बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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को मैंने छाती से जोर से लिपटा लिया। मेरी यह नई जिन्दगी थी। मेरा यह नया
जन्म प्रारम्भ हुआ।
जिस रोज मैं घर पहुँचा उसके पहले दिन ही मेरे कनिष्ठ भ्राता का उपनयन-
संस्कार हो चुका था। घर में यह किसी को पता न था कि आज यहाँ आ पहुँ-
चूँगा। मैंने सबसे पूछा, माताजी कहाँ हैं ? माताजी बगल के मकान में कुछ काम
से गई हुई थीं। मैं पूछताछ कर ही रहा था कि इतने में वे आ गईं। मुझे देखते
ही आनन्द के मारे रो पड़ीं और कहने लगीं, "बेटा मेरा, आ गए हो, मेरा बेटा आ
गए हो।" और मेरे सिर पर, मेरे बदन पर, मेरे कन्धे पर और हाथ-पर-हाथ
फेरने लग गईं। कहने लगीं, "जाने कितनी मुसीबत तुमने झेली !"
मैंने जब सबसे छोटे भाई को देखा तो मुझे एक अजीब-सा धक्का पहुँचा।
इस कनिष्ठ भ्राता को आठ साल की उम्र में घर पर छोड़ आया था। मेरे मन
में अभी तक उसकी वही आठ साल की कमनीय मूर्ति बनी हुई थी। अब जब मैंने
इसको देखा तो उस कमनीय मूर्ति के साथ इसका कोई सादृश्य नहीं पाया। मैंने
कल्पना नहीं की थी कि भूपेन्द्रनाथ को जब देखूँगा तो उसको किसी और मूर्ति में
देखूँगा।
जीवन का एक अध्याय समाप्त हुआ अब दूसरा प्रारम्भ होगा।