बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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सरकार सचमुच ऐसा अवसर हमें देगी इसलिए अब तुम्हारा कर्त्तव्य है कि सच्चे
दिल से माण्टेगू के सुधार को लेकर काम करो और गुप्त षड्यन्त्र के रास्ते को
त्याग दो। इसी आशा से और इसी विश्वास से सरकार ने तुम्हें छोड़ दिया है।"
मैंने जवाब में यह कहा था कि "विनायक दामोदर सावरकर ने भी तो अपनी
चिट्ठी में ऐसी ही भावना प्रकट की थी जैसीकि मैंने की है तो फिर सावरकर
को क्यों नहीं छोड़ा गया और मुझी को क्यों छोड़ा गया ? यदि आपकी बात सत्य
होती तो सावरकर को भी छोड़ना चाहिए था। मैं तो यह समझता हूँ कि मेरे
छूटने और सावरकरजी के न छूटने में दो बातें हैं। एक तो यह कि बंगाल के
जनमत ने मेरे जैसे राजनीतिक बन्दियों को छुड़ाने के लिए प्रबल आग्रह किया था।
राजबन्दियों की रिहाई के मूल में यही बात बहुत बड़ी थी। लेकिन महाराष्ट्र में
उतना तीव्र आन्दोलन नहीं हुआ जैसाकि बंगाल में हुआ। दूसरी बात सावरकरजी
के न छूटने में यह थी कि सावरकरजी और उनके दो-चार साथियों की गिरफ्तारी
के बाद महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन समाप्त-सा हो गया था। इसलिए
सरकार को यह डर था कि यदि सावरकर इत्यादि को छोड़ दिया जाय तो ऐसा
नहो कि फिर महाराष्ट्र में क्रान्तिकारी आन्दोलन प्रारम्भ हो जाए। इसके अतिरिक्त
एक बात यह भी थी कि सावरकरजी के द्वारा इग्लैंड के एक अंग्रेज़ की हत्या हुई
थी। इस पर ब्रिटिश सरकार को विशेष क्रोध था। राजबन्दियों की मुक्ति के
समय सरकार ने यह नीति बना ली थी कि जिन पर किसी की हत्या करना या
डकैती करने का अपराध लगाया गया था उन्हें न छोड़ा जाय। इस नीति के
अनुसार भी सावरकर नही छोड़े जा सकते थे। कारण उन पर हत्या करने का
अपराध लगाया गया था।" चटर्जी साहब ने इस पर यह कहा था कि "बात
असल में यह है कि मरहठों के ऊपर अंग्रेजों का बिल्कुल विश्वास नही है। बंगालियों
के ऊपर अंग्रेज़ी सरकार यह भरोसा कर रही है कि बंगाली जैसा कहेंगे, वैसा
करेंगे लेकिन मरहठे ऐसा कभी नहीं कर सकते।" इस बात को सुनकर मैंने मन-
ही-मन कुछ लज्जा अनुभव की और हँसा भी। लज्जा इसलिए अनुभव की कि
राजनीतिक दृष्टि से चटर्जी साहब महाराष्ट्र को उच्च स्थान दे रहे थे और
बंगालियों को भ्रम से ऐसा स्थान दे रहे थे कि राजनीतिक दृष्टि से दूरदर्शितापूर्ण
नहीं कह सकते। हँसा इसलिए कि चटर्जी साहब भी समझ रहे हैं कि अंग्रेज़
सरकार हमें अपने आदर्श को प्राप्त करने के लिए पूर्ण अवकाश देगी। मैं जानता
था कि ब्रिटिश सरकार कभी भी यह मौका नहीं देगी, इसलिए हमें अवश्य क्रांति
का मार्ग ग्रहण करना ही पड़ेगा और खुले तौर पर मैंने चटर्जी साहब से यह कहा
भी था कि यदि ब्रिटिश सरकार हमें पूरा मौका देती है, अपने देश को उस सीमा
तक पहुँचाने के लिए जिस सीमा तक अंग्रेजों ने अपने देश में अपने राष्ट्र को
पहुँचाया है तभी एकमात्र उसी अवस्था में ही यह बात भी सही होगी कि सशस्त्र
क्रांति के मार्ग को छोड़कर भी हम आगे बढ़ सकते हैं।
अबकी बार फिर जब कि मैं बेनियापुकुर के मकान में ठहरा हुआ था तो चटर्जी