बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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भाई श्री धीरेन्द्रचन्द्र मुकर्जी इलाहाबाद में पढ़ते थे। ये बी० एस-सी० प्रशंसा के
सहित पास करके अब एम० ए० में अर्थशास्त्र लेकर पढ़ने लग गए थे। उनमें
अब राजनीतिक कार्यों में भाग लेने के लिए प्रबल उत्साह पैदा हुआ था। जितेन्द्र
की तरह धीरेन्द्र भी इलाहाबाद में मुझसे मिलने आए। एक ग्राहक को पाकर
दूकानदार जैसे खुश होता है या जैसे किसी चिड़िया को देखकर बाज प्रलुब्ध
होता है, वैसे ही धीरेन्द्र को देखकर मैं मन-ही-मन में प्रसन्न हुआ और प्रलुब्ध
हुआ। मैंने देखा कि सशस्त्र विप्लव आन्दोलन के प्रति धीरेन्द्र को उतना उत्साह
नहीं है जितनी सहानुभूति उनकी अहिंसात्मक असहयोग के प्रति थी। फिर
भी मैंने आशा नहीं छोड़ी। भविष्य में इनके बारे में बहुत कुछ कहना है, इसलिए
यहाँ पर इसकी उपक्रमणिका-मात्र कर दी। जैसे किसी अच्छे ग्राहक को पाकर
भी जब दुकानदार बिक्री नहीं कर पाता है या बाज जैसे अपने शिकार को सामने
पाकर भी कभी-कभी चूक जाता है और विफल मनोरथ हो खिन्न होता है, उसी
प्रकार धीरेन्द्र को अपने दल में सम्मिलित न कर पाने के कारण मैं मन में बहुत
खिन्न हुआ। मैं गोरखपुर वापस लौट आया।
कालेपानी जाने के पहले मैं एक प्रकार से छात्र-जीवन ही व्यतीत कर रहा
था। कमाने की फिक्र नहीं थी। घर का खाता था। मनमाना काम किया करता
था। अब कालेपानी से लौटने के बाद मैंने अपने को उम्र में भी कुछ बड़ा पाया
और दायित्व-बोध भी मैं पहले से कहीं अधिक मात्रा में अनुभव करने लगा।
जीवन में अब ही सर्वप्रथम मैंने यह अनुभव किया कि अपने भोजनाच्छादन के
लिए अब मुझे अपने उपार्जन पर ही निर्भर करना पड़ेगा। मेरी अवस्था इस
समय क़रीब सत्ताईस वर्ष की थी। अर्थोपार्जन के लिए आज तक मैंने अपने को
तैयार नहीं किया था। अब मुझे एक तरफ तो अर्थोपार्जन रूपी संकट का सामना
करना पड़ रहा था, दूसरी तरफ मेरा यह प्रबल आग्रह था कि मैं अपने जीवन के
स्वप्न को वास्तविक जगत् में रूप-दान करूँ। अण्डमन से लौटने के बाद यह
समस्या जैसे गम्भीर रूप से दिखलाई पड़ी थी आज अठारह साल के बाद भी
वही समस्या और भी कठिन एवं गम्भीर रूप में जीवन-पथ में आकर खड़ी हुई
है।
इसी समय सैकड़ों की संख्या में बंगाल के नज़रबन्द कैदी छूटने लगे। इन
सबके सामने भी यही समस्या थी। कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसिद्ध बैरिस्टर श्रीयुत
बी० सी० चटर्जी ने इस समस्या को हल करने के लिए कुछ रुपये इकट्ठे किए
थे। एक बड़ा-सा मकान किराए पर लिया गया था। राजबन्दीगण मुक्त हो-होकर
इस मकान में आकर ठहरते थे। दोनों समय भोजन का अच्छा प्रबन्ध था। यहाँ
पर महीना-पन्द्रह दिन तक लोग ठहर सकते थे। बंगाल के विभिन्न जिलों से
राजबन्दी यहाँ आकर ठहरते थे। श्रीयुत बी० सी० चटर्जी साहब एवं यंगमेन्स
क्रिश्चियन एसोसिएशन की तरफ से यह व्यवस्था की गई थी। आगे चलकर
अर्थोपार्जन के लिए भी इनकी तरफ से सहायता मिलती थी। अखबार में ये सब