बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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चेम्सफोर्ड सुधार और असहयोग
जेल में बैठे हुए भी हम यह देख रहे थे कि माण्टेगू-चेम्सफोर्ड सुधार के बारे
में हमारे नेताओं में तीन प्रकार की मनोवृत्ति दिखाई दे रही थी। एक तो
मदनमोहन जी मालवीय इत्यादि नरम मनोवृत्तिवा' नेतागण यह चाहते थे कि
बिना किसी प्रकार की कोई उलझन पैदा किये पूर्ण शक्ति से इस सुधार को काम
में लाया जाय। दूसरी मनोवृत्ति के कुछ नेता यह चाहते थे कि इस सुधार को
एकदम ठुकरा दिया जाय। तीसरी मनोवृत्तिवाले कुछ ऐसे नेता भी थे जो कि
इस नए सुधार से फायदा तो उठाना चाहते थे लेकिन वे यह भी चाहते थे कि पूर्ण
स्वतन्त्रता के आदर्श को प्राप्त करने के लिए भी राजनीतिक आन्दोलन को ऐसे
मार्ग पर चलाया जाय जिससे देशवासी इस नये सुधार से सन्तुष्ट न होकर आगे
बढ़ने के लिए तैयार हों।
जेल में बैठे-बैठे विभिन्न प्रदेश के राजबन्दियों में यह हाड़ लगी रहती थी
कि कौन-सा प्रान्त सबसे उग्र मनोवृत्ति का परिचय देता है, अर्थात् माण्टेगू-चेम्स-
फोर्ड के सुधार को कौन-सा प्रान्त सबसे उग्र रूप में ठुकराता है। इस बात को
देखने के लिए अण्डमन के राजबन्दियों में विशेष उत्सुकता रहती थी। कभी-कभी
क्रान्तिकारी होने पर भी हम यह भूल जाते थे कि इन नये सुधारों को ठुकरा देना
एक बात है और उनका सदुपयोग करना और बात है।
अण्डमन से लौटकर हमारे सामने वही प्रश्न फिर आ खड़ा हुआ। बी० सी०
चटर्जी साहब उन व्यक्तियों में से थे जो क्रान्तिकारी आन्दोलन की आवश्यकता
समझते थे, लेकिन इन नए सुधारों को ठुकरा देना नही चाहते थे। महात्मा गांधी
एक समय बिलकुल मॉडरेट थे, लेकिन समय के फेर से वे क्रमशः मॉडरेट नीति
को त्याग रहे थे। सम्भव है आज भी महात्मा गांधी मॉडरेट मनोवृत्ति को सम्पूर्ण-
तया त्याग नहीं पाए हों। सी० आर० दास क्रान्तिकारी न होने पर भी क्रान्ति-
कारियों के प्रति गहरी सहानुभूति रखते थे। उन्हें यह सहानुभूति जितनी उनके
त्याग को देखकर होती थी उतनी ही राजनीतिक दृष्टि से भी होती थी, क्योंकि
वे यह समझते थे कि क्रान्तिकारी आन्दोलन के कारण भारत के दूसरे सब आन्दो-
लनों को बल पहुँचता है। तिलक और सी० आर० दास क़रीब-क़रीब एक ही
मनोवृत्ति के थे। सी० आर० दास को अभी राजनीति में आए हुए थोड़े ही