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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 408 में से

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पृष्ठ 224

222 / बन्दी जीवन
सका। आखिरकार बंगाल के गवर्नर भारत के लाट साहब एवं इंग्लैण्ड के मंत्रियों
को मजबूर होकर यह कहना पड़ा था कि जब तक उन्हें बंगाल की जनता की
सहायता नहीं मिलती है तब तक वे क्रान्तिकारी आन्दोलन को दबा नहीं सकते।
बनारस में मालवीयजी से मिलने के बाद मैं और जितेन्द्र मुकर्जी सीधे कल-
क्टर के यहाँ चले गए। ऊपर लिख चुका हूँ कि छूटने के समय मुझे जो सर्टि-
फिकेट मिला था उसमें एक हिदायत यह थी कि अपने स्थान पर पहुँचने पर जिला
कलक्टर को मैं इत्तला दे दूँ कि मैं कालेपानी से वापस आ गया हूँ। इसी हिदायत
के मुताबिक मैंने जिला-कलक्टर को अपने आने की इत्तला कर दी। कलक्टर ने
कहा कि पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट को इत्तला दे दो। यह बात बहुत बुरी मालुम हुई,
लेकिन आखिर पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट के दफ्तर पर चले गए। लेकिन वहाँ पर
असिस्टेण्ट पुलिस सुपरिटेण्डेण्ट ही मिले। उनको भी मैंने अपने आने की इत्तला
कर दी। उन्होंने कहा कि सुपरिटेण्डेण्ट अभी नहीं हैं। मैंने कहा कि वह हों, या
न हों मैंने अपना फ़र्ज अदा कर दिया और अब मैं जा रहा हूँ। उन्होंने मेरा
नाम और पता नोट कर लिया। नतीजा यह हुआ कि मेरे ऊपर पहरा लग
गया। जहाँ तक मुझे याद है, अण्डमन से लौटकर बनारस में सिर्फ़ एक दिन
रहा। दूसरे दिन अपने कनिष्ठ भाई भूपेन्द्र को लेकर गोरखपुर चला आया।
गोरखपुर में दो-चार महीने पड़ा रहा। यह दो-चार महीने मैंने निश्चिन्त होकर
कुछ आराम से बिताए। लेकिन प्रतिदिन मेरे मन में यह खटकता रहा कि आखिर
मैं उचित रूप से जीवन व्यतीत कर रहा हूँ या नहीं। मैं प्रतिदिन यह अवसर
ढूंढ रहा था कि फिर कैसे नये सिरे से कार्य आरम्भ करूँ। मैं एक दफा कलकत्ता
जाना चाहता था, लेकिन पास में पैसा न था। गोरखपुर से एक साप्ताहिक पत्र
'स्वदेश' नाम से निकलता था। उसके सम्पादक श्री दशरथजी द्विवेदी से मैंने
परिचय प्राप्त कर लिया। बहुत इशारे से मैंने एक दिन उनसे अपनी मनोभिलाषा
व्यक्त की। कलकत्ता जाने की इच्छा प्रकट करते हुए मैंने उनसे सहायता माँगी।
मुझे आशा तो मिली, लेकिन सहायता नही मिली। इसी बीच मे मैं एक दिन
इलाहाबाद पंडित जवाहरलालजी से मिलने के लिए गया एवं अण्डमन की दशा
लिखकर रजिस्ट्री द्वारा पं० मदनमोहन मालवीयजी के पास भेजी। इन सबका
जो कुछ परिणाम हुआ उसे मैं पहले बता चुका हूँ। किसी कार्यवश एक दिन
बनारस गया। वहाँ पर अपने पुराने साथी श्री प्रियनाथ भट्टाचार्य एवं श्री सुरेश-
चन्द्र भट्टाचार्य से मिला। इन लोगों से मैंने संगठन-कार्य का प्रस्ताव किया। इसके
थोड़े ही दिनों के अनन्तर सी० आई० डी० के डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल मिस्टर
बिगैन के पास से मेरे भाई के पास इत्तला आई कि मैं फिर संगठन की बातचीत
चला रहा हूँ। मुझे आश्चर्य हुआ। बाद को पता चला कि प्रियनाथ भट्टाचार्य
ने छूटने के पहले ही एक लम्बा इकरारनामा पुलिस को दे दिया था। इसके बाद
से मैं फिर कभी प्रियनाथ से नही मिला।