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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 408 में से

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पृष्ठ 222

220 / बन्दी जीवन
के पास गया। ऑल इण्डिया पोलिटिकल सफरर्स कांफ्रेन्स में सभापति का आसन
सुशोभित करने के लिए उनसे अनुरोध किया। लाजपतरायजी राजी हो गये।
उनके सभापतित्व में इण्डियन एसोसिएशन के हाल में ऑल इण्डिया पोलिटिकल
सफरर्स कांफ्रेंस हुई। इस कांफ्रेन्स को बुलाने में प्रसिद्ध बैरिस्टर श्री बी० सी०
चटर्जी एवं कलकत्ता के पुराने क्रांतिकारी नेताओं की विशेष सहायता मिली
थी।
बहुतों ने वक्तृता दी। किसी की वक्तृता हृदयग्राही थी और किसी की शुष्क।
स्व० श्यामसुन्दर चक्रवर्ती ने हृदयावेग से गद्गद होकर सबसे लंबी स्पीच दी,
लेकिन उनकी स्पीच मर्मस्पर्शी नहीं हुई। वक्तृता देते-देते वे सभापति के शरीर
के ऊपर आ गिरते थे। भूल जाते थे कि सभापति के आसन पर कोई बैठा है।
पंडित मदनमोहन मालवीयजी ने जो वक्तृता दी उससे क्रांतिकारियों के प्रति
सहानुभूति रखनेवाले बहुत कुछ असन्तुष्ट हो गए। इसके प्रत्युत्तर में कलकत्ता के
बैरिस्टरगण जे० एन० राय, बी० सी० चटर्जी इत्यादि ने मालवीयजी को कुछ
बातें सुनाईं। लेकिन इस कांफ्रेंस में स्वर्गीय एनीबेसेण्ट महोदया ने जो मर्मस्पर्शी
एवं ओजस्विनी वक्तृता दी थी, उसकी तुलना की वक्तृता जीवन-भर में और
नहीं मिली। उस दिन यह पता चला कि वाग्मी किसे कहते हैं। वे दृश्य जीवन में
भूले नहीं जा सकते, मानो एक श्वेत प्रस्तर-मूर्ति जीवन्त होकर निश्चल रूप में
खड़ी है, कभी-कभी हाथ और सिर थोड़ा-थोड़ा हिल जाता है, केवल ओठ चल रहे
हैं। और उस प्रस्तरमूर्ति के मुख से मानो स्वयं सरस्वती हृदयग्राहिणी भाषा
उद्गीर्ण कर रही है। मालवीयजी लज्जित हो गए। तमाम हाल में मानो बिजली
का संचार हो गया। लाला लाजपतरायजी ने सभापति के आसन से यहाँ तक
भी कह डाला कि इन राजबन्दियों में ऐसे आदमी भी हैं जिनके जूते के फ़ीते
खोलने लायक यहाँ के लाटसाहब भी नहीं। मीटिंग समाप्त होने के बाद मालवीयजी
ने apology (क्षमा-याचना) के तौर पर कुछ कहा, जिसका आशय यह था कि
उनके कहने का मतलब तो यह-वह कुछ और था इत्यादि। इस प्रकार से राज-
बन्दियों के लिए कुछ प्रोपेगैण्डा किया गया।
उसी साल नागपुर मे जो कांग्रेस हुई, उसमें घटनाचक्र से मै Subjects
Committee (विषय-निर्वाचिनी समिति) में पहुँच गया। महात्माजी के असह-
योग आन्दोलन के कारण राजनीतिक barometer बहुत ही चढा हुआ था।
सरकार के साथ जब झगडा मोल लिया जा रहा था तब कैसे उसी सरकार से यह
अनुरोध किया जाय कि राजबन्दियो को छोड़ दो। मैंने स्व० विपिनचन्द्रपालजी
से बहुत अनुरोध किया कि कुछ तो हमें करना ही चाहिए। मेरे कहने पर विपिन-
चन्द्र ने एक प्रस्ताव तैयार किया। मैं उसी प्रस्ताव पर राजी हो गया और उसे
विषय निर्वाचिनी (Subject Committee) समिति से पास करवा लिया।
नागपुर कांग्रेस के अधिवेशन में भी स्व० विपिनचन्द्रपाल ने इस प्रस्ताव को रखा
और इसका अनुमोदन दूसरों के साथ मैंने किया। जीवन में सर्वप्रथम आम सभा में