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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 408 में से

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पृष्ठ 159

की कूटनीति की कहानी, तुर्की के भाग्यनियन्ता उस यंग टर्क (तरुण तुर्क) दल
की कहानी, किस प्रकार इस तरुण तुर्क दल ने तुर्की में पहले-पहल अपने को प्रकट
किया, किस प्रकार इस तरुण दल ने मृतप्राय तुर्क समाज में नवचेतना का संचार
करके विप्लव पथ में चलते हुए अब्दुलहमीद के समान प्रबल दुर्दान्त और क्रूर
सुलतान को पदच्युत करके तुर्की में नवीन नियमतन्त्र राज्यप्रणाली का प्रवर्त्तन
कियः । ये सब बातें, दिन पर दिन, अलीअहमद, अनवर पाशा के पास स्वप्नाविष्ट
की तरह एकान्त में तन्मय होकर सुनते थे । मुस्लिम-जगत् की कितनी ही मर्म-
कथाएँ, कितनी ही वीरता की कहानियाँ, कितनी ही मनुष्योचित अभिव्यक्ति की
घटनाएँ सुन-सुनकर उनका हृदय मानो एक अननुभूत आनन्द से खिल उठता,
मुस्लिम-जगत् के गौरवमय उज्ज्वल भविष्य का चित्र उन्हें अधीर-सा कर डालता
था । तुर्की के एक सर्वप्रधान यूरोप-प्रसिद्ध सेनापति और प्रसिद्ध नेता जो तुर्की
के भाग्य-परिवर्त्तन के प्रधान अवलम्बन थे, जब ऐसे एक प्रसिद्ध व्यक्ति भारत के
एक नगण्य तरुण युवक के साथ निःसंकोच दिल खोलकर बातें करते होते, तब एक
ओर जहां उनकी प्रशस्त उन्नत छाती फूलकर स्पन्दन करने लगती, वहां दूसरी
ओर वैसे ही उसी एक मुहूर्त्त में उनका मन भारत की उस हीनता और दीनतापूर्ण
जीवन-यात्रा के प्रतिदिन के अपमानों की कहानी स्मरण कर मानो अनजाने में
ही घोर अंग्रेज-विद्वेषी हो उठता, और उनकी धमनियों का रक्त नाच-नाचकर
दुर्निवार वेग से उन्हें विप्लववादियों के दल में खींचकर ला रखता ।
पीछे अलीअहमद आदि कई भारतवासियों ने तुर्की का देश देखने की इच्छा
प्रकट की तो तुर्की के भिन्न-भिन्न स्थानों के राजप्रतिनिधियों ने बड़ा समारोह
करके राज-सम्मान के साथ उन्हें अपना सारा देश दिखलाया । इस प्रकार देश में
भ्रमण करते समय जब नगर-नगर में तुर्क नर-नारी इकट्ठे होकर ऊंचे स्वर में
जयकार बुलाकर उनका आदर करते, जब राजपथ के दोनों ओर झरोखों में से
सुन्दरियों को उत्सुक दृष्टि और उनके हाथों से टपके हुए फूल उनके अंगों पर
झड़ पड़ते, तब वे भारतवासी तुर्क देश को भारतवर्ष की अपेक्षा भी सौ गुना
अधिक अपना समझकर चाहने लगते । स्वदेश में उन्हें अंग्रेजों के नजदीक जो
सलूक मिलता उसके साथ वे इन तुर्कों के व्यवहार की तुलना किए बिना न रह
सकते, इस प्रकार अली अहमद विप्लव मन्त्र में दीक्षित हुए और अन्य अनेक
भारतवर्षीय मुसलमानों की तरह अलीअहमद भी तरुण तुर्क (यंग टर्क) दल में
शामिल हो गए ।
इसी तुर्की-इटालियन युद्ध के समय पंजाब के एक और युवक, अबू सैयद,
रंगून से ईजिप्ट गए और फिर ईजिप्ट से तुर्की आए । इन्हीं अबू सैयद के अनुरोध
और प्रस्ताव से तरुण तुर्क दल के एक सदस्य, ताफ़्रिक बे को सन् 1916 में रंगून
भेजा गया । रंगून के एक मुसलमान व्यवसायी अहमद मुल्ला दाऊद को ताफ़्रिक
बे तुर्की का कोन्सल नियुक्त करा गए । पिछले युद्ध के समय यह मुल्ला दाऊद ही
तुर्की के काँसल रूप में रंगून मे थे ।