बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबन्दी साथियों की चिन्ता / 221
इसी मौके पर मैंने व्याख्यान दिया था। इस कांग्रेस में बीस हज़ार के क़रीब डेली-
गेट्स थे। मैं ही ऐसा सर्वप्रथम बगाली था जिसने कांग्रेस में हिन्दी में वक्तृता दी
हो। आजकल के हिन्दू महासभा के सभापति बैरिस्टर श्रीयुत् विनायक दामोदर
सावरकरजी के छोटे भाई श्रीनारायण दामोदर सावरकर के पास मैं मंच पर
बैठा हुआ था। व्याख्यान देने के बाद जब मैं डा० सावरकर के पास लौट आया
तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारे व्याख्यान से लोग रो पड़े हैं। प्रस्ताव का पूरा
मसविदा मुझे इस वक्त याद नहीं है। संभव है ऐसा रहा हो—This congress
sends its message of hope and sympathy to all political prisi-
oners incorcerated in the different Jails of India and in the
distant Andamans islands अर्थात् "भारतवर्ष की विभिन्न जेलों में एवं
अण्डमान के सुदूर टापू में जो भारतीय राजबन्दी पडे सड रहे हैं उनके लिए यह
कांग्रेस की महासभा सहानुभूतिपूर्ण ओर आशा का सन्देश भेजती है।" इसके बाद
प्रस्ताव में कुछ और भी शब्द थे जो कि मुझे याद नहीं हैं। मेरी और श्री विपिन-
चन्द्रपालजी की सलाह में यह प्रस्ताव बना था एवं स्व० देशबन्धु चितरंजनदासजी
की सहायता से यह प्रस्ताव कांग्रेस से पास हुआ। विजयराघवाचार्यजी ने जो
कांग्रेस के सभापति थे मुझे पाँच मिनट-मात्र का समय दिया था। अण्डमन से देश
लौट आते ही बम्बई में डाक्टर सावरकरजी को मैंने पत्र भेज दिया था और
लिखा था कि राजबन्दियों की मुक्ति के लिए कुछ करना चाहिए। इसके बाद
डाक्टर सावरकर और मैं दोनों सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के पास गए। सुरेन्द्रनाथजी ने
पहले तो यह कहा कि हमें तो तुम लोग गाली दिया करते हो। इसके जवाब में
हमने उनको यक़ीन दिलाया कि राजनैतिक बन्दियों के लिए उन्होंने जितना काम
किया है उतना और किसी ने नहीं किया है। बात सच भी थी। हृदय से जो
बात कही जाती है उसका असर भी होता है। सुरेन्द्रनाथजी ने सब नोट इत्यादि
कर लिया। यहाँ पर एक बात कह देना आवश्यक है कि हम दोनों सुरेन्द्रनाथजी
के पास विनायक दामोदर सावरकरजी के विषय में ही कहने गए थे।
राजबन्दियों की रिहाई के लिए मैंने जो कुछ किया वह कुछ भी नहीं था।
ब्रिटिश गवर्नमेण्ट ने ही जिसे चाहा, उसे छोड़ा। महात्मा गांधी के सत्याग्रह
आन्दोलन के कारण भारत के राजबन्दियों का प्रश्न दब-सा गया। भारत के राज-
नीतिक वातावरण में स्वाधीनता के प्रश्न ने अभी भारतीयों के हृदय को जरा भी
बेचैन नहीं किया था। यही कारण था कि जिन लोगों ने भारतवर्ष को स्वाधीन
करने के लिए अपने जीवन को निछावर कर दिया था उसके लिए भारतवासी एक
प्रकार से उदासीन थे। आज भी भारत की दशा कुछ अधिक आशाप्रद नहीं है।
आज भी भारत के गष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के मन में स्वाधीनता की चाह नहीं पैदा
हुई है। अरविन्द और तिलक के समय में स्वाधीनता का ही प्रश्न अन्तिम रूप से
राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के सामने जीवन का ध्येय बन गया था। यही कारण है कि
बगाल का क्रान्तिकारी आन्दोलन तीस साल तक दमन-चक्र चलनेपर भी दब नहीं