बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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बन्दी साथियों की चिन्ता
घर पहुँचने के दो-एक घण्टे के अन्दर ही पुराने मिलनेवालों में से एक युवक
मेरे पास आए । इनका नाम था— जितेन्द्रनाथ मुकर्जी । कॉलेज छोड़ने के समय
आप मेरे सहपाठी थे । लेकिन आप मेरी गुप्त समिति के सदस्य नही थे । जैसे
भाइयों से मिलते हुए हम एक-दूसरे से लिपट गए थे, वैसे ही देखते ही इनसे भी
लिपट गए । बनारस के पुराने साथियों मे से कोई भी मुझसे मिलने नही आया ।
इनसे देश की राजनीतिक स्थिति पर बातचीत होने लग गई । मुझे भली भाँति
स्मरण था कि देश पहुँचते ही मेरा प्रथम कर्तव्य क्या है। मैंने जितेन्द्र से पूछा,
“कहो, मालवीयजी आजकल कहाँ है ? मुझे मालवीयजी से मिलना है ।” मैंने
इन्हें अण्डमन की स्थिति बताई कि कैसे वहाँ पर दुखी राजबन्दी पड़े-पड़े सड़
रहे हैं, कैसे भाई परमानन्द कोठरी में एकाएक बन्द कर दिये गए हैं । भारत-भूमि
से नितान्त विच्छिन्न होने के कारण अण्डमन टापू से दर्द की कोई कहानी भारत
पहुँच नही पाती है । राजबन्दियों की मुक्ति के लिए कैसे, क्या किया जाय ?
जितेन्द्र मुकर्जी से पता चला कि महामना पं० मदनमोहन मालवीय जी बनारस
में ही हैं एवं सम्भवतः आज हिन्दू यूनिर्वसिटी कोर्ट की मीटिंग होगी और वहाँ
मालवीय जी से हम मिल सकते हैं । रोटी खाकर दो काम करना ठीक हुआ ।
एक तो मालवीयजी के पाम जाना, दूसरा मैजिस्ट्रेट के पास जाकर अपने आने
की सूचना देना ।
रोटी खाकर हिन्दू स्कूल पहुँचे । वाकई मीटिंग हो रही थी । मैंने एक स्लिप
पर यह लिखकर मालवीयजी के पास भेज दिया, “Comming straight from
the Andamans, an interview may be allowed in connection
with the cases of Bhai Parmanand and other Political prisi-
oners Sachindra Nath Sanyal.”
स्लिप पहुँचते ही पंडितजी एवं डाक्टर गणेशप्रसाद फौरन चले आए । हम सब
एक छोटे से कमरे में बैठ गए । मेरे लिए यह एक सौभाग्य की बात थी कि डाक्टर
गणेशप्रसाद ने मुझे पहचान लिया । सम्भव है, मेरी स्लिप को पढ़ते ही पहचान
लिया हो । मालवीयजी के सामने डाक्टर गणेशप्रसाद मेरी खूब प्रशंसा करने लग