बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ें212 / बन्दी जीवन
बाद ही वे कुर्सी से कूदकर खड़े हो गए और दौड़कर मेरे गले से लग गए । फिर
हमें प्रेम और आदर के साथ अपने पास बैठाया और टेबुल पर से मेरी ही लिखित
एक चिट्ठी उठाकर मुझे दिखलाई । यह चिट्ठी मैंने अण्डमन से अपने भाई को
लिखी थी । मैंने देखा कि इस चिट्ठी में कई स्थान पर स्याही से कुछ लाइनें इस
प्रकार लीप-पोत दी गई थीं कि पढ़ी नहीं जा सकती थीं। इस चिट्ठी में और
बातों के साथ मैंने यह भी लिखा था कि भारत में अब नया शासन-विधान
प्रचलित होनेवाला है । अधिकारीगण यह कह रहे हैं कि भारत को अपनी राज-
नीतिक उन्नति के लिए पर्याप्त अवसर दिया जाएगा। यदि यह बात सच है, यदि
इंग्लैंड एवं फ्रांस की तरह हमें भी अपनी उन्नति के लिए उचित मौका मिले तो
ऐसा कौन पागल होगा जो कि खामखा खून-खराबी के रास्ते को ही ग्रहण करेगा
और यों ही अपनी जान को जोखिम में डालकर बन्दूक और तलवार के रास्ते को
अख्तियार करेगा। क्रान्तिकारीगण सचमुच पागल तो हैं नहीं। यदि अधिकारी-
गणों का कहना दिली हक़ीक़त है तो उन्हें अवश्य राजबन्दियों को छोड़ देना
चाहिए । इस चिट्ठी को मेरे भाई साहब ने बी० सी० चटर्जी के पास भेज दिया
था। बी० सी० चटर्जी साहब ने यह चिट्ठी दिखलाकर मुझसे यह कहा कि
उन्होंने इस चिट्ठी को अपने ससुर श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को दे दिया था । उन्होंने
असेम्बली में इस चिट्ठी के आधार पर राजबन्दियों को छोड़ने के लिए जोरदार
अपील की थी एवं अनेक राज-पुरुषों को यह चिट्ठी दिखलाई भी थी। बी० सी०
चटर्जी ने यह भी कहा कि वे स्वयं मांटेग्यू साहब से इस सम्बन्ध में मिले भी थे ।
उनके मुंह से मैंने यह भी सुना कि जिस समय वे मैनपुरा केस की पैरवी कर रहे
थे, उसी समय सम्राट् की घोषणा का पत्र प्रकाशित हुआ, जिसमें राजबन्दियों को
छोड़ने की इच्छा प्रकट की गई थी । सी० आई० डी० के डिप्टी-इंस्पेक्टर जनरल
सैण्ड्स साहब भी उस समय चटर्जी साहब के पास ही थे । सैण्ड्स साहब ने चटर्जी
साहब से कहा कि शचीन्द्र की माता से माफी की दरखास्त दिलवा दें और इस
पर उन्होंने स्वयं सिफारिश कर देने को कहा । चटर्जी साहब ने तार से मेरे मामा
को इस बात की इत्तिला दी । मामा ने माताजी के मार्फत दरखास्त दिलवाई ।
सैण्ड्स साहब ने इस दरखास्त पर सिफारिश लिख दी । यह इसी सब का परिणाम
हुआ कि मैं कारावास से मुक्त हो गया और बी० सी० चटर्जी से यह सब सुनने
का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ ।
बी० सी० चटर्जी ने मुझे तेईस साल की अवस्था में देखा था । अब जब मैं
लौटकर आया तो मेरी अवस्था अट्ठाईस साल की थी । बाल बहुत बड़े-बड़े हो
रहे थे । बकरे की दाढ़ी की तरह मेरी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी । इसीलिए प्रथम
दर्शन में तो चटर्जी साहब मुझे पहचान नहीं पाए थे । चटर्जी साहब ने चाहा कि
मेरे भाई को तार द्वारा मेरी रिहाई का संवाद भेज दें। मैंने मना किया । मैंने
चाहा कि अचानक घर में जाकर खड़ा हो जाऊँ । बहुत हर्ष के साथ चटर्जी साहब
से विदाई ली । एक मुक्त डेटेन्यू भी चटर्जी साहब के पास बैठे थे, उनसे भी