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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 408 में से

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पृष्ठ 220

218 / बन्दी जीवन
गए। मैंने देखा कि उन्हें छोटी-छोटी बातें भी खूब याद थीं। वे जब मेरी प्रशंसा
कर रहे थे तो मैं मन-ही-मन हँस रहा था। हँसने का कारण था।
एण्ट्रैन्स पास करके मैं क्वीन्स कॉलेज में भरती हुआ था। डाक्टर गणेश-
प्रसाद उस समय गणितशास्त्र के अध्यापक थे। मैं उनका छात्र रह चुका था। मैं
आज तक जितने अध्यापकों के पास पढ़ा हूँ उनमें से आप ही ऐसे अध्यापक थे
जिनके छात्र अमूमन फेल नही होते थे। आप लड़कों से जबरन सब काम करा
लेते थे। लेकिन आपका Task करने के बाद फिर कॉलेज का और कोई काम हो
नही सकता था। स्कूल में गणित में मैं प्रायः शत प्रतिशत अंक (Full marks)
पाया करता था। अब कॉलेज में आकर, राष्ट्रीय आन्दोलन मे सक्रिय रूप से भाग
लेने के कारण गुप्त षड्यन्त्रकारी आवर्त में फँसकर कॉलेज का काम यथोचित
नहीं कर पाता था। पहले-पहल तो मैं डाक्टर साहब का काम पूरा कर देता था
और मेरी गिनती अच्छे लडकों में होने लग गई थी। इसलिए डाक्टर साहब
अपनी निकटतम सामने की बेंच में दूसरे अच्छे लड़कों के साथ ही मुझे भी बैठाते
थे। लेकिन थोड़े ही दिनों मे मेरा क्लास का काम ढीला पड़ गया। अतः फिर
दूसरी बेंच में बैठना पड़ा, और फिर तीसरी मे। जिस छात्र से डा० गणेशप्रसाद
अत्यन्त असन्तुष्ट हो जाते थे, उसे वे आखिरी बेंच पर बैठाते थे एव उसके साथ
ऐसा व्यवहार करते थे मानो वे हैं ही नही। फिर उनको न वे कोई Task देते न
लेते थे; न उनसे बोलते थे। ऐसे लड़कों को वे Non-entity कहा करते थे।
आप नही चाहते थे कि उनके छात्र कोर्सबुक को छोड़कर और कोई किताब पढ़ें।
छात्र प्रायः उपन्यास आदि पढ़ा करते थे तो उनसे छिपाकर ही पढ़ा करते थे।
मैं डा० साहब के क्लास मे Non-entity रह चुका था। इसी हालत मे एक दिन
मैं जान-बूझकर पाठ्य पुस्तक के अलावा एक अंग्रेजी किताब क्लास मे ले आया था
और उसको मैंने किताबों में सबसे ऊपर रखा था, यह देखने के लिए कि डा०
साहब इस किताब को देखकर मुझे कुछ कहते हैं या नही। रामकृष्ण मिशन के
स्वामी अभेदानन्द के अमेरिका मे प्रदत्त व्याख्यानों का संग्रह India and her
people नाम से मुद्रित हुआ था। इसी पुस्तक को मैं क्लास मे ले आया था।
डा० गणेशप्रसाद ने मेरे पास से गुज़रते हुए किताब को देखा; देखकर उठा
लिया; किताब के पन्नों को इधर-उधर उलटकर थोड़ा-सा देखा और फिर
किताब को यथास्थान रख दिया। मैं देखना चाहता था कि वे मुझे डाँटते हैं या
नही। क्लास मे तो मेरे साथ उनके ऐसे ताल्लुक़ात थे, लेकिन आज मालवीयजी
के सामने वे मेरी कितनी प्रशंसा कर रहे थे, इसका थोड़ा-सा कारण अवश्य है।
कॉलेज में पढ़ते समय हम लोगों ने अपनी चेष्टा से, अपने ही उद्योग से, एक स्कूल
खोला था। वह स्कूल मिडिल तक पहुँचा था। इस स्कूल के वार्षिकोत्सव के
अवसर पर हम लोगो ने डा० गणेशप्रसाद को सभापति का आसन ग्रहण करने के
लिए निमन्त्रित किया था। हम अन्तिम परीक्षा के पहले Non-entity नहीं रह
गए थे।