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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 408 में से

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पृष्ठ 216

214 / बन्दी जीवन
अवहेलना से बाद में पछताना पड़ेगा।
खाने-पीने के बाद कुछ आराम करके लालदिग्घी पहुँच गए। इतने में एक
मोटरकार थाने के प्रांगण में आई। इसमें कलकत्ता के सुपरिचित बैरिस्टर आई०
वी० सेन एवं बी० के० लाहिड़ी थे। ये आए थे बारीन्द्र वगैरह की खोज में।
संवाद-पत्र में पढ़ा होगा कि बारीन्द्र वगैरह छूट गए हैं। मैंने इनको बतलाया कि
वे तो कल रात ही अपने-अपने ठिकाने पहुँच गए होंगे। मुझे इस वक़्त याद नहीं
है कि आई० वी० सेन आए थे कि जे० एम० सेन गुप्ता । बी० के० लाहिड़ी ने
मेरे परिवार के साथ अपना कुछ रिश्ता बतलाया। बारीन्द्र को न पाकर इन्होंने
मुझसे ही अनुरोध किया कि कलकत्ता में एक खिलाफ़त कान्फ्रेंस हो रही है और
मुझे वहाँ चलना होगा। मैं जी में जरा-सा घबराया, सोचा कि आज ही तो कल-
कत्ता में पहले दिन क़दम रखा है ! अभी भी पुलिस के पंजे से छुटकारा नही
पाया है और लालदिग्घी थाने के प्रांगण के अन्दर ही राजनीतिक कान्फ्रेंस मे जाने
का यह साग्रह अनुरोध ! यह सच है कि बिना किसी प्रकार की शर्तें लगाये हुए ही
मुझे छोड़ दिया गया था। मुक्ति पाने का जो सर्टिफिकेट मुझे मिला था उसमें
एक स्थान पर ऐसा लिखा था कि अपने स्थान पर पहुँचते ही ज़िला-कलेक्टर को
हम इत्तिला दे दें कि कालेपानी से लौट आए हैं। अतः मैंने बैरिस्टर साहबों से
कहा कि अभी हम थाने मे ही हैं, ऐसी हालत मे कान्फ्रेंस में जाने से कोई हर्ज तो
नही है ? कान्फ्रेंस में मेरे लिए जाना क्या कोई विशेष आवश्यक बात है ? परन्तु
गुप्ता साहब तथा लाहिड़ी साहब ने इस पर भी विशेष आग्रह किया कि मैं कान्फ्रेंस
में अवश्य चलूँ, तो मैं तैयार हो गया। मुझे उन्होंने मोटर में बैठा लिया और
कान्फ्रेंस के पंडाल मे हाज़िर कर दिया। कान्फ्रेंस के बाद मै मौलाना शौकतअली
से मिलने गया। गिरफ़्तार होने के पहले मेरे आदमी मौलाना शौकतअली एवं
मौलाना मोहम्मदअली के पास क्रान्तिकारी उद्योग के सम्बन्ध मे पहुँचे थे।
इसलिए मौलाना मोहम्मदअली तथा मौलाना शौकतअली साहब मुझे जानते थे।
शौकतअली साहब ने मुझसे अनुरोध किया कि अब मैं खुले मैदान कूद पड़ूँ।
चोरी छिपकर काम का अब प्रयोजन नही है। मैंने शान्तिपूर्वक सब सुन लिया।
वहाँ से विदा होकर पंजाब-कैम्प में आए। विशेष अनुरोध पर मुझे यहाँ कुछ
खाना पड़ा। अच्छी-अच्छी चीजें देखकर लोभ तो बहुत हो रहा था, लेकिन जी
मे डर रहा था कि ऐसा खाना खा लूं तो सम्भव है, हज़म न कर पाऊँ। अभी तक
एक प्रकार का भोजन खाते आए थे जिसमें तेल तो नाम के लिए होता भी था
परन्तु घी की तो सुगन्ध भी न होती थी। इस चहल-पहल से लौटकर फिर वही
निरानन्दमय अशुभ थाने के प्रांगण मे लौट आया। अब भी नाम वगैरह लिखे
जाने एवं राह के खर्च मिलने में काफ़ी देर थी। ये घड़ियां मुझे बहुत ही नागवार
गुज़री। पुलिस की परछाईं से भी मुझे घिन थी। पुलिस के द्वारा जीवन में बहुत-
कुछ दुख पाया था सम्भवतः इसीलिए पुलिसवालों की हवा से भी चिढ़ पैदा हो
गई थी। कालेपानी के पाँच साल काटने में जितनी भी पीड़ा मालूम हुई हो उसके