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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 408 में से

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पृष्ठ 163

बर्मा की कहानी / 161
सोहनलाल जेल में डाल दिये गए सही, किन्तु जेल के किसी नियम का
पालन वे न करते थे। जेल के अधिकारी जेल के परिदर्शन के लिए आते तो सारे
कैदी जिस प्रकार आईने के मुताबिक उनको सम्मान दिखलाते थे, सोहनलाल
वैसा न करते। वे कहते—मैं अंग्रेजों के राजत्व को ही जब अन्याय और अत्या-
चार मानता हूँ तब अंग्रेजों की जेल के नियमों का ही क्योंकर पालन करूँ ?''
जेल सुपरिटेण्डेण्ट अथवा जेलर उनके सम्मुख आते तो वे और सबकी तरह
सम्मान के लिए उठकर खड़े न होते, इसी से जब बर्मा के लाटसाहब सोहनलाल
के पकड़े जाने के ठीक बाद ही जेल का परिदर्शन करने आए, तब जेलर साहब
ने अत्यन्त संकोच के साथ सोहनलाल से अनुरोध किया कि वे कम-से-कम लाट-
साहब को तो सम्मान दिखाएँ, किन्तु वे इस पर सहमत न हुए। किन्तु ऐसे निर्भीक
और आत्ममर्यादा पर इस प्रकार सुप्रतिष्ठित होते हुए भी सोहनलाल मनुष्य के
साथ मनुष्य की तरह व्यवहार करते थे, कभी किसी प्रकार की अभद्रता नहीं
दिखाते थे। कोई उनके साथ बात करने आए तो वे भद्रतापूर्वक यथोचित सम्मान
करके उससे बात करते। कोई उनके साथ खड़ा होकर बात करे तो वे भी खड़े
होकर बात करते। इसी से लाटसाहब के सोहनलाल के पास आने से ठीक पहले
जेलर सोहन के पास आकर खड़े होकर बात करने लगे। इसीलिए लाटसाहब के
आने पर नए सिरे से उन्हें खड़ा नहीं होना पड़ा, और इस प्रकार जेलर ने अपनी
और लाटसाहब की मर्यादा की उस बार रक्षा की।
लाटसाहब ने प्रायः दो घण्टे सोहनलाल के साथ वार्तालाप किया। लाट-
साहब ने सोहनलाल से बड़ा अनुरोध किया कि वे क्षमा माँग लें; लाटसाहब ने
कहा कि वे केवल एक बार क्षमा की प्रार्थना कर दें, बस, उनकी प्राणदण्ड से रक्षा
हो जायगी। सोहनलाल ने लाटसाहब को भली प्रकार समझाकर कहा कि इस
समय जो कुछ अन्याय या जोर-जुल्म हो रहा है, सब अंग्रेजों की तरफ से ही हो
रहा है, अंग्रेजों ने केवल डंडे के जोर से इस देश पर दखल किया है और डंडे के
जोर से ही इस देश में शासन कर रहे हैं, इसलिए क्षमा-प्रार्थना यदि किसी को
करनी चाहिए तो लाटसाहब को ही, —सोहनलाल ने यह सब बात लाटमाहब
को समझा देनी चाही।
फाँसी होने के दिन जब सोहनलाल को फाँसी के तख्ते पर खड़ा किया गया
तब भी एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने उन्हें फिर एक बार समझाया कि अब भी यदि वे
केवल मुँह से क्षमा-प्रार्थना कर लें तो एकदम उनकी प्राण-दण्ड से रक्षा हो सकती
है। इन अंग्रेज अधिकारी ने सोहन से कहा कि उनके पास आदेश आया है कि
अन्तिम बार एक दफ़ा फिर सोहनलाल से क्षमा-भिक्षा मांगने के लिए अनुरोध
किया जाय। जीवन और मरण के सन्धि-स्थल में खड़े सोहनलाल के मुंह की ओर
जेल के कर्मचारी और राज्याधिकारी अवाक् होकर ताक रहे थे। सोहनलाल
धीरे-धीरे मुस्कराने लगे और अनायास ही बोले—"क्षमा माँगनी हो तो अंग्रेज
मुझसे क्षमा मांगें, मैं किसलिए तुम्हारे पास क्षमा मांगने आऊँगा।" अंग्रेज राज्या-