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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 408 में से

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पृष्ठ 162

160 / बन्दी जीवन
के जर्मन कौन्सल के पास भेजा। इस रुपए का कुछ अंश बर्मा जाने वाले सिक्खों
की खातिर खर्च हुआ और बाकी बैंकाक के एक बंगाली वकील की मार्फत बंगाल
के विप्लवियों के पास भेजा गया। कहते हैं, इसी बंगाली वकील ने, यह सब
विप्लवायोजन की बात अन्त में अंग्रेज गवर्नमेण्ट के सामने खोल दी। जो विप्लवा-
योजन युद्ध छिड़ने से बहुत पहले से ही करना उचित था जब वही आयोजन युद्ध
के समय में बड़ी दौड़-धूप में किया गया, तब ऐसे तुच्छ जीवों से भी काम लेना
आवश्यक हो गया। न जाने किसकी सिफारिश पर इस बंगाली वकील को इस
काम पर लगाया गया था। जो भी हो, इस प्रकार विदेश की विप्लव योजना
विफल हुई।—किन्तु बर्मा के कार्यकर्ताओं ने एक बार और विप्लव की चेष्टा कर
देखी।
सोहनलाल पाठक और नारायणसिंह ये दो जने एक बार फिर बर्मा में
विभिन्न स्थानों की छावनियों में जाकर सिपाहियों के बीच विप्लवमन्त्र का
प्रचार करने लगे। सोहनलाल बर्मा के एक गोलन्दाज सिपाहियों के दल में अंग्रेज-
विद्वेष फैलाने लगे, अंग्रेजों की तरफ रहकर प्राणों की बलि देने में कुछ भी सार्थ-
कता नहीं है, यही बात उन्हें समझाने लगे। यदि प्राण देने ही हों तो स्वदेश और
स्वधर्म के लिए प्राण देने का कितना महान् गौरव है, यह भी सिपाहियों को
समझाने लगे। सिपाहियों द्वारा भले ही उनका कोई अनिष्ट न हुआ किन्तु सिपा-
हियों के एक जमादार ने एक दिन सोहनलाल को पकड़ लिया। उस दिन उस
जगह उस जमादार और सोहनलाल के सिवाय और कोई नहीं था। सोहनलाल
के जामे की पाकेट में तब दो-तीन रिवाल्वर और भरपूर गोलियाँ भी थीं, किन्तु
क्या जाने सोहनलाल उस घड़ी किसी स्वप्न की खुमारी में थे कि उस दिन रिवा-
ल्वर की सहायता से उन्होंने उस प्राणघाती जमादार के हाथ से मुक्ति पाने की
कोई चेष्टा ही नहीं की। उस दिन ऐसी अवस्था में सोहनलाल के मुँह से केवल
कुछ ऐसे ही शब्द निकले थे—“अरे भाई तू मुझे पकड़ा देगा? तू क्या भूला जाता
है कि मैं तेरा भाई हूँ? भाई होकर भाई को पकड़ा देगा? भाई को पकड़ा देने
में तुझे क्या कुछ भी दर्द नहीं होता? अरे, तू कैसा भाई है, भाई होकर भाई को
पकड़ाए देता है?” लेकिन जमादार सोहनलाल को खींच ही ले चला। यह
सच है कि सोहनलाल बहुत बलिष्ठ न थे किन्तु यह बात भी सच है कि कोई भी
आदमी दूसरे एक आदमी को किसी और की सहायता बिना पूरी तरह काबू नहीं
कर सकता, चाहे वह कितना ही बलवान् व्यक्ति क्यों न हो। असल बात यह है
कि सोहनलाल ने उस स्वार्थान्ध जमादार के ऊपर जरा भी शारीरिक बल का
प्रयोग नहीं किया। इस प्रकार अंग्रेजों के पंजे में पड़ने का अर्थ उनके सामने खूब
सुस्पष्ट था, इच्छा होती तो वे उस प्राणलोलुप जमादार के हाथ से, रिवाल्वर की
सहायता से क्षणभर में छुटकारा पा सकते थे। किन्तु न जाने भगवान् ने उनके
मन को उस घड़ी किस दिव्य-लोक में भेज दिया था—वे मानो उस दिन इस
संसार में एकदम थे ही नहीं।