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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 408 में से

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पृष्ठ 213

मातृभूमि की गोद में / 211

कम-से-कम दो-तीन घंटे की देरी है। यह जानकर कि यदि मैं फिलहाल मिटिया-
बुर्ज थाने से चला जाऊँ और सीधा लालदिग्गी थाने में जाकर वहाँ फिर मुक्त
क़ैदियों के दल में सम्मिलित हो जाऊँ तो पुलिस को आपत्ति न होगी, मैंने सीधा
ट्राम का रास्ता लिया। ट्राम में चढ़कर कालीघाट आ पहुँचा। कालीघाट में मेरे
चचेरे भाई रहते थे। लेकिन मैंने सबसे पहले बी० सी० चटर्जी बैरिस्टर के यहाँ
जाने का निश्चय किया।
बंगाल एवं यू० पी० में चटर्जी साहब ने बहुत-से राजनीतिक षड्यन्त्रों के
मामले में पैरवी की थी। आप प्रसिद्ध नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के दामाद थे।
क्रांतिकारियों के साथ आप विशेष सहानुभूति रखते थे। बनारस षड्यन्त्र केस में
भी आपने पैरवी की थी। इस सिलसिले में चटर्जी साहब को घनिष्ठ रूप में
जानने का मौका मिला था। राजनैतिक क्षेत्र में आप अरविन्द की नीति के पक्ष-
पाती थे। बंग-विच्छेद के बाद बंगाल में जो अग्निमय युग आया था उस ज़माने
में अरविन्द एवं विपिनचन्द्र पाल के संचालन में 'वन्देमातरम्' नाम का एक
प्रसिद्ध दैनिक पत्र निकला करता था। हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में
इस पत्र का विशेष स्थान है। इस पत्र में अरविन्द के सहयोगी के रूप में श्री बी०
सी० चटर्जी भी लिखा करते थे। कलकत्ता हाईकोर्ट में जितने वकील-बैरिस्टर थे
उनमें सी० आर० दास, बी० सी० चटर्जी एवं एस० एन० हलदार प्रमुख थे।
बी० सी० चटर्जी साहब ने हम लोगों से अनुरोध किया था कि हम लोग डकैती
करना छोड़ दें। हम लोगों के लिए जितने रुपयों की आवश्यकता होगी, सब वे
संग्रह करके देंगे। लेकिन थोड़े ही दिनों बाद आपने हमसे कह दिया था कि
'भाई, तुम लोग जो चाहो सो करो, रुपया कोई देता नहीं है। हमने आशा की
थी कि हम काफ़ी रुपयों की मदद तुम्हें दे सकेंगे, लेकिन हम निराश हो गए हैं।
अब तुम्हें अधिकार है जो ठीक समझो, सो करो।' क्रांतिकारियों के साथ ये इतनी
गहरी सहानुभूति रखते थे, अतः मुक्ति पाने पर कलकत्ते में क़दम रखते ही आज
सीधा मैं उन्हीं बी० सी० चटर्जी के मकान की तरफ रवाना हो गया। मुझे उनके
स्थान का ठीक पता नहीं था। कालीघाट में ट्राम से उतरकर मैंने एक युवक से
बी० सी० चटर्जी का पता पूछा। सौभाग्य से इस युवक ने मेरे साथ बहुत सहानु-
भूति दिखाई। लेकिन जितनी आशा थी उतनी सहानुभूति नहीं मिली। पहले
तो इस युवक ने मुझे यों ही समझा के टालना चाहा कि अमुक रास्ते पर जाने
पर गन्तव्य स्थान को पहुँच जाऊँगा। लेकिन जब मैंने बतलाया कि मैं अभी सीधा
कालेपानी से आ रहा हूँ, यदि आप कृपापूर्वक मेरे साथ हो लें और बी० सी०
चटर्जी साहब का मकान दिखला दें तो मैं बहुत अनुगृहीत हूँगा। इस पर पहले तो
वह युवक हिचकिचाया, लेकिन मेरे अनुरोध करने पर वह मेरे साथ हो लिया।
कालीघाट से बालीगंज तक एवं पुनः बालीघाट से कालीघाट तक इस बेचारे ने
मेरा साथ नहीं छोड़ा। कालीघाट से बालीगंज काफ़ी दूर था।
प्रथम साक्षात में चटर्जी साहब ने मुझे नहीं पहचाना, लेकिन एक-दो क्षणों के