बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमातृभूमि की गोद में / 215
मुकाबले में लालदिग्घी के पाँच घंटे बहुत भारी प्रतीत हुए। आखिर इसका भी
अन्त हुआ। पुलिस वाले हमें फिर हावड़ा स्टेशन ले गए। खैरियत यह थी कि
अब की जोड़ा-जोड़ा नहीं जाना पड़ा। चालीस-पचास मुक्त बन्दियों के लिए
कागजात के आधार पर पुलिसवालों ने टिकट कटवाया। स्टेशन पर टिकट देने
वाली ऐंग्लो-इण्डियन मेमसाहिबा टिकट देते-देते चिढ़ गईं और अपशब्द कहने
लगीं। मैं सामने ही खड़ा था। सम्भव है, मुस्कराता रहा होऊँ। दिल में तो मैं
हँसता ही था और सोच रहा था चलो मेरी भी गिनती बदमाशों में हो गई। मैं
डर रहा था कि कहीं पुलिस घर तक मेरे साथ न चले। लेकिन जब टिकट मेरे
हाथ में देकर पुलिसवाले चले गए तो मानो मनों बोझ सिर से उतर गया। रेल के
छोटे-से डिब्बे में तो अवश्य रहे, लेकिन मैंने यही सर्वप्रथम यथार्थ स्वच्छन्दता
अनुभव की। मानो मैं जहाँ-तहाँ विचरने लग गया हूँ। रेल की रफ़्तार मुझे धीमी
मालूम पड़ी। तूफ़ान में सवार होकर यदि मैं घर पहुँच सकता तो मानो जी को
कुछ तसल्ली होती। रात कैसे बीती, मुझे याद नहीं। जाड़े के दिन थे। मेरे
पास न कोई बिस्तरा था न पहनने के गर्म कपड़े। वारीन्द्र का दिया हुआ एक कोट
और एक धोती और कुछ पैसे मेरे पास थे। जेल के दिये हुए कुछ कपड़े भी
साथ थे।
मुझे खूब याद है, भोर होते ही मैं बनारस पहुँचा। असल में छूटने का जो
आनन्द है वह मुझे बनारस पहुँचने पर ही मिला। मेरे लिए बनारस से प्रिय भूमि
संसार में और कोई नहीं है। मेरी यह जन्मभूमि है; शिशु-अवस्था मैंने यहाँ पर
कैसे बिताई, मुझे वह याद नहीं और बाल्यावस्था मैंने यहाँ बिताई नहीं, लेकिन
जीवन का जो श्रेष्ठ अंश है, जो मधुरतम भाग है, अपनी वही किशोरावस्था मैंने
बनारस ही में बितायी है। इसलिए मेरे जीवन की मधुरतम स्मृति बनारस के वायु-
मण्डल में, बनारस की भूमि के प्रति रज-कण में अनन्तकाल के लिए विजड़ित
है। स्टेशन से जब घर की तरफ चला तो प्रति क्षण आनन्द की मात्रा बढ़ती
गई। लेकिन जिस क्षण मैंने इक्के से उतरकर गली के भीतर क़दम रखा तो मुझे
ऐसा मालूम पड़ा कि क़दम के नीचे की भूमि भी मानो कठिन एवं स्थिर नहीं है
मानो वह भूमि भी आनन्द के स्पर्श से चंचल हो रही थी, हिल-डुल रही थी। मैं
चलकर घर नहीं आया बल्कि दौड़ता हुआ घर पहुँचा। क्या हृदयावेग की
आकर्षण शक्ति धरित्री की मध्याकर्षण शक्ति ही की तरह है कि अण्डमन से जब
चले तब से लेकर घर पहुँचने तक यह आकर्षण का वेग बढ़ता ही गया और घर के
पास आकर आखिर मुझे दौड़ना ही पड़ा। मकान के नीचे के कमरे का जंगला
खुला हुआ था। मैं मुहूर्त्त-भर जंगले के सामने आकर खड़ा हो गया। कई एक
युवक वहाँ लेटे हुए थे। इनमें मेरे दो भाई रवीन्द्र और जितेन्द्र भी थे। रवीन्द्र
मुझे देखते ही हर्षोत्फुल्ल स्वर से नाति-उच्च कण्ठ से चिल्ला उठे, “अरे, दादा
हैं।” रवीन्द्र बिस्तरे से ऐसे उचक पड़े मानो नीचे से किसी ने जोर का धक्का
देकर उन्हें ऊपर फेंक दिया हो। घूमकर दरवाजे होते हुए अन्दर आए एवं हरएक