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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 408 में से

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पृष्ठ 221

मालवीयजी ने सब बातें सुन लीं और आखिर में कहा कि मुझे लिखकर
रजिस्ट्री पत्र द्वारा सब बातें सूचित करो। मैंने गोरखपुर जाकर वैसा ही किया
था। Acknowledgement due की रसीद तो मुझे मिल गई। लेकिन मालवीय
जी ने राजनीतिक बन्दियों की मुक्ति के लिए एक आवाज़ भी नहीं उठाई।
जितेन्द्र मुकर्जी एवं मेरे भाइयों का कहना था कि आजकल युक्त प्रदेश में
उदीयमान नेता पण्डित जवाहरलालजी नेहरू हैं। यदि वे राजनीतिक क़ैदियों का
प्रश्न उठाएँ तो कुछ काम हो सकता है।
मैं बनारस में दो ही दिन ठहरा और फिर गोरखपुर चला गया। मेरे साथ
मेरे सर्वकनिष्ठ भाई भूपेन्द्रनाथ थे। बनारस षड्यंत्र के मामले में आजन्म काले-
पानी की सजा के अतिरिक्त मेरे ऊपर यह भी दण्ड था कि मेरी तमाम जायदाद
छीन ली जाय। बनारस में जिस मकान में हम लोग रहते थे वह मेरी आजी का
मकान था। मुझे सज़ा होने के बाद पुलिसवालों ने इस मकान को अपने क़ब्ज़े में
कर लिया था। मकान के साथ बिस्तरे आदि भी, जो कुछ मकान में थे, पुलिस के
ही व्यवहार में आए। अर्थात् जो पुलिस वाले रखवाली के तौर पर उस मकान
में रहते थे, वही वह सब सामान अपने इस्तेमाल में ले आए। उस समय में मेरी
माताजी, मेरी आजी, मेरी मौसी एवं मौसी की पाली हुई एक लड़की और मेरा
सबसे छोटा भाई मेरे पकड़े जाने के बाद सब यहीं घर में रह गए थे। जब पुलिस
ने मकान को अपने क़ब्ज़े में कर लिया तो इनके रहने के लिए स्थान न रहा।
ऐसी विकट परिस्थिति में मेरे मामा इन सबको गोरखपुर ले आए। जब मैं काले-
पानी से छूटकर आया तो मेरे भाई, मां इत्यादि गोरखपुर में मेरे मामा के पास
ही थे। मेरी आजी मेरे चाचा के पास चली गई थी।
गोरखपुर से मैं एक दफे पं० जवाहरलालजी से मिलने आया। राजनैतिक
बन्दियों के विषय में और विशेषकर कालेपानी में स्थित घोर दुर्दिन में पड़े हुए
बहुत-से लम्बी सजा पाये हुए राजबन्दियों के प्रति जवाहरलालजी की दृष्टि मैंने
आकर्षित की। जवाहरलालजी सब बातें सुनकर यह कह उठे—"हम लोग तो
स्वयं ही जेल जाने का इन्तज़ाम कर रहे हैं और आप दूसरों को छुड़ाने की बातें
कर रहे हैं।" मैं उनके मुंह की तरफ ताकता ही रह गया और सोचने लगा कि मैं
इनसे और क्या कहूँ। मैंने यह समझ लिया अपने ही आदमी हुए बगैर दूसरों के
दुःख को समझना सहज नहीं है। यदि जवाहरलालजी अपने दल के आदमी होते
तो वे मेरी प्रार्थना के महत्त्व को अनुभव कर पाते। और शायद यह भी बात थी
कि जब सरकार के साथ झगड़ा ही करना है तो फिर सरकार से किसी बात के
लिए अनुरोध कैसे किया जाय। मैं बहुत नाउम्मेद हो गया।
सितम्बर, सन् 1920 में कलकत्ता में स्पेशल कांग्रेस हुई। भारत के प्रत्येक
राजनीतिक नेता की दृष्टि उस समय महात्माजी के Non-cooperation प्रस्ताव
पर लगी हुई थी। वहाँ भी कुछ काम नहीं बना। कांग्रेस में तो हम कुछ कर
नहीं पाए लेकिन दूसरे मुक्त राजबन्दियों को साथ लेकर मैं लाला लाजपतराय