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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 408 में से

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पृष्ठ 229

मि० सैम्बुड्स और बैरिस्टर चटर्जी / 227
बातें पढ़कर मैं भी बेनियापुकुर लेन में स्थित इस मकान में आकर उपस्थित हुआ ।
बंगाल के तमाम राजबन्दियों से यहाँ पर मिलने का अवसर मिला । यहाँ पर
बीसियों राजबन्दी ऐसे मिले जिनको देखकर मन में किसी प्रकार की भी आशा
का संचार नहीं हुआ । एक ही समय में इस मकान में कम-से-कम पचास राजबन्दी
ठहरते थे । सब जगह मैं घूम-घूमकर देखा करता था कि ये राजबन्दी किस तरह
जीवन व्यतीत कर रहे हैं, क्या सोचते हैं, क्या बातें करते हैं। इनमें से अधिकांश
को मैंने ऐसा पाया कि इनके बारे में मैं यही सोचता रहा कि आखिर यह क्यों
और कैसे राजबन्दी हुए थे। बहुतेरे पुराने साथियों से भी मैं मिला, भविष्य के
बारे में बहुत बातचीत भी हुई, लेकिन सबके सामने वही कठिन समस्या थी जो
कि मेरे सामने थी । फिर भी मैंने यह अनुभव किया कि जैसे प्रबल बाढ़ के कारण
स्रोतस्विनी नदी का पानी प्रचण्ड वेग से बहकर ग्राम और जनपद में बाधा पाकर
ठहर जाता है, उसी प्रकार से विप्लववाद का प्रबल प्रवाह अभी थोड़ी देर के लिए
बाधा पाकर ठहर गया है । समय और अवसर मिलने पर जिस प्रकार बाँध के
टूटने पर बाढ़ आ जाती है उसी प्रकार बंगाल में फिर क्रान्ति की लहर चारों
दिशा में उमड़ पड़ेगी । जिस प्रकार बाढ़ के कारण गृहस्थ विस्थापित हो जाता है
और कहीं ठहरने का आश्रय ढूँढ़ा करता है उसी प्रकार से मुक्ति पाकर विप्लव-
वादी राजबन्दीगण जन-कोलाहलपूर्ण संसार में आकर अपने को नितान्त आश्रय-
हीन अनुभव कर रहे थे । कहीं पर टिकने का, ठहरने का स्थान ढूँढ़ रहे थे ।
पिछले युग में जो लोग विप्लववादी आन्दोलन के कर्णधार थे, जैसे वारीन्द्र
और उपेन्द्रनाथ उनके समान बुद्धि-शक्ति सम्पन्न, विचारशील, प्रतिभावान,
मस्तिष्क परिचालन में तत्पर, शक्तिशाली लेखक एवं कार्यकुशल नेता मैंने अपने
युग में और किसी को नहीं देखा । अण्डमन में बैठे हुए एक दिन वारीन्द्र ने परि-
पूर्ण अवज्ञा के शब्दों में तिरस्कारपूर्वक आँख-मुँह बनाकर यह कहा था : “जो
रास्ता मैंने एक मर्तबा दिखलाया, बंगाल आज भी इतने दिनों तक उसी एक रास्ते
का अनुसरण करता आया । आज भी बंगाल के विप्लववादी कोई नया रास्ता
नहीं निकाल पाए ।” बात कुछ ज्यादा झूठ न थी ।
अभी मेरे पुराने साथियों में से सब नहीं छूटे थे । जो लोग छूट गए थे उनसे
मैं मिला । लेकिन मुझे सन्तोष नहीं हुआ । पहली बात तो यह थी कि जिनसे मैं
मिला, वे पुराने कार्यकर्त्ता तो अवश्य थे, लेकिन मेरे साथ उनके ताल्लुकात गहरे
न थे ।
जब मैं अण्डमन से छूटकर आया था तो श्रीयुत बी० सी० चटर्जी साहब ने
मुझसे एक बात कही थी जिसका उल्लेख यहाँ कर देना आवश्यक है । मैंने
अण्डमन से एक चिट्ठी में ऐसा लिखा था कि यदि ब्रिटिश सरकार भारतवासियों
को यथार्थ में यह मौका देती है कि हम अपने देश की भलाई के लिए जो ठीक
समझें उसे कर सकें तो गुप्त षड्यन्त्र के द्वारा खून-खराबी के रास्ते से आग को
लेकर हम खिलवाड़ क्यों करें। चटर्जी साहब ने मुझसे यह कहा था कि “ब्रिटिश