा मौलाना शौकतअली साहब मुझे जानते थे।
शौकतअली साहब ने मुझसे अनुरोध किया कि अब मैं खुले मैदान कूद पड़ूँ।
चोरी छिपकर काम का अब प्रयोजन नही है। मैंने शान्तिपूर्वक सब सुन लिया।
वहाँ से विदा होकर पंजाब-कैम्प में आए। विशेष अनुरोध पर मुझे यहाँ कुछ
खाना पड़ा। अच्छी-अच्छी चीजें देखकर लोभ तो बहुत हो रहा था, लेकिन जी
मे डर रहा था कि ऐसा खाना खा लूं तो सम्भव है, हज़म न कर पाऊँ। अभी तक
एक प्रकार का भोजन खाते आए थे जिसमें तेल तो नाम के लिए होता भी था
परन्तु घी की तो सुगन्ध भी न होती थी। इस चहल-पहल से लौटकर फिर वही
निरानन्दमय अशुभ थाने के प्रांगण मे लौट आया। अब भी नाम वगैरह लिखे
जाने एवं राह के खर्च मिलने में काफ़ी देर थी। ये घड़ियां मुझे बहुत ही नागवार
गुज़री। पुलिस की परछाईं से भी मुझे घिन थी। पुलिस के द्वारा जीवन में बहुत-
कुछ दुख पाया था सम्भवतः इसीलिए पुलिसवालों की हवा से भी चिढ़ पैदा हो
गई थी। कालेपानी के पाँच साल काटने में जितनी भी पीड़ा मालूम हुई हो उसके

मातृभूमि की गोद में / 215

मुकाबले में लालदिग्घी के पाँच घंटे बहुत भारी प्रतीत हुए। आखिर इसका भी
अन्त हुआ। पुलिस वाले हमें फिर हावड़ा स्टेशन ले गए। खैरियत यह थी कि
अब की जोड़ा-जोड़ा नहीं जाना पड़ा। चालीस-पचास मुक्त बन्दियों के लिए
कागजात के आधार पर पुलिसवालों ने टिकट कटवाया। स्टेशन पर टिकट देने
वाली ऐंग्लो-इण्डियन मेमसाहिबा टिकट देते-देते चिढ़ गईं और अपशब्द कहने
लगीं। मैं सामने ही खड़ा था। सम्भव है, मुस्कराता रहा होऊँ। दिल में तो मैं
हँसता ही था और सोच रहा था चलो मेरी भी गिनती बदमाशों में हो गई। मैं
डर रहा था कि कहीं पुलिस घर तक मेरे साथ न चले। लेकिन जब टिकट मेरे
हाथ में देकर पुलिसवाले चले गए तो मानो मनों बोझ सिर से उतर गया। रेल के
छोटे-से डिब्बे में तो अवश्य रहे, लेकिन मैंने यही सर्वप्रथम यथार्थ स्वच्छन्दता
अनुभव की। मानो मैं जहाँ-तहाँ विचरने लग गया हूँ। रेल की रफ़्तार मुझे धीमी
मालूम पड़ी। तूफ़ान में सवार होकर यदि मैं घर पहुँच सकता तो मानो जी को
कुछ तसल्ली होती। रात कैसे बीती, मुझे याद नहीं। जाड़े के दिन थे। मेरे
पास न कोई बिस्तरा था न पहनने के गर्म कपड़े। वारीन्द्र का दिया हुआ एक कोट
और एक धोती और कुछ पैसे मेरे पास थे। जेल के दिये हुए कुछ कपड़े भी
साथ थे।
मुझे खूब याद है, भोर होते ही मैं बनारस पहुँचा। असल में छूटने का जो
आनन्द है वह मुझे बनारस पहुँचने पर ही मिला। मेरे लिए बनारस से प्रिय भूमि
संसार में और कोई नहीं है। मेरी यह जन्मभूमि है; शिशु-अवस्था मैंने यहाँ पर
कैसे बिताई, मुझे वह याद नहीं और बाल्यावस्था मैंने यहाँ बिताई नहीं, लेकिन
जीवन का जो श्रेष्ठ अंश है, जो मधुरतम भाग है, अपनी वही किशोरावस्था मैंने
बनारस ही में बितायी है। इसलिए मेरे जीवन की मधुरतम स्मृति बनारस के वायु-
मण्डल में, बनारस की भूमि के प्रति रज-कण में अनन्तकाल के लिए विजड़ित
है। स्टेशन से जब घर की तरफ चला तो प्रति क्षण आनन्द की मात्रा बढ़ती
गई। लेकिन जिस क्षण मैंने इक्के से उतरकर गली के भीतर क़दम रखा तो मुझे
ऐसा मालूम पड़ा कि क़दम के नीचे की भूमि भी मानो कठिन एवं स्थिर नहीं है
मानो वह भूमि भी आनन्द के स्पर्श से चंचल हो रही थी, हिल-डुल रही थी। मैं
चलकर घर नहीं आया बल्कि दौड़ता हुआ घर पहुँचा। क्या हृदयावेग की
आकर्षण शक्ति धरित्री की मध्याकर्षण शक्ति ही की तरह है कि अण्डमन से जब
चले तब से लेकर घर पहुँचने तक यह आकर्षण का वेग बढ़ता ही गया और घर के
पास आकर आखिर मुझे दौड़ना ही पड़ा। मकान के नीचे के कमरे का जंगला
खुला हुआ था। मैं मुहूर्त्त-भर जंगले के सामने आकर खड़ा हो गया। कई एक
युवक वहाँ लेटे हुए थे। इनमें मेरे दो भाई रवीन्द्र और जितेन्द्र भी थे। रवीन्द्र
मुझे देखते ही हर्षोत्फुल्ल स्वर से नाति-उच्च कण्ठ से चिल्ला उठे, “अरे, दादा
हैं।” रवीन्द्र बिस्तरे से ऐसे उचक पड़े मानो नीचे से किसी ने जोर का धक्का
देकर उन्हें ऊपर फेंक दिया हो। घूमकर दरवाजे होते हुए अन्दर आए एवं हरएक

216 / बन्दी जीवन
को मैंने छाती से जोर से लिपटा लिया। मेरी यह नई जिन्दगी थी। मेरा यह नया
जन्म प्रारम्भ हुआ।
जिस रोज मैं घर पहुँचा उसके पहले दिन ही मेरे कनिष्ठ भ्राता का उपनयन-
संस्कार हो चुका था। घर में यह किसी को पता न था कि आज यहाँ आ पहुँ-
चूँगा। मैंने सबसे पूछा, माताजी कहाँ हैं ? माताजी बगल के मकान में कुछ काम
से गई हुई थीं। मैं पूछताछ कर ही रहा था कि इतने में वे आ गईं। मुझे देखते
ही आनन्द के मारे रो पड़ीं और कहने लगीं, "बेटा मेरा, आ गए हो, मेरा बेटा आ
गए हो।" और मेरे सिर पर, मेरे बदन पर, मेरे कन्धे पर और हाथ-पर-हाथ
फेरने लग गईं। कहने लगीं, "जाने कितनी मुसीबत तुमने झेली !"
मैंने जब सबसे छोटे भाई को देखा तो मुझे एक अजीब-सा धक्का पहुँचा।
इस कनिष्ठ भ्राता को आठ साल की उम्र में घर पर छोड़ आया था। मेरे मन
में अभी तक उसकी वही आठ साल की कमनीय मूर्ति बनी हुई थी। अब जब मैंने
इसको देखा तो उस कमनीय मूर्ति के साथ इसका कोई सादृश्य नहीं पाया। मैंने
कल्पना नहीं की थी कि भूपेन्द्रनाथ को जब देखूँगा तो उसको किसी और मूर्ति में
देखूँगा।
जीवन का एक अध्याय समाप्त हुआ अब दूसरा प्रारम्भ होगा।

4
बन्दी साथियों की चिन्ता
घर पहुँचने के दो-एक घण्टे के अन्दर ही पुराने मिलनेवालों में से एक युवक
मेरे पास आए । इनका नाम था— जितेन्द्रनाथ मुकर्जी । कॉलेज छोड़ने के समय
आप मेरे सहपाठी थे । लेकिन आप मेरी गुप्त समिति के सदस्य नही थे । जैसे
भाइयों से मिलते हुए हम एक-दूसरे से लिपट गए थे, वैसे ही देखते ही इनसे भी
लिपट गए । बनारस के पुराने साथियों मे से कोई भी मुझसे मिलने नही आया ।
इनसे देश की राजनीतिक स्थिति पर बातचीत होने लग गई । मुझे भली भाँति
स्मरण था कि देश पहुँचते ही मेरा प्रथम कर्तव्य क्या है। मैंने जितेन्द्र से पूछा,
“कहो, मालवीयजी आजकल कहाँ है ? मुझे मालवीयजी से मिलना है ।” मैंने
इन्हें अण्डमन की स्थिति बताई कि कैसे वहाँ पर दुखी राजबन्दी पड़े-पड़े सड़
रहे हैं, कैसे भाई परमानन्द कोठरी में एकाएक बन्द कर दिये गए हैं । भारत-भूमि
से नितान्त विच्छिन्न होने के कारण अण्डमन टापू से दर्द की कोई कहानी भारत
पहुँच नही पाती है । राजबन्दियों की मुक्ति के लिए कैसे, क्या किया जाय ?
जितेन्द्र मुकर्जी से पता चला कि महामना पं० मदनमोहन मालवीय जी बनारस
में ही हैं एवं सम्भवतः आज हिन्दू यूनिर्वसिटी कोर्ट की मीटिंग होगी और वहाँ
मालवीय जी से हम मिल सकते हैं । रोटी खाकर दो काम करना ठीक हुआ ।
एक तो मालवीयजी के पाम जाना, दूसरा मैजिस्ट्रेट के पास जाकर अपने आने
की सूचना देना ।
रोटी खाकर हिन्दू स्कूल पहुँचे । वाकई मीटिंग हो रही थी । मैंने एक स्लिप
पर यह लिखकर मालवीयजी के पास भेज दिया, “Comming straight from
the Andamans, an interview may be allowed in connection
with the cases of Bhai Parmanand and other Political prisi-
oners Sachindra Nath Sanyal.”
स्लिप पहुँचते ही पंडितजी एवं डाक्टर गणेशप्रसाद फौरन चले आए । हम सब
एक छोटे से कमरे में बैठ गए । मेरे लिए यह एक सौभाग्य की बात थी कि डाक्टर
गणेशप्रसाद ने मुझे पहचान लिया । सम्भव है, मेरी स्लिप को पढ़ते ही पहचान
लिया हो । मालवीयजी के सामने डाक्टर गणेशप्रसाद मेरी खूब प्रशंसा करने लग

218 / बन्दी जीवन
गए। मैंने देखा कि उन्हें छोटी-छोटी बातें भी खूब याद थीं। वे जब मेरी प्रशंसा
कर रहे थे तो मैं मन-ही-मन हँस रहा था। हँसने का कारण था।
एण्ट्रैन्स पास करके मैं क्वीन्स कॉलेज में भरती हुआ था। डाक्टर गणेश-
प्रसाद उस समय गणितशास्त्र के अध्यापक थे। मैं उनका छात्र रह चुका था। मैं
आज तक जितने अध्यापकों के पास पढ़ा हूँ उनमें से आप ही ऐसे अध्यापक थे
जिनके छात्र अमूमन फेल नही होते थे। आप लड़कों से जबरन सब काम करा
लेते थे। लेकिन आपका Task करने के बाद फिर कॉलेज का और कोई काम हो
नही सकता था। स्कूल में गणित में मैं प्रायः शत प्रतिशत अंक (Full marks)
पाया करता था। अब कॉलेज में आकर, राष्ट्रीय आन्दोलन मे सक्रिय रूप से भाग
लेने के कारण गुप्त षड्यन्त्रकारी आवर्त में फँसकर कॉलेज का काम यथोचित
नहीं कर पाता था। पहले-पहल तो मैं डाक्टर साहब का काम पूरा कर देता था
और मेरी गिनती अच्छे लडकों में होने लग गई थी। इसलिए डाक्टर साहब
अपनी निकटतम सामने की बेंच में दूसरे अच्छे लड़कों के साथ ही मुझे भी बैठाते
थे। लेकिन थोड़े ही दिनों मे मेरा क्लास का काम ढीला पड़ गया। अतः फिर
दूसरी बेंच में बैठना पड़ा, और फिर तीसरी मे। जिस छात्र से डा० गणेशप्रसाद
अत्यन्त असन्तुष्ट हो जाते थे, उसे वे आखिरी बेंच पर बैठाते थे एव उसके साथ
ऐसा व्यवहार करते थे मानो वे हैं ही नही। फिर उनको न वे कोई Task देते न
लेते थे; न उनसे बोलते थे। ऐसे लड़कों को वे Non-entity कहा करते थे।
आप नही चाहते थे कि उनके छात्र कोर्सबुक को छोड़कर और कोई किताब पढ़ें।
छात्र प्रायः उपन्यास आदि पढ़ा करते थे तो उनसे छिपाकर ही पढ़ा करते थे।
मैं डा० साहब के क्लास मे Non-entity रह चुका था। इसी हालत मे एक दिन
मैं जान-बूझकर पाठ्य पुस्तक के अलावा एक अंग्रेजी किताब क्लास मे ले आया था
और उसको मैंने किताबों में सबसे ऊपर रखा था, यह देखने के लिए कि डा०
साहब इस किताब को देखकर मुझे कुछ कहते हैं या नही। रामकृष्ण मिशन के
स्वामी अभेदानन्द के अमेरिका मे प्रदत्त व्याख्यानों का संग्रह India and her
people नाम से मुद्रित हुआ था। इसी पुस्तक को मैं क्लास मे ले आया था।
डा० गणेशप्रसाद ने मेरे पास से गुज़रते हुए किताब को देखा; देखकर उठा
लिया; किताब के पन्नों को इधर-उधर उलटकर थोड़ा-सा देखा और फिर
किताब को यथास्थान रख दिया। मैं देखना चाहता था कि वे मुझे डाँटते हैं या
नही। क्लास मे तो मेरे साथ उनके ऐसे ताल्लुक़ात थे, लेकिन आज मालवीयजी
के सामने वे मेरी कितनी प्रशंसा कर रहे थे, इसका थोड़ा-सा कारण अवश्य है।
कॉलेज में पढ़ते समय हम लोगों ने अपनी चेष्टा से, अपने ही उद्योग से, एक स्कूल
खोला था। वह स्कूल मिडिल तक पहुँचा था। इस स्कूल के वार्षिकोत्सव के
अवसर पर हम लोगो ने डा० गणेशप्रसाद को सभापति का आसन ग्रहण करने के
लिए निमन्त्रित किया था। हम अन्तिम परीक्षा के पहले Non-entity नहीं रह
गए थे।

मालवीयजी ने सब बातें सुन लीं और आखिर में कहा कि मुझे लिखकर
रजिस्ट्री पत्र द्वारा सब बातें सूचित करो। मैंने गोरखपुर जाकर वैसा ही किया
था। Acknowledgement due की रसीद तो मुझे मिल गई। लेकिन मालवीय
जी ने राजनीतिक बन्दियों की मुक्ति के लिए एक आवाज़ भी नहीं उठाई।
जितेन्द्र मुकर्जी एवं मेरे भाइयों का कहना था कि आजकल युक्त प्रदेश में
उदीयमान नेता पण्डित जवाहरलालजी नेहरू हैं। यदि वे राजनीतिक क़ैदियों का
प्रश्न उठाएँ तो कुछ काम हो सकता है।
मैं बनारस में दो ही दिन ठहरा और फिर गोरखपुर चला गया। मेरे साथ
मेरे सर्वकनिष्ठ भाई भूपेन्द्रनाथ थे। बनारस षड्यंत्र के मामले में आजन्म काले-
पानी की सजा के अतिरिक्त मेरे ऊपर यह भी दण्ड था कि मेरी तमाम जायदाद
छीन ली जाय। बनारस में जिस मकान में हम लोग रहते थे वह मेरी आजी का
मकान था। मुझे सज़ा होने के बाद पुलिसवालों ने इस मकान को अपने क़ब्ज़े में
कर लिया था। मकान के साथ बिस्तरे आदि भी, जो कुछ मकान में थे, पुलिस के
ही व्यवहार में आए। अर्थात् जो पुलिस वाले रखवाली के तौर पर उस मकान
में रहते थे, वही वह सब सामान अपने इस्तेमाल में ले आए। उस समय में मेरी
माताजी, मेरी आजी, मेरी मौसी एवं मौसी की पाली हुई एक लड़की और मेरा
सबसे छोटा भाई मेरे पकड़े जाने के बाद सब यहीं घर में रह गए थे। जब पुलिस
ने मकान को अपने क़ब्ज़े में कर लिया तो इनके रहने के लिए स्थान न रहा।
ऐसी विकट परिस्थिति में मेरे मामा इन सबको गोरखपुर ले आए। जब मैं काले-
पानी से छूटकर आया तो मेरे भाई, मां इत्यादि गोरखपुर में मेरे मामा के पास
ही थे। मेरी आजी मेरे चाचा के पास चली गई थी।
गोरखपुर से मैं एक दफे पं० जवाहरलालजी से मिलने आया। राजनैतिक
बन्दियों के विषय में और विशेषकर कालेपानी में स्थित घोर दुर्दिन में पड़े हुए
बहुत-से लम्बी सजा पाये हुए राजबन्दियों के प्रति जवाहरलालजी की दृष्टि मैंने
आकर्षित की। जवाहरलालजी सब बातें सुनकर यह कह उठे—"हम लोग तो
स्वयं ही जेल जाने का इन्तज़ाम कर रहे हैं और आप दूसरों को छुड़ाने की बातें
कर रहे हैं।" मैं उनके मुंह की तरफ ताकता ही रह गया और सोचने लगा कि मैं
इनसे और क्या कहूँ। मैंने यह समझ लिया अपने ही आदमी हुए बगैर दूसरों के
दुःख को समझना सहज नहीं है। यदि जवाहरलालजी अपने दल के आदमी होते
तो वे मेरी प्रार्थना के महत्त्व को अनुभव कर पाते। और शायद यह भी बात थी
कि जब सरकार के साथ झगड़ा ही करना है तो फिर सरकार से किसी बात के
लिए अनुरोध कैसे किया जाय। मैं बहुत नाउम्मेद हो गया।
सितम्बर, सन् 1920 में कलकत्ता में स्पेशल कांग्रेस हुई। भारत के प्रत्येक
राजनीतिक नेता की दृष्टि उस समय महात्माजी के Non-cooperation प्रस्ताव
पर लगी हुई थी। वहाँ भी कुछ काम नहीं बना। कांग्रेस में तो हम कुछ कर
नहीं पाए लेकिन दूसरे मुक्त राजबन्दियों को साथ लेकर मैं लाला लाजपतराय

220 / बन्दी जीवन
के पास गया। ऑल इण्डिया पोलिटिकल सफरर्स कांफ्रेन्स में सभापति का आसन
सुशोभित करने के लिए उनसे अनुरोध किया। लाजपतरायजी राजी हो गये।
उनके सभापतित्व में इण्डियन एसोसिएशन के हाल में ऑल इण्डिया पोलिटिकल
सफरर्स कांफ्रेंस हुई। इस कांफ्रेन्स को बुलाने में प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री बी० सी०
चटर्जी एवं कलकत्ता के पुराने क्रांतिकारी नेताओं की विशेष सहायता मिली
थी।
बहुतों ने वक्तृता दी। किसी की वक्तृता हृदयग्राही थी और किसी की शुष्क।
स्व० श्यामसुन्दर चक्रवर्ती ने हृदयावेग से गद्गद होकर सबसे लंबी स्पीच दी,
लेकिन उनकी स्पीच मर्मस्पर्शी नहीं हुई। वक्तृता देते-देते वे सभापति के शरीर
के ऊपर आ गिरते थे। भूल जाते थे कि सभापति के आसन पर कोई बैठा है।
पंडित मदनमोहन मालवीयजी ने जो वक्तृता दी उससे क्रांतिकारियों के प्रति
सहानुभूति रखनेवाले बहुत कुछ असन्तुष्ट हो गए। इसके प्रत्युत्तर में कलकत्ता के
बैरिस्टरगण जे० एन० राय, बी० सी० चटर्जी इत्यादि ने मालवीयजी को कुछ
बातें सुनाईं। लेकिन इस कांफ्रेंस में स्वर्गीय एनीबेसेण्ट महोदया ने जो मर्मस्पर्शी
एवं ओजस्विनी वक्तृता दी थी, उसकी तुलना की वक्तृता जीवन-भर में और
नहीं मिली। उस दिन यह पता चला कि वाग्मी किसे कहते हैं। वे दृश्य जीवन में
भूले नहीं जा सकते, मानो एक श्वेत प्रस्तर-मूर्ति जीवन्त होकर निश्चल रूप में
खड़ी है, कभी-कभी हाथ और सिर थोड़ा-थोड़ा हिल जाता है, केवल ओठ चल रहे
हैं। और उस प्रस्तरमूर्ति के मुख से मानो स्वयं सरस्वती हृदयग्राहिणी भाषा
उद्गीर्ण कर रही है। मालवीयजी लज्जित हो गए। तमाम हाल में मानो बिजली
का संचार हो गया। लाला लाजपतरायजी ने सभापति के आसन से यहाँ तक
भी कह डाला कि इन राजबन्दियों में ऐसे आदमी भी हैं जिनके जूते के फ़ीते
खोलने लायक यहाँ के लाटसाहब भी नहीं। मीटिंग समाप्त होने के बाद मालवीयजी
ने apology (क्षमा-याचना) के तौर पर कुछ कहा, जिसका आशय यह था कि
उनके कहने का मतलब तो यह-वह कुछ और था इत्यादि। इस प्रकार से राज-
बन्दियों के लिए कुछ प्रोपेगैण्डा किया गया।
उसी साल नागपुर मे जो कांग्रेस हुई, उसमें घटनाचक्र से मै Subjects
Committee (विषय-निर्वाचिनी समिति) में पहुँच गया। महात्माजी के असह-
योग आन्दोलन के कारण राजनीतिक barometer बहुत ही चढा हुआ था।
सरकार के साथ जब झगडा मोल लिया जा रहा था तब कैसे उसी सरकार से यह
अनुरोध किया जाय कि राजबन्दियो को छोड़ दो। मैंने स्व० विपिनचन्द्रपालजी
से बहुत अनुरोध किया कि कुछ तो हमें करना ही चाहिए। मेरे कहने पर विपिन-
चन्द्र ने एक प्रस्ताव तैयार किया। मैं उसी प्रस्ताव पर राजी हो गया और उसे
विषय निर्वाचिनी (Subject Committee) समिति से पास करवा लिया।
नागपुर कांग्रेस के अधिवेशन में भी स्व० विपिनचन्द्रपाल ने इस प्रस्ताव को रखा
और इसका अनुमोदन दूसरों के साथ मैंने किया। जीवन में सर्वप्रथम आम सभा में

बन्दी साथियों की चिन्ता / 221

इसी मौके पर मैंने व्याख्यान दिया था। इस कांग्रेस में बीस हज़ार के क़रीब डेली-
गेट्स थे। मैं ही ऐसा सर्वप्रथम बगाली था जिसने कांग्रेस में हिन्दी में वक्तृता दी
हो। आजकल के हिन्दू महासभा के सभापति बैरिस्टर श्रीयुत् विनायक दामोदर
सावरकरजी के छोटे भाई श्रीनारायण दामोदर सावरकर के पास मैं मंच पर
बैठा हुआ था। व्याख्यान देने के बाद जब मैं डा० सावरकर के पास लौट आया
तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारे व्याख्यान से लोग रो पड़े हैं। प्रस्ताव का पूरा
मसविदा मुझे इस वक्त याद नहीं है। संभव है ऐसा रहा हो—This congress
sends its message of hope and sympathy to all political prisi-
oners incorcerated in the different Jails of India and in the
distant Andamans islands अर्थात् "भारतवर्ष की विभिन्न जेलों में एवं
अण्डमान के सुदूर टापू में जो भारतीय राजबन्दी पडे सड रहे हैं उनके लिए यह
कांग्रेस की महासभा सहानुभूतिपूर्ण ओर आशा का सन्देश भेजती है।" इसके बाद
प्रस्ताव में कुछ और भी शब्द थे जो कि मुझे याद नहीं हैं। मेरी और श्री विपिन-
चन्द्रपालजी की सलाह में यह प्रस्ताव बना था एवं स्व० देशबन्धु चितरंजनदासजी
की सहायता से यह प्रस्ताव कांग्रेस से पास हुआ। विजयराघवाचार्यजी ने जो
कांग्रेस के सभापति थे मुझे पाँच मिनट-मात्र का समय दिया था। अण्डमन से देश
लौट आते ही बम्बई में डाक्टर सावरकरजी को मैंने पत्र भेज दिया था और
लिखा था कि राजबन्दियों की मुक्ति के लिए कुछ करना चाहिए। इसके बाद
डाक्टर सावरकर और मैं दोनों सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के पास गए। सुरेन्द्रनाथजी ने
पहले तो यह कहा कि हमें तो तुम लोग गाली दिया करते हो। इसके जवाब में
हमने उनको यक़ीन दिलाया कि राजनैतिक बन्दियों के लिए उन्होंने जितना काम
किया है उतना और किसी ने नहीं किया है। बात सच भी थी। हृदय से जो
बात कही जाती है उसका असर भी होता है। सुरेन्द्रनाथजी ने सब नोट इत्यादि
कर लिया। यहाँ पर एक बात कह देना आवश्यक है कि हम दोनों सुरेन्द्रनाथजी
के पास विनायक दामोदर सावरकरजी के विषय में ही कहने गए थे।
राजबन्दियों की रिहाई के लिए मैंने जो कुछ किया वह कुछ भी नहीं था।
ब्रिटिश गवर्नमेण्ट ने ही जिसे चाहा, उसे छोड़ा। महात्मा गांधी के सत्याग्रह
आन्दोलन के कारण भारत के राजबन्दियों का प्रश्न दब-सा गया। भारत के राज-
नीतिक वातावरण में स्वाधीनता के प्रश्न ने अभी भारतीयों के हृदय को जरा भी
बेचैन नहीं किया था। यही कारण था कि जिन लोगों ने भारतवर्ष को स्वाधीन
करने के लिए अपने जीवन को निछावर कर दिया था उसके लिए भारतवासी एक
प्रकार से उदासीन थे। आज भी भारत की दशा कुछ अधिक आशाप्रद नहीं है।
आज भी भारत के गष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के मन में स्वाधीनता की चाह नहीं पैदा
हुई है। अरविन्द और तिलक के समय में स्वाधीनता का ही प्रश्न अन्तिम रूप से
राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के सामने जीवन का ध्येय बन गया था। यही कारण है कि
बगाल का क्रान्तिकारी आन्दोलन तीस साल तक दमन-चक्र चलनेपर भी दब नहीं

222 / बन्दी जीवन
सका। आखिरकार बंगाल के गवर्नर भारत के लाट साहब एवं इंग्लैण्ड के मंत्रियों
को मजबूर होकर यह कहना पड़ा था कि जब तक उन्हें बंगाल की जनता की
सहायता नहीं मिलती है तब तक वे क्रान्तिकारी आन्दोलन को दबा नहीं सकते।
बनारस में मालवीयजी से मिलने के बाद मैं और जितेन्द्र मुकर्जी सीधे कल-
क्टर के यहाँ चले गए। ऊपर लिख चुका हूँ कि छूटने के समय मुझे जो सर्टि-
फिकेट मिला था उसमें एक हिदायत यह थी कि अपने स्थान पर पहुँचने पर जिला
कलक्टर को मैं इत्तला दे दूँ कि मैं कालेपानी से वापस आ गया हूँ। इसी हिदायत
के मुताबिक मैंने जिला-कलक्टर को अपने आने की इत्तला कर दी। कलक्टर ने
कहा कि पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट को इत्तला दे दो। यह बात बहुत बुरी मालुम हुई,
लेकिन आखिर पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट के दफ्तर पर चले गए। लेकिन वहाँ पर
असिस्टेण्ट पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट ही मिले। उनको भी मैंने अपने आने की इत्तला
कर दी। उन्होंने कहा कि सुपरिटेण्डेण्ट अभी नहीं हैं। मैंने कहा कि वह हों, या
न हों मैंने अपना फ़र्ज अदा कर दिया और अब मैं जा रहा हूँ। उन्होंने मेरा
नाम और पता नोट कर लिया। नतीजा यह हुआ कि मेरे ऊपर पहरा लग
गया। जहाँ तक मुझे याद है, अण्डमन से लौटकर बनारस में सिर्फ़ एक दिन
रहा। दूसरे दिन अपने कनिष्ठ भाई भूपेन्द्र को लेकर गोरखपुर चला आया।
गोरखपुर में दो-चार महीने पड़ा रहा। यह दो-चार महीने मैंने निश्चिन्त होकर
कुछ आराम से बिताए। लेकिन प्रतिदिन मेरे मन में यह खटकता रहा कि आखिर
मैं उचित रूप से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ या नहीं। मैं प्रतिदिन यह अवसर
ढूंढ रहा था कि फिर कैसे नये सिरे से कार्य आरम्भ करूँ। मैं एक दफा कलकत्ता
जाना चाहता था, लेकिन पास में पैसा न था। गोरखपुर से एक साप्ताहिक पत्र
'स्वदेश' नाम से निकलता था। उसके सम्पादक श्री दशरथजी द्विवेदी से मैंने
परिचय प्राप्त कर लिया। बहुत इशारे से मैंने एक दिन उनसे अपनी मनोभिलाषा
व्यक्त की। कलकत्ता जाने की इच्छा प्रकट करते हुए मैंने उनसे सहायता माँगी।
मुझे आशा तो मिली, लेकिन सहायता नही मिली। इसी बीच मे मैं एक दिन
इलाहाबाद पंडित जवाहरलालजी से मिलने के लिए गया एवं अण्डमन की दशा
लिखकर रजिस्ट्री द्वारा पं० मदनमोहन मालवीयजी के पास भेजी। इन सबका
जो कुछ परिणाम हुआ उसे मैं पहले बता चुका हूँ। किसी कार्यवश एक दिन
बनारस गया। वहाँ पर अपने पुराने साथी श्री प्रियनाथ भट्टाचार्य एवं श्री सुरेश-
चन्द्र भट्टाचार्य से मिला। इन लोगों से मैंने संगठन-कार्य का प्रस्ताव किया। इसके
थोड़े ही दिनों के अनन्तर सी० आई० डी० के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल मिस्टर
बिगैन के पास से मेरे भाई के पास इत्तला आई कि मैं फिर संगठन की बातचीत
चला रहा हूँ। मुझे आश्चर्य हुआ। बाद को पता चला कि प्रियनाथ भट्टाचार्य
ने छूटने के पहले ही एक लम्बा इकरारनामा पुलिस को दे दिया था। इसके बाद
से मैं फिर कभी प्रियनाथ से नही मिला।

5
मि० सैण्ड्स और बैरिस्टर चटर्जी
बनारस षड्यन्त्र के मामले में हम चार भाइयों में से तीन गिरफ्तार हो चुके
थे । मेरे तीसरे भाई जितेन्द्र को दो साल की सजा भी हो गई थी । मेरे मझले
भाई रवीन्द्रनाथ अदालत से तो बरी कर दिये गए थे, लेकिन बाद को गोरखपुर
में अपने मकान में नज़रबन्द कर दिये गए । जितने दिनों के बाद में अण्डमन से
लौटकर आया उतने दिनों में जितेन्द्र ने एन्ट्रेंस और इण्टरमीडिएट पास करके
बी० ए० में पढ़ना शुरू कर दिया । रवीन्द्रनाथ बी० ए० में पढ़ने के लिए जाने
वाले थे या चले गए थे, यह मुझे ठीक-ठीक याद नहीं । अण्डमन जाने के पहले
मैं बी० एस-सी० के प्रथम वर्ष में पढ़ रहा था । अब छूटने के बाद मैंने भी चाहा
कि बी० ए० पाम कर लूं । मेरे भाई और माताजी की इच्छा न थी कि मैं
बी० ए० पढ़ूँ । लेकिन मेरे अत्यन्त आग्रह करने पर वे राजी हो गए । मन में यह था
कि कॉलेज में पढ़ने से मुझे नौजवानों से मिलने का प्रचुर अवसर मिलेगा । कुछ यह
भी इच्छा थी कि बी० ए० की डिग्री ले लूं शायद भविष्य में कुछ काम आए ।
इलाहाबाद जाने के पहले मेरे एक आत्मीय के पास जो कि रिश्ते में मेरे मामू
लगते थे, डिप्टी इन्स्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस सैण्ड्स साहब के पास से एक चिट्ठी
आई थी, जिसमें लिखा था कि शचीन्द्र को कालेपानी से लौटने पर अवश्य मेरे
पास एक दिन भेज दें ।
यहाँ पर सैण्ड्स साहब के बारे मे दो शब्द कह देना नितान्त आवश्यक है ।
आप ही के तत्वावधान में बनारम षड्यन्त्र केस चला था । मैनपुरी षड्यन्त्र केस
भी आप ही के जिम्मे था । मुझे सजा हो जाने के बाद माताजी ने सरकार के पास
माफ़ी का एक आवेदन-पत्र भेज दिया था; लेकिन सरकार की तरफ से यह जवाब
मिला था कि अभी छोड़ा नही जा सकता । इसके बाद जब सन् 1919 के
दिसम्बर महीने में सम्राट् के मुंह से राजबन्दियों को छोड़ने की घोषणा हुई तो
सैण्ड्स साहब ने कलकत्ता के प्रसिद्ध बैरिस्टर बी० सी० चटर्जी साहब से यह
कहा कि अब शचीन्द्र की माता से माफ़ी का आवेदनपत्र देने के लिए कह दीजिए,
मैं उमके लिए सिफारिश कर दूंगा । बी० सी० चटर्जी उस समय मैनपुरी केस
की अपील की पैरवी के लिए आये हुए थे। मेरे छूटने की कहानी दूसरे स्थान पर
बतलाई जा चुकी है ।

224 / बन्दी जीवन
मैनपुरी केस के कुछ फरार व्यक्तियों के छुटकारे के लिए भी सैण्ड्स साहब
ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। उन्होंने सबसे कहला दिया कि फरार व्यक्ति
आत्म-समर्पण कर दें हम उन्हें छुड़वाने का प्रबन्ध कर देंगे। इस प्रकार से मैनपुरी
के क़रीब-क़रीब सब कैदी कुछ शर्तों पर छोड़ दिए गए। लेकिन एक व्यक्ति पं०
देवनारायणजी सैण्ड्स साहब से तो मिले लेकिन उन्होंने कोई शर्त कबूल नहीं की।
तब सैण्ड्स साहब ने कहा कि मैं आपको गिरफ्तार नहीं करूँगा, क्योंकि आप
अपनी खुशी से मेरे पास आए हैं। हम लोगों ने आपको नहीं ढूँढ़ा था। आपकी
जहाँ खुशी हो, चले जा सकते हैं। मैं आपको चले जाने का काफ़ी मौक़ा दूंगा।
लेकिन मेरी सलाह है कि आप हमारी शर्तों को मान लें।
आखिर में यह तय हुआ था कि पं० देवनारायणजी अपने स्थान पर जाकर
रहेंगे; पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं करेगी; और इस बीच में सैण्ड्स साहब अपने
ऊपरवालों से यह तय करेंगे कि पं० देवनारायणजी को बिना शर्त छोड़ दिया जा
सकता है या नहीं; नहीं तो उन्हें भाग जाने का काफ़ी मौक़ा दिया जाएगा। ऐसी
सूरत में देवनारायणजी ने सैण्ड्स साहब से एक चिट्ठी ले ली थी जिसमें यह
हिदायत थी कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार न करे। इसके बाद न तो उन्हें किसी ने
गिरफ्तार ही किया और न उन्हें कोई हुक्म ही मिला। आधुनिक भारत के
इतिहास में इस प्रकार का शायद यही एक ऐसा दृष्टान्त है और सम्भवतः सैण्ड्स
साहब को छोड़कर आज तक ऐसा व्यवहार और किसी ने नही किया। लेकिन यह
भी बात सच है कि असहयोग आन्दोलन के सिलसिले में चौरी-चौरा में पुलिस
की तरफ से जो बीभत्स काण्ड हुआ था वह भी सैण्ड्स साहब के ही हुक्म से हुआ
था लेकिन चौरी-चौरा के मामले में प्रजा की तरफ से भी पुलिस के ऊपर जो
कुछ हुआ था उसी के कारण पुलिसवाले उत्तेजित हो गए थे और इस उत्तेजना
के आवेश में दोनों ही तरफ से ज्यादतियां हुईं।
खैर, कुछ भी हुआ हो, अण्डमन से लौटने के बाद एक दफा मुझे सैण्ड्स साहब
से मिलने जाना ही था। गोरखपुर में आने के बाद जाँच करने पर मालूम हुआ
कि सैण्ड्स साहब खुफिया विभाग से अलग होकर साधारण विभाग में डिप्टी
इंस्पेक्टर जनरल के पद पर हैं और इस समय फैज़ाबाद में हैं। फैज़ाबाद में मेरे
एक बड़े पुराने मित्र आचार्य नरेन्द्रदेव भी रहते थे। सैण्ड्स साहब से मिलने का
मैंने यही अच्छा अवसर समझा। सैण्ड्स साहब से मिलने के बहाने नरेन्द्रदेवजी
से भी मिल लूंगा।
मैं फैज़ाबाद चला गया और सैण्ड्स साहब से मिला। मुझे क़रीब दस मिनट
तक एक कमरे में ठहरना पड़ा। बगल के कमरे में सैण्ड्स साहब एक डकैती के
मामले की तहकीकात कर रहे थे। इतनी शान्तिपूर्वक बातचीत हो रही थी कि
किसी को यह पता भी नहीं चल सकता था कि कमरे में कोई है भी। जब सैण्ड्स
साहब हमसे मिले तो बड़ी भद्रतापूर्वक शिष्टाचार के साथ हाथ-मे-हाथ मिलाकर
मुझे अपने पास बैठाया और कहा कि रस्सी को एक तरफ आप लोग खींच रहे थे

[Header] मि० सैण्ड्स और बैरिस्टर चटर्जी / 225

और दूसरी तरफ हम लोग । अब रस्सी-खिंचाई खत्म हो गई। अब आगे चलकर
क्या करने का इरादा है ? मेरी सलाह है कि खेती का काम करो, जो कुछ करो
उसमें अगर मेरी मदद की ज़रूरत है तो मुझे बतलाना, मैं मदद करने के लिए
तैयार हूं।" मैने सैण्ड्स साहब से कहा था, "मैं पढ़ना चाहता हूं और आप इतना
कर दीजिए कि मुझे किसी कालेज में भर्ती होने में दिक्कत न पड़े।" मैंने देखा
सैण्ड्स साहब को यह बात ज्यादा पसन्द नहीं आई। लेकिन मेरे मुंह पर तो
उन्होंने यही कहा, "मेरी मदद से यदि तुम कॉलेज में भर्ती हो सको तो मैं मदद
करने के लिए तैयार हूं। लेकिन कॉलेज के अधिकारियों पर मेरा कोई अधिकार
नहीं है।" मैंने कहा, "पुलिस की तरफ से बाधा आने पर किसी कॉलेज में भर्ती
नहीं किया जा सकता।" सैण्ड्स साहब ने कहा, "इतना हम कर देंगे कि पुलिस
की तरफ से बाधा न आए।" मैं मन-ही-मन समझ गया कि मेरे लिए कॉलेज में
भर्ती होना आसान नहीं है। इसके बाद मैं नरेन्द्रदेवजी से मिलने चला गया।
जब मैं सन् 1910 और 1911 में क्वींस कालेज में पढ़ता था, तभी से नरेन्द्रदेवजी
से मेरी जान-पहचान है।
कई कारणों से मैं गोरखपुर छोड़ना चाहता था। मेरे तीसरे भाई जितेन्द्र ने
जब बी० ए० पास कर लिया तब सभी ने सलाह दी कि जितेन्द्र को अब एम० ए०
'पढ़ना चाहिए। जितेन्द्र एम० ए० पढ़ने के लिए कतई राजी नहीं हुआ। संयोग-
वश जितेन्द्र को इलाहाबाद मे एग्लो-बंगाली मिडिल स्कूल में हेडमास्टरी मिल
गई। जहाँ तक मुझे याद है, जितेन्द्र ने इस पद पर साल-भर तक काम किया।
इसके थोड़े ही दिन पहले मैं कॉलेज मे भर्ती होने के लिए इलाहाबाद आया था।
मैंने म्योर सेन्ट्रल कॉलेज मे नाम भी लिखा लिया था लेकिन दो ही दिन के बाद
प्रिंसिपल साहब ने मुझे दफ्तर मे बुलाया और कह दिया कि तुम इस कॉलेज मे
नहीं लिए जा सकते। मैंने संण्ड्स साहब की दुहाई दी लेकिन कुछ बस न चला।
मुझे कुछ खुशी भी हुई और कुछ दुःख भी हुआ । दुःख होना तो स्वाभाविक ही
था, लेकिन मन-ही-मन खुशी भी इसलिए हुई कि चलो इम्तहान देने से छुट्टी
मिली। कही फेल हो जाते तो दुर्दशा की सीमा न रहती। फिर कायस्थ पाठशाला
के प्रिंसिपल डा० ताराचन्द से जाकर मिले । मालूम हुआ कि प्रिंसिपल तारा-
चन्द लाला हरदयाल के साथी हैं एव उनकी उनसे रिश्तेदारी भी है।
मैं जिन विषयों को साथ-साथ लेना चाहता था वे मुझे कायस्थ पाठशाला मे
नहीं मिले। फिर भी मैं भर्ती हो गया। लेकिन दो-चार दिन के बाद छोड़ दिया।
कारण, मुझे अभिप्रेत विषयो का संयोग न मिलने से पढ़ने में उत्साह नहीं मिला।
संभव है, फेल होने का भय भी मन मे छिपा हो।
इसी समय से मैने सर्वान्तःकरण से क्रान्तिकारी दल के पुनः संगठन का काम
प्रारम्भ कर दिया। यह पहले ही बतला चुका हूँ कि अण्डमन से लौटते ही बनारस
में हमारे पुराने साथी श्री जितेन्द्रचन्द्र मुकर्जी हम से आकर मिले। मैं जानता था
कि जितेन्द्रचन्द्र मुकर्जी क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित नहीं होंगे। इन्ही के छोटे

226 / बन्दी जीवन
भाई श्री धीरेन्द्रचन्द्र मुकर्जी इलाहाबाद में पढ़ते थे। ये बी० एस-सी० प्रशंसा के
सहित पास करके अब एम० ए० में अर्थशास्त्र लेकर पढ़ने लग गए थे। उनमें
अब राजनीतिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रबल उत्साह पैदा हुआ था। जितेन्द्र
की तरह धीरेन्द्र भी इलाहाबाद में मुझसे मिलने आए। एक ग्राहक को पाकर
दूकानदार जैसे खुश होता है या जैसे किसी चिड़िया को देखकर बाज प्रलुब्ध
होता है, वैसे ही धीरेन्द्र को देखकर मैं मन-ही-मन में प्रसन्न हुआ और प्रलुब्ध
हुआ। मैंने देखा कि सशस्त्र विप्लव आन्दोलन के प्रति धीरेन्द्र को उतना उत्साह
नहीं है जितनी सहानुभूति उनकी अहिंसात्मक असहयोग के प्रति थी। फिर
भी मैंने आशा नहीं छोड़ी। भविष्य में इनके बारे में बहुत कुछ कहना है, इसलिए
यहाँ पर इसकी उपक्रमणिका-मात्र कर दी। जैसे किसी अच्छे ग्राहक को पाकर
भी जब दुकानदार बिक्री नहीं कर पाता है या बाज जैसे अपने शिकार को सामने
पाकर भी कभी-कभी चूक जाता है और विफल मनोरथ हो खिन्न होता है, उसी
प्रकार धीरेन्द्र को अपने दल में सम्मिलित न कर पाने के कारण मैं मन में बहुत
खिन्न हुआ। मैं गोरखपुर वापस लौट आया।
कालेपानी जाने के पहले मैं एक प्रकार से छात्र-जीवन ही व्यतीत कर रहा
था। कमाने की फिक्र नहीं थी। घर का खाता था। मनमाना काम किया करता
था। अब कालेपानी से लौटने के बाद मैंने अपने को उम्र में भी कुछ बड़ा पाया
और दायित्व-बोध भी मैं पहले से कहीं अधिक मात्रा में अनुभव करने लगा।
जीवन में अब ही सर्वप्रथम मैंने यह अनुभव किया कि अपने भोजनाच्छादन के
लिए अब मुझे अपने उपार्जन पर ही निर्भर करना पड़ेगा। मेरी अवस्था इस
समय क़रीब सत्ताईस वर्ष की थी। अर्थोपार्जन के लिए आज तक मैंने अपने को
तैयार नहीं किया था। अब मुझे एक तरफ तो अर्थोपार्जन रूपी संकट का सामना
करना पड़ रहा था, दूसरी तरफ मेरा यह प्रबल आग्रह था कि मैं अपने जीवन के
स्वप्न को वास्तविक जगत् में रूप-दान करूँ। अण्डमन से लौटने के बाद यह
समस्या जैसे गम्भीर रूप से दिखलाई पड़ी थी आज अठारह साल के बाद भी
वही समस्या और भी कठिन एवं गम्भीर रूप में जीवन-पथ में आकर खड़ी हुई
है।
इसी समय सैकड़ों की संख्या में बंगाल के नज़रबन्द कैदी छूटने लगे। इन
सबके सामने भी यही समस्या थी। कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसिद्ध बैरिस्टर श्रीयुत
बी० सी० चटर्जी ने इस समस्या को हल करने के लिए कुछ रुपये इकट्ठे किए
थे। एक बड़ा-सा मकान किराए पर लिया गया था। राजबन्दीगण मुक्त हो-होकर
इस मकान में आकर ठहरते थे। दोनों समय भोजन का अच्छा प्रबन्ध था। यहाँ
पर महीना-पन्द्रह दिन तक लोग ठहर सकते थे। बंगाल के विभिन्न जिलों से
राजबन्दी यहाँ आकर ठहरते थे। श्रीयुत बी० सी० चटर्जी साहब एवं यंगमेन्स
क्रिश्चियन एसोसिएशन की तरफ से यह व्यवस्था की गई थी। आगे चलकर
अर्थोपार्जन के लिए भी इनकी तरफ से सहायता मिलती थी। अखबार में ये सब

मि० सैम्बुड्स और बैरिस्टर चटर्जी / 227
बातें पढ़कर मैं भी बेनियापुकुर लेन में स्थित इस मकान में आकर उपस्थित हुआ ।
बंगाल के तमाम राजबन्दियों से यहाँ पर मिलने का अवसर मिला । यहाँ पर
बीसियों राजबन्दी ऐसे मिले जिनको देखकर मन में किसी प्रकार की भी आशा
का संचार नहीं हुआ । एक ही समय में इस मकान में कम-से-कम पचास राजबन्दी
ठहरते थे । सब जगह मैं घूम-घूमकर देखा करता था कि ये राजबन्दी किस तरह
जीवन व्यतीत कर रहे हैं, क्या सोचते हैं, क्या बातें करते हैं। इनमें से अधिकांश
को मैंने ऐसा पाया कि इनके बारे में मैं यही सोचता रहा कि आखिर यह क्यों
और कैसे राजबन्दी हुए थे। बहुतेरे पुराने साथियों से भी मैं मिला, भविष्य के
बारे में बहुत बातचीत भी हुई, लेकिन सबके सामने वही कठिन समस्या थी जो
कि मेरे सामने थी । फिर भी मैंने यह अनुभव किया कि जैसे प्रबल बाढ़ के कारण
स्रोतस्विनी नदी का पानी प्रचण्ड वेग से बहकर ग्राम और जनपद में बाधा पाकर
ठहर जाता है, उसी प्रकार से विप्लववाद का प्रबल प्रवाह अभी थोड़ी देर के लिए
बाधा पाकर ठहर गया है । समय और अवसर मिलने पर जिस प्रकार बाँध के
टूटने पर बाढ़ आ जाती है उसी प्रकार बंगाल में फिर क्रान्ति की लहर चारों
दिशा में उमड़ पड़ेगी । जिस प्रकार बाढ़ के कारण गृहस्थ विस्थापित हो जाता है
और कहीं ठहरने का आश्रय ढूँढ़ा करता है उसी प्रकार से मुक्ति पाकर विप्लव-
वादी राजबन्दीगण जन-कोलाहलपूर्ण संसार में आकर अपने को नितान्त आश्रय-
हीन अनुभव कर रहे थे । कहीं पर टिकने का, ठहरने का स्थान ढूँढ़ रहे थे ।
पिछले युग में जो लोग विप्लववादी आन्दोलन के कर्णधार थे, जैसे वारीन्द्र
और उपेन्द्रनाथ उनके समान बुद्धि-शक्ति सम्पन्न, विचारशील, प्रतिभावान,
मस्तिष्क परिचालन में तत्पर, शक्तिशाली लेखक एवं कार्यकुशल नेता मैंने अपने
युग में और किसी को नहीं देखा । अण्डमन में बैठे हुए एक दिन वारीन्द्र ने परि-
पूर्ण अवज्ञा के शब्दों में तिरस्कारपूर्वक आँख-मुँह बनाकर यह कहा था : “जो
रास्ता मैंने एक मर्तबा दिखलाया, बंगाल आज भी इतने दिनों तक उसी एक रास्ते
का अनुसरण करता आया । आज भी बंगाल के विप्लववादी कोई नया रास्ता
नहीं निकाल पाए ।” बात कुछ ज्यादा झूठ न थी ।
अभी मेरे पुराने साथियों में से सब नहीं छूटे थे । जो लोग छूट गए थे उनसे
मैं मिला । लेकिन मुझे सन्तोष नहीं हुआ । पहली बात तो यह थी कि जिनसे मैं
मिला, वे पुराने कार्यकर्त्ता तो अवश्य थे, लेकिन मेरे साथ उनके ताल्लुकात गहरे
न थे ।
जब मैं अण्डमन से छूटकर आया था तो श्रीयुत बी० सी० चटर्जी साहब ने
मुझसे एक बात कही थी जिसका उल्लेख यहाँ कर देना आवश्यक है । मैंने
अण्डमन से एक चिट्ठी में ऐसा लिखा था कि यदि ब्रिटिश सरकार भारतवासियों
को यथार्थ में यह मौका देती है कि हम अपने देश की भलाई के लिए जो ठीक
समझें उसे कर सकें तो गुप्त षड्यन्त्र के द्वारा खून-खराबी के रास्ते से आग को
लेकर हम खिलवाड़ क्यों करें। चटर्जी साहब ने मुझसे यह कहा था कि “ब्रिटिश

: 228 / बन्दी जीवन

सरकार सचमुच ऐसा अवसर हमें देगी इसलिए अब तुम्हारा कर्त्तव्य है कि सच्चे
दिल से माण्टेगू के सुधार को लेकर काम करो और गुप्त षड्यन्त्र के रास्ते को
त्याग दो। इसी आशा से और इसी विश्वास से सरकार ने तुम्हें छोड़ दिया है।"
मैंने जवाब में यह कहा था कि "विनायक दामोदर सावरकर ने भी तो अपनी
चिट्ठी में ऐसी ही भावना प्रकट की थी जैसीकि मैंने की है तो फिर सावरकर
को क्यों नहीं छोड़ा गया और मुझी को क्यों छोड़ा गया ? यदि आपकी बात सत्य
होती तो सावरकर को भी छोड़ना चाहिए था। मैं तो यह समझता हूँ कि मेरे
छूटने और सावरकरजी के न छूटने में दो बातें हैं। एक तो यह कि बंगाल के
जनमत ने मेरे जैसे राजनीतिक बन्दियों को छुड़ाने के लिए प्रबल आग्रह किया था।
राजबन्दियों की रिहाई के मूल में यही बात बहुत बड़ी थी। लेकिन महाराष्ट्र में
उतना तीव्र आन्दोलन नहीं हुआ जैसाकि बंगाल में हुआ। दूसरी बात सावरकरजी
के न छूटने में यह थी कि सावरकरजी और उनके दो-चार साथियों की गिरफ्तारी
के बाद महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन समाप्त-सा हो गया था। इसलिए
सरकार को यह डर था कि यदि सावरकर इत्यादि को छोड़ दिया जाय तो ऐसा
नहो कि फिर महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन प्रारम्भ हो जाए। इसके अतिरिक्त
एक बात यह भी थी कि सावरकरजी के द्वारा इग्लैंड के एक अंग्रेज़ की हत्या हुई
थी। इस पर ब्रिटिश सरकार को विशेष क्रोध था। राजबन्दियों की मुक्ति के
समय सरकार ने यह नीति बना ली थी कि जिन पर किसी की हत्या करना या
डकैती करने का अपराध लगाया गया था उन्हें न छोड़ा जाय। इस नीति के
अनुसार भी सावरकर नही छोड़े जा सकते थे। कारण उन पर हत्या करने का
अपराध लगाया गया था।" चटर्जी साहब ने इस पर यह कहा था कि "बात
असल में यह है कि मरहठों के ऊपर अंग्रेजों का बिल्कुल विश्वास नही है। बंगालियों
के ऊपर अंग्रेज़ी सरकार यह भरोसा कर रही है कि बंगाली जैसा कहेंगे, वैसा
करेंगे लेकिन मरहठे ऐसा कभी नहीं कर सकते।" इस बात को सुनकर मैंने मन-
ही-मन कुछ लज्जा अनुभव की और हँसा भी। लज्जा इसलिए अनुभव की कि
राजनीतिक दृष्टि से चटर्जी साहब महाराष्ट्र को उच्च स्थान दे रहे थे और
बंगालियों को भ्रम से ऐसा स्थान दे रहे थे कि राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शितापूर्ण
नहीं कह सकते। हँसा इसलिए कि चटर्जी साहब भी समझ रहे हैं कि अंग्रेज़
सरकार हमें अपने आदर्श को प्राप्त करने के लिए पूर्ण अवकाश देगी। मैं जानता
था कि ब्रिटिश सरकार कभी भी यह मौका नहीं देगी, इसलिए हमें अवश्य क्रांति
का मार्ग ग्रहण करना ही पड़ेगा और खुले तौर पर मैंने चटर्जी साहब से यह कहा
भी था कि यदि ब्रिटिश सरकार हमें पूरा मौका देती है, अपने देश को उस सीमा
तक पहुँचाने के लिए जिस सीमा तक अंग्रेजों ने अपने देश में अपने राष्ट्र को
पहुँचाया है तभी एकमात्र उसी अवस्था में ही यह बात भी सही होगी कि सशस्त्र
क्रांति के मार्ग को छोड़कर भी हम आगे बढ़ सकते हैं।
अबकी बार फिर जब कि मैं बेनियापुकुर के मकान में ठहरा हुआ था तो चटर्जी

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चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग
जेल में बैठे हुए भी हम यह देख रहे थे कि माण्टेगू-चेम्सफोर्ड सुधार के बारे
में हमारे नेताओं में तीन प्रकार की मनोवृत्ति दिखाई दे रही थी। एक तो
मदनमोहन जी मालवीय इत्यादि नरम मनोवृत्तिवा' नेतागण यह चाहते थे कि
बिना किसी प्रकार की कोई उलझन पैदा किये पूर्ण शक्ति से इस सुधार को काम
में लाया जाय। दूसरी मनोवृत्ति के कुछ नेता यह चाहते थे कि इस सुधार को
एकदम ठुकरा दिया जाय। तीसरी मनोवृत्तिवाले कुछ ऐसे नेता भी थे जो कि
इस नए सुधार से फायदा तो उठाना चाहते थे लेकिन वे यह भी चाहते थे कि पूर्ण
स्वतन्त्रता के आदर्श को प्राप्त करने के लिए भी राजनीतिक आन्दोलन को ऐसे
मार्ग पर चलाया जाय जिससे देशवासी इस नये सुधार से सन्तुष्ट न होकर आगे
बढ़ने के लिए तैयार हों।
जेल में बैठे-बैठे विभिन्न प्रदेश के राजबन्दियों में यह हाड़ लगी रहती थी
कि कौन-सा प्रान्त सबसे उग्र मनोवृत्ति का परिचय देता है, अर्थात् माण्टेगू-चेम्स-
फोर्ड के सुधार को कौन-सा प्रान्त सबसे उग्र रूप में ठुकराता है। इस बात को
देखने के लिए अण्डमन के राजबन्दियों में विशेष उत्सुकता रहती थी। कभी-कभी
क्रान्तिकारी होने पर भी हम यह भूल जाते थे कि इन नये सुधारों को ठुकरा देना
एक बात है और उनका सदुपयोग करना और बात है।
अण्डमन से लौटकर हमारे सामने वही प्रश्न फिर आ खड़ा हुआ। बी० सी०
चटर्जी साहब उन व्यक्तियों में से थे जो क्रान्तिकारी आन्दोलन की आवश्यकता
समझते थे, लेकिन इन नए सुधारों को ठुकरा देना नही चाहते थे। महात्मा गांधी
एक समय बिलकुल मॉडरेट थे, लेकिन समय के फेर से वे क्रमशः मॉडरेट नीति
को त्याग रहे थे। सम्भव है आज भी महात्मा गांधी मॉडरेट मनोवृत्ति को सम्पूर्ण-
तया त्याग नहीं पाए हों। सी० आर० दास क्रान्तिकारी न होने पर भी क्रान्ति-
कारियों के प्रति गहरी सहानुभूति रखते थे। उन्हें यह सहानुभूति जितनी उनके
त्याग को देखकर होती थी उतनी ही राजनीतिक दृष्टि से भी होती थी, क्योंकि
वे यह समझते थे कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के कारण भारत के दूसरे सब आन्दो-
लनों को बल पहुँचता है। तिलक और सी० आर० दास क़रीब-क़रीब एक ही
मनोवृत्ति के थे। सी० आर० दास को अभी राजनीति में आए हुए थोड़े ही