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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 408 में से

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पृष्ठ 160

158 / बन्दी जीवन
बलकान युद्ध समाप्त हो जाने पर अथवा यूरोपीय युद्ध आरम्भ हो जाने के
बाद अलीअहमद देश में लौट आए और कुछ दिन घर पर रहकर अपनी स्त्री के
आभूषण आदि बेचकर कुछ थोड़ा रुपया ले अपना व्यापार करने के लिए रंगून
चले आए । कौन्स्टैण्टिनोपल से कायमअली नामक एक और भारतीय मुसलमान
को तुर्क लोगों ने दिसम्बर सन् 1914 में तरुण तुर्क दल का प्रतिनिधि बनाकर
रंगून भेजा । कायमअली और अलीअहमद सिद्दीकी दोनों ने रंगून आकर परस्पर
मिलने के बाद तुर्की के नेतृत्व में बर्मा में विप्लव-षड्यन्त्र आरम्भ कर दिया । कुछ
ही दिनों में इन्होंने स्थानीय मुसलमानों के पास से पन्द्रह हज़ार रुपया चन्दा जमा
कर लिया। इस चन्दा करने के सम्बन्ध में एक बात यहाँ कहे बिना नहीं रह
सकता, वह यह कि बंगाल के सम्पन्न व्यक्ति विप्लववादियों की धन से ज़रा भी
सहायता न करते थे, इसी से बंगाल में राजनैतिक डकैती का प्रादुर्भाव अनिवार्य
हो गया था ।
एक ओर यदि ये पैन-इस्लामिक (विश्व-इस्लामिक) दल के मुसलमान विप्लव
का आयोजन करते थे, तो दूसरी ओर अमेरिका का 'गदर' दल भी निश्चेष्ट न
था। खेमचन्द दामजी नामक एक गुजराती सज्जन किसी समय रंगून से अमेरिका
गए और अमेरिका में आते ही वहाँ के गदर दल में सम्मिलित हो गए। पहले-
पहल इन्हीं खेमचन्द की सहायता से केवल बर्मा में 'गदर' पत्रिका भेजी जाया
करती थी, युद्ध के समय यह पत्रिका गुजराती, हिन्दी और उर्दू तीन भाषाओं
में छापी जाती थी । यूरोप के युद्ध के कारण बर्मा के मुसलमान लांग भी उत्ते-
जित हो उठे थे और इस 'गदर' पत्रिका के प्रभाव से उत्तेजना का स्रोत क्रमशः
बढ़ता गया । इसी समय बम्बई में बिलोची पल्टन के एक सैनिक ने अपने अंग्रेज़
अफ़सर की हत्या कर डाली, जिससे इस सेनादल को फिर यूरोप न भेजकर रंगून
में रोक रखा गया । रंगून के मुसलमान 'गदर' अखबार के सहारे इस सेना में
विप्लव की बातों का प्रचार करते रहे; फलतः जनवरी, 1915 तक यह सेनादल
खुल्लमखुल्ला विप्लव आरम्भ करने को उद्यत हो गया, किन्तु समाचार का
आभासमात्र मिलते ही सेनापतियों ने इस दल को कठोर दण्ड दिये। दो सौ
`बलोचों को भारत की भिन्न-भिन्न जेलों में भेज दिया ।
इस समय सिंगापुर में दो रेजिमेण्टें थीं । उनमें से एक के साथ बर्मा के मुसल-
मान विप्लवी दल का जोड़-तोड़ हो गया । सिंगापुर के कासिममंसूर नामी एक
गुजराती मुसलमान ने रंगून में अपने पुत्र को पत्र लिखा, उसमें तुर्की के जो कौंसल
रंगून में थे उनके नाम भी एक पत्र था । उस पत्र में लिखा था, सिंगापुर का
एक सेनादल विद्रोह करके तुर्की का साथ देने को तैयार है और इस समय तुर्की
का एक लड़ाऊ जहाज़ सिंगापुर में आना आवश्यक है। यह पत्र अंग्रेज़ों के हाथ
लग गया और सिंगापुर की रेजिमेंट को दूसरी जगह भेज दिया गया ।
इसी बीच अमेरिका के 'गदर' दल के लोग भी सिंगापुर में आ उपस्थित
हुए। इन्होंने एक ओर जहाँ उसी सिंगापुर की दूसरी सेना के बीच प्रचार आरम्भ