सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 227

[Header] मि० सैण्ड्स और बैरिस्टर चटर्जी / 225

और दूसरी तरफ हम लोग । अब रस्सी-खिंचाई खत्म हो गई। अब आगे चलकर
क्या करने का इरादा है ? मेरी सलाह है कि खेती का काम करो, जो कुछ करो
उसमें अगर मेरी मदद की ज़रूरत है तो मुझे बतलाना, मैं मदद करने के लिए
तैयार हूं।" मैने सैण्ड्स साहब से कहा था, "मैं पढ़ना चाहता हूं और आप इतना
कर दीजिए कि मुझे किसी कालेज में भर्ती होने में दिक्कत न पड़े।" मैंने देखा
सैण्ड्स साहब को यह बात ज्यादा पसन्द नहीं आई। लेकिन मेरे मुंह पर तो
उन्होंने यही कहा, "मेरी मदद से यदि तुम कॉलेज में भर्ती हो सको तो मैं मदद
करने के लिए तैयार हूं। लेकिन कॉलेज के अधिकारियों पर मेरा कोई अधिकार
नहीं है।" मैंने कहा, "पुलिस की तरफ से बाधा आने पर किसी कॉलेज में भर्ती
नहीं किया जा सकता।" सैण्ड्स साहब ने कहा, "इतना हम कर देंगे कि पुलिस
की तरफ से बाधा न आए।" मैं मन-ही-मन समझ गया कि मेरे लिए कॉलेज में
भर्ती होना आसान नहीं है। इसके बाद मैं नरेन्द्रदेवजी से मिलने चला गया।
जब मैं सन् 1910 और 1911 में क्वींस कालेज में पढ़ता था, तभी से नरेन्द्रदेवजी
से मेरी जान-पहचान है।
कई कारणों से मैं गोरखपुर छोड़ना चाहता था। मेरे तीसरे भाई जितेन्द्र ने
जब बी० ए० पास कर लिया तब सभी ने सलाह दी कि जितेन्द्र को अब एम० ए०
'पढ़ना चाहिए। जितेन्द्र एम० ए० पढ़ने के लिए कतई राजी नहीं हुआ। संयोग-
वश जितेन्द्र को इलाहाबाद मे एग्लो-बंगाली मिडिल स्कूल में हेडमास्टरी मिल
गई। जहाँ तक मुझे याद है, जितेन्द्र ने इस पद पर साल-भर तक काम किया।
इसके थोड़े ही दिन पहले मैं कॉलेज मे भर्ती होने के लिए इलाहाबाद आया था।
मैंने म्योर सेन्ट्रल कॉलेज मे नाम भी लिखा लिया था लेकिन दो ही दिन के बाद
प्रिंसिपल साहब ने मुझे दफ्तर मे बुलाया और कह दिया कि तुम इस कॉलेज मे
नहीं लिए जा सकते। मैंने संण्ड्स साहब की दुहाई दी लेकिन कुछ बस न चला।
मुझे कुछ खुशी भी हुई और कुछ दुःख भी हुआ । दुःख होना तो स्वाभाविक ही
था, लेकिन मन-ही-मन खुशी भी इसलिए हुई कि चलो इम्तहान देने से छुट्टी
मिली। कही फेल हो जाते तो दुर्दशा की सीमा न रहती। फिर कायस्थ पाठशाला
के प्रिंसिपल डा० ताराचन्द से जाकर मिले । मालूम हुआ कि प्रिंसिपल तारा-
चन्द लाला हरदयाल के साथी हैं एव उनकी उनसे रिश्तेदारी भी है।
मैं जिन विषयों को साथ-साथ लेना चाहता था वे मुझे कायस्थ पाठशाला मे
नहीं मिले। फिर भी मैं भर्ती हो गया। लेकिन दो-चार दिन के बाद छोड़ दिया।
कारण, मुझे अभिप्रेत विषयो का संयोग न मिलने से पढ़ने में उत्साह नहीं मिला।
संभव है, फेल होने का भय भी मन मे छिपा हो।
इसी समय से मैने सर्वान्तःकरण से क्रान्तिकारी दल के पुनः संगठन का काम
प्रारम्भ कर दिया। यह पहले ही बतला चुका हूँ कि अण्डमन से लौटते ही बनारस
में हमारे पुराने साथी श्री जितेन्द्रचन्द्र मुकर्जी हम से आकर मिले। मैं जानता था
कि जितेन्द्रचन्द्र मुकर्जी क्रान्तिकारी दल में सम्मिलित नहीं होंगे। इन्ही के छोटे