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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 408 में से

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पृष्ठ 161

बर्मा की कहानी / 159

कर दिया, वहां दूसरी ओर बर्मा में भी अपने आदमी भेजे। सन् 1915 के आरम्भ
में ही सोहनलाल पाठक और हसनखां नामक गदर दल के दो व्यक्तियों ने बैंकाक
से रंगून आकर अपना केन्द्र स्थापित कर दिया। यहां एक बात गौर करने की
है कि 'गदर' दल में मुसलमानों को भी लिया जाता था किन्तु मुसलमान विप्लव
दल में हिन्दुओं के लिए स्थान न था।
सिंगापुर की सेना मे प्रचार करने का फल यह हुआ कि इस बार सचमुच ही
विप्लव आरम्भ हो गया। यद्यपि इस सिंगापुर के विप्लवायोजन के साथ पंजाब
के विप्लवायोजन का कोई भी सम्बन्ध न था, तो भी आश्चर्य की बात है कि 21
फरवरी सन् 1915 को सिंगापुर में विप्लव शुरू हुआ और पंजाब में भी ठीक
यही 21 फरवरी विप्लव शुरू करने की तिथि निश्चित हुई थी। इस 21 फरवरी
के दिन सिंगापुर के सैनिक बहुत दिनों के संस्कारों को तोड़कर खुल्लमखुल्ला
अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो गए। एक सप्ताह के लिए सिंगापुर भारतीय सेना के
हाथ में हो गया, किन्तु सिंगापुर भारत के बीच में न था इससे विप्लव की वह
आग चारों तरफ फैल न सकी, और एक सप्ताह के बाद रूसी, जापानी और
अंग्रेजों के लड़ाकू जहाजों ने आकर सिंगापुर को घेर लिया। इस एक सप्ताह-भर
विप्लवियों ने स्थानीय अंग्रेजी सेना के साथ योग्यता से युद्ध किया था, और अंग्रेजी
सेना को उस युद्ध में हार भी माननी पड़ी थी। किन्तु रूस इंग्लैण्ड और जापान
के जंगी जहाज आ जाने पर दो दिन की लड़ाई के बाद अन्त में बाध्य होकर
विप्लवियों को भागना पड़ा। विप्लवियों ने वनों-जंगलों में जाकर आश्रय लिया,
जो भाग न सके, वे वहीं अंग्रेजों के हाथ बन्दी हो गए। सिंगापुर से भागकर एक
ही बार छुटकारा पाने का भी कोई उपाय न था, कुछ ही दिनों में प्रायः सभी
विप्लवी पकड़े गए—अंग्रेज़ी अखबारों मे छपा, सिंगापुर में एक दंगा हो गया,
किन्तु अंग्रेज़ गवर्नमेण्ट और भारतीय विप्लव दल दोनों ही की समझ में निःसंशय
रूप से आ गया कि विप्लवियों का देशी सिपाहियों को हाथ में कर लेना कुछ वैसी
कठिन बात नहीं है।
सिंगापुर की दुर्घटना के बाद 'गदर' दल के दो-एक बचे हुए व्यक्ति बर्मा
चले आये और पूरे उद्यम से फिर वे देशी सेना में विप्लव की बात का प्रचार
करने लगे। एक तरफ से बर्मा के सेनादल में विप्लव प्रचार चलने लगा, दूसरी
तरफ वैसे ही बर्मा के सीमान्त पर स्याम में भी जर्मनों की सहायता से विप्लव
का आयोजन होता रहा। उत्तर स्याम प्रदेश में जर्मन इंजीनियरों की अधीनता
में एक रेलवे लाइन तैयार होती थी। इस कार्य में अधिकांश मिस्त्री और मजदूर
पंजाबी ही थे। इसी रेलवे लाइन की दिशा से बर्मा पर आक्रमण करने की
योजना चलने लगी। अमेरिका, चीन आदि देशों से लौटे हुए सिक्ख और पंजाबी
यहीं स्याम के सीमान्त में इकट्ठे होने लगे।
शिवदयाल कपूर नामक एक सिक्ख (पंजाबी) अमेरिका से लौटते समय
शांघाई आए। शांघाई के एक जर्मन ने इन्हीं की मार्फत बहुत-सा रुपया बैंकाक