बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमातृभूमि की गोद में / 213
विदाई ली। पुनः अपने उस अपरिचित युवक के साथ कालीघाट में वापस लौट
आए। रास्ते में मैंने इस युवक के साथ राजनैतिक मामलों पर बातचीत की।
कलकत्ता में क़दम रखने के बाद रंगरूट भरती करने की मेरी यह सर्वप्रथम चेष्टा
थी। कालीघाट में मेरे चचेरे भाई रहते थे। मुझे पता था कि वह कहाँ रहते थे।
चटर्जी साहब के यहाँ से लौटने के बाद मैं सीधा भाई के पास नहीं आया। मैं तो
सबसे पहले इस युवक का ही घर देखने चला गया, तब कहीं बाद को भाई के पास
आया। लेकिन दुःख के साथ बताना पड़ता है कि रंगरूट्टी का मेरा यह प्रथम प्रयत्न
विफल रहा। यह युवक मेरे काम में शामिल नहीं हुआ। इस वक़्त तो मैंने सिर्फ़ इस
युवक का केवल घर ही देख लिया एवं थोड़ी-बहुत राजनीतिक आलोचनाएँ कीं।
बाद को मैं जब कलकत्ता आया तो मैंने फिर इनका पीछा किया एवं कुछ दिनों
तक यह प्रयत्न करता रहा कि यह युवक मेरे प्रभाव के अंदर आ जाय। लेकिन
मैं जैसा पहले कह चुका हूँ, इस प्रयत्न में मैं असफल ही रहा।
इस युवक के घर होते हुए भाईसाहब के घर आया। दरवाजे पर खड़े होकर
मैं यह पूछ रहा था कि अब भी मेरे भाईसाहब उसी मकान में रहते हैं या नहीं।
जंगले से उचककर भाईसाहब ने मुझे देखा एवं देखकर बोल पड़े, “शचीन्द्र ! आ
गए हो ! आओ, भीतर आओ।” भाईसाहब बार-बार मेरे मुंह की तरफ ताकने
लग गए। हँसकर मैंने कहा, “हजामत बहुत दिनों से नहीं बनी है।” नाई आया,
हजामत बनी। भाईसाहब ने कहा कि बनारस से मेरे छोटे भाई मुझे ले जाने के
लिए कलकत्ता आए थे। उन्हें पता ही नहीं चला कि जहाज कहाँ पर आया था।
बेचारे नाउम्मेद होकर वापस चले गए। नहाया-धोया। अब कुछ मालूम पड़ा कि
मैं छूट गया हूँ। क़ैद होने के बाद आज सर्वप्रथम मैंने घर का भोजन किया। पाँच
साल लगातार क़ैद का भोजन करते हुए भी रुचि नहीं बदली। नित्य प्रतिदिन
खाते-खाते भी यह आदत नहीं पड़ी कि जेलखाने के भोजन के प्रति भी रुचि हो
जाय। इससे यह प्रमाणित होता है कि स्थूल रूप से किसी काम को बराबर
करने ही से कहीं आदत नहीं बना करती, अच्छे भोजन के लिए हर घड़ी जी में
चाह बनी रहती थी। इसलिए वासना की तृप्ति न होने के कारण स्थूल व्यवहार
का कोई असर स्वभाव पर नहीं पड़ा। यथार्थ में वासना-जगत् में कोई परिवर्तन
हुए बिना शारीरिक या स्थूल व्यवहार का कोई असर मनुष्य-जीवन पर नहीं
होता। इस प्रकार हम यह थोड़ा-बहुत अनुभव कर सकते हैं कि जगत् प्रधानतः
वासनात्मक है। पाँच साल के बाद आज महत् तृप्तिपूर्वक भोजन किया। भाई ने
कहा कि घर को तार द्वारा मेरे छूटने का संवाद दे दूँ। इस वक़्त ठीक याद नहीं
है कि तार किसने भेजा था—चटर्जी साहब ने या इन्हीं भाई साहब ने। सम्भव
है कि भाईसाहब ने ही भेजा हो, क्योंकि शायद ऐसा हुआ हो कि मेरे छोटे भाई
का कलकत्ता आना और अकेले वापस चले जाने का असर.मेरे ऊपर हुआ था।
भाई साहब ने मुझे समझाया कि जो कुछ होना था.सो हो गया, अब मैं दत्तचित्त
होकर गृहस्थी के काम में लग जाऊँ। उम्र काफ़ी हो चुकी है। इस वक़्त की