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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

बंगाल में / 155
ओर उस प्रकार ध्यान दे सकते तो अवश्य ही और तरह का फल होता ।
जो लोग यह सोचते हैं कि संसार की इम्पीरियलिस्टिक (साम्राज्य कामी)
गवर्नमेंटों से भारतीय विप्लववादियों की सहायता पाने की आशा बिलकुल दुराशा
मात्र थी उन्हें जान लेना चाहिए कि ससार की इन साम्राज्यकामी गवर्नमेंटों की
परस्पर शत्रुता के कारण ही चीन अब तक अत्यन्त बुरी अवस्था मे रहने पर भी
एकदम असहाय होकर पराधीनता की जकड़ मे नही आया, अफ़गानिस्तान,
फारिस, तुर्की आदि देश भी इसी प्रकार विभिन्न राजशक्तियों की सहानुभूति और
सहायता पाकर ही क्रमशः एक-एक शक्तिशाली जाति के रूप मे परिणत होते
जाते हैं, पिछले बोअर युद्ध के समय जर्मनी ने बोअरों की अस्त्र-शस्त्र द्वारा कम
सहायता नही की और अभी पिछले युद्ध के कारण तुर्की की दशा तो एकदम
निढाल हो गई है, कमालपाशा ने तो उस समय एक प्रकार से तुर्की गवर्नमेंट के
विरुद्ध ही विद्रोह की घोषणा करके मित्र शक्तियो के सन्धि-पत्र को भी निकम्मा
कर दिया किन्तु ऐसा हो सका फ्रांसीसियों की सहायता से और फिर आज भी
एकदम फ्रांसीसियों पर ही बिलकुल निर्भर न रहना पड़े इसीलिए अमेरिका के
साथ अंगोरा की जान-पहचान बनाने की चेष्टा चल रही है।
असल बात यह है कि दुनिया मे यदि कोई माथा ऊँचा करके खड़ा हो सके
तो उसे सहायता का अभाव नही रहता. अन्दर की शक्ति के अभाव से ही सभी
लांछनाएँ होती हैं, अन्दर की दीनता से ही कंगाली होती है, "बाहर से दिया ही
जा सकता है किन्तु लेना होता है अपने गुण से।"

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बर्मा की कहानी
भारतवासियों के प्रयत्न से ब्रह्मदेश में जो विप्लव की चेष्टा हुई उसके बहुत
पहले से ही वहाँ के स्वाधीनता-प्रयासी बर्मियों ने भी बहुत बार विप्लव का आयो-
जन किया था। अण्डमन में भी इस प्रकार के राजनीतिक अपराधों में दण्डित
बहुत-से बर्मी थे। युद्ध समाप्त होने के बाद ही उनमें से प्रायः सभी को छोड़ दिया
गया था। तो भी अंग्रेज़ गवर्नमेंट इन सब विप्लव चेष्टाओं को भय की दृष्टि से
न देखती थी। जान पड़ता है कि उसका कारण यह था कि यहसब विप्लवान्दोलन
एक व्यापक जातीय जागरण का फल न था, इसी से वैसा शक्तिशाली भी न हो
सका था। किन्तु भारतीय विप्लववादियों की चेष्टा से बर्मा में भी अत्यन्तर्निविड़
रूप से विप्लव का आयोजन हो गया था। रोलट रिपोर्ट में लिखा है- "Burma,
however has not been altogether free from criminal conspiracy
connected with the Indian revolutionary movement. It has been
the scene of determined efforts to stir up mutiny among the
military forces and to overthrow the British Government."
अर्थात् “बर्मा भी भारत के विप्लवान्दोलन से सम्बद्ध षड्यन्त्रों से बचा नहीं
रहा। ब्रिटिश सरकार को उखाड़ डालने और सेनाओं में विप्लव खड़ा कर देने
की दृढ़ चेष्टाओं की वह रंगस्थली बन चुका है।" किस प्रकार ये दृढ़ चेष्टाएँ
(determined efforts) हुई थीं उसका कुछ संक्षिप्त परिचय देता हूँ।
गत तुर्की-इटालियन युद्ध के समय भारतवर्ष के मुसलमानों ने एक मेडिकल
मिशन, अर्थात् युद्ध में घायलों की सेवा के लिए एक दल, तुर्की भेजा था। इस दल
में फैजाबाद के निकट अकबरपुर के रहनेवाले अलीअहमद सिद्दीकी नामक एक
तरुण युवक भी थे; अपने संरक्षकों को पता दिए बिना ही उन्होंने दल में प्रवेश
किया था और भारत का तट छोड़ने से पहले घर के लोगों को केवल एक पत्र से
जता दिया था कि वे भारतीय मेडिकल मिशन में शामिल होकर तुर्की जाते हैं।
तुर्की में कार्यवश इन्हें अनवर पाशा के साथ प्रायः चार मास तक समरांगण
में ही रहना पड़ा। उस समय इन्होंने अनवर पाशा के जीवन की अनेक रहस्यपूर्ण
कहानियाँ सुनीं। तुर्की-इटालियन और तुर्की-ग्रीक युद्ध के समय अंग्रेजों की कूट
राजनीति की महिमा का तुर्क लोगों ने मर्मान्तक अनुभव कर पाया था, अंग्रेजों

की कूटनीति की कहानी, तुर्की के भाग्यनियन्ता उस यंग टर्क (तरुण तुर्क) दल
की कहानी, किस प्रकार इस तरुण तुर्क दल ने तुर्की में पहले-पहल अपने को प्रकट
किया, किस प्रकार इस तरुण दल ने मृतप्राय तुर्क समाज में नवचेतना का संचार
करके विप्लव पथ में चलते हुए अब्दुलहमीद के समान प्रबल दुर्दान्त और क्रूर
सुलतान को पदच्युत करके तुर्की में नवीन नियमतन्त्र राज्यप्रणाली का प्रवर्त्तन
कियः । ये सब बातें, दिन पर दिन, अलीअहमद, अनवर पाशा के पास स्वप्नाविष्ट
की तरह एकान्त में तन्मय होकर सुनते थे । मुस्लिम-जगत् की कितनी ही मर्म-
कथाएँ, कितनी ही वीरता की कहानियाँ, कितनी ही मनुष्योचित अभिव्यक्ति की
घटनाएँ सुन-सुनकर उनका हृदय मानो एक अननुभूत आनन्द से खिल उठता,
मुस्लिम-जगत् के गौरवमय उज्ज्वल भविष्य का चित्र उन्हें अधीर-सा कर डालता
था । तुर्की के एक सर्वप्रधान यूरोप-प्रसिद्ध सेनापति और प्रसिद्ध नेता जो तुर्की
के भाग्य-परिवर्त्तन के प्रधान अवलम्बन थे, जब ऐसे एक प्रसिद्ध व्यक्ति भारत के
एक नगण्य तरुण युवक के साथ निःसंकोच दिल खोलकर बातें करते होते, तब एक
ओर जहां उनकी प्रशस्त उन्नत छाती फूलकर स्पन्दन करने लगती, वहां दूसरी
ओर वैसे ही उसी एक मुहूर्त्त में उनका मन भारत की उस हीनता और दीनतापूर्ण
जीवन-यात्रा के प्रतिदिन के अपमानों की कहानी स्मरण कर मानो अनजाने में
ही घोर अंग्रेज-विद्वेषी हो उठता, और उनकी धमनियों का रक्त नाच-नाचकर
दुर्निवार वेग से उन्हें विप्लववादियों के दल में खींचकर ला रखता ।
पीछे अलीअहमद आदि कई भारतवासियों ने तुर्की का देश देखने की इच्छा
प्रकट की तो तुर्की के भिन्न-भिन्न स्थानों के राजप्रतिनिधियों ने बड़ा समारोह
करके राज-सम्मान के साथ उन्हें अपना सारा देश दिखलाया । इस प्रकार देश में
भ्रमण करते समय जब नगर-नगर में तुर्क नर-नारी इकट्ठे होकर ऊंचे स्वर में
जयकार बुलाकर उनका आदर करते, जब राजपथ के दोनों ओर झरोखों में से
सुन्दरियों को उत्सुक दृष्टि और उनके हाथों से टपके हुए फूल उनके अंगों पर
झड़ पड़ते, तब वे भारतवासी तुर्क देश को भारतवर्ष की अपेक्षा भी सौ गुना
अधिक अपना समझकर चाहने लगते । स्वदेश में उन्हें अंग्रेजों के नजदीक जो
सलूक मिलता उसके साथ वे इन तुर्कों के व्यवहार की तुलना किए बिना न रह
सकते, इस प्रकार अली अहमद विप्लव मन्त्र में दीक्षित हुए और अन्य अनेक
भारतवर्षीय मुसलमानों की तरह अलीअहमद भी तरुण तुर्क (यंग टर्क) दल में
शामिल हो गए ।
इसी तुर्की-इटालियन युद्ध के समय पंजाब के एक और युवक, अबू सैयद,
रंगून से ईजिप्ट गए और फिर ईजिप्ट से तुर्की आए । इन्हीं अबू सैयद के अनुरोध
और प्रस्ताव से तरुण तुर्क दल के एक सदस्य, ताफ़्रिक बे को सन् 1916 में रंगून
भेजा गया । रंगून के एक मुसलमान व्यवसायी अहमद मुल्ला दाऊद को ताफ़्रिक
बे तुर्की का कोन्सल नियुक्त करा गए । पिछले युद्ध के समय यह मुल्ला दाऊद ही
तुर्की के काँसल रूप में रंगून मे थे ।

158 / बन्दी जीवन
बलकान युद्ध समाप्त हो जाने पर अथवा यूरोपीय युद्ध आरम्भ हो जाने के
बाद अलीअहमद देश में लौट आए और कुछ दिन घर पर रहकर अपनी स्त्री के
आभूषण आदि बेचकर कुछ थोड़ा रुपया ले अपना व्यापार करने के लिए रंगून
चले आए । कौन्स्टैण्टिनोपल से कायमअली नामक एक और भारतीय मुसलमान
को तुर्क लोगों ने दिसम्बर सन् 1914 में तरुण तुर्क दल का प्रतिनिधि बनाकर
रंगून भेजा । कायमअली और अलीअहमद सिद्दीकी दोनों ने रंगून आकर परस्पर
मिलने के बाद तुर्की के नेतृत्व में बर्मा में विप्लव-षड्यन्त्र आरम्भ कर दिया । कुछ
ही दिनों में इन्होंने स्थानीय मुसलमानों के पास से पन्द्रह हज़ार रुपया चन्दा जमा
कर लिया। इस चन्दा करने के सम्बन्ध में एक बात यहाँ कहे बिना नहीं रह
सकता, वह यह कि बंगाल के सम्पन्न व्यक्ति विप्लववादियों की धन से ज़रा भी
सहायता न करते थे, इसी से बंगाल में राजनैतिक डकैती का प्रादुर्भाव अनिवार्य
हो गया था ।
एक ओर यदि ये पैन-इस्लामिक (विश्व-इस्लामिक) दल के मुसलमान विप्लव
का आयोजन करते थे, तो दूसरी ओर अमेरिका का 'गदर' दल भी निश्चेष्ट न
था। खेमचन्द दामजी नामक एक गुजराती सज्जन किसी समय रंगून से अमेरिका
गए और अमेरिका में आते ही वहाँ के गदर दल में सम्मिलित हो गए। पहले-
पहल इन्हीं खेमचन्द की सहायता से केवल बर्मा में 'गदर' पत्रिका भेजी जाया
करती थी, युद्ध के समय यह पत्रिका गुजराती, हिन्दी और उर्दू तीन भाषाओं
में छापी जाती थी । यूरोप के युद्ध के कारण बर्मा के मुसलमान लांग भी उत्ते-
जित हो उठे थे और इस 'गदर' पत्रिका के प्रभाव से उत्तेजना का स्रोत क्रमशः
बढ़ता गया । इसी समय बम्बई में बिलोची पल्टन के एक सैनिक ने अपने अंग्रेज़
अफ़सर की हत्या कर डाली, जिससे इस सेनादल को फिर यूरोप न भेजकर रंगून
में रोक रखा गया । रंगून के मुसलमान 'गदर' अखबार के सहारे इस सेना में
विप्लव की बातों का प्रचार करते रहे; फलतः जनवरी, 1915 तक यह सेनादल
खुल्लमखुल्ला विप्लव आरम्भ करने को उद्यत हो गया, किन्तु समाचार का
आभासमात्र मिलते ही सेनापतियों ने इस दल को कठोर दण्ड दिये। दो सौ
`बलोचों को भारत की भिन्न-भिन्न जेलों में भेज दिया ।
इस समय सिंगापुर में दो रेजिमेण्टें थीं । उनमें से एक के साथ बर्मा के मुसल-
मान विप्लवी दल का जोड़-तोड़ हो गया । सिंगापुर के कासिममंसूर नामी एक
गुजराती मुसलमान ने रंगून में अपने पुत्र को पत्र लिखा, उसमें तुर्की के जो कौंसल
रंगून में थे उनके नाम भी एक पत्र था । उस पत्र में लिखा था, सिंगापुर का
एक सेनादल विद्रोह करके तुर्की का साथ देने को तैयार है और इस समय तुर्की
का एक लड़ाऊ जहाज़ सिंगापुर में आना आवश्यक है। यह पत्र अंग्रेज़ों के हाथ
लग गया और सिंगापुर की रेजिमेंट को दूसरी जगह भेज दिया गया ।
इसी बीच अमेरिका के 'गदर' दल के लोग भी सिंगापुर में आ उपस्थित
हुए। इन्होंने एक ओर जहाँ उसी सिंगापुर की दूसरी सेना के बीच प्रचार आरम्भ

बर्मा की कहानी / 159

कर दिया, वहां दूसरी ओर बर्मा में भी अपने आदमी भेजे। सन् 1915 के आरम्भ
में ही सोहनलाल पाठक और हसनखां नामक गदर दल के दो व्यक्तियों ने बैंकाक
से रंगून आकर अपना केन्द्र स्थापित कर दिया। यहां एक बात गौर करने की
है कि 'गदर' दल में मुसलमानों को भी लिया जाता था किन्तु मुसलमान विप्लव
दल में हिन्दुओं के लिए स्थान न था।
सिंगापुर की सेना मे प्रचार करने का फल यह हुआ कि इस बार सचमुच ही
विप्लव आरम्भ हो गया। यद्यपि इस सिंगापुर के विप्लवायोजन के साथ पंजाब
के विप्लवायोजन का कोई भी सम्बन्ध न था, तो भी आश्चर्य की बात है कि 21
फरवरी सन् 1915 को सिंगापुर में विप्लव शुरू हुआ और पंजाब में भी ठीक
यही 21 फरवरी विप्लव शुरू करने की तिथि निश्चित हुई थी। इस 21 फरवरी
के दिन सिंगापुर के सैनिक बहुत दिनों के संस्कारों को तोड़कर खुल्लमखुल्ला
अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो गए। एक सप्ताह के लिए सिंगापुर भारतीय सेना के
हाथ में हो गया, किन्तु सिंगापुर भारत के बीच में न था इससे विप्लव की वह
आग चारों तरफ फैल न सकी, और एक सप्ताह के बाद रूसी, जापानी और
अंग्रेजों के लड़ाकू जहाजों ने आकर सिंगापुर को घेर लिया। इस एक सप्ताह-भर
विप्लवियों ने स्थानीय अंग्रेजी सेना के साथ योग्यता से युद्ध किया था, और अंग्रेजी
सेना को उस युद्ध में हार भी माननी पड़ी थी। किन्तु रूस इंग्लैण्ड और जापान
के जंगी जहाज आ जाने पर दो दिन की लड़ाई के बाद अन्त में बाध्य होकर
विप्लवियों को भागना पड़ा। विप्लवियों ने वनों-जंगलों में जाकर आश्रय लिया,
जो भाग न सके, वे वहीं अंग्रेजों के हाथ बन्दी हो गए। सिंगापुर से भागकर एक
ही बार छुटकारा पाने का भी कोई उपाय न था, कुछ ही दिनों में प्रायः सभी
विप्लवी पकड़े गए—अंग्रेज़ी अखबारों मे छपा, सिंगापुर में एक दंगा हो गया,
किन्तु अंग्रेज़ गवर्नमेण्ट और भारतीय विप्लव दल दोनों ही की समझ में निःसंशय
रूप से आ गया कि विप्लवियों का देशी सिपाहियों को हाथ में कर लेना कुछ वैसी
कठिन बात नहीं है।
सिंगापुर की दुर्घटना के बाद 'गदर' दल के दो-एक बचे हुए व्यक्ति बर्मा
चले आये और पूरे उद्यम से फिर वे देशी सेना में विप्लव की बात का प्रचार
करने लगे। एक तरफ से बर्मा के सेनादल में विप्लव प्रचार चलने लगा, दूसरी
तरफ वैसे ही बर्मा के सीमान्त पर स्याम में भी जर्मनों की सहायता से विप्लव
का आयोजन होता रहा। उत्तर स्याम प्रदेश में जर्मन इंजीनियरों की अधीनता
में एक रेलवे लाइन तैयार होती थी। इस कार्य में अधिकांश मिस्त्री और मजदूर
पंजाबी ही थे। इसी रेलवे लाइन की दिशा से बर्मा पर आक्रमण करने की
योजना चलने लगी। अमेरिका, चीन आदि देशों से लौटे हुए सिक्ख और पंजाबी
यहीं स्याम के सीमान्त में इकट्ठे होने लगे।
शिवदयाल कपूर नामक एक सिक्ख (पंजाबी) अमेरिका से लौटते समय
शांघाई आए। शांघाई के एक जर्मन ने इन्हीं की मार्फत बहुत-सा रुपया बैंकाक

160 / बन्दी जीवन
के जर्मन कौन्सल के पास भेजा। इस रुपए का कुछ अंश बर्मा जाने वाले सिक्खों
की खातिर खर्च हुआ और बाकी बैंकाक के एक बंगाली वकील की मार्फत बंगाल
के विप्लवियों के पास भेजा गया। कहते हैं, इसी बंगाली वकील ने, यह सब
विप्लवायोजन की बात अन्त में अंग्रेज गवर्नमेण्ट के सामने खोल दी। जो विप्लवा-
योजन युद्ध छिड़ने से बहुत पहले से ही करना उचित था जब वही आयोजन युद्ध
के समय में बड़ी दौड़-धूप में किया गया, तब ऐसे तुच्छ जीवों से भी काम लेना
आवश्यक हो गया। न जाने किसकी सिफारिश पर इस बंगाली वकील को इस
काम पर लगाया गया था। जो भी हो, इस प्रकार विदेश की विप्लव योजना
विफल हुई।—किन्तु बर्मा के कार्यकर्ताओं ने एक बार और विप्लव की चेष्टा कर
देखी।
सोहनलाल पाठक और नारायणसिंह ये दो जने एक बार फिर बर्मा में
विभिन्न स्थानों की छावनियों में जाकर सिपाहियों के बीच विप्लवमन्त्र का
प्रचार करने लगे। सोहनलाल बर्मा के एक गोलन्दाज सिपाहियों के दल में अंग्रेज-
विद्वेष फैलाने लगे, अंग्रेजों की तरफ रहकर प्राणों की बलि देने में कुछ भी सार्थ-
कता नहीं है, यही बात उन्हें समझाने लगे। यदि प्राण देने ही हों तो स्वदेश और
स्वधर्म के लिए प्राण देने का कितना महान् गौरव है, यह भी सिपाहियों को
समझाने लगे। सिपाहियों द्वारा भले ही उनका कोई अनिष्ट न हुआ किन्तु सिपा-
हियों के एक जमादार ने एक दिन सोहनलाल को पकड़ लिया। उस दिन उस
जगह उस जमादार और सोहनलाल के सिवाय और कोई नहीं था। सोहनलाल
के जामे की पाकेट में तब दो-तीन रिवाल्वर और भरपूर गोलियाँ भी थीं, किन्तु
क्या जाने सोहनलाल उस घड़ी किसी स्वप्न की खुमारी में थे कि उस दिन रिवा-
ल्वर की सहायता से उन्होंने उस प्राणघाती जमादार के हाथ से मुक्ति पाने की
कोई चेष्टा ही नहीं की। उस दिन ऐसी अवस्था में सोहनलाल के मुँह से केवल
कुछ ऐसे ही शब्द निकले थे—“अरे भाई तू मुझे पकड़ा देगा? तू क्या भूला जाता
है कि मैं तेरा भाई हूँ? भाई होकर भाई को पकड़ा देगा? भाई को पकड़ा देने
में तुझे क्या कुछ भी दर्द नहीं होता? अरे, तू कैसा भाई है, भाई होकर भाई को
पकड़ाए देता है?” लेकिन जमादार सोहनलाल को खींच ही ले चला। यह
सच है कि सोहनलाल बहुत बलिष्ठ न थे किन्तु यह बात भी सच है कि कोई भी
आदमी दूसरे एक आदमी को किसी और की सहायता बिना पूरी तरह काबू नहीं
कर सकता, चाहे वह कितना ही बलवान् व्यक्ति क्यों न हो। असल बात यह है
कि सोहनलाल ने उस स्वार्थान्ध जमादार के ऊपर जरा भी शारीरिक बल का
प्रयोग नहीं किया। इस प्रकार अंग्रेजों के पंजे में पड़ने का अर्थ उनके सामने खूब
सुस्पष्ट था, इच्छा होती तो वे उस प्राणलोलुप जमादार के हाथ से, रिवाल्वर की
सहायता से क्षणभर में छुटकारा पा सकते थे। किन्तु न जाने भगवान् ने उनके
मन को उस घड़ी किस दिव्य-लोक में भेज दिया था—वे मानो उस दिन इस
संसार में एकदम थे ही नहीं।

बर्मा की कहानी / 161
सोहनलाल जेल में डाल दिये गए सही, किन्तु जेल के किसी नियम का
पालन वे न करते थे। जेल के अधिकारी जेल के परिदर्शन के लिए आते तो सारे
कैदी जिस प्रकार आईने के मुताबिक उनको सम्मान दिखलाते थे, सोहनलाल
वैसा न करते। वे कहते—मैं अंग्रेजों के राजत्व को ही जब अन्याय और अत्या-
चार मानता हूँ तब अंग्रेजों की जेल के नियमों का ही क्योंकर पालन करूँ ?''
जेल सुपरिटेण्डेण्ट अथवा जेलर उनके सम्मुख आते तो वे और सबकी तरह
सम्मान के लिए उठकर खड़े न होते, इसी से जब बर्मा के लाटसाहब सोहनलाल
के पकड़े जाने के ठीक बाद ही जेल का परिदर्शन करने आए, तब जेलर साहब
ने अत्यन्त संकोच के साथ सोहनलाल से अनुरोध किया कि वे कम-से-कम लाट-
साहब को तो सम्मान दिखाएँ, किन्तु वे इस पर सहमत न हुए। किन्तु ऐसे निर्भीक
और आत्ममर्यादा पर इस प्रकार सुप्रतिष्ठित होते हुए भी सोहनलाल मनुष्य के
साथ मनुष्य की तरह व्यवहार करते थे, कभी किसी प्रकार की अभद्रता नहीं
दिखाते थे। कोई उनके साथ बात करने आए तो वे भद्रतापूर्वक यथोचित सम्मान
करके उससे बात करते। कोई उनके साथ खड़ा होकर बात करे तो वे भी खड़े
होकर बात करते। इसी से लाटसाहब के सोहनलाल के पास आने से ठीक पहले
जेलर सोहन के पास आकर खड़े होकर बात करने लगे। इसीलिए लाटसाहब के
आने पर नए सिरे से उन्हें खड़ा नहीं होना पड़ा, और इस प्रकार जेलर ने अपनी
और लाटसाहब की मर्यादा की उस बार रक्षा की।
लाटसाहब ने प्रायः दो घण्टे सोहनलाल के साथ वार्तालाप किया। लाट-
साहब ने सोहनलाल से बड़ा अनुरोध किया कि वे क्षमा माँग लें; लाटसाहब ने
कहा कि वे केवल एक बार क्षमा की प्रार्थना कर दें, बस, उनकी प्राणदण्ड से रक्षा
हो जायगी। सोहनलाल ने लाटसाहब को भली प्रकार समझाकर कहा कि इस
समय जो कुछ अन्याय या जोर-जुल्म हो रहा है, सब अंग्रेजों की तरफ से ही हो
रहा है, अंग्रेजों ने केवल डंडे के जोर से इस देश पर दखल किया है और डंडे के
जोर से ही इस देश में शासन कर रहे हैं, इसलिए क्षमा-प्रार्थना यदि किसी को
करनी चाहिए तो लाटसाहब को ही, —सोहनलाल ने यह सब बात लाटमाहब
को समझा देनी चाही।
फाँसी होने के दिन जब सोहनलाल को फाँसी के तख्ते पर खड़ा किया गया
तब भी एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने उन्हें फिर एक बार समझाया कि अब भी यदि वे
केवल मुँह से क्षमा-प्रार्थना कर लें तो एकदम उनकी प्राण-दण्ड से रक्षा हो सकती
है। इन अंग्रेज अधिकारी ने सोहन से कहा कि उनके पास आदेश आया है कि
अन्तिम बार एक दफ़ा फिर सोहनलाल से क्षमा-भिक्षा मांगने के लिए अनुरोध
किया जाय। जीवन और मरण के सन्धि-स्थल में खड़े सोहनलाल के मुंह की ओर
जेल के कर्मचारी और राज्याधिकारी अवाक् होकर ताक रहे थे। सोहनलाल
धीरे-धीरे मुस्कराने लगे और अनायास ही बोले—"क्षमा माँगनी हो तो अंग्रेज
मुझसे क्षमा मांगें, मैं किसलिए तुम्हारे पास क्षमा मांगने आऊँगा।" अंग्रेज राज्या-

162 / बन्दी जीवन
धिकारी ने फिर भी सोहनलाल से बड़ा अनुरोध किया, अनेक प्रकार समझाया
कि वृथा प्राण देकर कुछ लाभ नहीं होगा। अन्त में सोहनलाल कुछ सोचकर
बोले—"देखो, यदि मुझे बिलकुल छोड़ दो और यदि मैं इच्छानुसार चला जा
सकूँ, तो क्षमा प्रार्थना करने को प्रस्तुत हूँ।" अंग्रेज राज्याधिकारी ने दुःखित होकर
कहा, "वैसा कोई अधिकार उनके हाथ में नहीं है।" सोहनलाल ने कहा, 'तो
और ज़रा भी देर न करो, अपने कर्त्तव्य का पालन करो, और मुझे भी अपना
कर्त्तव्य पूरा करने दो।"
सोहनलाल को फाँसी हो गई।
बर्मा के मुसलमान विप्लववादियों ने फिर बकरीद के समय विप्लव का
आयोजन किया। किन्तु आयोजन पूरा न होने से विप्लव का दिन पच्चीस दिसम्बर
तक हटा दिया गया। बर्मा की मिलिटरी पुलिस की एक बारक में रिवाल्वर,
डाइनामाइट आदि बहुत-सी चीजें पकड़ी गईं और उसके बाद बर्मा के सब सन्देह-
जनक व्यक्तियों को डिफेंस ऑफ़ इंडिया ऐक्ट के अनुसार नज़रबन्द करा दिया
गया। उसके बाद बर्मा में कोई उपद्रव नहीं हुआ है।

6
परिणाम
विप्लवियों की सभी चेष्टाएँ बार-बार व्यर्थ हुईं, उसका फल यह हुआ कि
स्वदेश में और विदेश में भिन्न-भिन्न राजशक्तियों की चक्की मे पिसते हुए उनकी
लांछनाओं की सीमा न रही । स्वदेश की तो बात ही नही, विदेश में भी वे एक
देश से दूसरे देश को मारे-मारे फिरने लगे और स्वदेश में ‘भारत रक्षा आईन’ के
नीचे ज़रा-सा सन्देह होते ही दल-के-दल युवकों को जेलों में या गाँवों की नज़र-
बन्दी में ठेल दिया जाता । जिनके विरुद्ध तनिक-सा भी प्रमाण पाया गया, उन्हें
अंग्रेज़ सरकार के हाथ कठोर दण्ड भोगना पड़ा । अनेकों ने फाँसी के तख्ते पर
जीवन दिया, बहुतों को कालापानी हुआ । पुलिस का उत्पात या जेल की कठोरता
न सह सकने पर कई युवकों ने आत्महत्या का आश्रय लिया, इन सब करुण-
कथाओं ने कितने ही तरुण युवकों की माताओं के दिल निष्ठुरता से टुकड़े-टुकड़े
कर डाले । विप्लव दल प्रायः छिन्न-भिन्न हो गया । विप्लवियों के नेता या तो
जेल मे डाले गए, या फाँसी के तख्ते पर चढ़े । विप्लव दल जब इस प्रकार छिन्न-
भिन्न होकर देश के चारों ओर बिखर गया तब अनेक स्थानों पर पुलिस के साथ
उनके जो सब सघर्ष हुए, विप्लव युग के इतिहास में वे स्मरणीय रहेंगे ।
पजाब के विप्लवान्दोलन की गम्भीरता और व्यापकता जब प्रकट हो गई,
तब गवर्नमेंट जान गई कि इस विप्लव दल की अब किसी प्रकार अवहेलना करने
से काम न चलेगा । भारत के प्रवीण, विज्ञ और राजनीति-विशारद नेता लोग
बहुत समय से यह बात कहते आते थे कि भारत का यह विप्लव प्रयास बिलकुल
लड़कपन है, किन्तु अंग्रेज़ गवर्नमेंट यह बात अच्छी तरह जान गई थी कि इन
विप्लवियों को यदि कुछ दिन भी निर्विघ्न रूप से अपने अभीष्ट के अनुसार काम
करने का अवसर और सुयोग मिल जाय तो भारत की अवस्था में सचमुच एक
अभूतपूर्व परिवर्तन हो जायगा । भारतीय विप्लववादियों के लिए क्या-कुछ कर
डालना सम्भव है, इसकी अंग्रेज़ गवर्नमेंट जैसी कल्पना करती थी, भारत के
राजनीतिक नेताओं ने वैसी कल्पना कभी नही की । अण्डमन जाने से पहले कुछ
ऊँचे अंग्रेज़ अधिकारियों के साथ मेरी इस विषय में अनेक बार बातचीत हुआ
करती थी। इनकी बातचीत से मैं समझ पाया था कि गवर्नमेंट भारत के
भिन्न-भिन्न आन्दोलनों में से एकमात्र विप्लवान्दोलन को चिन्ता करने लायक

164 / बन्दी जीवन
गिनती थी, इसी से इस गवर्नमेंट में जो कुछ जहर था, इन्हीं विप्लवियों पर
उसका प्रयोग किया गया। इसी से पंजाब के विप्लव आन्दोलन का पता लगते
ही भारत सरकार ने भारत के मंगल के लिए 'भारत-रक्षा-आईन' के समान
अत्यन्त कठोर शासन-प्रणाली जारी कर दी।
इतिहास में जो चिरकाल से होता आता है, भारत की बारी में भी उससे
उलटा नहीं हुआ। जब कोई पराधीन जाति जागने लगती है तब उस जागरण को
व्यर्थ करने के लिए ऐसी ही कठोर शासन-नीति जारी की जाती है। किन्तु जाति
जब सचमुच जाग उठती है तब संसार की कोई भी कठोर नीति उस जागरण को
व्यर्थ नहीं कर सकती, वरन् इस तरह की कठोर दमन-नीति के द्वारा जाति की
केवल शक्ति-परीक्षा होती है। जाति में यदि सचमुच प्राणों की कुछ शक्ति हो
तो यह सब कठोरता जागृति की रुकावट न होकर सहायक हो जाती है। इसी
से जागरण के दिन राजकोप को वास्तव में कोप न समझकर भगवान् का अनुग्रह
समझना उचित है। भारत के विप्लवियों ने भी सचमुच कभी भी इस दमन-
नीति के लिए अंग्रेजों को दोषी नहीं ठहराया, प्रत्युत वे तो यह सोचते थे कि
इन सब कठोरताओं में से गुजारकर भगवान् हमें जाति को पुनरुज्जीवित करने
के लिए आह्वान करते हैं। वे जानते थे कि पराधीन जाति का स्वाधीनता-प्रयास
इन सब कठोरताओं में से गुज़रकर ही सार्थक होता है। सभी दमन-नीति मानो एक
प्रकार के मीलों के पत्थर (Milestone) हैं। कौन पराधीन जाति स्वाधीनता
प्राप्ति के पथ में कितनी आगे बढ़ी है यह सब दमन-नीति ही मानो उसका
परिचय देती है, भारतीय विप्लववादी यही विश्वास करते थे। इसी विश्वास के
कारण वे सब दुःख-लांछनाएँ प्रफुल्ल-वदन से सह सके, प्राणों के बलिदान से ही
जाति में प्राणों का संचार होता है, इसी विश्वास से वे प्राणों की बलि देने से भी
घबराते न थे।
डिफेंस ऑफ़ इण्डिया ऐक्ट जारी होने के बाद से समरी ट्रायल्स (संक्षिप्त
मुकद्दमे) आरम्भ हो गए। बारी-बारी से पंजाब में तीन षड्यन्त्र केस चले। प्रत्येक
मामले में साठ-सत्तर आसामी थे। इन सब मुकद्दमों के फलस्वरूप पंजाब में एक
साथ अट्ठाईस व्यक्तियों को फाँसी हुई। मेरठ पलटन में ग्यारह व्यक्तियों को
फाँसी हुई, सातवीं राजपूत सेना में कई व्यक्तियों को सम्भवतः दिल्ली में फाँसी
हुई, जिन्हें फाँसी न हुई, उन्हें प्रायः सभी को कालापानी हुआ। ऐसी अवस्था
के बाद भी पंजाब के बचे हुए विप्लवियों के बीच फिर विप्लव की योजना चलने
लगी। कुछ अकाली दल इन सब क़ैदी विप्लवियों को जेल से छुड़ाने के इरादे
बाँधने लगे। सिक्खों के एक और दल ने अस्त्र-शस्त्र की ओर ध्यान दिया। उन
दिनों बड़े-बड़े रेलवे-स्टेशनों पर और बड़े-बड़े पुलों के नीचे हथियारबन्द सिपाहियों
का पहरा रहता था। एक बार विप्लवियों के एक छोटे-से दल ने, जान पड़ता है,
केवल सात-आठ व्यक्तियों ने मिलकर अमृतसर के पुल के सिपाहियों पर एकाएक
हमला कर दिया। वहाँ पंद्रह सिपाही, पंद्रह मैगजीन राइफ़लें और प्रायः सात

परिणाम / 165
सौ पचास कारतूस थे। सात-आठ पिस्तौलधारी विप्लवी सात सौ पचास कारतूस
समेत पंद्रह-की-पंद्रह राइफलें छीन ले गए। किन्तु उस समय दल की कुछ
अच्छी विधि-व्यवस्था न रहने से थोड़े दिनों में ही बन्दूकों समेत पांच विप्लवी
पकड़े गए। उन पाँचों को फाँसी हुई। इससे पहले ही अट्ठाईस व्यक्तियों को
फाँसी हो चुकी थी। इन्हें फाँसी देने के बाद भी फिर से कुछ सिक्ख स्कूल-
मास्टरों ने मिलकर विप्लव की धारा को अक्षुण्ण रखने की चेष्टा की, सम्भवतः
उसका सिलसिला आज भी चलता होगा। डा० मथुरासिंह आदि कई विप्लवी
भारत त्यागने के बाद अफ़गानिस्तान में से होकर फ़ारस में और मेसोपोटामिया
की भारतीय सेनाओं में विप्लव की बातों का प्रचार करते रहे। एक बार घटना-
क्रम से डा० मथुरासिंह भारत-अफ़गानिस्तान के सीमान्त प्रदेश में पकड़े गए।
उन्हें भी फांसी हुई। जो इस प्रकार फाँसी और कालापानी से बच पाए उनमें से
अनेकों को इण्टर्नमेंट (नज़रबन्दी) भोगनी पड़ी। उस युग में बंगाल और पंजाब
की जितनी इण्टर्नमेंट और किसी प्रान्त में नहीं हुई, और कालापानी और फाँसी
उस बार पंजाब में ही और सब प्रान्तों की अपेक्षा अधिक हुई।
उक्त प्रदेश में भी बनारस षड्यन्त्र मामले के बाद मैनपुरी को केन्द्र बनाकर
प्रायः एक बरस-भर में ही फिर एक बड़ा विप्लव दल उठ खड़ा हुआ। इस
विप्लव दल की बात भी प्रायः दो-एक बरस के बीच ही प्रकाशित हो गई। इस
प्रसंग में एक बात कह देना चाहता हूँ; रूस में प्रायः कोई भी विप्लवी दो मास से
अधिक समय तक अप्रकाशित रूप से काम न कर पाते थे। दो महीने के अन्दर ही
या तो वे राज्य से दण्ड पा जाते थे, या उन्हें देश छोड़कर विदेश का आश्रय लेना
पड़ता था। भारतवर्ष में अब तक प्रायः देखा गया है कि यहाँ विप्लवियों का
कार्यकलाप और उनका परिचय दो बरस से अधिक समय गुप्त नहीं रह पाता।
बंगाल में उस समय फांसी और कालापानी की अपेक्षा नज़रबन्दी ही अधिक
हुई। इन नज़रबन्दियों के कारण बंगाल का विप्लव दल बहुत-कुछ टूट गया,
तब यह विप्लव दल भिन्न-भिन्न भागों में बँटकर देश मे बिखर गया। उस समय
यदि विप्लवियों के हाथ में उपयुक्त परिमाण में अस्त्र-शस्त्र रहते तो वे सरकार
का राज्य चलाना असम्भव कर डाल सकते थे।
उस समय तक रासबिहारी काशी में ही थे। एक दिन केन्द्र से संवाद आया
कि बंगाल के प्रसिद्ध विप्लवनेता श्रीयुत यतीन्द्रनाथ मुखोपाध्याय को अज्ञातवास
में रहना होगा, और उन्होंने कांशी में आकर रहने की इच्छा प्रकट की है। हमने
परामर्श करके देखा कि उन्हें काशी में बेखटके रहना कुछ ऐसी कठिन बात नहीं
है; किन्तु हमने यह भी देखा कि काशी के बाहर उनके दल की भूल-चूक के
कारण काशी पर भी विपत्ति आ सकती है। जिस दल की प्रत्येक विधि-व्यवस्था
अपने नियन्त्रण के अधीन हो उसकी भूल-चूक के लिए दायित्व लिया जा सकता
है, और उस अवस्था में भूल-चूक पकड़ना और उसका संशोधन करना भी अपनी
ताक़त में होता है। किन्तु जिस दल की विधि-व्यवस्था के ऊपर अपना कोई हाथ

166 / बन्दी जीवन
नहीं, उसकी भूल-चूक पकड़ने का सुयोग कहाँ होता है ? यह सच था कि बंगाल के
बहुत-से क्षुद्र-क्षुद्र दल यतीन बाबू के नेतृत्व के अधीन सम्मिलित हो गए थे, किन्तु
वे पूर्व बंगाल की अनुशीलन समिति के साथ अथवा चन्दननगर के विप्लवियों के
अर्थात् रासबिहारी के साथ सम्मिलित न हुए थे, और न होने की कोई चेष्टा ही
करते थे, जापान जाने से पहले रासबिहारी ने उनके साथ भेंट करने की बहुत
चेष्टा की, किन्तु जिस किसी कारण से हो, भेंट न हो सकी। खैर, जो भी हो, जब
यतीन बाबू के काशी आने की बात चली तब हमने सब तरफ देख-भालकर उन्हें
काशी में रखने का भार लेना स्वीकार कर लिया, किन्तु क्या जाने क्यों उन्होंने
खुद ही काशी न आना ही तय किया ।
उस समय भी यतीन बाबू कलकत्ता छोड़कर गए नहीं। एक दिन वे अपने
पाथुरियाघाट वाले एक मकान पर आये हुए थे। वहाँ और भी कई फ़रार विप्लवी
थे । उस समय उसी घर में घटनाक्रम से थोड़े दिनों का परिचित एक आदमी आ
उपस्थित हुआ। इस आदमी पर वे गुप्तचर होने का सन्देह करते थे, इसी से
भली प्रकार आगे-पीछे देख-भाल करने से पहले ही विप्लवियों में से एक ने इस
थोडे दिन के परिचित आदमी को देखते ही गोली दाग़ दी । सुविधा होती तो
यतीन बाबू को गवर्नमेंट निश्चय से पकड़ लेती। यतीन बाबू को बचाने की
ख़ातिर ही सम्भवतः इस युवक ने इस प्रकार गोली दाग़ दी थी। यह बात सच
है कि यतीन बाबू ने गोली नही मारी, किन्तु इस व्यक्ति ने डाइंग-डिक्लेरेशन
(मरते समय के इज़हार) में यतीन बाबू के नाम पर ही गोली मारने का अभियोग
लगा दिया। इस प्रकार यतीन बाबू के नाम पर फांसी का परवाना लिखा गया।
जब उस व्यक्ति को गोली ही मारनी थी तब फिर डाइंग-डिक्लेरेशन देने का
सुयोग क्यों दिया गया, यह कह नहीं सकता।
लाचार यतीन बाबू को दूसरी जगह जाना पड़ा । यतीन बाबू के लिए एक
निरापद स्थान ठीक हुआ। वहाँ जाने का समय आया तो यतीन्द्रनाथ अपने
साथियों से कह उठे, "जब तक मैं भली भाँति न जान लूं कि तुमने और सबके
लिए भी ऐसे ही निरापद स्थान ठीक कर रखे हैं, जैसा मेरे लिए किया है, तब तक मैं
तुम्हारा यह बन्दोबस्त मान नहीं सकूंगा, हम सब बरखास्त किये हुए सिपाही हैं,
हर घड़ी मृत्यु का आदेश सुनने की प्रतीक्षा में हैं, इसीलिए सभी एक संग रहना
चाहते हैं, जिससे एक प्रभावशाली मुठभेड़ (effective struggle) की जा सके,
which will create a moral impression जिससे जनता पर एक नैतिक
प्रभाव हो सके ।
अन्त में उनकी इच्छानुसार ही व्यवस्था हो गई, जिससे वे लोग पाँच व्यक्ति
बालेश्वर के निकट एक अड्डा बनाकर रहने लगे। इधर विप्लवान्दोलन भी बन्द
नहीं हुआ। दूर बालेश्वर में रहते हुए भी यतीन्द्र बाबू विप्लव कार्य की परि-
चालना करते थे। यदि विप्लवी लोग भागकर फिर से विप्लव के कार्य में ध्यान न
देकर निश्चेष्ट होकर केवल अपने को गुप्त रखने का ही खयाल करते, तो मालूम

परिणाम / 167
होता है, कोई भी विप्लवी पकड़ा न जाता। विप्लवी लोग अपने को गुप्त रखकर
भी बराबर विप्लव कार्य में लिप्त रहते थे, इसी कारण वे बार-बार विपत्ति में
पड़ते थे। किन्तु केवल प्राण बचाना ही तो विप्लवियों का उद्देश्य न था। जीवन
यदि देश के काम में न लगा तो जीवन बना रहने से क्या बनेगा, यही थी
विप्लवियों की धारणा। उधर पूर्व परिच्छेद में उल्लिखित उसी बैंकॉक के वकील
ने जब विप्लवायोजन के सब सम्वाद सरकार के पास खोल दिये तब उसी सिल-
सिले में कलकत्ता में और कुछ धर-पकड़ हुई। इसी सूत्र से फिर यतीन्द्रनाथ के
अड्डे का सम्वाद भी पुलिस को मिल गया। यतीन्द्रनाथ को भी पता लग गया
कि पुलिस को उनका सुराग़ मिल गया। वे चाहते तो उसी समय भाग सकते थे,
पर तुच्छ प्राणों के डर से यतीन्द्रनाथ भागना न चाहते थे। उद्देश्य-सिद्धि के लिए
यदि उन्हें दूसरी जगह जाना होता तब भी वे अपने साथियों को छोड़कर भागने
को राज़ी न थे। वे अपने साथियों के जीवन और अपने जीवन में कोई भेद न
देखते थे। इसी से तय हुआ कि सभी एक सग ही जाएँगे, किन्तु उनके साथियों में
से दो उस समय बारह मील दूर घने जंगल में थे। उनका किसी प्रकार भी
छोड़कर जाना नही हो सकता। यतीन्द्रनाथ अपने दूसरे संगियों को ले अँधेरी
रात में पहाड़ी रास्ते से जंगल के बीचोंबीच अपने साथियों को लाने के लिए
चल पड़े। अपरिचित रास्ते पर बारह मील रास्ता तय करके फिर बारह मील
वापम आकर दूसरी जगह जाना असंभव था। तब भी यतीन्द्र बाबू का हृदय
इसे असम्भव कहकर रह नही सकता था। असाध्य साधन ही उनके जीवन का
व्रत था—उस दिन भी उस असाध्य साधन में ही वे अग्रसर हुए। लौटते हुए रात
बीत गई। उस समय जंगल के साथ-साथ गाँवों के पड़ोस मे नदी के किनारे-
किनारे चौकियाँ बैठ गई थी; किन्तु इतना आयोजन होने पर भी वे बस्ती में
घुसकर बालेश्वर की ओर भाग चले। उनके साथ चित्तप्रिय, मनोरंजन, नीरेन्द्र
और ज्योतिष ये चार युवक थे। उस समय सबेरा हो गया था, गाँव के लोगों
को पुलिस ने समझा दिया था कि एक भयकर डकैतों का दल उनके इलाक़े में
छिपा हुआ है, उन्हें पकड़ने अथवा पकड़ा देने पर यथेष्ठ पुरस्कार दिया जायगा।
पिछले दो दिन यतीन्द्रनाथ को खाना या सोना कुछ नसीब न हुआ। दिन दोपहर
की धूप में उन्हें फिर भी ग्राम, नदी, नाले पार करके चलना पड़ रहा था। राह
में एक नदी पार होते समय माझी से कहा कि सारा दिन उन्हें कुछ खाने को नही
मिला, थोड़ा-सा भात रांध दे तो उनके प्राण बचें, किन्तु हिन्दू माझी अपने जन्म-
जन्मान्तरों के संस्कारों की रक्षा में ही व्यस्त रहा ब्राह्मण की प्राण-रक्षा हो या
न हो, ब्राह्मण को भोजन करा के वह नरक जाने को प्रस्तुत न था, वह नीच जाति
का होकर ब्राह्मणों को किसी प्रकार भात राँधकर न दे सकता था, इसी कारण
भात रांधने की हाँडी भी न दे सकता था। इधर पुलिस को भी सन्धान मिल गया
कि यतीन्द्रनाथ अमुक गाँव में से गुज़र रहे हैं। यतीन्द्रनाथ के पीछे-पीछे सशस्त्र
पुलिस दल छूट पड़ा। इस प्रदेश में यदि विप्लवियों का आर्गनाइजेशन (संगठन) रहा

108 / बन्दी जीवन
होता तो उस विपत्ति में भी वे रक्षा पा सकते थे। किन्तु आर्गनिजेशन न रहने
से उन्हें क्रमशः एक गांव से दूसरे गांव भागना पड़ा। इस प्रकार सन्ध्या के बाद
बालेश्वर के निकट एक जंगल में आ उपस्थित हुए। उस समय ज़िले के मैजिस्ट्रेट
और ज़िले के सुपरिटेण्डेण्ट, आर्मड् (सशस्त्र) पुलिस सर्चलाइट (search
light) इत्यादि खण्डयुद्ध (skirmish) का सब सरंजाम संग लेकर यतीन्द्रनाथ
के पीछे दौड़ते आते थे। यतीन्द्रनाथ दल सहित आगे-आगे जा रहे थे, और पीछे
पुलिस दल दो भागों में बँटकर जंगल के दोनों बाजू पर सर्चलाइट छोड़ते हुए
क्रमशः एक-दूसरे के नजदीक होते हुए यतीन्द्रनाथ का पीछा कर रहा था। इस
प्रकार जंगल में से खिसक जाना यतीन्द्रनाथ के लिए सम्भव न रहा। भोर भी हो
गया। अब और निस्तार नहीं—पुलिस बहुत ही निकट थी। उस समय यतीन्द्र-
नाथ के साथियों ने सजल नेत्रों से प्रार्थना की—वे मरते हैं तो मरें, यतीन्द्रनाथ
कपटवेश से दूसरी जगह निकल जायें। किन्तु यतीन्द्रनाथ ने यह प्रस्ताव नहीं
माना। वे बोले—"प्यारे भाई, देखो, विचार करो, हम सब पिता-माता की
स्नेहमयी गोद, स्त्री-पुत्रों का माया-बन्धन, बन्धु-बान्धवों का प्यार-दुलार और
घर की सुख-शान्ति छोड़कर आये हैं, एक संग काम करेंगे यही कहकर न ? अब
इस विपत्ति के समय वह प्रण क्योंकर छोड़ दें ? मनुष्य तो अमर नहीं है। एक-
न-एक दिन उसे मरना ही होगा। तब कायरों की तरह मरने से लाभ क्या !"
युद्ध करना ही तय पाया। एक ओर प्रायः हज़ार से अधिक गाँववाले, डाकू
पकड़े जा रहे हैं यह समझकर, हथियारबन्द पुलिस सेना का साथ दे रहे है—
दूसरी ओर हैं केवल पांच विप्लवी ! वे फिर जंगल छोड़कर गांव मे आ घुसे।
भूख, अनिद्रा और राह की मेहनत से वे सभी हारे-थके थे। एक पैसे का चना-
चबेना खरीदकर खा लेने का भी चारा न था। इतने मे दोनो दलों ने एक-दूसरे
को देख लिया, दोनों ओर से गोली चली। पुलिस की ओर के एक साहब
विप्लवियों की ओर ज़रा अधिक आगे बढ़े, उसी समय चित्तप्रिय की एक गोली से
उनकी टोपी आसमान में उड़ गई। पुलिस के साहब फिर आगे न बढ़े। विप्लवी
लोग ऊँची-नीची ज़मीन पर लेटकर निशाना बांधकर गोली छोड़ने लगे। पुलिस
की ओर से भी धारा-प्रवाह गोलियां बरसने लगीं। इस प्रकार प्रबल शत्रुओं के
मुक़ाबले में थके-मांदे, भूखे-प्यासे पांच आदमी कब तक युद्ध कर पाते ? विप्लवियों
की गोलियां भी खतम होने को आईं। वे सभी घायल हो गए थे। किन्तु घायल
होने पर भी उन्होंने हथियार नहीं रखे। इतने में एक घातक गोली आकर
चित्तप्रिय को अमर-धाम ले गई, और सब भी उस समय बुरी तरह घायल थे।
यतीन्द्रनाथ उस समय साथियों से बोले, "अब और शक्ति क्षय करने से कुछ लाभ
न होगा। चित्तप्रिय गया, मैं भी बचूँगा नहीं, तुम अब वृथा प्राण न दो, शायद
तुम फिर भविष्य में कुछ काम कर सको," किन्तु साथी लोग लड़कर प्राण देना
चाहते थे, पर यतीन्द्रनाथ उनके प्राण बचाना चाहते थे। अन्त में उन्होंने यतीन्द्र-
नाथ के आग्रहपूर्ण अनुरोध से आत्मसमर्पण कर दिया। बहुत खून गिरने से

परिणाम / 169
यतीन्द्रनाथ का शरीर अबसन्न होकर गिर पड़ा, प्यास से उनका गला सूख गया
था । डूबती आवाज में उन्होने कहा, "पानी ! " बालक मनोरंजन के शरीर से
उस वक्त रक्त-धारा बह रही थी । किन्तु नेता की इस अन्तिम आकांक्षा को पूर्ण
करने के लिए वह उस समय भी पास के जलाशय से चादर भिगोकर पानी लाने
के लिए चल पड़ा । इस दृश्य से पुलिस के साहब भी पिघल गए । वे मनोरंजन
से बैठने को कहकर कोई बर्त्तन न होने से अपनी टोपी में ही जल भरकर मरते
आदमी के मुंह में डालने लगे । गले में पानी पहुँचने पर यतीन्द्रनाथ के मुंह से
बात निकली, उस समय स्निग्ध मधुर हँसी हँसकर वे साहब से बोले, "इस मामले
में मैं ही अकेला उत्तरदायी हूँ, इन मेरे साथियों ने मेरे आदेश का ही पालन
किया है ।" यतीन्द्रनाथ ने कटक के अस्पताल में प्राण-त्याग किया । मनोरंजन
और नीरेन्द्र को फांसी हुई । ज्योतिष को आजन्म कालेपानी की सजा मिली ।
यही ज्योतिषचन्द्र बच गए थे, इसी से उनके पास से यह सब संवाद पाकर आज
हम देशवासियों को दे सके हैं । अण्डमन जेल मे नाना रूप निर्यातन्रों को सह न
सकने से ज्योतिषचन्द्र वही पागल हो गए थे । आजकल सुना है वे बहरामपुर के
पागलखाने में रहते हैं ।¹
मृत्यु की गोद में बैठे हुए, कटक के फांसी-घर के अंधेरे कोने से मनोरंजन
और नीरेन्द्र ने जो अन्तिम चिट्ठी कलकत्ते भेजी थी, उस अतीत की स्वप्नमय
कहानी प्रकाशित करते हुए छाती मे कैसे-कैसे स्पन्दन अनुभव होते हैं ! उन्होने
लिखा था—
“चित्तप्रिय और दादा (भैया) चले गए, हम भी जाते है । आशा है आप लोग
पहले की तरह काम चलाएँगे । भगवान् आप लोगो को सफलता दान करेंगे ।
आज हमारे जीवन की विजयदशमी है । अलविदा ! अलविदा ! जो चले गए
उन्हें लौटा लाने का कोई उपाय नही । किन्तु ज्योतिष की मुक्ति के लिए क्या
करना चाहिए, यह उनके स्वदेशवासी ही निश्चय कर सकेंगे ।”
इस चिट्ठी के प्रसंग से एक और चिट्ठी की बात याद आ गई । जैन-
धर्मावलम्बी होते हुए भी उन्होने कर्त्तव्य की खातिर देश के मगल के लिए सशस्त्र
विप्लव का मार्ग पकड़ा था । 'निमेज'² के खून के अपराध में वे भी जब फांसी की
कोठरी में क़ैद थे, तब उन्होने भी जीवन-मरण के वैसे ही सन्धिस्थल में अपने
विप्लव के साथियों के पास जो पत्र भेजा था, उसका सार कुछ ऐसा था, “भाई,
मरने से डरे नहीं और जीवन की भी कोई साध नही है; भगवान् जब जहां जैसी
अवस्था में रखेंगे, वैसी ही अवस्था में सन्तुष्ट रहेंगे ।” इन दो युवकों में से एक का

  1. पीछे फ़ारवर्ड में छपा था कि ज्योतिषचन्द्रपाल बहरामपुर के पागलखाने मे स्वर्गवासी हो
    गए ।
  2. निमेज के महन्त का वध सन् 1913 में हुआ था । रोलट कमेटी की रिपोर्ट के बिहार-
    उड़ीसा प्रकरण (आठवे अध्याय) मे उसका उल्लेख है ।

170 / बन्दी जीवन
नाम था मोतीचन्द और दूसरे का नाम था माणिकचन्द या जयचन्द ।
इन सब विप्लवियों के मत के तार ऐसे ऊँचे सुर में बँधे थे, जो प्रायः साधु
और फ़क़ीरों के बीच ही पाया जाता है। इन सब विप्लवियों के जो प्रतिपक्षी थे,
वे अंग्रेज भी अनेक बार दिल खोलकर इनकी प्रशंसा किए बिना नही रह सके।
उस जमाने के खुफ़िया विभाग के सर्वेसर्वा, आजकल कलकत्ता के पुलिस-कमिश्नर
मि० टेगार्ट ने, सुनते हैं, परलोक गत प्रतिष्ठित बैरिस्टर मि० जे० एन० राय को
यतीन्द्रनाथ के सम्बन्ध में कहा था, “Though I had to do my duties I
have great admiration for him. He was the only Bengali who
died in an open fight from a trench.” (यद्यपि मुझे अपना कर्त्तव्य
पालना पड़ा, पर मेरे दिल में उसके लिए बड़ा आदर है। वह एकमात्र बंगाली
था जो एक खुली लड़ाई में खन्दक से लड़ता हुआ मारा गया)।” किन्तु टेगार्ट
साहब ने जिस समय यह बात कही थी उसके बाद और भी अनेक बंगाली ऐसी
ही खुली लड़ाई में काम आए, उनका भी थोड़ा-सा परिचय पाठको को देता
हूँ ।
9 सितम्बर सन् 1915 को यतीन बाबू और उनके साथियों ने खुली लड़ाई
में प्राण दिए। किन्तु उसके बाद भी प्रायः 1918 तक विप्लवियों के अस्तित्व का
परिचय विशेष रूप से मिलता रहा। सन् 1916 के अन्तिम भाग में खुफिया
विभाग के डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट बसन्तकुमार चट्टोपाध्याय पर, जो इससे पहले दो
बार आश्चर्यमय तरीकों से बच गए थे, तीसरी बार विप्लवियों ने हाथ साफ़
किया। सन् 1917 में गोहाटी में विप्लवियों के साथ पुलिस का खंड-युद्ध
(skirmish) हुआ, और सन् 1918 में ढाका में फिर पुलिस के साथ विप्लवियों
का सशस्त्र मुकाबला हुआ, जिसमें विप्लवियों के दो व्यक्ति खेत रहे। पाबना मे
भी एक छोटी-मोटी मुठभेड़ हुई, इस सबके अलावा खून-डकैती तो जारी ही थी।
इन सब सशस्त्र मुठभेड़ों का थोड़ा-बहुत परिचय यहाँ देते हैं। सम्भवतः सन् 1916
में विप्लव दल की ओर से बिहार में विप्लववाद का प्रचार करने को वीरभूम के
नलिनी वाक्चि भागलपुर के कालेज में पढ़ने भेजे गए। कुछ ही दिन में इस
बंगाली पर पुलिस की नज़र पड़ गई। नलिनी पढ़ना छोड़कर फ़रार हो गए।
नलिनी छात्रवृत्ति पाने वाले अच्छे विद्यार्थी थे, पर छात्रवृत्ति के झंझट में कौन
पड़े ? नलिनी एकदम खालिस बिहारी बनकर बिहार के शहर-शहर में घूमने
लगे। कुछ दिन बाद फिर पुलिस की नज़र में पड़े। नलिनी बंगाल आए तब था
सन् 1917, बंगाल का उस समय बुरा हाल और टेढ़े दिन थे—चारों ओर थी घर-
पकड़, खाना-तलाशी, इण्टर्नमेण्ट (नज़रबन्दी), डिपोर्टेशन (देशनिकाला) और
गोलियों की बौछार ! इसी से बंगाल में रहना तब बेखटके न था। विप्लव दल में
तब यह फैसला हुआ कि दल के अच्छे-अच्छे कार्यकर्त्ताओं को आसाम के किसी
अच्छे स्थान में रिज़र्व फोर्स (सुरक्षित सेना) के रूप में रखा जाए। फलतः नलिनी
वाक्चि, नलिनी घोष, नरेन बैनर्जी और अन्य अनेक लोगों ने गोहाटी (आसाम)

परिणाम / 171

में आकर आश्रय लिया । सोते समय उनके बिछौने के तले भरी रिवाल्वरें रहतीं
और उन्हीं में से एक-एक आदमी दो-दो घंटे के लिए पहरेदार के रूप में खिड़की
के नजदीक सावधानी से बैठा रहता। कलकत्ते की पुलिस ने किसी गिरफ्तार
विप्लववादी के पास से गोहाटी का संवाद पाकर, 9 जनवरी सन् 1917 को यह
मकान घेर लिया। पहरेदार ने पुलिस को आते देख सबको जगा दिया, पर
चुपचाप ही। रिवाल्वर और पिस्तोल हाथ में लेकर सभी बाहर आकर पुलिस
पर गोलियां दागने लगे। इस एकाएक आक्रमण से पुलिस छिन्न-भिन्न हो गई,
और इसी बीच विप्लवी भी पहाड़ की ओर खिसक गए, किन्तु तीसरे पहर
अनगिनत सशस्त्र पुलिस ने आकर सारी पहाड़ी के आस-पास घेरा डाल दिया।
दोनों ओर से गोली चली। बहुत-से घायल होकर पकड़े गए। इनमें से केवल दो
जन पुलिस की आँख बचाकर भाग सके। इन दो में से एक यही नलिनी थे। छः
दिन रास्ता चलकर पहाड़ पार होकर नलिनी लामडिंग स्टेशन पर आ पहुँचे ।
वह यात्रा क्या सीधी बात थी ? बगैर खाये और सोये प्रतिदिन चढ़ाई-उतराई पर
गोड़े तोड़ने पड़े थे। सदा पुलिस की नज़र से अपने को बचाते हुए, कभी वृक्ष पर
चढ़कर, कभी पहाड़ की चोटी पर--किसी चट्टान पर सोकर रात कटती थी।
बराबर तेज चाल से पहाड़ की चढ़ाई-उतराई में चलते-चलते हाथ-पैर की तलियों
मे दरारें पड़ गईं। फिर क्या केवल चलने का ही कष्ट था ? पहाड़ की एक किस्म
की चिपचिपी चिचड़ी नलिनी के माथे और पीठ में चिपट गई, अनेक तरह से
खींचने-छुटाने से भी वह नहीं छूटी। इस चिचड़ी का विष चढ़ जाने की पीड़ा से
जर्जरित होकर नलिनी एकदम बेहाल हो गए। अस्तु, मौत के साथ लड़ाई लड़कर
आसाम की पुलिस के हाथ से बचकर नलिनी बिहार आए; किन्तु वहाँ रहना
निरापद न था। यह देख वे फिर बंगाल चले आए। हावड़ा स्टेशन पर उतरकर
जिनके मिलने की आशा की थी उनमें से किसी को न देख पाया। संग में एक
रिवाल्वर था। कहाँ जाएँ ? पखवाड़े से अधिक हो चुका था जब से न खाना, न
सोना, न कोई और नियम रहा था, शरीर टूट चुका था, जहरीला कीड़ा तब भी
माथे और देह में चिपटा हुआ था, हावड़ा में ही नलिनी को तेज़ बुखार हो गया।
लाचार कोई उपाय न देखकर वे किले के मैदान के एक पेड़ के नीचे सो गए। मुर्दे
की तरह दिन-रात वही पड़े रहे। परले दिन दैवयोग से उनके एक परिचित
विप्लवी ने उन्हें देख लिया। उनके सब अंगों में उस समय चेचक के चिह्न दिखाई
दिए। कलकत्ते में विप्लवियों की अवस्था उस समय अत्यन्त शोचनीय थी, प्रायः
सभी विप्लवी पकड़े जा चुके थे। टका-पैसा तब किसी के हाथ में न था, दो-चार
जन जो बाकी थे वे भी तब क्षीण आशा के साथ इधर-उधर घूमते फिरते थे।
कलकत्ते की एक छोटी-सी कोठरी में उन्हें रखा गया। चेचक से उनकी आँखें
और मुँह ढक गए, जिह्वा अचल हो गई थी। तीन दिन तक बात करना भी बन्द
रहा। इस प्रकार पैसा पास न होने से चिकित्सा कराए बिना दिन काटते रहे। इस
मकान में उस समय केवल एक और विप्लववादी अपने-आपको छिपाये हुए थे।

172 / बन्दी जीवन
मृत देह की यथोचित क्रिया करने को भी लोग कैसे जुटेंगे, यह समझ में न आता
था। सन् 1918 में विप्लवियों की अवस्था ऐसी ही शोचनीय हो गई थी। किन्तु
नलिनी इस बेवक से भी मरे नहीं। मृत्यु और भी महनीय रूप में दिखाई देने के
लिए उस समय तक ढाका में प्रतीक्षा कर रही थी। चंगे होकर नलिनी बुझते
विप्लव दीप का भार लेकर फिर ढाका में आ रहे। नलिनी और तारिणी मजूमदार
एक ही मकान में रहते थे। सन् 1918 की 15 जून को भोर के समय पुलिस ने
फिर नलिनी का मकान घेर लिया। फिर दोनों ओर से गोली चली। तारिणी के
अंगों में बहुत गोलियां लगने से वे वहीं मरकर गिर पड़े। नलिनी ने गोली खाकर
भी भागने की चेष्टा की, परन्तु फिर बन्दूक की गोली से घायल होकर उनका
शरीर भी जमीन पर लोटने लगा।
विप्लववादी नलिनी घायल अवस्था में अस्पताल में लेटाये हुए हैं—पुलिस
नाम-धाम लेने में व्यग्र है,—डाइंग-डिक्लेरेशन—मरते समय का इजहार, मांगती
है।
मृत्यु-शय्या पर लेटे हुए घायल विप्लववादी असह्य यन्त्रणा सहते हुए मृत्यु
की प्रतीक्षा में हैं। ऐसे समय साधारण व्यक्ति अपने को छिपा नहीं सकता, वरन्
इच्छा होती है कि उसके कार्यों को देशवासी भली भांति जान जाएँ। जिनके
लिए वह मरता है वे जान जाएँ कि किस प्रकार वह दूसरों के लिए प्राण दे गया,
साधारण मनुष्य की यही इच्छा होती है। किन्तु विप्लववादियों की अपने को
छिपाने की शैली साधारण नहीं होती। शिक्षा और साधना के बिना आत्मगोपन
का वैसा सामर्थ्य आता ही नहीं। मृत्यु के समय भी इच्छा नहीं है, कोई उन्हें
जान जाए, या कोई उनका 'मूल्य' समझ ले—कोई मैसेज (सन्देश) नही है¹—
'Unwept, unhonoured, unsung' ही वह जाना चाहता है! वह नहीं चाहता
कोई उस पर आंसू बहाये, कोई उसका नाम याद करे, कोई भी उसका गीत
गाए! —इसलिए मृत्यु-शय्या पर पड़े विप्लववादी के क्षीण कण्ठ से उत्तर
निकला, 'Don't disturb please, let me die peacefully', 'तंग न करो
भाई, मुझे शान्ति से मरने दो।'
पुलिस ने अनेक प्रकार से बात निकालने की चेष्टा की—कहा नाम तो
बताओ—घर कहाँ है? किन्तु उसका वह एक ही उत्तर था, "don't disturb
please, let me die peacefully—कृपा कर और तंग न करो भाई, शान्ति से
मरने दो।"
इस प्रकार जो मृत्यु को महिमामय बना सकते थे, इस प्रकार जिन्होंने आत्म-
गोपन करना सीखा था, उनकी कहानी पर देशवासियों ने क्या कभी गौर करके

  1. इस प्रसंग में असहयोग के दिन की याद आ जाती है, जब प्रत्येक छोटे-बड़े नेता चार दिन
    की हवालात होने पर भी कॉलमों लम्बे 'मैसेज' अखबारों में भेजना अपना पहला कर्त्तव्य
    समझते थे।

देखा है ? वे लोग जीवन की सब आशा-प्रतीक्षा अपूर्ण रखकर संसार से एकदम
निश्चिन्त हो गए हैं। प्रतिष्ठा की रत्ती-भर भी कामना उन्होंने नहीं रखी। मृत्यु
के दरवाजे पर पहुँचकर, जहाँ कोई बात खुल जाने का डर नहीं, वहाँ भी ख्याति
का निषेध करके वे शान्ति से मरते हैं। वे अपने कर्म से यदि किसी को तृप्त करना
चाहते हैं तो अपने ही अन्तरारमा को, इसीलिए किसी और से कुछ भी अपेक्षा न
रखकर शान्ति से मरना चाहते हैं। संसार की किसी चीज की भी चाह नहीं है, वे
केवल देने के ही धनी हैं।
इन सब विप्लवियों को न जाने क्या कहकर पुकारना चाहिए ? शायद ये
पागल थे, या शायद ये भ्रान्त निर्बोध बालक थे, क्योंकि हमारे इस अभागे देश के
अभिज्ञ नेता और राजनीति-विशारद विचक्षण पंडित इन्हें इन्हीं शब्दों से पुकारते
रहे हैं।
इन विप्लवियों का सबसे बड़ा दोष, जान पड़ता है, यही था कि ये अपने
उद्देश्य-साधन में कृतकार्य नही हो सके। मास के बाद मास और बरस के बाद
बरस विप्लव के लिए अनथक परिश्रम करने के बाद भी ये केवल एक बड़ी व्यर्थता
का ही उपार्जन कर सके ? जिस पथ का अन्तिम परिणाम केवल व्यर्थता हो वह
पथ क्या भ्रान्त नही है ? इस व्यर्थता का कुछ भी मूल्य है ? भारत के अभिज्ञ
नेता और विचक्षण समालोचक विप्लवियों से ऐसे ही प्रश्न प्रायः करते रहे
हैं।
व्यर्थता के एक ही पहलू पर हमारा ध्यान जाता है; किन्तु इस व्यर्थता की
आड़ में जगत् की श्रेष्ठ सम्पद् किस प्रकार अपने को छिपाए रहती है, विफलताओं
के द्वारा किस प्रकार शक्ति का संचार होते-होते एक दिन इस व्यर्थता के बीच
सार्थकता आकर दर्शन देती है, विफलता और पराजय के निराशा-वेदना पूर्ण
अवसाद के समय में इन सब बातों को हम में से बहुत-से हृदयंगम नही कर पाते।
सभी समाजों में, सभी समयों मे विप्लवी लोगों पर समाज के विज्ञ और अभिज्ञ
लोग हँसते और लांछन लगाते रहे हैं। इसका कारण यही है कि प्रायः सभी देशों
के सभी विप्लवियों की पहली चेष्टाएं व्यर्थ हुई हैं, और समाज के विज्ञ और
अभिज्ञ लोग इसी व्यर्थता के माप से ही सब विषयों पर विचार करते रहे हैं। उसी
नियम से भारत के विप्लववादी भी विज्ञ और अभिज्ञ लोगों के मत में भ्रान्त-पथ
के यात्री हैं। और इन समालोचकों में से जो बड़े ही प्रवीण और होशियार हैं वे
इन विप्लवियों को 'ईडियट' (बुद्धू, पागल) कहने में भी संकोच नही करते।
भारत की लब्धप्रतिष्ठ मासिक पत्रिका 'मॉडर्न रिव्यू' के विचक्षण सम्पादक ने
विप्लवियों को निर्देश करके कहा था कि 'यदि भारत में कुछ भी लोग सशस्त्र
विप्लववादी हैं तो भारतवासियों को निश्चय से अपनी बुद्धि-विवेचना पर सन्देह
करना होगा।'
विप्लवियो और समालोचको मे भेद यही है कि विप्लवी लोगों की अपने
आदर्श पर अटूट श्रद्धा है, इसीलिए उन्होने अद्भुत निष्ठा के साथ अपने आदर्श

बनारस षड्यन्त्र अभियोग, आजीवन कारावास एवं कालापानी (अण्डमान) प्रस्थान

174 / बन्दी जीवन
की ओर जानेवाले पथ पर चलते हुए जीवन बिताया है, और इन समालोचक
लोगों ने आराम-चौकी पर बैठकर समालोचना करने को ही जीवन का पेशा बना
डाला है और बहुतों का तो यह समालोचना करना ही जीविका अर्जन करने
का मुख्य अवलम्ब हो गया है। जीविका कमाने के लिए अनेक बातों का हिसाब
करके चलना होता है, किन्तु इस प्रकार हिसाब करके चलने से हमेशा सत्य की
मर्यादा को अटूट रखना शायद सम्भव नहीं होता। इस सबके अलावा विप्लवियों
में और इन सारे समालोचकों में एक और भी बड़ा भेद है, विप्लवियों के नजदीक
जो चीज़ 'Faith' (श्रद्धा) है; समालोचकों के लिए वह केवल 'Opinion
(सम्मति) है। यह 'सम्मति' प्रायः सफलता का मोह पार नहीं कर सकती; इसी-
लिए फलाफल पर निर्भर होकर ही बहुधा 'सम्मति' बनती है। किन्तु जो लोग
इतिहास-स्रष्टा के आसन पर बैठते हैं वे इस 'सम्मति' की परवाह नही करते;
वे निष्ठावान् और श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। विफलता उन्हें श्रद्धा-भ्रष्ट
नही कर पाती। इसी कारण इतिहास मे वे चिरस्मरणीय हो जाते हैं; इसी से
ये श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति ही जगत् में कुछ स्थायी काम कर जाने मे समर्थ होते
हैं।
भारत के विप्लववादी भी ऐसे ही श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति थे। भारत के इन
विप्लवियों की ओर निर्देश करके ही प्रसिद्ध कानून-वेत्ता बैरिस्टर नार्टन साहब
ने एक बार कहा था, "ये सब विप्लवी अपने अभीष्ट साधन मे कृतकार्य नही हो
पाते, इसी कारण आज वे सरकार के अपराधी हैं, किन्तु यदि ये अपने उद्देश्य को
सफल कर सकते तो फिर यही संसार मे स्वदेश-भक्त, वीर तथा साधक कहकर
पूजे जाते।"
भारतीय विप्लवियों ने जो मार्ग ग्रहण किया था उस मार्ग से ही भारत की
मुक्ति होगी कि नहीं, कौन कह सकता है ! शायद उन्होंने उल्टा ही रास्ता ग्रहण
किया हो; किन्तु उनके साथ हमारा मत नही मिलता, इसी कारण तो उन्हें
'ईडियट' (बुद्धू) कहना उचित नहीं है। न जाने संसार के सभ्य लोगों में भारत-
वासियों के मान-इज्जत की इन विप्लवियों के द्वारा अधिक रक्षा हुई है अथवा
इनके विरोधी समालोचकों की युक्तियों के ज़ोर पर ! तो भी यह बात तो हम
जानते हैं कि गत साठ बरसों तक जब रूसी विप्लववादियों के सभी प्रयास निष्फल
हुए थे, जब प्रबल प्रतापी आस्ट्रिया की राजशक्ति के विरुद्ध इटली के मुट्ठी-भर
विप्लववादियों ने पहले-पहल सिर उठाया था, तब इन देशों के विप्लववादियों को भी
ऐसे ही व्यंग्य और गालियां सहनी पड़ती थीं। साठ बरस के अनथक परिश्रम के बाद,
अनेक बाधाओं और व्यर्थताओं में से गुज़रकर सारे जगत् की उपेक्षा और प्रति-
कूलता को सहकर आज रूसी विप्लववादियों की आशा सफल होने जा रही है।
प्रायः चालीस बरस की कशमकश के बाद, कितने त्याग, कितने कष्ट और कितनी
अशान्तियों को लांघकर इटली ने स्वाधीनता पाई थी। किन्तु जो इस मुक्ति-पथ
के प्रथम यात्री थे उन्हें उनकी पहली विप्लव चेष्टाओं के व्यर्थ होने के दिन